संरचनात्मक परिवर्तन क्या है?
संरचना का मतलब है समाज का टिकाऊ ढाँचा: लोग गाँवों और शहरों में कैसे बँटे हैं, क्या काम करते हैं, और धन व शक्ति कैसे बँटी है। जब यह ढाँचा ही बदल जाए तो उसे संरचनात्मक परिवर्तन कहते हैं।
आधुनिक भारत में तीन ताकतें साथ-साथ काम कर रही थीं: उपनिवेशवाद, औद्योगीकरण और नगरीकरण। ये आपस में जुड़ी हैं: औपनिवेशिक शासन ने तय किया कि कौन-से उद्योग बढ़ें, और उद्योगों ने तय किया कि कौन-से शहर बढ़ें।
उपनिवेशवाद और भारतीय समाज पर उसका प्रभाव
उपनिवेशवाद तब होता है जब एक देश दूसरे पर राज करे और उसे अपने लाभ के लिए इस्तेमाल करे। पहले के शासक भी कर लेते थे, पर ब्रिटिश उपनिवेशवाद अलग था: उसने भारत की पूरी अर्थव्यवस्था को ब्रिटेन के उद्योगों की सेवा में लगा दिया।
- कच्चा माल और बाज़ार: भारत से सस्ती कपास, नील, जूट और चाय गई। बदले में महँगा मशीनी माल आया।
- नए भूमि कानून: नई लगान व्यवस्थाओं ने ज़मीन को ख़रीद-बिक्री की चीज़ बना दिया और नए ज़मींदार बनाए।
- लोगों का स्थानांतरण: मज़दूरों को असम के चाय बागानों और विदेशी बागानों में ले जाया गया।
- नए विचार: अंग्रेज़ी शिक्षा, अदालतें, प्रेस और रेल से समानता और राष्ट्रवाद के विचार भी फैले, जो बाद में औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध काम आए।
इसलिए उपनिवेशवाद एक संरचनात्मक बदलाव था: इसने काम, ज़मीन, नगर और विचार सब एक साथ बदले।
वि-औद्योगीकरण: जब पुराने हस्तशिल्प उजड़े
ब्रिटेन में औद्योगीकरण का अर्थ था ज़्यादा कारख़ाने। औपनिवेशिक भारत में हस्तशिल्प के लिए इसका अर्थ अक्सर उल्टा हुआ। मैनचेस्टर के सस्ते मिल कपड़े ने हाथ से बुने कपड़े को बाहर कर दिया। बुनकर और कतैये बेरोज़गार हुए और बहुत-से खेती पर लौट गए। इसे वि-औद्योगीकरण कहते हैं।
शिल्प और व्यापार पर टिके पुराने नगर, जैसे सूरत, मसूलीपट्टनम और मुर्शिदाबाद, की आबादी और महत्त्व घट गया। उसी समय नए औपनिवेशिक शहर बढ़े। यानी नगरों का नक्शा ही बदल गया।
औपनिवेशिक भारत में औद्योगीकरण
कुछ आधुनिक उद्योग आए ज़रूर: कलकत्ता के आसपास जूट मिलें, बंबई और अहमदाबाद में कपास मिलें, कोयला खदानें और चाय बागान। रेलें मुख्य रूप से कच्चा माल बंदरगाहों तक ले जाने के लिए बनीं।
ये उद्योग छोटे थे और वहीं बढ़े जहाँ ब्रिटिश व्यापार को फ़ायदा था। बंदरगाह नगर बंबई, कलकत्ता और मद्रास बड़े केंद्र बने। बागानों में काम कठिन, कम मज़दूरी वाला और कड़े नियंत्रण में था। अंग्रेज़ी शिक्षा से क्लर्क, शिक्षक और वकीलों का नया मध्यम वर्ग बना।
स्वतंत्र भारत में औद्योगीकरण
1947 के बाद नेताओं ने उद्योग को ग़रीबी मिटाने और आत्मनिर्भर बनने का रास्ता माना। राज्य ने ख़ुद सार्वजनिक क्षेत्र में भारी उद्योग बनाए: भिलाई, राउरकेला और दुर्गापुर के इस्पात संयंत्र, बड़े बाँध, बिजलीघर और मशीन कारख़ाने। इनके आसपास नए औद्योगिक नगर बसे।
इन इकाइयों की नौकरियाँ संगठित या औपचारिक थीं: तय वेतन, तय घंटे, पेंशन और नियम। पर भारत के थोड़े-से मज़दूरों को ही ऐसी नौकरी मिली। ज़्यादातर खेती या असंगठित (अनौपचारिक) क्षेत्र में रहे। 1991 के बाद निजी उद्योग और सेवाएँ तेज़ी से बढ़ीं।
भारत में नगरीकरण
नगरीकरण का अर्थ है नगरों और शहरों में रहने वाले लोगों का बढ़ता हिस्सा। 1901 में लगभग 11% भारतीय नगरों में रहते थे; 2011 तक यह लगभग 31% हो गया।
- औपनिवेशिक काल: पुराने शिल्प नगर घटे; बंदरगाह और प्रशासनिक शहर बढ़े; शासकों के लिए पहाड़ी नगर (हिल स्टेशन) और छावनियाँ बनीं।
- 1947 के बाद: लोग नौकरी और पढ़ाई के लिए शहर आए। महानगर बहुत तेज़ी से बढ़े।
- समस्याएँ: झुग्गियाँ, भीड़, कमज़ोर आवास, पानी और परिवहन; ज़्यादातर प्रवासी बिना सुरक्षा के अनौपचारिक काम करते हैं।
शहर सामाजिक जीवन भी बदलते हैं: लोग अनजान लोगों से मिलते हैं, सार्वजनिक जगहों पर जाति के नियम ढीले पड़ते हैं, और वर्ग व पेशा जैसी नई पहचानें अहम होती हैं। पर पुरानी पहचानें ख़त्म नहीं होतीं।
परीक्षा कोना
इस इकाई के लगभग 5 अंक होते हैं। आम प्रश्न: उपनिवेशवाद की परिभाषा और दो प्रभाव; नगरों के उदाहरण के साथ वि-औद्योगीकरण समझाइए; औपनिवेशिक और स्वतंत्र भारत के औद्योगीकरण की तुलना; उपनिवेशवाद ने नगरीकरण को कैसे आकार दिया। हमेशा भारतीय उदाहरण दें और कारण → प्रभाव जोड़ें।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- संरचनात्मक परिवर्तन: समाज के बुनियादी ढाँचे (काम, बसावट, धन) में बदलाव।
- उपनिवेशवाद: एक देश का अपने आर्थिक लाभ के लिए दूसरे पर राज।
- वि-औद्योगीकरण: सस्ते मशीनी माल के कारण हस्तशिल्प का पतन।
- औपनिवेशिक उद्योग: जूट, कपास मिलें, कोयला, बागान; बंदरगाह बंबई, कलकत्ता, मद्रास।
- 1947 के बाद: राज्य के नेतृत्व में भारी उद्योग (सार्वजनिक क्षेत्र), जैसे भिलाई इस्पात संयंत्र।
- संगठित/औपचारिक क्षेत्र: तय वेतन, नियम, सुरक्षा। असंगठित/अनौपचारिक: इनमें से कुछ नहीं।
- नगरीकरण: नगरों में लोगों का बढ़ता हिस्सा (1901 में लगभग 11%, 2011 में लगभग 31%)।
हल किए गए उदाहरण
1. ब्रिटिश उपनिवेशवाद को केवल शासक का बदलना नहीं, संरचनात्मक परिवर्तन क्यों कहते हैं?
पहले के शासक कर लेते थे पर अर्थव्यवस्था लगभग वैसी ही रहती थी। अंग्रेज़ों ने पूरी अर्थव्यवस्था को ब्रिटिश उद्योग की सेवा में बदल दिया: ज़मीन बिकाऊ बनी, हस्तशिल्प घटे, नकदी फ़सलें फैलीं, निर्यात के लिए रेल और बंदरगाह बने। काम, नगर और विचार सब साथ बदले। यही ढाँचे का बदलाव है।
2. मुर्शिदाबाद का एक बुनकर परिवार 1780 में और 1880 में। क्या बदला और क्यों?
1780 में वे बढ़िया कपड़ा बुनकर एक व्यस्त व्यापारी नगर में बेचते थे। 1880 तक मैनचेस्टर के सस्ते कपड़े ने उनका बाज़ार छीन लिया। आमदनी घटी, बहुत-से खेतिहर मज़दूर बने, और नगर भी सिकुड़ गया। कारण: औपनिवेशिक व्यापार। प्रभाव: वि-औद्योगीकरण और पुराने नगर का पतन।
3. औपनिवेशिक भारत और स्वतंत्र भारत के औद्योगीकरण की तुलना कीजिए।
औपनिवेशिक: छोटा, ब्रिटिश व्यापार की मदद के लिए (जूट, कपास, बागान, खदानें), बंदरगाह नगरों में केंद्रित, हस्तशिल्प घटे। स्वतंत्र भारत: राज्य ने आत्मनिर्भरता के लिए भारी उद्योग (इस्पात, बाँध, बिजली) की योजना बनाई, भिलाई जैसे नए नगर बसाए, संगठित नौकरियाँ बनाईं, पर ज़्यादातर मज़दूर अनौपचारिक ही रहे।
4. स्लाइडर वाला विचार: 1951 में भारत का नगरीय हिस्सा 17% और 2011 में 31% था। कितने प्रतिशत अंक बढ़ा और इसका क्या अर्थ है?
31 − 17 = 14 प्रतिशत अंक। यानी आबादी का कहीं बड़ा हिस्सा अब नगरों में रहता है, क्योंकि लोग काम के लिए आए और नगर बढ़े। फिर भी 2011 में लगभग दो-तिहाई भारतीय गाँवों में रहते थे।
आम गलतियाँ
- यह मानना कि उपनिवेशवाद का अर्थ केवल विदेशी शासक था। इसका अर्थ था पूरी अर्थव्यवस्था को शासक देश के लिए बदलना।
- यह मानना कि औद्योगीकरण हमेशा नौकरियाँ बढ़ाता है। औपनिवेशिक भारत में पहले इसने बहुत-से शिल्प रोज़गार नष्ट किए (वि-औद्योगीकरण)।
- बंदरगाह नगर (नए, औपनिवेशिक) और पुराने शिल्प नगर (पतन) को मिला देना: बंबई बढ़ा, सूरत सिकुड़ा।
- यह मानना कि ज़्यादातर भारतीय औपचारिक कारख़ाना नौकरी करते हैं। ज़्यादातर खेती या अनौपचारिक क्षेत्र में हैं।