अतीत में जाति: वर्ण और जाति
अंग्रेज़ी शब्द caste पुर्तगाली casta से आया, जिसका अर्थ है शुद्ध नस्ल। भारत में इसमें दो विचार मिले हैं:
- वर्ण (शाब्दिक अर्थ 'रंग'): ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र की चार भागों वाली योजना। 'अछूतों' को इसके बाहर रखा गया। यह पूरे भारत का विचार है।
- जाति: असली स्थानीय समूह, हज़ारों, हर एक का अपना नाम। जातियाँ क्षेत्र-क्षेत्र में अलग हैं।
जाति हमेशा के लिए स्थिर नहीं थी: समूह कभी ऊपर-नीचे हुए और सदियों में बदलाव आया। पर आधार हमेशा जन्म रहा।
जाति व्यवस्था की मुख्य विशेषताएँ
- जन्म से सदस्यता: जाति में जन्म होता है और आमतौर पर छोड़ी नहीं जा सकती।
- अंतर्विवाह: सिर्फ़ अपनी जाति में शादी के कड़े नियम।
- खान-पान के नियम: किसके साथ खाएँ और किससे भोजन लें।
- संस्तरण (ऊँच-नीच): जातियों का 'ऊँची' से 'नीची' तक क्रम।
- खंडीय संगठन: जातियाँ उप-जातियों में और वे फिर उप-उप-जातियों में बँटती हैं।
- वंशानुगत पेशा: हर जाति एक पारंपरिक काम से जुड़ी थी, जो परिवार में आगे चलता था।
पीछे के दो सिद्धांत
भिन्नता और अलगाव: हर जाति दूसरों से अलग रखी जाती है (शादी, भोजन, काम)। संपूर्णता और संस्तरण: हिस्से मिलकर एक पूरा बनाते हैं, पर शुद्धता और अशुद्धता के क्रम में: पुजारी जातियाँ सबसे 'शुद्ध' कही गईं, मरे जानवर उठाने या सफ़ाई जैसे 'दूषित' काम करने वाली जातियाँ 'अशुद्ध'। इसी विचार से अस्पृश्यता (छुआछूत) को सही ठहराया गया।
जाति आर्थिक ताकत से भी मेल खाती थी: 'ऊँची' जातियों के पास आमतौर पर ज़मीन और धन था। पर यह मेल पूरा नहीं था; कुछ 'मध्यम' जातियों के पास अपने गाँवों में ज़मीन और ताकत थी।
उपनिवेशवाद और जाति
- जनगणना: 1860 के दशक से, और खास तौर पर हर्बर्ट रिज़ले के समय 1901 की जनगणना में, अंग्रेज़ों ने सभी जातियों को गिनने और क्रम देने की कोशिश की। जातियाँ ऊँचे स्थान के लिए अर्ज़ियाँ भेजने लगीं। गिनती से जाति और कठोर और राजनीतिक हुई।
- लगान कानूनों ने ऊँची जाति के ज़मीनदारों को कानूनी मालिकाना हक दिया, उनकी ताकत बढ़ी।
- विशेष सूचियाँ: भारत सरकार अधिनियम 1935 ने विशेष मदद के लिए जातियों और जनजातियों की अनुसूचियाँ (सूचियाँ) बनाईं। यही अनुसूचित जातियाँ और अनुसूचित जनजातियाँ बनीं।
- सुधार: ज्योतिबा फुले, पेरियार, गांधी और बी.आर. आंबेडकर जैसे नेताओं के छुआछूत-विरोधी आंदोलन इसी दौर में बढ़े।
यानी आज की जाति आंशिक रूप से उपनिवेशी राज की उपज है, सिर्फ़ 'प्राचीन परंपरा' नहीं।
वर्तमान में जाति
- संविधान: अनुच्छेद 17 ने छुआछूत खत्म की; शिक्षा, नौकरी और विधायिका में आरक्षण अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग की मदद करता है।
- सार्वजनिक जीवन में कमज़ोरी: शहर, कारखाने, रेल और स्कूल लोगों को मिलाते हैं। पेशा अब जाति से कम बँधा है।
- निजी जीवन में मज़बूती: ज़्यादातर शादियाँ अब भी जाति के अंदर होती हैं।
- राजनीति: जाति वोट और संगठन का आधार बनी। एम.एन. श्रीनिवास ने प्रबल जाति शब्द उन जातियों के लिए दिया जिनकी संख्या ज़्यादा हो, ज़मीन हो और स्थानीय ताकत हो, जैसे अपने-अपने क्षेत्रों में जाट, यादव, रेड्डी, वोक्कालिगा और मराठा।
- विशेषाधिकार वालों के लिए अदृश्यता: ऊँची जाति के शहरी मध्यम वर्ग के लोग अक्सर कहते हैं 'अब जाति मायने नहीं रखती', क्योंकि उनके जातिगत फ़ायदे (शिक्षा, संपर्क, संपत्ति) पहले से जमा हैं। अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़े वर्गों के लिए जाति बहुत दिखती है: उन्हें मुख्य रूप से जाति से ही पहचाना जाता है।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- जाति: जन्म पर आधारित, ऊँच-नीच में बँटे समूहों की व्यवस्था।
- वर्ण: चार भागों की अखिल भारतीय योजना। जाति: हज़ारों स्थानीय समूह।
- अंतर्विवाह: अपनी ही जाति में शादी।
- संस्तरण: जातियों का 'ऊँची' से 'नीची' तक क्रम।
- शुद्धता और अशुद्धता: कुछ जातियों को 'शुद्ध' और कुछ को 'अशुद्ध' मानने वाला विचार।
- खंडीय संगठन: जातियाँ उप-जातियों में, वे फिर आगे बँटती हैं।
- अस्पृश्यता: 'अशुद्ध' कही जातियों का चरम बहिष्कार; अनुच्छेद 17 से समाप्त।
- प्रबल जाति (एम.एन. श्रीनिवास): संख्या में बड़ी, ज़मीन वाली, स्थानीय ताकत वाली जाति।
हल किए गए उदाहरण
1. अर्जुन का परिवार कहता है कि उसे अपनी ही जाति में शादी करनी होगी। यह जाति की कौन सी विशेषता है?
अंतर्विवाह: अपनी जाति के अंदर शादी। यही विशेषता सबसे कम बदली है।
2. एक गाँव में जाटों के पास ज़्यादातर ज़मीन है और वे सबसे बड़ा समूह हैं। पंचायत के फ़ैसले वही लेते हैं। इन्हें क्या कहेंगे?
प्रबल जाति (एम.एन. श्रीनिवास): संख्या में बड़ी, ज़मीन वाली और स्थानीय रूप से ताकतवर, भले कर्मकांडी क्रम में 'सबसे ऊँची' न हो।
3. 1901 में बहुत सी जातियों ने जनगणना अधिकारियों को अर्ज़ियाँ क्यों भेजीं?
जनगणना जातियों को क्रम दे रही थी। ऊँचा स्थान मिलना सम्मान था, इसलिए जाति संगठनों ने ऊँची जगह माँगी। इससे जाति और संगठित और राजनीतिक हुई।
आम गलतियाँ
- वर्ण और जाति को एक समझना। वर्ण चार भागों का विचार है; जाति हज़ारों असली स्थानीय समूह हैं।
- यह सोचना कि जाति हज़ारों साल से बिना बदले चली आई। वह बदली और उपनिवेशी राज ने उसे नया रूप दिया।
- यह कहना कि शहरों में कम दिखती है इसलिए जाति खत्म हो गई। शादी और राजनीति में वह अब भी मज़बूत है।
- 'प्रबल जाति' को कर्मकांड में सबसे ऊँची जाति समझना। इसका मतलब है संख्या, ज़मीन और स्थानीय ताकत।