सामाजिक आंदोलन क्या है?
सामाजिक आंदोलन एक बड़े समूह का लंबे समय तक चलने वाला, संगठित प्रयास है, जिसका साझा लक्ष्य समाज में बदलाव लाना (या बदलाव रोकना) होता है।
- साझा लक्ष्य और विचार: लोग मानते हैं कि क्या ग़लत है और क्या बदलना चाहिए।
- संगठन और नेतृत्व: नेता, बैठकें, योजनाएँ होती हैं।
- निरंतरता: यह एक दिन नहीं, लंबे समय तक चलता है।
- सामूहिक कार्रवाई: लोग मिलकर प्रदर्शन, जुलूस, याचिका, मुक़दमे, गीत और मीडिया का सहारा लेते हैं।
दंगा या एक दिन की भीड़ सामूहिक कार्रवाई तो है, पर आंदोलन नहीं, क्योंकि उसमें टिकाऊ संगठन नहीं होता। आंदोलन के जवाब में अक्सर प्रति-आंदोलन भी उठते हैं, जो चीज़ें जैसी हैं वैसी रखना चाहते हैं।
सामाजिक परिवर्तन हर समय धीरे-धीरे होता रहता है (जैसे नगरीकरण)। आंदोलन किसी दिशा में बदलाव के लिए सोचा-समझा प्रयास है।
सामाजिक आंदोलनों के सिद्धांत
1. सापेक्ष वंचना का सिद्धांत
लोगों को लगता है कि उनके पास दूसरों से या जितना हक़ है उससे कम है। यह अन्याय का एहसास ग़ुस्से और सामूहिक कार्रवाई में बदलता है। कमी: बहुत-से वंचित लोग कभी विरोध नहीं करते, और सिर्फ़ एहसास से संगठन नहीं बनता।
2. सामूहिक कार्रवाई का तर्क (मैंकर ओल्सन)
व्यक्ति अपने हित में काम करता है। वह आंदोलन में तभी जुड़ता है जब फ़ायदा लागत से ज़्यादा हो। समस्या: अगर फ़ायदा सबको मिलना ही है, तो मैं जोखिम क्यों लूँ? इसे मुफ़्तख़ोर (फ़्री राइडर) समस्या कहते हैं। कमी: लोग मूल्यों और अपनेपन के लिए भी जुड़ते हैं, सिर्फ़ फ़ायदे के लिए नहीं।
3. संसाधन जुटाने का सिद्धांत (मैकार्थी और ज़ाल्ड)
आंदोलन तब सफल होता है जब वह संसाधन जुटा सके: नेता, पैसा, सदस्य, संगठन और मीडिया। कमी: कुछ आंदोलन बहुत कम संसाधनों में भी सफल होते हैं।
सामाजिक आंदोलनों के प्रकार
- सुधारवादी: व्यवस्था के भीतर रहकर क़ानून, रीति या नीतियाँ धीरे-धीरे बदलता है (जैसे सूचना के अधिकार का अभियान)।
- मुक्तिकामी (प्रतिदानात्मक): सदस्यों के भीतरी जीवन और आचरण को बदलता है (जैसे केरल के एझवा समुदाय में श्री नारायण गुरु का आंदोलन)।
- क्रांतिकारी: पूरी सामाजिक या राजनीतिक व्यवस्था पलटना चाहता है (जैसे रूसी क्रांति)।
पुराने और नए सामाजिक आंदोलन
पुराने आंदोलन (1970 से पहले) राजनीतिक दलों के ज़रिए वर्ग और सत्ता के सवाल उठाते थे, जैसे मज़दूर, किसान और उपनिवेश-विरोधी संघर्ष। नए सामाजिक आंदोलन पहचान, सम्मान, जीवन की गुणवत्ता और पर्यावरण पर हैं, जैसे महिला, पर्यावरण और दलित आंदोलन, और अक्सर दलों से बाहर काम करते हैं। भारत में यह रेखा धुंधली है: चिपको जैसे पर्यावरण आंदोलन रोज़ी और वर्ग के सवाल भी थे।
पर्यावरणीय आंदोलन
पर्यावरण आंदोलन प्रकृति और रोज़ी को जोड़ते हैं। चिपको आंदोलन (1970 का दशक, हिमालय के गाँव) में महिलाओं ने पेड़ों से चिपककर बाहरी ठेकेदारों को पेड़ काटने से रोका। जंगल से उन्हें ईंधन, चारा और पानी मिलता था, इसलिए जंगल बचाना घर बचाना था। इसने उस दूर की सरकार पर भी सवाल उठाया जो स्थानीय जंगल को सिर्फ़ लकड़ी मानती थी।
नर्मदा बचाओ आंदोलन ने बड़े बाँधों पर सवाल उठाया: फ़ायदा किसे (शहर, खेत) और नुक़सान किसे (जिन गाँव वालों और आदिवासियों की ज़मीन डूबी)। पर्यावरण आंदोलन ऐसा विकास माँगते हैं जो ग़रीबों को किनारे न करे।
किसान और मज़दूर आंदोलन
किसान आंदोलन
औपनिवेशिक काल में किसानों ने भारी लगान और अन्यायपूर्ण किराए का विरोध किया, जैसे बारदोली सत्याग्रह (1928, गुजरात)। तेभागा आंदोलन (1946–47, बंगाल) बटाईदारों का था, जो आधी की जगह दो-तिहाई फ़सल चाहते थे। तेलंगाना आंदोलन (1946–51) ज़ुल्मी ज़मींदारों के ख़िलाफ़ था। आज़ादी के बाद नक्सलबाड़ी विद्रोह (1967) हुआ, और 1980 के दशक में बाज़ार से जुड़े किसानों के नए किसान आंदोलन आए, जो बेहतर फ़सल दाम और कम लागत माँगते थे, अक्सर सड़क जाम करके।
मज़दूर आंदोलन
बंदरगाह नगरों में कारख़ाना मज़दूर संगठित होने लगे। पहली आधुनिक ट्रेड यूनियन 1918 में मद्रास में बनी, और 1920 में अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (एटक) बनी। यूनियनें वेतन, घंटों और सुरक्षा के लिए लड़ीं। बाद में यूनियनें दलों के हिसाब से बँट गईं, और उदारीकरण के बाद ठेका और अनौपचारिक काम बढ़ने से कमज़ोर हुईं।
दलित और पिछड़ा वर्ग आंदोलन
दलित आंदोलन छुआछूत और जातिगत अपमान से लड़ते हैं और सम्मान, बराबरी और आत्म-सम्मान माँगते हैं, सिर्फ़ नौकरी या पैसा नहीं। उदाहरण: छत्तीसगढ़ के चमारों में सतनामी आंदोलन, पंजाब का आदि धर्म आंदोलन, महाराष्ट्र का महार आंदोलन, डॉ. बी. आर. आंबेडकर के मंदिर-प्रवेश और पानी के तालाब वाले सत्याग्रह, और दलित पैंथर्स (1972)। दलित साहित्य और कविता एक मज़बूत आवाज़ बनी।
पिछड़ा वर्ग आंदोलन औपनिवेशिक काल में, ख़ासकर दक्षिण में (जैसे ग़ैर-ब्राह्मण आंदोलन) शुरू हुए। इन्होंने शिक्षा, सरकारी नौकरी और राजनीतिक सत्ता में उचित हिस्सा माँगा। आज़ादी के बाद इन्होंने पिछड़े वर्गों के आरक्षण के लिए दबाव बनाया।
आदिवासी आंदोलन
आदिवासी आंदोलन मुख्यतः ज़मीन, जंगल और पहचान पर हैं। बाहरी लोगों, साहूकारों, खनन और बाँधों ने आदिवासियों की ज़मीन छीनी। छोटानागपुर क्षेत्र का झारखंड आंदोलन एक लंबा उदाहरण है: यह बिरसा मुंडा के ज़मींदारों और औपनिवेशिक शासन के ख़िलाफ़ पुराने विद्रोह से प्रेरित हुआ, पढ़े-लिखे आदिवासी नेताओं के समूहों से बढ़ा, और ज़मीन-संसाधनों पर नियंत्रण और अलग राज्य माँगा। 2000 में झारखंड राज्य बना। पूर्वोत्तर के आंदोलनों ने भी पहचान और स्वायत्तता के सवाल उठाए।
महिला आंदोलन
19वीं सदी में समाज सुधारकों ने विधवा पुनर्विवाह, बाल विवाह के विरोध और लड़कियों के स्कूलों के लिए काम किया। 20वीं सदी की शुरुआत में महिलाओं ने राष्ट्रीय संगठन बनाए, जैसे विमेंस इंडिया एसोसिएशन (1917) और अखिल भारतीय महिला सम्मेलन (1926), और बड़ी संख्या में स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया।
1970 के दशक से दूसरा दौर शुरू हुआ। दलों से स्वायत्त महिला समूहों ने दहेज हत्या, बलात्कार और घरेलू हिंसा के ख़िलाफ़ और बराबर वेतन व अधिकारों के लिए अभियान चलाए। 'टुवर्ड्स इक्वॉलिटी' (1974) रिपोर्ट ने दिखाया कि महिलाएँ अब भी कितनी पीछे थीं। चिपको जैसे किसान, आदिवासी और पर्यावरण आंदोलनों में भी महिलाओं ने आगे बढ़कर भूमिका निभाई।
करके देखें: आंदोलन पहचानिए
इस हफ़्ते के किसी विरोध-प्रदर्शन की एक ख़बर पढ़िए। "सा-सं-ने-स" से जाँचिए: क्या साझा लक्ष्य, संगठन, नेता और विचार हैं, और क्या यह लंबे समय से चल रहा है? फिर तय कीजिए: सुधारवादी, मुक्तिकामी या क्रांतिकारी? पुराना (वर्ग) या नया (पहचान, पर्यावरण)? 3D के खुले खेल में पिकर से तुलना कीजिए।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- सामाजिक आंदोलन: साझा लक्ष्य वाला लंबा, संगठित, सामूहिक प्रयास जो बदलाव लाए या रोके
- प्रति-आंदोलन: किसी दूसरे आंदोलन के बदलाव का विरोध करने वाला आंदोलन
- सापेक्ष वंचना: दूसरों से या हक़ से कम होने का एहसास
- ओल्सन का सामूहिक कार्रवाई का तर्क: फ़ायदा > लागत हो तभी जुड़ना; मुफ़्तख़ोर समस्या
- संसाधन जुटाना (मैकार्थी और ज़ाल्ड): सफलता नेता, पैसा, सदस्य, मीडिया पर निर्भर
- सुधारवादी / मुक्तिकामी / क्रांतिकारी: धीरे-धीरे बदलाव / व्यक्ति में बदलाव / व्यवस्था पलटना
- पुराने आंदोलन: वर्ग और सत्ता, दलों के ज़रिए; नए आंदोलन: पहचान, पर्यावरण, जीवन की गुणवत्ता
- मुख्य तिथियाँ: एटक 1920, बारदोली 1928, तेभागा 1946–47, दलित पैंथर्स 1972, टुवर्ड्स इक्वॉलिटी 1974, झारखंड राज्य 2000
हल किए गए उदाहरण
1. एक सड़क दुर्घटना के बाद हज़ारों लोग एक बार प्रदर्शन करके घर चले जाते हैं। क्या यह सामाजिक आंदोलन है?
नहीं। यह सामूहिक कार्रवाई है, पर इसमें न टिकाऊ संगठन है, न लंबी योजना या नेतृत्व, और यह समय के साथ जारी नहीं रहती।
2. कौन-सा सिद्धांत इसे सबसे अच्छा समझाता है: 'किसानों ने देखा कि शहर की आमदनी बढ़ी पर उनकी फ़सल के दाम कम रहे, तो उन्होंने विरोध शुरू किया'?
सापेक्ष वंचना का सिद्धांत: किसानों ने अपनी तुलना दूसरों से की और ख़ुद को अन्यायपूर्वक पीछे छूटा हुआ महसूस किया।
3. चिपको आंदोलन को पुराना या नया आंदोलन मानें? समझाइए।
पर्यावरण पर होने से यह नया सामाजिक आंदोलन लगता है। पर यह ग़रीब पहाड़ी गाँव वालों की रोज़ी और सरकार व ठेकेदारों के ख़िलाफ़ संसाधनों पर हक़ का भी सवाल था, यानी इसमें 'पुराने' वर्गीय मुद्दे भी थे। भारत में दोनों अक्सर मिले रहते हैं।
4. दलित आंदोलन को सिर्फ़ पैसे की नहीं, सम्मान की लड़ाई क्यों कहा जाता है?
क्योंकि इसका मुख्य लक्ष्य छुआछूत और जातिगत अपमान ख़त्म करना और बराबर इंसान के रूप में स्वीकार होना है। नौकरी और पैसा ज़रूरी हैं, पर आत्म-सम्मान और पहचान केंद्र में हैं।
आम गलतियाँ
- हर प्रदर्शन या दंगे को सामाजिक आंदोलन कहना। आंदोलन के लिए संगठन और निरंतरता चाहिए।
- मुक्तिकामी और क्रांतिकारी में उलझना: मुक्तिकामी व्यक्ति को बदलता है; क्रांतिकारी पूरी व्यवस्था को।
- यह मानना कि भारत के पर्यावरण आंदोलन सिर्फ़ प्रकृति पर हैं। वे आमतौर पर रोज़ी और न्याय पर भी हैं।
- नाम ग़लत जोड़ना: ओल्सन = सामूहिक कार्रवाई का तर्क; मैकार्थी और ज़ाल्ड = संसाधन जुटाना।