समाजशास्त्र को अपनी संकल्पनाएँ क्यों चाहिए
रोज़ के शब्द जैसे "समूह" या "वर्ग" ढीले-ढाले होते हैं। समाजशास्त्र इन्हें पक्का अर्थ देता है, ताकि समाज पढ़ने वाला हर व्यक्ति एक ही बात समझे। नीचे की संकल्पनाएँ औज़ार हैं: इनसे किसी भी समाज का साफ़ वर्णन कर सकते हैं।
सामाजिक समूह
सामाजिक समूह दो या अधिक लोग हैं जो:
- बार-बार आपस में मिलते हैं,
- कुछ लक्ष्य या रुचियाँ साझा करते हैं,
- साझा नियम मानते हैं,
- अपनापन ("हम") महसूस करते हैं।
अर्ध-समूह (या समुच्चय) वे लोग हैं जो बस एक जगह हैं या एक गुण साझा करते हैं, बिना स्थायी रिश्ते के: बस स्टॉप पर खड़े लोग, शहर के सारे किशोर। अर्ध-समूह समूह बन सकता है, जैसे यात्री मिलकर संघ बना लें।
प्राथमिक और द्वितीयक समूह
- प्राथमिक समूह: छोटा, आमने-सामने, लंबे समय तक, आत्मीय। रिश्ता अपने आप में कीमती। उदाहरण: परिवार, पक्के दोस्त। (सी.एच. कूले का विचार।)
- द्वितीयक समूह: बड़ा, औपचारिक, किसी मकसद से बना, कम निजी। उदाहरण: स्कूल, दफ़्तर, राजनीतिक दल।
समुदाय और समाज (संघ)
समुदाय में समय के साथ बने करीबी, निजी रिश्ते होते हैं (गाँव)। समाज/संघ में अवैयक्तिक, अनुबंध वाले रिश्ते (बड़े शहर की कंपनी)।
अंतः समूह, बाह्य समूह और संदर्भ समूह
- अंतः समूह: जिसे मैं "हम" कहूँ और जिसके प्रति वफ़ादार रहूँ।
- बाह्य समूह: जिसे मैं "वे" कहूँ; कभी नापसंदगी से देखा जाता है।
- संदर्भ समूह: वह समूह जिसके तौर-तरीकों की हम नकल या तुलना करें, चाहे उसके सदस्य न हों, जैसे गाँव का युवक शहर का फ़ैशन अपनाए।
समवयस्क समूह
समवयस्क समूह लगभग एक उम्र और दर्जे के लोग हैं, जैसे सहपाठी। यह किशोरों पर गहरा असर डालता है।
सामाजिक स्तरीकरण
स्तरीकरण का अर्थ है कि समाज एक के ऊपर एक परतों (स्तरों) में बँटा है, और हर परत को धन, सत्ता और प्रतिष्ठा असमान मिलती है।
- यह समाज की विशेषता है, केवल व्यक्तियों का अंतर नहीं।
- यह पीढ़ी दर पीढ़ी चलता है।
- ऐसे विश्वास इसे सहारा देते हैं जो इसे स्वाभाविक या सही दिखाएँ।
मुख्य रूप
- जाति: जन्म से तय प्रस्थिति; बंद व्यवस्था; विवाह, खान-पान और काम के पुराने नियम। एक जाति से दूसरी में जाना लगभग असंभव।
- वर्ग: धन, आय और पेशे पर आधारित; ज़्यादा खुला; व्यक्ति ऊपर-नीचे जा सकता है (सामाजिक गतिशीलता)।
- लिंग: ज़्यादातर समाजों में महिलाओं और पुरुषों को असमान सत्ता, वेतन और आज़ादी मिलती है।
एक परत से दूसरी में जाने को सामाजिक गतिशीलता कहते हैं।
प्रस्थिति और भूमिका
प्रस्थिति अधिकारों और कर्तव्यों वाला सामाजिक स्थान है, जैसे शिक्षक, माँ या मतदाता। एक व्यक्ति के पास एक साथ कई प्रस्थितियाँ होती हैं (प्रस्थिति समूह)।
- प्रदत्त प्रस्थिति: जन्म से मिली, चुनी नहीं: उम्र, लिंग, जाति, बेटी होना।
- अर्जित प्रस्थिति: मेहनत से कमाई: डॉक्टर, कप्तान, स्नातक।
प्रतिष्ठा किसी प्रस्थिति से जुड़ा सम्मान है; जज को आम तौर पर क्लर्क से ज़्यादा प्रतिष्ठा मिलती है।
भूमिका प्रस्थिति का अपेक्षित व्यवहार है। प्रस्थिति यानी आप क्या हैं; भूमिका यानी आप क्या करते हैं।
- भूमिका समूह: एक प्रस्थिति की कई भूमिकाएँ (शिक्षक का विद्यार्थियों, अभिभावकों, प्रधानाचार्य से व्यवहार)।
- भूमिका संघर्ष: दो भूमिकाएँ टकराएँ, जैसे कामकाजी माँ की दफ़्तर और घर दोनों जगह एक साथ ज़रूरत।
- भूमिका रूढ़िबद्धता: लिंग से भूमिका तय करना, जैसे "खाना सिर्फ़ लड़कियाँ बनाएँ"।
सामाजिक नियंत्रण
सामाजिक नियंत्रण वे तरीके हैं जिनसे समाज लोगों से अपने मानदंड (व्यवहार के नियम) मनवाता है और व्यवस्था बनाए रखता है।
- औपचारिक नियंत्रण: लिखित नियम, अधिकारियों द्वारा: कानून, पुलिस, अदालत, जुर्माना, स्कूल के नियम।
- अनौपचारिक नियंत्रण: अलिखित, आम लोगों द्वारा: माता-पिता की डाँट, तारीफ़, ताने, दोस्त का मज़ाक, धार्मिक विश्वास।
नियंत्रण अनुशास्ति (सैंक्शन) से चलता है: पुरस्कार (सकारात्मक: इनाम, तारीफ़) और दंड (नकारात्मक: जुर्माना, अलग कर देना)।
दो दृष्टिकोण: एक कहता है नियंत्रण समाज को स्थिर रखता है। दूसरा पूछता है कि किसके नियम लागू हो रहे हैं, क्योंकि ताकतवर लोग अपनी जगह बचाने के लिए नियंत्रण का प्रयोग कर सकते हैं।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- सामाजिक समूह: जो लोग नियमित मिलें, साझा लक्ष्य रखें और "हम" महसूस करें।
- अर्ध-समूह: संयोग से या एक गुण से साथ लोग, बिना स्थायी रिश्ते।
- प्राथमिक समूह: छोटा, करीबी, आमने-सामने। द्वितीयक समूह: बड़ा, औपचारिक, किसी मकसद से।
- स्तरीकरण: समाज का असमान परतों (जाति, वर्ग, लिंग) में बँटना।
- प्रस्थिति: सामाजिक स्थान। भूमिका: उस स्थान का अपेक्षित व्यवहार।
- प्रदत्त प्रस्थिति: जन्म से। अर्जित प्रस्थिति: मेहनत से।
- सामाजिक नियंत्रण: मानदंड मनवाने के तरीके; औपचारिक (कानून) और अनौपचारिक (परिवार, ताने)।
हल किए गए उदाहरण
1. ट्रेन के डिब्बे में यात्री 10 घंटे बातें करते हैं। क्या वे सामाजिक समूह हैं?
ज़्यादातर अर्ध-समूह। वे बात करते हैं, पर न स्थायी रिश्ता है, न साझा लक्ष्य, न "हम" का एहसास। अगर वे व्हाट्सऐप ग्रुप बनाकर मिलते रहें, तो समूह बन सकते हैं।
2. प्राथमिक या द्वितीयक में बाँटिए: आपका परिवार, स्कूल, सबसे पक्का दोस्त, राजनीतिक दल।
प्राथमिक: परिवार, पक्का दोस्त (छोटे, करीबी, निजी)। द्वितीयक: स्कूल, राजनीतिक दल (बड़े, औपचारिक, मकसद से बने)।
3. प्रिया किसान परिवार में लड़की के रूप में जन्मी और ज़िला कलेक्टर बनी। उसकी प्रदत्त और अर्जित प्रस्थिति बताइए।
प्रदत्त: स्त्री, बेटी, अपनी जाति और परिवार की सदस्य। अर्जित: स्नातक, आईएएस अफ़सर, ज़िला कलेक्टर।
4. एक डॉक्टर माँ को रात में अस्पताल बुलाया जाता है जब उसके बच्चे को बुखार है। इसे क्या कहते हैं?
भूमिका संघर्ष: डॉक्टर की भूमिका और माँ की भूमिका उसे एक ही समय में उलटी दिशा में खींचती हैं।
5. औपचारिक या अनौपचारिक नियंत्रण में बाँटिए: ट्रैफ़िक चालान, दादी की त्योरी, स्कूल में सज़ा, पड़ोसियों के ताने।
औपचारिक: ट्रैफ़िक चालान, स्कूल की सज़ा (लिखित नियम, अधिकारी)। अनौपचारिक: दादी की त्योरी, ताने (रोज़ का जीवन, अलिखित)।
6. जाति को बंद और वर्ग को खुली व्यवस्था क्यों कहते हैं?
जाति जन्म से तय होती है और मेहनत से बदली नहीं जा सकती। वर्ग में व्यक्ति पढ़ाई या बेहतर नौकरी से ऊपर जा सकता है, या धन खोकर नीचे आ सकता है।
आम गलतियाँ
- हर भीड़ को समूह कहना। नियमित संपर्क, साझा लक्ष्य और "हम" के बिना यह अर्ध-समूह है।
- प्रस्थिति और भूमिका को मिलाना। प्रस्थिति स्थान है; भूमिका उससे अपेक्षित व्यवहार।
- स्तरीकरण को केवल व्यक्तिगत अंतर मानना। यह पीढ़ियों तक चलने वाली स्थायी सामाजिक व्यवस्था है।
- सामाजिक नियंत्रण को केवल पुलिस मानना। परिवार, दोस्त और ताने हमें कहीं ज़्यादा बार नियंत्रित करते हैं।