Germany Jahrgangsstufe 9 Social-Practical Education (WSG-S track)
अध्याय: 4
1. Education and personality development
Upbringing and personality development
- मनोविज्ञान की प्रकृति: मन और व्यवहार का विज्ञान – मनोविज्ञान वह विज्ञान है जो मानसिक प्रक्रियाओं (सोचना, याद करना), अनुभवों (अंदर की भावनाएँ) और व्यवहार (हम क्या करते हैं) का अध्ययन करता है। मानसिक प्रक्रियाएँ दिखती नहीं, इसलिए उन्हें व्यवहार से समझा जाता है। व्यवहार प्रकट (बाहर से दिखे) या अप्रकट (अंदर छिपा, जैसे तेज़ धड़कन) हो सकता है। मनोविज्ञान अपनी विधियों और सिद्धांतों वाला एक विषय है। प्रयोग करने और मस्तिष्क-शरीर पढ़ने के कारण यह प्राकृतिक विज्ञान है, और परिवार, समूह व संस्कृति में लोगों को पढ़ने के कारण सामाजिक विज्ञान भी। मन और मस्तिष्क जुड़े हैं, पर एक नहीं। "मनोवैज्ञानिक मन पढ़ लेते हैं" जैसी कई लोकप्रिय धारणाएँ सही नहीं हैं।
2. Inclusion and integration as shared tasks
Inclusion and integration in groups
- संस्कृति और समाजीकरण: हम साथ रहना कैसे सीखते हैं – संस्कृति किसी समूह के जीने का पूरा तरीका है, जिसे लोग सीखते हैं और आपस में बाँटते हैं: उनके विचार, नियम और चीज़ें। यह जन्म से नहीं आती, सीखी जाती है। संस्कृति के तीन आयाम हैं: संज्ञानात्मक (हम क्या जानते और मानते हैं), मानकीय (व्यवहार के नियम) और भौतिक (औज़ार और वस्तुएँ)। समाजीकरण वह जीवन भर चलने वाली प्रक्रिया है जिससे एक बच्चा संस्कृति सीखकर समाज का सदस्य बनता है। यह परिवार, मित्र-समूह, विद्यालय, जनसंचार माध्यम और कार्यस्थल, धर्म, समुदाय जैसे अभिकरणों से होता है।
3. Reflective leisure and media use
Leisure time and media use
- मीडिया साक्षरता (Media Literacy) – मीडिया साक्षरता मीडिया को पढ़ने, उस पर सवाल करने और खुद बनाने का हुनर है: समाचार, विज्ञापन, वीडियो, पोस्ट, फ़िल्म और गेम। हर मीडिया पाठ किसी ने, किसी उद्देश्य से, किसी दर्शक के लिए बनाया है, और उसमें ऐसे रूप, परिपाटियाँ और तकनीकें हैं जो हमारी भावना बदलती हैं। मीडिया-साक्षर व्यक्ति मानने या शेयर करने से पहले स्रोत, सबूत, दूसरे स्रोत और मूल जाँचता है, पूर्वाग्रह और फ़िल्टर बबल पहचानता है, और ज़िम्मेदारी से अपना मीडिया बनाता है।
4. Valuing nature and responsible consumption
Protecting nature and responsible consumption
- पर्यावरण और धारणीय विकास – पर्यावरण हमें संसाधन देता है, हमारा कचरा सोखता है, जीवन चलाता है और सुंदरता देता है। जब हम संसाधन प्रकृति के नवीकरण से तेज़ लेते हैं, या कचरा उसकी सोखने की क्षमता से ज़्यादा फेंकते हैं, तो धारण क्षमता पार होती है और पर्यावरण संकट आता है। भारत में भूमि अपक्षय, वायु-जल प्रदूषण, वन और जैव-विविधता की हानि है। जीवाश्म ईंधन जलाने से गर्मी फँसती है और वैश्विक उष्णता होती है; CFC ओज़ोन परत पतली करते हैं। धारणीय विकास आज की ज़रूरतें पूरी करता है बिना भावी पीढ़ियों की क्षमता घटाए।