कृमियों के तीन समूह
कृमियों का शरीर कोमल होता है, पैर नहीं होते और रीढ़ भी नहीं होती। वैज्ञानिक इन्हें तीन समूहों में रखते हैं।
- चपटे कृमि (प्लेनेरिया, पर्णाभ कृमि, फीताकृमि): शरीर चपटा होता है। आहार नली में एक ही छेद होता है, या फीताकृमि में बिलकुल नहीं।
- गोल कृमि (एस्केरिस, हुकवर्म): शरीर लंबी गोल नली जैसा होता है। आहार नली के दो छेद होते हैं, मुँह और गुदा।
- वलयाकार कृमि (केंचुआ, जोंक): शरीर कई छल्लों (खंडों) में बँटा होता है। आहार नली मुँह से गुदा तक जाती है।
परजीवी और उनके जीवन चक्र
परजीवी किसी दूसरे जंतु (पोषी) के ऊपर या अंदर रहता है और उससे भोजन लेता है। परजीवी अक्सर पोषी को नुकसान पहुँचाता है।
परजीवियों में खास लक्षण होते हैं: पकड़ने के लिए हुक और चूषक, मोटी त्वचा जिसे पोषी के पाचक रस नहीं पचा पाते, और बहुत ज़्यादा अंडे, क्योंकि कई अंडे पोषी तक पहुँचने से पहले नष्ट हो जाते हैं।
सूअर के फीताकृमि का जीवन चक्र:
- वयस्क फीताकृमि मनुष्य की आँत में रहता है और अंडे देता है। अंडे मल के साथ बाहर आते हैं।
- सूअर अंडों लगा भोजन खा लेता है।
- अंडों से बच्चे निकलकर सूअर की माँसपेशी (मांस) में पुटी बनकर बैठ जाते हैं।
- कोई व्यक्ति कच्चा या अधपका सूअर का मांस खाता है। पुटी बढ़कर नया वयस्क कृमि बन जाती है।
यह चक्र साफ़ शौचालय, हाथ-सब्ज़ियाँ धोने और मांस अच्छे से पकाने से टूट जाता है। एस्केरिस जैसे गोल कृमि गंदे भोजन-पानी से फैलते हैं। हुकवर्म नम मिट्टी से नंगे पैरों के रास्ते घुसता है, इसलिए चप्पल पहनना मदद करता है।
केंचुआ
केंचुआ वलयाकार कृमि है। इसके शरीर में 100 से ज़्यादा छल्ले होते हैं। आगे की ओर हल्की पट्टी (क्लाइटेलम) जनन में मदद करती है। हर छल्ले पर छोटे बाल (सीटी) मिट्टी को पकड़ते हैं। माँसपेशियाँ लहर की तरह शरीर को छोटा-लंबा करती हैं, जिससे केंचुआ रेंगता है।
केंचुआ नम त्वचा से साँस लेता है, इसलिए उसे गीली मिट्टी चाहिए और वह बरसात में बाहर आता है। इसमें बंद रक्त परिसंचरण होता है, लाल रक्त और कई छोटे "हृदय" होते हैं।
यह किसान का मित्र क्यों है: यह सुरंग खोदता है जिससे जड़ों को हवा-पानी मिलता है, मिट्टी की परतें मिलाता है और इसका मल (वर्मीकास्ट) पौधों को भोजन देता है।
तीनों समूहों की तुलना
| समूह | शरीर का आकार | उदाहरण |
|---|---|---|
| चपटा कृमि | चपटा, छल्ले नहीं | फीताकृमि, लिवर फ़्लूक |
| गोल कृमि | गोल नली, छल्ले नहीं | एस्केरिस, हुकवर्म |
| वलयाकार कृमि | गोल, छल्लों वाला | केंचुआ, जोंक |
करके देखिए
3D में: तीनों, चपटा, गोल और वलयाकार बटन दबाइए। जीवन चक्र में अंडे का पीछा कीजिए और हर डिब्बे पर बताइए क्या होता है। फिर मिट्टी बटन दबाकर देखिए हवा कहाँ जाती है।
घर या बगीचे में: बारिश के बाद केंचुए खोजिए (उन्हें चोट न पहुँचाएँ)। एक केंचुए के कुछ छल्ले गिनिए। देखिए कि वह लहर की तरह कैसे चलता है। बाद में हाथ धो लें।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- चपटा कृमि: चपटा शरीर। गोल कृमि: गोल नली। वलयाकार कृमि: छल्लों (खंडों) वाला शरीर।
- परजीवी = पोषी पर रहकर उससे भोजन लेने वाला
- फीताकृमि चक्र: मनुष्य की आँत - मल में अंडे - सूअर अंडे खाता - मांस में पुटी - मनुष्य मांस खाता
- चक्र तोड़ने के उपाय: साफ़ पानी, साफ़ हाथ, पका मांस, चप्पल
हल किए गए उदाहरण
1. एक कृमि का शरीर लंबा गोल है, छल्ले नहीं हैं और आहार नली में मुँह और गुदा दोनों हैं। यह किस समूह का है?
यह गोल कृमि (निमेटोड) है।
2. फीताकृमि हज़ारों अंडे क्यों देता है?
ज़्यादातर अंडे सूअर तक कभी नहीं पहुँचते और नष्ट हो जाते हैं। बहुत अंडे देने से कुछ को जीवन चक्र पूरा करने का मौका मिल जाता है।
3. एक केंचुए के 120 छल्ले हैं। बगीचे में 15 केंचुए हैं। कुल कितने छल्ले हुए?
120 x 15 = 1800 छल्ले।
आम गलतियाँ
- सभी कृमियों को एक ही प्रकार का समझना। चपटे, गोल और वलयाकार अलग समूह हैं।
- हर कृमि को परजीवी कहना। केंचुआ स्वतंत्र जीवी और उपयोगी है।
- यह कहना कि केंचुआ फेफड़ों से साँस लेता है। वह नम त्वचा से साँस लेता है।
- यह मानना कि परजीवी केवल बाहर रहते हैं। कई आँत या माँसपेशियों के अंदर रहते हैं।