फलदार पौधों के प्रकार और विशेषताएँ
फलदार पौधे तीन आकार के होते हैं।
- पेड़: एक तना, जैसे सेब, आम, संतरा।
- बेल: सहारे पर चढ़ती है, जैसे अंगूर, कीवी।
- झाड़ी: कई पतले तने, जैसे ब्लूबेरी, करंट।
पत्तों के हिसाब से दो समूह हैं। पर्णपाती (सेब, आड़ू, अंगूर) ठंड में पत्ते गिराकर आराम करते हैं। सदाबहार (आम, नींबू-वर्ग, केला) साल भर पत्ते रखते हैं। जलवायु के हिसाब से भी फल बँटे हैं: शीतोष्ण (सेब, नाशपाती), उपोष्ण (नींबू-वर्ग) और उष्ण (आम, केला)।
वृद्धि और साल भर का चक्र
पर्णपाती फल-वृक्ष हर साल एक चक्र पूरा करता है: सुप्तावस्था (सर्दी का आराम) → कली फूटना और फूल आना (वसंत) → परागण और फल लगना → फल बढ़ना (गर्मी) → पकना और तुड़ाई (पतझड़) → पत्ते झड़ना। अगले साल की फूल-कलियाँ गर्मी में बनती हैं, इसलिए इस साल की देखभाल अगले साल की फसल तय करती है। फल-वृक्ष की लकड़ी बहुवर्षीय होती है, यानी वही पेड़ कई साल जीता और फल देता है।
पत्तियाँ प्रकाश-संश्लेषण से शर्करा बनाकर फलों को भेजती हैं। हर फल के लिए जितनी ज़्यादा स्वस्थ पत्तियाँ, फल उतना मीठा।
पर्यावरण और वृद्धि का नियंत्रण
वृद्धि तापमान, रोशनी, पानी, हवा और मिट्टी पर निर्भर है।
- शीत-घंटे: कई शीतोष्ण फलों को सर्दी में कुछ घंटे ठंड चाहिए। न मिले तो कलियाँ देर से और बेमेल खुलती हैं।
- पाला: वसंत का पाला फूल मार सकता है। किसान हवारोधक, धुआँ या पानी का छिड़काव करते हैं।
- रोशनी: पत्तों पर धूप से शर्करा और फल का रंग बनता है।
- पानी और मिट्टी: गहरी, अच्छी निकासी वाली मिट्टी और नियमित पानी सबसे अच्छे हैं। जल-जमाव से जड़ें सड़ती हैं।
किसान वृद्धि को छँटाई (आकार देने और रोशनी आने देने के लिए डालियाँ काटना), फल विरलन (फालतू फल हटाना ताकि बाक़ी बड़े हों), सहारे पर चढ़ाने, और समय पर पानी-खाद देकर नियंत्रित करते हैं।
प्रजनन और प्रवर्धन
प्रजनन (breeding) अच्छे गुणों वाले (मीठा, रोग-रोधी, बड़ा, देर तक टिकने वाला) जनकों का संकरण करके नई किस्म बनाता है और सबसे अच्छे पौधे चुनता है। पेड़ों में इसमें बहुत साल लगते हैं।
प्रवर्धन (propagation) यानी और पौधे बनाना। बीज से उगा पौधा माँ-पेड़ जैसा नहीं होता, इसलिए अच्छे पेड़ की नक़ल दूसरे तरीकों से बनाते हैं: कटिंग (तने का टुकड़ा जड़ पकड़ता है), दाब कलम (झुकी डाली जुड़ी-जुड़ी जड़ निकालती है) और कलम बाँधना (grafting)। कलम बाँधने में अच्छी किस्म की टहनी कलम (scion) को मज़बूत जड़ वाले निचले तने मूलवृंत (rootstock) से जोड़ते हैं। दोनों की कैम्बियम परतें छूनी चाहिए ताकि वे साथ बढ़ें; जोड़ को टेप से बाँधते हैं। मूलवृंत रोग-प्रतिरोध दे सकता है और पेड़ का आकार तय कर सकता है।
खुद करके देखें
1) 3D में तीनों बटन दबाकर पेड़ के फल गिनें। 2) पतझड़ पर जाएँ, गिनें, फिर छँटाई दबाएँ और फिर गिनें। फल कम हुए या बड़े? 3) घर पर सेब या आम का बीज लगाएँ और अमरूद या गुलाब की कटिंग। देखें कौन माँ-पौधे जैसा बनता है। 4) 3D में कलम बाँधना दबाएँ और कलम को नीचे आते देखें।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- साल का चक्र: आराम → फूल → फल लगना → बढ़ना → पकना → पत्ते झड़ना
- कलमी पौधा = कलम (ऊपर, अच्छा फल) + मूलवृंत (जड़, मज़बूत)
- छँटाई: कम फल, बड़े फल, ज़्यादा रोशनी
- प्रवर्धन: कटिंग, दाब, कलम (नक़ल); प्रजनन (नई किस्म)
हल किए गए उदाहरण
1. एक पेड़ पर 100 ग्राम के 200 फल लगे। फल-विरलन के बाद 150 ग्राम के 125 फल रखे गए। कुल वज़न की तुलना कीजिए।
पहले: 200 × 100 = 20000 ग्राम। बाद में: 125 × 150 = 18750 ग्राम। कुल थोड़ा कम है, पर फल बड़े हैं और अक्सर ज़्यादा दाम पर बिकते हैं।
2. सेब के बीज से माँ-पेड़ जैसा सेब क्यों नहीं मिलता?
बीज परागण से बनता है जिसमें दो जनकों के गुण मिलते हैं, इसलिए पौधा अलग होता है। कलम बाँधने से माँ-पेड़ की हूबहू नक़ल बनती है।
3. किसान को छोटा पेड़ चाहिए जिसकी तुड़ाई आसान हो और जड़ के रोग से बचे। कलम के किस हिस्से को उसे ध्यान से चुनना चाहिए?
मूलवृंत को। यह पेड़ का आकार और जड़ के रोग का प्रतिरोध तय करता है, जबकि फल कलम से आता है।
आम गलतियाँ
- सर्दी में बिना पत्तों के पेड़ को मरा हुआ मान लेना। पर्णपाती पेड़ सिर्फ़ आराम करते हैं।
- कलम और मूलवृंत उलटना। कलम ऊपर की टहनी है; मूलवृंत जड़ वाला हिस्सा है।
- गलत मौसम में ज़ोरदार छँटाई, जिससे अगले साल की फूल-कलियाँ कट जाती हैं।
- यह सोचना कि पेड़ पर ज़्यादा फल हमेशा अच्छे हैं। बहुत फल छोटे और खट्टे रहते हैं।