शरीर का आकार और पंख
मछली का शरीर धारा-रेखित होता है: दोनों सिरों पर पतला और बीच में चौड़ा। पानी उस पर से कम रुकावट के साथ बह जाता है। शल्कों वाली चिकनी त्वचा भी मदद करती है।
- पुच्छ पंख (पूँछ): मछली को आगे धकेलता है।
- वक्ष और श्रोणि पंख (बगल और पेट के पंख): दिशा बदलने, मुड़ने और रुकने में काम आते हैं।
- पृष्ठ पंख (पीठ पर): मछली को सीधा रखता है।
शरीर के दोनों ओर संवेदी कोशिकाओं की एक रेखा, पार्श्व रेखा, पानी की हलचल महसूस करती है।
मछली साँस कैसे लेती है
पानी में थोड़ी ऑक्सीजन घुली होती है। मछली मुँह से पानी अंदर लेकर गिल पर से बहाती है। गिल में छोटी-छोटी रक्त वाहिकाएँ भरी होती हैं, इसलिए वे लाल दिखते हैं। ऑक्सीजन पानी से रक्त में जाती है और कार्बन डाइऑक्साइड उलटी दिशा में। पानी गिल छिद्रों से बाहर निकलता है। अस्थिल मछलियों में गिल का ढक्कन (ऑपरकुलम) गिल की रक्षा करता और पानी पंप करने में मदद करता है।
पानी से बाहर मछली साँस नहीं ले पाती क्योंकि गिल की पतली परतें आपस में चिपक जाती हैं।
वायु-कोष और तैरना
अस्थिल मछलियों में गैस से भरी थैली होती है, जिसे वायु-कोष कहते हैं। मछली उसमें गैस बढ़ा दे तो कुल मिलाकर हल्की हो जाती है और ऊपर उठती है। गैस निकाल दे तो भारी होकर नीचे डूबती है। इससे वह बिना ज़्यादा मेहनत के किसी भी गहराई पर रह सकती है। शार्क में वायु-कोष नहीं होता, इसलिए उसे तैरते रहना पड़ता है, पर उसके तैलीय यकृत से उसे तैरने में मदद मिलती है।
उपास्थिल और अस्थिल मछलियाँ
| उपास्थिल मछली | अस्थिल मछली | |
|---|---|---|
| कंकाल | नरम उपास्थि | कठोर हड्डी |
| उदाहरण | शार्क, रे | रोहू, कतला, टूना, समुद्री घोड़ा |
| गिल का ढक्कन | नहीं, खुले छिद्र | होता है |
| वायु-कोष | नहीं | होता है |
| शल्क | दाँत जैसे, खुरदरे | पतले, चपटे, एक-दूसरे पर चढ़े |
| निषेचन | शरीर के अंदर | ज़्यादातर बाहर |
दोनों शीत-रक्त वाली हैं (शरीर का ताप पानी जैसा रहता है) और हृदय दो कक्षों वाला होता है।
मछली पकड़ना और मत्स्य पालन
लोग जाल, काँटे और फंदों से मछली पकड़ते हैं। छेद का आकार (जाली) बहुत मायने रखता है। बड़ी जाली से छोटी, कम उम्र की मछलियाँ निकल जाती हैं, जो बाद में बड़ी होकर अंडे देती हैं। बहुत ज़्यादा या बहुत छोटी मछलियाँ पकड़ना अति-मत्स्यन है, जिससे मछलियों की संख्या घटती है।
मत्स्य पालन में रोहू और कतला जैसी मछलियाँ साफ़ पानी और चारे के साथ तालाबों में पाली जाती हैं, जिससे जंगली मछलियों पर दबाव कम पड़ता है। मछली से प्रोटीन, विटामिन और ओमेगा-3 तेल मिलता है।
करके देखिए
3D में: वायु-कोष वाले चरण में गैस को ऊपर और नीचे खिसकाइए। मछली कहाँ जाती है? जाल वाले चरण में जाली तब तक खिसकाइए जब तक छोटी मछलियाँ निकल न जाएँ।
घर पर: बाज़ार में साबुत मछली या उसकी तस्वीर देखिए। पूँछ, पीठ का पंख, गिल का ढक्कन और शल्क ढूँढ़िए। हर एक का काम बताइए।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- मछली = धारा-रेखित शरीर + पंख + गिल + शल्क + दो कक्षों वाला हृदय + शीत-रक्त
- वायु-कोष में ज़्यादा गैस = ऊपर उठना। कम गैस = डूबना।
- उपास्थिल: शार्क, रे (उपास्थि कंकाल)। अस्थिल: रोहू, कतला (हड्डी का कंकाल)।
- बड़ी जाली = छोटी मछलियाँ बच जाती हैं = भविष्य में ज़्यादा मछली
हल किए गए उदाहरण
1. एक मछली पूँछ हिलाए बिना तालाब की तली से ऊपर आ जाती है। कैसे?
वह वायु-कोष में गैस भर लेती है। इससे वह कुल मिलाकर हल्की हो जाती है और ऊपर उठती है।
2. शार्क और रोहू में एक अंतर और एक समानता बताइए।
अंतर: शार्क का कंकाल उपास्थि का और रोहू का हड्डी का है (रोहू में गिल ढक्कन और वायु-कोष भी है)। समानता: दोनों गिल से साँस लेती हैं और शीत-रक्त वाली कशेरुकी हैं।
3. एक किसान ने तालाब में रोहू के 2,000 बच्चे डाले। 10% मर गए। कितने बचे?
2000 का 10% = 200 मरे। 2000 - 200 = 1800 बचे।
आम गलतियाँ
- यह कहना कि शार्क में हड्डी होती है। उसका कंकाल उपास्थि का होता है।
- यह सोचना कि मछली हवा की ऑक्सीजन पीती है। गिल पानी में घुली ऑक्सीजन लेते हैं।
- यह कहना कि सभी मछलियों में वायु-कोष होता है। शार्क और रे में नहीं होता।
- मछली को गरम रक्त वाली कहना। वे शीत-रक्त वाली होती हैं।