मांसपेशियाँ और कंकाल
वयस्क के कंकाल में लगभग 206 हड्डियाँ होती हैं। वह शरीर को खड़ा रखता है, कोमल अंगों को बचाता है (खोपड़ी दिमाग को, पसलियाँ दिल और फेफड़ों को) और मांसपेशियों को खींचने का आधार देता है।
जोड़ वह जगह है जहाँ दो हड्डियाँ मिलती हैं। दो प्रकार ज़रूर जानो:
- कब्ज़ा जोड़ (हिंज) (कोहनी, घुटना, उँगलियाँ): दरवाज़े की तरह एक तल में आगे-पीछे चलता है।
- गेंद-खाँचा जोड़ (कंधा, कूल्हा): गोल सिरा कटोरी में बैठता है, इसलिए कई दिशाओं में घूम सकता है।
कंकाल पेशी मज़बूत डोरियों, यानी कंडरा (टेंडन) से हड्डी से जुड़ी होती है। पेशी सिकुड़ती है (छोटी होती है) तो हड्डी को खींचती है। पेशी सिर्फ़ खींच सकती है, इसलिए वे विरोधी जोड़ी में काम करती हैं: बाइसेप्स कोहनी मोड़ता है, ट्राइसेप्स सीधी करता है। हड्डी को हड्डी से जोड़ने वाली पट्टियाँ स्नायु (लिगामेंट) हैं।
नृत्य की गति का संरचनात्मक विश्लेषण
किसी गति का विश्लेषण करने के लिए चार सवाल पूछो: कौन-से जोड़ चल रहे हैं? किस दिशा में? कौन-सी मांसपेशियाँ काम कर रही हैं? वज़न कहाँ है?
उदाहरण: प्लिए (घुटने मोड़ना)। कूल्हा, घुटना और टखना तीनों मुड़ते हैं (फ्लेक्शन)। नीचे जाते समय जाँघ की मांसपेशियाँ (क्वाड्रिसेप्स) गिरने की गति को धीमा रखती हैं और वही ऊपर भी उठाती हैं। घुटने पंजों की दिशा में रहें और कूल्हे पैरों के ऊपर रहें, तो वज़न पैरों पर रहता है। घुटने अंदर गिरें तो घुटने के जोड़ पर ज़ोर पड़ता है।
जोड़ को और मोड़ना फ्लेक्शन है; सीधा करना एक्सटेंशन। अच्छी आदत: जोड़ और क्रिया का नाम लो, जैसे "घुटने का फ्लेक्शन"।
मुद्रा और प्रोप्रियोसेप्शन
मुद्रा (पोस्चर) यानी आप शरीर को कैसे रखते हैं। अच्छी खड़ी मुद्रा में कान से कंधा, कूल्हा, घुटना और टखना एक सीधी रेखा में होते हैं, और रीढ़ अपने प्राकृतिक हल्के मोड़ों में रहती है। तब वज़न हड्डियाँ उठाती हैं और मांसपेशियाँ नहीं थकतीं।
प्रोप्रियोसेप्शन शरीर का वह एहसास है जिससे आँखें बंद होने पर भी पता रहता है कि अंग कहाँ हैं और कैसे चल रहे हैं। मांसपेशियों, कंडराओं और जोड़ों में छोटे संवेदक हर समय दिमाग को संदेश भेजते हैं। आँखें बंद करके एक उँगली से नाक छुओ: यह प्रोप्रियोसेप्शन से ही होता है।
अभ्यास से यह एहसास तेज़ होता है। नर्तक, जिमनास्ट और क्रिकेटर धीमी गतियाँ दोहराकर इसे सिखाते हैं।
- झुकने से सिर आगे आता है और गर्दन-पीठ की मांसपेशियाँ थकती हैं।
- दीवार से जाँचो: एड़ियाँ, कूल्हे, कंधे और सिर बस दीवार को छुएँ।
साँस लेना
साँस की मुख्य पेशी डायाफ्राम है, जो फेफड़ों के नीचे गुंबद जैसी चादर है। साँस अंदर लेते समय वह सिकुड़कर चपटी होती है (नीचे जाती है) और पसलियों की पेशियाँ पसलियों को ऊपर-बाहर उठाती हैं। छाती में जगह बढ़ती है, इसलिए हवा फेफड़ों में आती है। साँस छोड़ते समय डायाफ्राम ढीली होकर ऊपर जाती है, पसलियाँ नीचे आती हैं और हवा बाहर निकलती है।
गहरी "पेट" वाली साँस में डायाफ्राम नीचे जाते समय नीचे के अंगों को हल्का धकेलती है, तो पेट बाहर आता है। धीमी गहरी साँस से कलाकार शांत रहते हैं, लंबी गति को सँभालते हैं और तनाव से बचते हैं।
खुद करके देखो
- मांसपेशी की जोड़ी: एक हाथ ऊपरी बाँह पर रखो। कोहनी धीरे से मोड़ो और सीधी करो। मुड़ते समय आगे का हिस्सा उभरता है।
- प्रोप्रियोसेप्शन: आँखें बंद करो, बाँहें बगल में फैलाओ, फिर एक उँगली से नाक छुओ।
- मुद्रा: दीवार की तरफ़ पीठ करके खड़े हो। एड़ियाँ, कूल्हे, कंधे और सिर दीवार छूते हैं?
- साँस: एक हाथ पेट पर, एक छाती पर रखो। धीरे से साँस अंदर लो। पहले कौन-सा हिलता है?
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- पेशी सिकुड़ती है → छोटी और मोटी → हड्डी को खींचती है
- विरोधी जोड़ी: बाइसेप्स (कोहनी मोड़े) ↔ ट्राइसेप्स (कोहनी सीधी करे)
- कब्ज़ा जोड़: कोहनी, घुटना। गेंद-खाँचा जोड़: कंधा, कूल्हा
- सही मुद्रा की रेखा: कान – कंधा – कूल्हा – घुटना – टखना
- साँस अंदर: डायाफ्राम नीचे, पसलियाँ ऊपर-बाहर
हल किए गए उदाहरण
1. घुटने और कूल्हे में कौन-सा जोड़ होता है?
घुटना कब्ज़ा जोड़ है (एक तल में चलता है)। कूल्हा गेंद-खाँचा जोड़ है (कई दिशाओं में चलता है)।
2. कोहनी मोड़कर किताब उठाते समय कौन-सी पेशी सिकुड़ती है और कौन-सी ढीली होती है?
बाइसेप्स सिकुड़ता है (छोटा और मोटा) और अग्रबाहु को ऊपर खींचता है। ट्राइसेप्स ढीला होकर लंबा हो जाता है।
3. नर्तक प्लिए करती है। कौन-से जोड़ मुड़ते हैं और वज़न कहाँ रहना चाहिए?
कूल्हा, घुटना और टखना तीनों मुड़ते हैं (फ्लेक्शन)। वज़न पैरों के ठीक ऊपर रहना चाहिए, और घुटने पंजों की दिशा में रहें।
आम गलतियाँ
- यह सोचना कि पेशी हड्डी को धकेल सकती है। पेशी सिर्फ़ खींचती है, इसलिए वापस खींचने के लिए दूसरी पेशी चाहिए।
- कंडरा और स्नायु में गड़बड़ करना: कंडरा पेशी को हड्डी से जोड़ती है; स्नायु हड्डी को हड्डी से।
- सोचना कि पेट में हवा भरती है। हवा सिर्फ़ फेफड़ों में जाती है; पेट इसलिए बाहर आता है कि डायाफ्राम नीचे के अंगों को धकेलती है।
- अच्छी मुद्रा को अकड़कर खड़ा होना समझना। अच्छी मुद्रा आराम वाली, संतुलित और प्राकृतिक मोड़ों वाली होती है।