नलियों वाले तीन बीजाणु-पौधे
क्लबमॉस, हॉर्सटेल और फ़र्न टेरिडोफ़ाइटा (pteridophytes) समूह में आते हैं। ये काई से अलग हैं क्योंकि इनमें सच्ची जड़, तना और पत्तियाँ तथा नलियाँ होती हैं (जाइलम पानी ऊपर ले जाता है, फ़्लोएम भोजन)। इसीलिए ये काई से ऊँचे हो पाते हैं। पर काई की तरह ये बीजाणु बनाते हैं, बीज नहीं, और नम जगह में सबसे अच्छे उगते हैं।
- क्लबमॉस (लाइकोपोड): छोटे पौधे, शल्क जैसी बारीक पत्तियाँ। बीजाणु शाखाओं के सिरे के छोटे शंकु में बनते हैं।
- हॉर्सटेल (अश्वपुच्छ): खोखले, गाँठ वाले तने। हर गाँठ पर पतली शाखाओं का घेरा होता है। तने खुरदरे लगते हैं क्योंकि उनमें सिलिका (रेत जैसा पदार्थ) होती है। सिरे के शंकु में बीजाणु बनते हैं।
- फ़र्न: बड़ी, पंख जैसी पत्तियाँ जिन्हें फ्रॉन्ड (frond) कहते हैं।
फ़र्न का शरीर
फ़र्न का मुख्य तना अक्सर ज़मीन के नीचे आड़ा बढ़ता है। इसे प्रकंद (rhizome) कहते हैं। इससे पतली जड़ें निकलती हैं। पत्तियाँ, यानी फ्रॉन्ड, कई छोटे पत्रकों में बँटी होती हैं। नई पत्ती स्प्रिंग की तरह मुड़ी रहती है, इसे फ़िडलहेड कहते हैं। बढ़ते हुए यह धीरे-धीरे खुलती है।
डंठल के भीतर नलियाँ हैं: जाइलम (पानी ऊपर) और फ़्लोएम (भोजन चारों ओर)। जो बड़ा हरा फ़र्न आप देखते हैं, वह बीजाणुद्भिद (sporophyte, 2n) है।
फ़र्न का जीवन-चक्र, क़दम दर क़दम
- फ्रॉन्ड के निचले भाग पर भूरे बिंदु होते हैं, जिन्हें सोराई (sori) कहते हैं (एक को सोरस)। हर सोरस बीजाणु-धानियों (sporangia) का गुच्छा है।
- सूखने पर धानियाँ फटती हैं और हज़ारों छोटे बीजाणु (n) हवा में उड़ जाते हैं।
- नम मिट्टी पर गिरा बीजाणु छोटे, चपटे, दिल जैसे हरे पौधे में बदलता है, जिसे प्रोथैलस (prothallus) (n) कहते हैं। यह लगभग 1 सेमी चौड़ा होता है और नीचे पतले मूलाभास होते हैं।
- प्रोथैलस के नीचे नर भागों में शुक्राणु और मादा भागों में अंडे बनते हैं।
- पानी की परत में शुक्राणु अंडे तक तैरते हैं। निषेचित अंडा युग्मनज (2n) बनता है।
- युग्मनज से नया फ़र्न (बीजाणुद्भिद, 2n) बढ़ता है और प्रोथैलस से बाहर निकलता है। फिर प्रोथैलस सूख जाता है।
यानी फ़र्न में भी पीढ़ी-एकांतरण है। काई से फ़र्क़ यह है कि यहाँ दिखने वाला बड़ा पौधा बीजाणुद्भिद (2n) है और युग्मकोद्भिद (n) छोटा प्रोथैलस है। शुक्राणुओं को तैरने के लिए अब भी पानी चाहिए।
प्राचीन फ़र्न और कोयला
लगभग 36 करोड़ से 30 करोड़ साल पहले पृथ्वी गर्म और नम थी और विशाल दलदली जंगल थे। उनके बहुत से पौधे आज के फ़र्न, हॉर्सटेल और क्लबमॉस के विशाल रिश्तेदार थे। कुछ तो पेड़ जितने ऊँचे थे, 20 मीटर या ज़्यादा।
- पौधे मरकर दलदल के पानी में गिरे।
- ऑक्सीजन कम थी, इसलिए वे पूरे सड़े नहीं।
- ऊपर मिट्टी और रेत की परतें जमती गईं। दबाव और गर्मी बढ़ी।
- लाखों साल में दबे पौधे निचुड़े, पानी खोया और कार्बन से भर गए। वे कोयला बन गए।
कोयला एक जीवाश्म ईंधन है। जलाने पर ऊर्जा देता है, पर कार्बन डाइऑक्साइड भी छोड़ता है। मनुष्य के जीवनकाल में यह दोबारा नहीं बन सकता। पीट (काई से बना) नए कोयले जैसा है, जो अभी ज़्यादा समय दबा नहीं है। कोयले में पत्तियों के जीवाश्म निशान उन प्राचीन फ़र्न का आकार दिखाते हैं।
ये पौधे क्यों ज़रूरी हैं?
ये मिट्टी को पकड़ते हैं, छोटे जीवों को आसरा देते हैं और कई फ़र्न बगीचों की शोभा हैं। एज़ोला जैसे जलीय फ़र्न उपयोगी जीवाणुओं के साथ रहते हैं और धान के खेतों में हरी खाद की तरह काम आते हैं। हॉर्सटेल के खुरदरे तने कभी बर्तन माँजने के काम आते थे।
करके देखिए: सोराई खोजिए
बगीचे या पार्क में फ़र्न खोजिए। एक पुरानी पत्ती को धीरे से पलटकर पत्रकों के नीचे भूरे बिंदु देखिए। पत्ती को सफ़ेद कागज़ के ऊपर थपथपाइए। हल्की धूल गिर सकती है। वे बीजाणु हैं। एक पत्रक बनाकर सोराई दिखाइए। 3D में समय की पट्टी चलाकर देखिए कि जंगल कैसे कोयला बनता है।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- मुख्य शब्द: टेरिडोफ़ाइट = नलियों वाला पौधा जो बीजाणुओं से प्रजनन करता है
- मुख्य शब्द: प्रकंद (भूमिगत तना), फ्रॉन्ड (पत्ती), सोरस (बीजाणु-धानियों का गुच्छा), प्रोथैलस (छोटा युग्मकोद्भिद)
- बड़ा फ़र्न = बीजाणुद्भिद (2n); प्रोथैलस = युग्मकोद्भिद (n)
- क्रम: बीजाणु → प्रोथैलस → शुक्राणु + अंडा → युग्मनज → नया फ़र्न → सोराई → बीजाणु
- कोयला: मृत पौधे → दबना → लाखों साल दबाव और गर्मी → कोयला
हल किए गए उदाहरण
1. फ़र्न और काई में क्या अंतर है?
फ़र्न में सच्ची जड़, तना, पत्तियाँ और नलियाँ (जाइलम और फ़्लोएम) होती हैं, इसलिए वह ऊँचा हो सकता है। दिखने वाला बड़ा पौधा बीजाणुद्भिद (2n) है। काई में नलियाँ नहीं हैं और मुख्य पौधा युग्मकोद्भिद (n) है।
2. एक पत्ती के पत्रकों के नीचे सीधी कतारों में भूरे बिंदु हैं। यह क्या है और बिंदु क्या हैं?
यह फ़र्न की फ्रॉन्ड है। बिंदु सोराई हैं, यानी बीजाणु-धानियों के गुच्छे जिनमें बीजाणु होते हैं।
3. नलियाँ होने पर भी फ़र्न को नम जगह क्यों चाहिए?
प्रोथैलस बहुत छोटा होता है और शुक्राणुओं को अंडे तक पहुँचने के लिए पानी की परत में तैरना पड़ता है। इसलिए निषेचन के लिए पानी ज़रूरी है।
4. प्राचीन फ़र्न के कोयला बनने को चार चरणों में समझाइए।
1) पौधे मरकर दलदल में गिरे। 2) ऑक्सीजन कम थी, इसलिए पूरे नहीं सड़े। 3) मिट्टी ने उन्हें दबा दिया। 4) लाखों साल के दबाव और गर्मी से वे कोयला बन गए।
आम गलतियाँ
- फ़र्न में बीज या फूल मान लेना। फ़र्न बीजाणु बनाता है।
- प्रोथैलस को बड़ा फ़र्न समझना। प्रोथैलस बहुत छोटा (लगभग 1 सेमी) और n अवस्था है।
- सोराई को अंडे या कीड़े समझना। सोराई बीजाणु-धानियों के गुच्छे हैं।
- सोचना कि कोयला कुछ ही सालों में बन जाता है। इसमें लाखों साल लगते हैं।