क्षैतिज जीन स्थानांतरण
आम तौर पर जीन ऊर्ध्वाधर चलते हैं: माता-पिता से संतान को। क्षैतिज जीन स्थानांतरण (HGT) ऐसी जीवित कोशिकाओं के बीच जीन जाना है जो माता-पिता और संतान नहीं हैं, यहाँ तक कि अलग प्रजातियों की भी। जीवाणुओं में यह तीन मुख्य तरीकों से होता है:
- रूपांतरण (transformation): कोशिका आसपास से खुला DNA ले लेती है।
- संयुग्मन (conjugation): दो कोशिकाएँ पतली नली से जुड़कर प्लास्मिड (DNA का छोटा छल्ला) की प्रति भेजती हैं।
- पारगमन (transduction): विषाणु एक जीवाणु से दूसरे तक DNA ले जाता है।
HGT उपयोगी जीन जल्दी फैलाता है, जैसे एंटीबायोटिक प्रतिरोध। कई जीवाणु जीनोमों में काफ़ी जीन दूसरी प्रजातियों से आए हैं। HGT दूसरे जीवों में भी है, जैसे पौधों और जंतुओं के कुछ जीन जीवाणुओं से आए।
विषाणु जीन वाहक के रूप में
वाहक (vector) वह है जो कोशिका में जीन पहुँचाए। विषाणु प्राकृतिक वाहक हैं: वे अपने जीन मेज़बान में डालते हैं और कोशिका की मशीनरी से उनकी प्रतियाँ बनवाते हैं। कुछ विषाणु, जैसे रेट्रोविषाणु, अपने RNA की DNA प्रति बनाकर मेज़बान गुणसूत्र में जोड़ देते हैं। अगर यह अंडाणु या शुक्राणु बनाने वाली कोशिका में हो तो विषाणु का DNA बच्चों को मिलता है और अंतर्जात (जीनोम का हिस्सा) बन जाता है। मानव जीनोम का लगभग 8% ऐसे विषाणुओं से आया है। इनमें से कुछ जीन काम में आ गए: एक (सिंसाइटिन) गर्भनाल बनाने में मदद करता है।
विषाणु मेज़बान के जीन भी कोशिकाओं के बीच ले जा सकते हैं (पारगमन)। वैज्ञानिक यही विचार जीन चिकित्सा और जैव प्रौद्योगिकी में लेते हैं, उपयोगी जीन पहुँचाने के लिए हानिरहित विषाणुओं का उपयोग करके।
कोशिकांगों की अंतःसहजीवी उत्पत्ति
अंतःसहजीवी सिद्धांत कहता है कि माइटोकॉन्ड्रिया और क्लोरोप्लास्ट कभी स्वतंत्र जीवाणु थे जिन्हें बड़ी कोशिका ने अंदर ले लिया, वे वहाँ मददगार बनकर रहे (सहजीविता) और समय के साथ कोशिकांग बन गए। माइटोकॉन्ड्रिया ऑक्सीजन इस्तेमाल करने वाले जीवाणु से आए; क्लोरोप्लास्ट प्रकाश-संश्लेषी सायनोबैक्टीरिया से।
प्रमाण: दोनों में दोहरी झिल्ली, अपना वृत्ताकार DNA, अपने छोटे (70S) राइबोसोम होते हैं, वे जीवाणुओं की तरह अपने आप विभाजित होते हैं, और उनका DNA जीवाणु DNA जैसा दिखता है। समय के साथ उनके कई जीन केंद्रक में चले गए, इसलिए अब वे अकेले नहीं जी सकते। यह जटिलता में बड़ी छलाँग थी: मेज़बान को बिजलीघर या सौर पैनल मिल गया।
जीनोम द्विगुणन
जीन द्विगुणन तब होता है जब गलती से जीन या DNA के हिस्से की प्रति बन जाए, जैसे जब गुणसूत्र असमान जोड़ी बनाकर टुकड़े असमान बदल लें। अब एक प्रति पुराना काम करती रह सकती है और दूसरी उत्परिवर्तित होने को आज़ाद है। फालतू प्रति नया कार्य पा सकती है, पुराने काम में हिस्सा बँटा सकती है, या टूटकर छद्म जीन बन सकती है। ग्लोबिन जीन परिवार (हीमोग्लोबिन और उसके रिश्तेदार) ऐसे ही बना।
कभी-कभी पूरा जीनोम दोगुना हो जाता है (बहुगुणिता), जब कोशिका विभाजन में गुणसूत्र अलग नहीं होते। पौधों में यह आम है: गेहूँ षट्गुणित है (गुणसूत्रों के छह सेट, कुल 42)। शुरुआती कशेरुकियों में भी जीनोम दोगुने हुए। दोगुने होने के बाद कई जीन फिर खो जाते हैं, पर कुछ रहकर नए कार्य देते हैं।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- गुणिता = कुल गुणसूत्र ÷ एक मूल सेट में गुणसूत्र
- द्विगुणन के बाद जीनोम की लंबाई = पुरानी लंबाई + दोहराए टुकड़े की लंबाई
- जीनोम में स्रोत का हिस्सा = (स्रोत का DNA ÷ कुल DNA) × 100
- ऊर्ध्वाधर = माता-पिता → संतान; क्षैतिज = कोशिका → असंबंधित कोशिका
हल किए गए उदाहरण
1. गेहूँ में 42 गुणसूत्र हैं और एक मूल सेट में 7। गुणिता ज्ञात करो।
गुणिता = 42 ÷ 7 = 6, इसलिए गेहूँ षट्गुणित है।
2. मानव जीनोम लगभग 3000 मिलियन क्षार युग्म (Mb) है और लगभग 8% रेट्रोविषाणुओं से आया। यह कितना है?
3000 का 8% = 0.08 × 3000 = 240 Mb।
3. एक जीवाणु जीनोम में 4000 जीन हैं। संयुग्मन से उसे 20 जीन वाला प्लास्मिड मिला। अब कितने जीन और प्रतिशत वृद्धि कितनी?
नया कुल = 4020। वृद्धि = 20 ÷ 4000 × 100 = 0.5%।
4. माइटोकॉन्ड्रिया के कभी जीवाणु होने के दो प्रमाण लिखो।
उनके पास अपना वृत्ताकार DNA और दोहरी झिल्ली है; वे अपने आप विभाजित होते हैं और जीवाणु जैसे राइबोसोम रखते हैं।
आम गलतियाँ
- क्षैतिज स्थानांतरण को लैंगिक जनन से मिलाना। HGT असंबंधित कोशिकाओं के बीच जीन ले जाता है, माता-पिता और संतान के बीच नहीं।
- यह सोचना कि विषाणु हमेशा नुकसान ही करते हैं। कुछ विषाणु जीन हमारे जीनोम के उपयोगी हिस्से बन गए।
- माइटोकॉन्ड्रिया को कोशिका के बनाए पुर्ज़े समझना। उनके पास अपना DNA है और वे जीवाणु से आए।
- यह मानना कि द्विगुणित जीन हमेशा कुछ नया बनाता है। कई अतिरिक्त प्रतियाँ खो जाती हैं या छद्म जीन बन जाती हैं।