जैविक हथियार क्या है?
जैविक हथियार में जीवित रोगाणु (जीवाणु, वायरस, कवक) या जीवों के बनाए विष (टॉक्सिन) जानबूझकर लोगों, पशुओं या फसलों को नुक़सान पहुँचाने या मारने के लिए इस्तेमाल होते हैं।
यह प्राकृतिक प्रकोप से अलग है। प्राकृतिक प्रकोप के पीछे कोई योजना नहीं होती। जैविक हथियार लोगों का चुना हुआ काम है। इस पाठ में हम दुनिया ने इसे क्यों प्रतिबंधित किया यह पढ़ते हैं, यह कैसे काम करता है यह नहीं।
रोगाणु बुरे हथियार क्यों हैं
- वे अपने आप फैलते हैं। एक बीमार व्यक्ति कई को रोगाणु दे सकता है (3D में लाल बिंदु देखें)।
- उन्हें निशाना नहीं बना सकते। रोगाणु समूह, झंडे या सीमाएँ नहीं जानते। लोग यात्रा करते हैं, व्यापार करते हैं और एक ही हवा में साँस लेते हैं।
- उन्हें रोकना कठिन है। एक बार छूटने पर कोई उन्हें वापस नहीं बुला सकता।
- सबसे ज़्यादा निर्दोष पीड़ित होते हैं। बच्चे, बूढ़े और बीमार पहले कष्ट पाते हैं।
- सब ख़तरे में हैं, प्रयोग करने वाला भी। इसीलिए लगभग सब प्रतिबंध पर सहमत हुए।
प्रतिबंधों का संक्षिप्त इतिहास
कुओं और भोजन में ज़हर डालना बहुत पुरानी बात है। 20वीं सदी में विज्ञान ने इसे कहीं ज़्यादा ख़तरनाक बना दिया, और कई देशों ने गुप्त रूप से रोगाणु हथियारों का अध्ययन किया।
- 1925, जिनेवा प्रोटोकॉल: देश युद्ध में ज़हरीली गैस या रोगाणु इस्तेमाल न करने पर सहमत हुए। पर इसने इन्हें बनाने या जमा करने से नहीं रोका।
- 1972, जैविक हथियार अभिसमय (BWC): हस्ताक्षर के लिए खुला। यह जैविक और विष हथियारों के विकास, निर्माण, भंडारण और अधिग्रहण पर रोक लगाता है।
- 1975: BWC लागू हुआ। 180 से अधिक देश जुड़ चुके हैं, भारत और चीन भी।
- 1980: चेचक का उन्मूलन घोषित हुआ, टीकों की साझा सफलता।
प्रतिबंध कैसे निभाया जाता है
- राष्ट्रीय क़ानून: देश ऐसे हथियार बनाना या रखना अपराध बनाते हैं। उदाहरण: भारत में सामूहिक विनाश के हथियारों पर क़ानून (2005) है।
- बैठकें और रिपोर्टें: सदस्य देश नियमित मिलते हैं और अपनी प्रयोगशालाओं की रिपोर्ट साझा करते हैं।
- निर्यात नियंत्रण: ख़तरनाक रोगाणु और विशेष उपकरण केवल भरोसेमंद, स्वीकृत उपयोगकर्ताओं को दिए जाते हैं।
- जैव-सुरक्षा और जैव-संरक्षा: प्रयोगशालाएँ ख़तरे के हिसाब से श्रेणीबद्ध हैं। सबसे ख़तरनाक रोगाणु बंद, सील की गई प्रयोगशालाओं में रहते हैं। जैव-सुरक्षा दुर्घटना रोकती है; जैव-संरक्षा चोरी और दुरुपयोग।
- नैतिकता और प्रशिक्षण: वैज्ञानिक द्वि-उपयोग पर सोचना और दुरुपयोग पर आवाज़ उठाना सीखते हैं।
BWC में अभी स्थायी निरीक्षण दल नहीं है, इसलिए भरोसा, ईमानदारी और रिपोर्टें बहुत मायने रखती हैं, और बेहतर जाँच के लिए काम जारी है।
द्वि-उपयोग: एक विज्ञान, दो रास्ते
रोगाणु हमें कैसे संक्रमित करते हैं, यह जानकारी वही है जो हमें टीके, दवाएँ और जाँचें देती है। इसे द्वि-उपयोग कहते हैं। रोगाणुओं का अध्ययन बंद नहीं कर सकते; इससे चिकित्सा रुक जाएगी। इसलिए दुनिया नियमों, ईमानदारी और निगरानी का उपयोग करती है।
हम सब टीकाकरण, हाथ धोने और असामान्य बीमारी की जल्दी सूचना देने का समर्थन करके मदद करते हैं।
करके देखिए
3D के मुक्त खेल में फैलाव 2 और टीका लगे लोग 0% रखिए। देखिए कितने बीमार होते हैं। अब टीका लगे लोग 70% कीजिए। क्या बदला? घर पर कक्षा में 20 बिंदु बनाइए, 2 को लाल कीजिए, और हर लाल बिंदु को चरणों में 2 पड़ोसियों को “देने” दीजिए। फिर पहले 14 बिंदु नीले कीजिए और दोबारा आज़माइए।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- जैविक हथियार = जानबूझकर नुक़सान के लिए प्रयोग हुए रोगाणु या विष
- फैलाव: नए मामले × फैलाव संख्या = अगले चरण के मामले (संख्या 2 हो तो दुगुना)
- 1925 जिनेवा प्रोटोकॉल: युद्ध में प्रयोग नहीं
- 1972 BWC खुला; 1975 लागू: विकास, निर्माण, भंडारण नहीं
- द्वि-उपयोग = वही विज्ञान, अच्छा या बुरा उपयोग
हल किए गए उदाहरण
1. फैलाव खेल में शुरू में 4 लोग बीमार हैं और हर नया मामला 2 को देता है। यदि सभी संपर्क स्वस्थ हैं तो चरण 2 में नए मामले कितने?
चरण 1: 4 × 2 = 8 नए मामले। चरण 2: 8 × 2 = 16 नए मामले।
2. 500 विद्यार्थियों के स्कूल में 80% को किसी रोग का टीका लगा है। कितनों को नहीं लगा?
500 का 20% = 100 विद्यार्थी।
3. कोई देश अपने छोड़े रोगाणु हथियार से “सुरक्षित” क्यों नहीं रह सकता?
रोगाणु लोगों और व्यापार के साथ यात्रा करते हैं, इसलिए प्रयोग करने वाले के अपने लोगों तक लौट सकते हैं। कोई सीमा उन्हें नहीं रोकती।
आम गलतियाँ
- यह सोचना कि प्रतिबंध रोगाणुओं का सारा अध्ययन रोक देता है। शांतिपूर्ण शोध, टीके और दवाएँ मान्य और ज़रूरी हैं।
- प्राकृतिक प्रकोप और हथियार को मिला देना। हथियार जानबूझकर छोड़ा जाता है।
- यह सोचना कि 1925 के जिनेवा प्रोटोकॉल ने बनाने पर रोक लगाई। उसने युद्ध में प्रयोग रोका; बनाने और जमा करने पर रोक 1972 के BWC ने लगाई।
- यह मानना कि रोगाणु केवल “शत्रु” पर हमला करता है। रोगाणु सबमें फैलते हैं।