ऐमीनो अम्ल
ऐमीनो अम्ल वह अणु है जिसमें ऐमीनो समूह (–NH2) और कार्बोक्सिलिक अम्ल समूह (–COOH) दोनों हों। प्रोटीन वाले ऐमीनो अम्लों में दोनों एक ही कार्बन (α-कार्बन) पर होते हैं, इसलिए इन्हें α-ऐमीनो अम्ल कहते हैं। सामान्य रूप: R–CH(NH2)–COOH।
प्रोटीन में लगभग 20 ऐमीनो अम्ल आम हैं; केवल R बदलता है। उदाहरण: ग्लाइसीन (R = H), ऐलानिन (R = CH3), सेरीन (R = CH2OH), लाइसीन (R में एक और –NH2), ग्लूटैमिक अम्ल (R में एक और –COOH), फ़ेनिलऐलानिन (R में बेंज़ीन छल्ला)।
उदासीन, अम्लीय और क्षारीय
- –NH2 और –COOH बराबर: उदासीन (ग्लाइसीन, ऐलानिन)।
- –COOH ज़्यादा: अम्लीय (ऐस्पार्टिक, ग्लूटैमिक अम्ल)।
- –NH2 ज़्यादा: क्षारीय (लाइसीन, आर्जिनिन)।
आवश्यक और अनावश्यक
अनावश्यक ऐमीनो अम्ल शरीर खुद बना लेता है। आवश्यक नहीं बना पाता, इसलिए भोजन से लेने पड़ते हैं (जैसे वेलीन, ल्यूसीन, लाइसीन, फ़ेनिलऐलानिन)। दालें, दूध, अंडे, मांस इन्हें देते हैं।
ज़्विटर आयन
पानी में अम्ल समूह अपना H+ उसी अणु के ऐमीनो समूह को दे देता है: H3N+–CHR–COO–। इस पर धन और ऋण दोनों आवेश हैं; इसे ज़्विटर आयन (उभयधर्मी आयन) कहते हैं। इसी कारण ऐमीनो अम्ल ऊँचे गलनांक वाले क्रिस्टलीय ठोस हैं, पानी में घुलते हैं और लवण जैसे व्यवहार करते हैं। ये अम्ल और क्षार दोनों से क्रिया करते हैं (उभयधर्मी)।
प्रकाशिक सक्रियता
ग्लाइसीन (R = H, α-कार्बन पर दो H) को छोड़कर सभी α-ऐमीनो अम्ल काइरल हैं। ज़्यादातर प्राकृतिक ऐमीनो अम्ल L-विन्यास वाले हैं।
पेप्टाइड बंध
एक ऐमीनो अम्ल का –COOH दूसरे के –NH2 से क्रिया करे तो एक पानी का अणु निकलता है और ऐमाइड जोड़ –CO–NH– बनता है। प्रोटीन में इसे पेप्टाइड बंध कहते हैं।
दो ऐमीनो अम्ल = डाइपेप्टाइड; तीन = ट्राइपेप्टाइड; लगभग दस तक = ऑलिगोपेप्टाइड; दस से ज़्यादा = पॉलीपेप्टाइड। लगभग सौ से ज़्यादा ऐमीनो अम्ल (मोलर द्रव्यमान लगभग 10 000 u से ज़्यादा) वाला पॉलीपेप्टाइड प्रोटीन कहलाता है।
हर शृंखला के एक सिरे पर मुक्त –NH2 (N-सिरा) और दूसरे पर मुक्त –COOH (C-सिरा) होता है। क्रम मायने रखता है, इसलिए ग्लाइसिलऐलानिन (Gly–Ala) और ऐलानिलग्लाइसीन (Ala–Gly) अलग डाइपेप्टाइड हैं।
रेशेदार और गोलाकार प्रोटीन
- रेशेदार प्रोटीन: शृंखलाएँ लंबे धागों में पास-पास लेटी, H-बंध और S–S पुल से जुड़ी। पानी में अघुलनशील। केराटिन (बाल, ऊन, नाखून, रेशम), मायोसिन (पेशी)।
- गोलाकार प्रोटीन: शृंखला मुड़कर गोल आकार लेती है। प्रायः पानी में घुलनशील। इंसुलिन, ऐल्बुमिन (अंडे की सफ़ेदी, रक्त), हीमोग्लोबिन।
प्रोटीन संरचना के चार स्तर
प्राथमिक संरचना
हर शृंखला में ऐमीनो अम्लों का ठीक-ठीक क्रम। एक भी बदला तो प्रोटीन बदल गया। सिकल-सेल एनीमिया में हीमोग्लोबिन का एक ऐमीनो अम्ल बदल जाता है और लाल कोशिकाएँ हँसिये जैसी मुड़ जाती हैं।
द्वितीयक संरचना
शृंखला का एक हिस्सा जो आकार लेता है, एक पेप्टाइड के C=O और दूसरे के N–H के बीच H-बंध से थमा।
- α-हेलिक्स: शृंखला दाएँ हाथ की स्प्रिंग जैसी घूमती है। हर C=O, चार इकाई आगे वाले N–H से H-बंध बनाता है।
- β-प्लीटेड शीट: शृंखलाएँ लगभग सीधी खिंचकर पास-पास लेटती हैं, H-बंध से जुड़ीं, कागज़ के पंखे जैसी तहों में। रेशम में यही है।
तृतीयक संरचना
पूरी शृंखला आगे मुड़कर 3D आकार लेती है। इसे H-बंध, डाइसल्फ़ाइड (S–S) पुल, आयनिक आकर्षण, वान्डरवाल्स बल और तैलीय (जलविरागी) R समूहों का अंदर की ओर खिंचाव थामते हैं। इसी से रेशेदार या गोलाकार आकार बनता है।
चतुर्धातुक संरचना
कुछ प्रोटीन दो या ज़्यादा शृंखलाओं (उप-इकाइयों) से बने हैं। ये उप-इकाइयाँ आपस में कैसे बैठी हैं, यह चतुर्धातुक संरचना है। हीमोग्लोबिन में चार उप-इकाइयाँ हैं।
प्रोटीन का विकृतीकरण
अपने सही आकार और काम वाला प्राकृतिक प्रोटीन मूल (नेटिव) प्रोटीन कहलाता है। गर्मी, pH बदलने, तेज़ अम्ल, ऐल्कोहॉल या भारी धातु लवणों से इसके H-बंध और दूसरे कमज़ोर बल टूट जाते हैं। कुंडलियाँ खुल जाती हैं, गोले बिखर जाते हैं। प्रोटीन अपना आकार और जैविक काम खो देता है। यह विकृतीकरण है।
- प्राथमिक संरचना वही रहती है: पेप्टाइड बंध नहीं टूटते। केवल द्वितीयक, तृतीयक (और चतुर्धातुक) संरचना जाती है।
- उदाहरण: अंडा उबालना (ऐल्बुमिन का स्कंदन), दूध का दही बनना (बैक्टीरिया के लैक्टिक अम्ल से), मांस पकाना।
- ज़्यादातर विकृतीकरण अनुत्क्रमणीय है, हालाँकि कुछ प्रोटीन धीरे-धीरे हालात लौटने पर फिर मुड़ जाते हैं।
एंज़ाइम
एंज़ाइम जैव उत्प्रेरक हैं। लगभग सभी गोलाकार प्रोटीन हैं। ये शरीर के ताप पर अभिक्रियाओं को लाखों गुना तेज़ कर देते हैं।
- विशिष्ट: हर एंज़ाइम एक ही पदार्थ (अपने सबस्ट्रेट) या एक तरह के बंध पर काम करता है। सबस्ट्रेट एक जेब में फिट होता है जिसे सक्रिय स्थल कहते हैं, जैसे ताले में चाबी।
- सक्रियण ऊर्जा घटाते हैं: अभिक्रिया को आसान रास्ता देते हैं। उदाहरण: अम्ल से सुक्रोज़ तोड़ने में Ea लगभग 104 kJ/mol; एंज़ाइम सुक्रेज़ से केवल लगभग 36 kJ/mol।
- नाम: सबस्ट्रेट या अभिक्रिया के नाम में "-एज़" जोड़कर: माल्टेज़ (माल्टोज़ → ग्लूकोज़), सुक्रेज़/इनवर्टेज़ (सुक्रोज़ → ग्लूकोज़ + फ्रक्टोज़), लाइपेज़ (वसा), प्रोटिएज़ (प्रोटीन), ऑक्सीडोरिडक्टेज़ (रेडॉक्स)।
- सबसे अच्छी दशा: लगभग 37 °C और एक खास pH पर सबसे अच्छा काम। ज़्यादा गर्मी या गलत pH इन्हें विकृत कर देते हैं।
एंज़ाइम क्रिया की विस्तृत विधि रासायनिक बलगतिकी में पढ़ते हैं; यहाँ ताला-चाबी चित्र याद रखो।
घर पर करके देखो
- दो छोटी कटोरियों में दो-दो चम्मच कच्चे अंडे की सफ़ेदी लो।
- पहले अनुमान लगाओ: एक में एक चम्मच नींबू का रस डालें और दूसरी को छोड़ दें तो क्या होगा?
- 10 मिनट रुको। नींबू वाली कटोरी धुँधली सफ़ेद हो जाती है: अम्ल ने ऐल्बुमिन को विकृत कर दिया, ठीक गर्मी की तरह। दूसरी पारदर्शी रहती है।
- अतिरिक्त: ताज़े अनानास का टुकड़ा (इसमें प्रोटीन काटने वाला एंज़ाइम है) जमी जेली या पनीर पर रातभर रखो; वह नरम हो जाता है। पका अनानास ऐसा नहीं करता, क्योंकि पकाने से एंज़ाइम विकृत हो गया। 3D के चरण 6 का तापमान स्लाइडर भी यही दिखाता है।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- α-ऐमीनो अम्ल: R–CH(NH₂)–COOH · ज़्विटर आयन: R–CH(NH₃⁺)–COO⁻
- ऐमीनो अम्ल + ऐमीनो अम्ल → डाइपेप्टाइड + H₂O (पेप्टाइड बंध –CO–NH–)
- एक शृंखला में n ऐमीनो अम्ल → (n − 1) पेप्टाइड बंध, (n − 1) H₂O निकले
- पेप्टाइड का द्रव्यमान = ऐमीनो अम्लों का योग − 18 × (n − 1)
- k प्रकार के ऐमीनो अम्लों से n लंबाई की शृंखलाएँ = kⁿ
- ग्लाइसीन 75, ऐलानिन 89 g/mol · शृंखला में एक इकाई ≈ ऐमीनो अम्ल − 18
हल किए गए उदाहरण
1. डाइपेप्टाइड Gly–Ala का बनना दिखाओ।
चरण 1: ग्लाइसीन H₂N–CH₂–COOH, ऐलानिन H₂N–CH(CH₃)–COOH। चरण 2: ग्लाइसीन का –COOH + ऐलानिन का –NH₂, H₂O निकला। चरण 3: H₂N–CH₂–CO–NH–CH(CH₃)–COOH। उत्तर: ग्लाइसिलऐलानिन, एक पेप्टाइड बंध।
2. 51 ऐमीनो अम्लों की एक शृंखला में कितने पेप्टाइड बंध?
चरण 1: n ऐमीनो अम्ल, n − 1 बंध। चरण 2: 51 − 1 = 50। उत्तर: 50 बंध।
3. ट्राइपेप्टाइड Gly–Gly–Ala का मोलर द्रव्यमान (Gly = 75, Ala = 89)?
चरण 1: योग = 75 + 75 + 89 = 239। चरण 2: 3 ऐमीनो अम्ल → 2 बंध → 2 H₂O = 36 घटा। चरण 3: 239 − 36 = 203 g/mol। उत्तर: 203 g/mol।
4. ग्लाइसीन और ऐलानिन से (हर एक दो बार भी) कितने डाइपेप्टाइड बन सकते हैं?
चरण 1: पहली जगह 2 विकल्प, दूसरी जगह 2। चरण 2: 2 × 2 = 4: Gly–Gly, Gly–Ala, Ala–Gly, Ala–Ala। उत्तर: 4। Gly–Ala और Ala–Gly अलग हैं क्योंकि क्रम मायने रखता है।
5. एक प्रोटीन का मोलर द्रव्यमान 11 000 g/mol है। औसत इकाई 110 g/mol हो तो ऐमीनो अम्ल लगभग कितने?
चरण 1: n ≈ 11 000 ÷ 110 = 100। चरण 2: लगभग 100 इकाइयाँ, इसलिए यह प्रोटीन गिना जाएगा। उत्तर: लगभग 100।
6. ग्लाइसीन लगभग 500 K पर पिघलता है, जबकि लगभग उतने ही आकार का ऐसीटिक अम्ल 290 K पर। क्यों?
चरण 1: ग्लाइसीन ज़्विटर आयन H₃N⁺–CH₂–COO⁻ के रूप में रहता है। चरण 2: पड़ोसी अणुओं के + और − सिरे लवण के क्रिस्टल की तरह ज़ोर से खिंचते हैं। चरण 3: ऐसीटिक अम्ल में केवल उदासीन अणुओं के बीच H-बंध हैं। उत्तर: ज़्विटर आयनों के तेज़ आयनिक आकर्षण से ग्लाइसीन का गलनांक बहुत ऊँचा।
7. अंडा उबाला गया। ऐल्बुमिन की कौन-सी संरचना बदली और कौन-सी बची?
चरण 1: गर्मी शृंखला को हिलाकर H-बंध और कमज़ोर बल तोड़ती है। चरण 2: कुंडलियाँ खुलीं (द्वितीयक गई), गोला खुला (तृतीयक गई)। चरण 3: पेप्टाइड बंध मज़बूत सहसंयोजक बंध हैं, नहीं टूटते। उत्तर: द्वितीयक और तृतीयक बदलीं; प्राथमिक (क्रम) बची।
आम गलतियाँ
- यह सोचना कि विकृतीकरण पेप्टाइड बंध तोड़ता है। केवल कमज़ोर बल टूटते हैं; क्रम वही रहता है।
- Gly–Ala और Ala–Gly को एक मानना। N-सिरा पहले लिखते हैं; क्रम से ये अलग हैं।
- सभी ऐमीनो अम्लों को प्रकाशिक सक्रिय मानना। ग्लाइसीन नहीं है (R = H)।
- द्वितीयक और तृतीयक को मिला देना। द्वितीयक = H-बंध से बनी स्थानीय कुंडली/परत; तृतीयक = पूरी शृंखला का 3D मोड़।