CBSE कक्षा 12 रसायन विज्ञान
अध्याय: 11
1. विलयन
प्रकार और सांद्रता · वाष्प दाब और आदर्श विलयन · अणुसंख्य गुणधर्म
- विलयन: प्रकार, सांद्रता और हेनरी का नियम – विलयन दो या ज़्यादा पदार्थों का एकसमान मिश्रण है। जो ज़्यादा मात्रा में हो वह विलायक, जो कम हो वह विलेय। विलयन कितना 'गाढ़ा' है, यह सांद्रता के पदों से बताते हैं: द्रव्यमान %, आयतन %, ppm, मोल अंश, मोलरता (1 लीटर विलयन में) और मोललता (1 kg विलायक में)। ठोस अक्सर गर्म करने पर ज़्यादा घुलते हैं। गैस दाब बढ़ाने पर ज़्यादा घुलती है (हेनरी का नियम, p = KH·x) और गर्म करने पर कम।
- राउल्ट का नियम: वाष्प दाब, आदर्श और अनादर्श विलयन – बंद बर्तन में द्रव के कुछ अणु भाप बनकर ऊपर जाते हैं और दीवारों पर दबाव डालते हैं: यही वाष्प दाब है। राउल्ट का नियम: विलयन के हर वाष्पशील घटक का आंशिक वाष्प दाब = उसका मोल अंश × शुद्ध अवस्था का वाष्प दाब, pA = xA·pA°। जो विलयन हर अनुपात पर यह माने वह आदर्श (Δमिश्रणH = 0, Δमिश्रणV = 0)। बाकी में विचलन: धनात्मक (A–B खिंचाव कमज़ोर, ज़्यादा भाप, न्यूनतम क्वथनांक वाला स्थिरक्वाथी) या ऋणात्मक (A–B खिंचाव मज़बूत, कम भाप, अधिकतम क्वथनांक वाला स्थिरक्वाथी)।
- अणुसंख्य गुणधर्म: कणों की गिनती, उनकी किस्म नहीं – अणुसंख्य गुणधर्म सिर्फ़ इस पर निर्भर हैं कि विलयन में विलेय के कितने कण हैं, वे कौन-से हैं इस पर नहीं। चार हैं: वाष्प दाब का आपेक्षिक अवनमन (Δp/p° = x₂), क्वथनांक उन्नयन (ΔTb = Kb·m), हिमांक अवनमन (ΔTf = Kf·m) और परासरण दाब (π = CRT)। इनसे मोलर द्रव्यमान निकालते हैं। जो लवण आयनों में टूटते हैं (NaCl) या जो अणु जोड़े बनाते हैं (बेंज़ीन में एसिटिक अम्ल), वे असामान्य मोलर द्रव्यमान देते हैं, जिसे वान्ट हॉफ़ गुणक i से ठीक करते हैं।
2. वैद्युतरसायन
गैल्वेनी सेल और नेर्न्स्ट समीकरण · विद्युत-अपघटनी विलयनों का चालकत्व · वैद्युत अपघटन, बैटरी, ईंधन सेल, संक्षारण
- गैल्वेनी सेल और नेर्न्स्ट समीकरण – गैल्वेनी सेल अपने-आप होने वाली रेडॉक्स अभिक्रिया की ऊर्जा को बिजली में बदलता है। ऐनोड (−) पर ऑक्सीकरण और कैथोड (+) पर अपचयन होता है। हर इलेक्ट्रोड का विभव मानक हाइड्रोजन इलेक्ट्रोड (0 V) से नापा जाता है। E°सेल = E°कैथोड − E°ऐनोड। नेर्न्स्ट समीकरण E = E° − (0.059/n) log Q (298 K पर) किसी भी सांद्रता पर वोल्टेज बताता है, और ΔG = −nFE वोल्टेज को ऊर्जा से जोड़ता है।
- विद्युत-अपघटनी विलयनों का चालकत्व – विलयन में धारा आयन ले जाते हैं। प्रतिरोध R सेल के आकार पर निर्भर है, जिसे सेल स्थिरांक G* = l/A से हटाते हैं: चालकता κ = G*/R। मोलर चालकता Λm = κ × 1000/c बताती है कि एक मोल विलेय कितना चालन करता है। तनु करने पर κ घटती है पर Λm बढ़ती है: प्रबल में थोड़ा (Λm = Λ°m − A√c), दुर्बल में बहुत। कोलराउश नियम: Λ°m = आयनों के मानों का योग, जिससे दुर्बल विद्युत-अपघट्य का Λ°m और वियोजन की मात्रा निकलती है।
- वैद्युत अपघटन, बैटरी, ईंधन सेल और संक्षारण – वैद्युत-अपघटनी सेल में बाहर का बिजली स्रोत ऐसी अभिक्रिया करवाता है जो अपने-आप नहीं होती: धनायन कैथोड (−) पर अपचयित और ऋणायन ऐनोड (+) पर ऑक्सीकृत होते हैं। फैराडे के नियम द्रव्यमान को आवेश से जोड़ते हैं: m = (M/nF) × I × t। कौन-सा उत्पाद बनेगा यह इलेक्ट्रोड विभव और अधिविभव पर निर्भर है। बैटरियाँ गैल्वेनी सेल हैं: प्राथमिक (शुष्क सेल, मर्करी सेल) दोबारा चार्ज नहीं होतीं; द्वितीयक (लेड संचायक, Ni–Cd) होती हैं। ईंधन सेल H₂ और O₂ से सीधे बिजली बनाता है। संक्षारण (जंग) धातु की सतह पर बना एक अनचाहा गैल्वेनी सेल है।
3. रासायनिक बलगतिकी
अभिक्रिया वेग · समाकलित वेग समीकरण · ताप और संघट्ट सिद्धांत
- रासायनिक अभिक्रिया का वेग – अभिक्रिया वेग बताता है कि प्रति इकाई समय में अभिकारक कितना ख़र्च होता है या उत्पाद कितना बनता है। वेग = −Δ[R]/Δt = +Δ[P]/Δt (इकाई mol L⁻¹ s⁻¹)। वेग नियम, वेग = k[A]^x[B]^y, प्रयोग से मिलता है; x + y कोटि है। आण्विकता = एक प्राथमिक चरण में टकराने वाले कणों की संख्या।
- समाकलित वेग समीकरण: शून्य और प्रथम कोटि – समाकलित वेग समीकरण सांद्रता को समय से जोड़ते हैं। शून्य कोटि: [R] = [R]₀ − kt (सीधी रेखा), t½ = [R]₀/2k। प्रथम कोटि: k = (2.303/t) log([R]₀/[R]); ln[R] बनाम t सीधी रेखा, ढलान −k; t½ = 0.693/k, जो शुरुआती मात्रा पर निर्भर नहीं।
- ताप, सक्रियण ऊर्जा, उत्प्रेरक और संघट्ट सिद्धांत – उत्पाद बनने के लिए अभिकारक अणुओं को एक ऊर्जा पहाड़ी चढ़नी होती है, जिसे सक्रियण ऊर्जा Ea कहते हैं। आरेनियस समीकरण k = A e^(−Ea/RT) बताता है कि ताप थोड़ा बढ़ने पर बहुत ज़्यादा अणु पहाड़ी पार करते हैं, इसलिए k तेज़ी से बढ़ता है। उत्प्रेरक नीची पहाड़ी देता है, ΔH नहीं बदलता। संघट्ट सिद्धांत: अणु तभी अभिक्रिया करते हैं जब पर्याप्त ऊर्जा और सही दिशा से टकराएँ।
4. d- एवं f-ब्लॉक के तत्व
संक्रमण तत्व · महत्वपूर्ण यौगिक · लैंथेनॉयड और ऐक्टिनॉयड
- संक्रमण तत्व (d-ब्लॉक) – संक्रमण तत्व समूह 3 से 12 की d-ब्लॉक धातुएँ हैं। इनका आखिरी इलेक्ट्रॉन अंदर के (n−1)d कक्षक में जाता है। d-कक्षक आधे-अधूरे भरे होने से ये कई ऑक्सीकरण अवस्थाएँ, रंगीन आयन, चुंबकत्व (μ = √(n(n+2)) BM), अच्छा उत्प्रेरण और आसानी से मिश्रधातु बनाते हैं।
- पोटैशियम डाइक्रोमेट और पोटैशियम परमैंगनेट – K₂Cr₂O₇ (नारंगी, Cr +6) क्रोमाइट अयस्क से बनता है; पानी में अम्ल में डाइक्रोमेट और क्षार में पीला क्रोमेट रहता है। KMnO₄ (बैंगनी, Mn +7) पायरोलुसाइट (MnO₂) से बनता है। दोनों प्रबल ऑक्सीकारक हैं: अम्लीय डाइक्रोमेट 6 इलेक्ट्रॉन लेकर हरा Cr³⁺ बनता है; परमैंगनेट अम्ल में 5 (Mn²⁺), उदासीन में 3 (MnO₂) और प्रबल क्षार में 1 (MnO₄²⁻) इलेक्ट्रॉन लेता है।
- लैंथेनॉयड और ऐक्टिनॉयड (f-ब्लॉक) – f-ब्लॉक की दो पंक्तियाँ आवर्त सारणी के नीचे रखी जाती हैं: लैंथेनॉयड (Ce से Lu, 4f भरता है) और ऐक्टिनॉयड (Th से Lr, 5f भरता है)। लैंथेनॉयड मुख्यतः +3 दिखाते हैं; ऐक्टिनॉयड +7 तक कई अवस्थाएँ दिखाते हैं और सब रेडियोधर्मी हैं। f-इलेक्ट्रॉनों के कमज़ोर परिरक्षण से पंक्ति में आकार लगातार घटता है: लैंथेनॉयड संकुचन। इसी से Zr और Hf लगभग एक आकार के हैं।
5. उपसहसंयोजन यौगिक
वर्नर का सिद्धांत और पद · समावयवता · आबंधन
- उपसहसंयोजन यौगिक: वर्नर का सिद्धांत, मुख्य पद और IUPAC नाम – उपसहसंयोजन यौगिक में बीच में एक धातु परमाणु या आयन होता है, जिससे कुछ तय संख्या में आयन या अणु जुड़े रहते हैं। इन्हें लिगैंड कहते हैं। हर लिगैंड धातु को एक इलेक्ट्रॉन-युग्म देता है। धातु और उसके लिगैंड मिलकर बड़े कोष्ठक [ ] में रहते हैं — यही उपसहसंयोजन क्षेत्र है। धातु से सीधे जुड़े दाता परमाणुओं की गिनती उपसहसंयोजन संख्या है। वर्नर ने बताया कि धातु की दो संयोजकताएँ होती हैं: प्राथमिक (आयनित होने वाली, कोष्ठक के बाहर) और द्वितीयक (स्थिर, कोष्ठक के अंदर)।
- उपसहसंयोजन यौगिकों में समावयवता – समावयवी (isomers) का सूत्र एक होता है पर परमाणुओं की व्यवस्था अलग। संरचनात्मक समावयवियों में बंध ही अलग होते हैं: आयनन, बंधनी, उपसहसंयोजन और विलायकयोजन। त्रिविम समावयवियों में बंध वही रहते हैं, बस अंतरिक्ष में जगह बदलती है: ज्यामितीय (सिस-ट्रांस, fac-mer) और ध्रुवण (ऐसे दर्पण प्रतिबिंब जो एक-दूसरे पर नहीं बैठते)।
- उपसहसंयोजन यौगिकों में आबंधन: VBT, क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धांत और धातु कार्बोनिल – संयोजकता आबंध सिद्धांत (VBT) कहता है कि धातु अपने खाली कक्षकों को मिलाकर संकर कक्षक (जैसे d²sp³ या sp³d²) बनाती है, जो लिगैंड के इलेक्ट्रॉन-युग्म लेते हैं; इससे आकार और चुंबकत्व पता चलता है। क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धांत (CFT) लिगैंड को ऋण आवेश मानता है जो कुछ d कक्षकों को ज़्यादा ऊपर धकेलते हैं: अष्टफलक में 5 d कक्षक t₂g (नीचे) और e_g (ऊपर) में Δo के अंतर से बँटते हैं। प्रबल लिगैंड Δo बड़ा करते हैं और इलेक्ट्रॉन जोड़े बनाते हैं (निम्न चक्रण)। प्रकाश सोखकर इलेक्ट्रॉन Δo पार करे तो रंग दिखता है। धातु कार्बोनिल में CO σ युग्म देता है और π इलेक्ट्रॉन वापस लेता है (सहक्रियाशील आबंधन)।
6. हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन
हैलोऐल्केन · हैलोऐरीन · पॉलिहैलोजन यौगिक
- हैलोऐल्केन – हैलोऐल्केन वह ऐल्केन है जिसमें एक हाइड्रोजन की जगह हैलोजन (X) लगा हो (R–X)। C–X आबंध ध्रुवीय है: कार्बन पर हल्का धन आवेश होता है, इसलिए नाभिकस्नेही उस पर हमला करते हैं। अभिक्रियाएँ तीन तरह की: SN2 (एक चरण, पीछे से हमला, प्रतीपन; 1° के लिए अच्छी), SN1 (दो चरण, चपटा कार्बोधनायन, रेसेमिक उत्पाद; 3° के लिए अच्छी) और विलोपन (ऐल्कोहॉली KOH से ऐल्कीन)।
- हैलोऐरीन – हैलोऐरीन में हैलोजन सीधे बेंज़ीन वलय से जुड़ा होता है (Ar–X), जैसे क्लोरोबेंज़ीन C₆H₅Cl। अनुनाद के कारण C–X आबंध में आंशिक द्वि-आबंध गुण आता है, इसलिए नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन कठिन है, जब तक ऑर्थो/पैरा पर –NO₂ न हो। इलेक्ट्रॉनस्नेही अभिक्रियाओं में हैलोजन वलय को थोड़ा धीमा करता है पर नए समूह को ऑर्थो और पैरा पर भेजता है।
- पॉलिहैलोजन यौगिक – पॉलिहैलोजन यौगिकों में कार्बन पर एक से ज़्यादा हैलोजन होते हैं। डाइक्लोरोमेथेन विलायक और पेंट हटाने वाला है; क्लोरोफ़ॉर्म विलायक है जो वायु और प्रकाश में विषैली फ़ॉस्जीन बनाता है; आयोडोफ़ॉर्म पीला पूतिरोधी है; CCl₄ विलायक और अग्निशामक था; फ़्रिऑन शीतलक थे जो ओज़ोन नष्ट करते हैं; DDT कीटनाशक है जो खाद्य शृंखला में जमा होता है।
7. ऐल्कोहॉल, फ़ीनॉल एवं ईथर
ऐल्कोहॉल · फ़ीनॉल · ईथर
- ऐल्कोहॉल – ऐल्कोहॉल वह कार्बनिक यौगिक है जिसमें –OH समूह एक sp³ कार्बन पर लगा हो (R–OH)। –OH वाले कार्बन पर जुड़े कार्बन गिनकर इसे प्राथमिक (1°), द्वितीयक (2°) या तृतीयक (3°) कहते हैं। नाम: ऐल्केन का 'e' हटाकर 'ऑल' (ol), –OH को सबसे छोटा नंबर। बनाने के तरीके: ऐल्कीन का जलयोजन या हाइड्रोबोरॉनन–ऑक्सीकरण, ऐल्डिहाइड/कीटोन/अम्ल का अपचयन, ग्रीन्यार अभिकर्मक। हाइड्रोजन बंध के कारण क्वथनांक ऊँचा और पानी में घुलनशील। अभिक्रियाओं में या तो O–H टूटता है (Na, एस्टरीकरण) या C–O (HX, निर्जलीकरण); 1° और 2° का ऑक्सीकरण होता है। मेथेनॉल और एथेनॉल मुख्य व्यापारिक ऐल्कोहॉल हैं।
- फ़ीनॉल – फ़ीनॉल में –OH सीधे बेंज़ीन वलय के कार्बन पर लगा होता है। इसे क्लोरोबेंज़ीन (NaOH, 623 K, 300 atm), बेंज़ीनसल्फ़ोनिक अम्ल, डाइऐज़ोनियम लवण या क्यूमीन से बनाते हैं। फ़ीनॉल, ऐल्कोहॉल और पानी से ज़्यादा अम्लीय है क्योंकि फ़ीनॉक्साइड आयन का ऋण आवेश वलय पर फैल जाता है; –NO₂ जैसे इलेक्ट्रॉन खींचने वाले समूह (ऑर्थो/पैरा पर) अम्लता बढ़ाते हैं, –CH₃ जैसे इलेक्ट्रॉन देने वाले घटाते हैं। –OH वलय की ऑर्थो और पैरा स्थितियों को सक्रिय करता है: ब्रोमीन जल → 2,4,6-ट्राइब्रोमोफ़ीनॉल, तनु HNO₃ → o- और p-नाइट्रोफ़ीनॉल, NaOH + CO₂ → सैलिसिलिक अम्ल (कोल्बे), CHCl₃ + NaOH → सैलिसिलैल्डिहाइड (राइमर–टीमान)।
- ईथर – ईथर में एक ऑक्सीजन दो कार्बन समूहों को जोड़ता है: R–O–R′। नाम: ऐल्कॉक्सीऐल्केन (छोटा समूह ऐल्कॉक्सी बनता है)। बनाने के तरीके: प्राथमिक ऐल्कोहॉल का सांद्र H₂SO₄ के साथ 413 K पर निर्जलीकरण (सममित ईथर), या विलियमसन संश्लेषण: सोडियम ऐल्कॉक्साइड + प्राथमिक ऐल्किल हैलाइड (SN2)। ईथर आपस में H-बंध नहीं बनाते, इसलिए क्वथनांक कम (ऐल्केन जैसा), पर पानी से H-बंध बनाकर छोटे ईथर थोड़ा घुलते हैं। HI, C–O बंध तोड़ता है: छोटा समूह ऐल्किल आयोडाइड बनता है (SN2), तृतीयक समूह SN1 से; ऐनिसोल से फ़ीनॉल + CH₃I। ऐनिसोल का –OCH₃ वलय पर ऑर्थो-पैरा प्रतिस्थापन कराता है।
8. ऐल्डिहाइड, कीटोन एवं कार्बोक्सिलिक अम्ल
ऐल्डिहाइड और कीटोन · कार्बोक्सिलिक अम्ल
- ऐल्डिहाइड और कीटोन: संरचना, बनाना और अभिक्रियाएँ – ऐल्डिहाइड और कीटोन दोनों में कार्बोनिल समूह C=O होता है। ऐल्डिहाइड में C=O वाले कार्बन पर कम से कम एक H होता है (−CHO)। कीटोन में उस कार्बन पर दो कार्बन समूह होते हैं (−CO−)। C=O बंध ध्रुवीय है: C थोड़ा धनात्मक, O थोड़ा ऋणात्मक। इसलिए इलेक्ट्रॉन से भरे कण (नाभिकस्नेही) कार्बन पर हमला करते हैं। यही एक बात ज़्यादातर अभिक्रियाएँ समझा देती है: HCN, NaHSO₃, ऐल्कोहॉल और अमोनिया व्युत्पन्नों का योग। ऐल्डिहाइड आसानी से ऑक्सीकृत होते हैं (टॉलेन्स, फेलिंग परीक्षण), कीटोन नहीं। C=O के बगल वाले कार्बन का H (α-H) थोड़ा अम्लीय होता है, इसी से ऐल्डोल संघनन होता है। जिन ऐल्डिहाइड में α-H नहीं, वे कैनिज़ारो अभिक्रिया देते हैं।
- कार्बोक्सिलिक अम्ल: कार्बोक्सिल समूह, अम्लता और अभिक्रियाएँ – कार्बोक्सिलिक अम्ल में कार्बोक्सिल समूह −COOH होता है: एक ही कार्बन पर C=O और O−H। यह H⁺ दे सकता है, और बचा हुआ आयन (कार्बोक्सिलेट, −COO⁻) स्थिर होता है क्योंकि उसका ऋण आवेश दोनों ऑक्सीजन में बराबर बँटा होता है। इसी कारण ये फ़ीनॉल और ऐल्कोहॉल से ज़्यादा अम्लीय हैं (पर HCl जैसे खनिज अम्लों से कमज़ोर)। इलेक्ट्रॉन खींचने वाले समूह (Cl, F, NO₂) अम्ल को प्रबल बनाते हैं, इलेक्ट्रॉन धकेलने वाले (ऐल्किल) दुर्बल। इन्हें ऐल्कोहॉल, ऐल्डिहाइड या ऐल्किलबेंज़ीन के ऑक्सीकरण से, नाइट्राइल, एस्टर और ऐमाइड के जल-अपघटन से, या ग्रिन्यार अभिकर्मक और CO₂ से बनाते हैं। मुख्य अभिक्रियाएँ: NaHCO₃ से लवण (CO₂ के बुलबुले), एस्टरीकरण, ऐसिल क्लोराइड और ऐनहाइड्राइड बनना, ऐल्कोहॉल में अपचयन, विकार्बोक्सिलन और HVZ अभिक्रिया।
9. ऐमीन
ऐमीन · डाइऐज़ोनियम लवण
- ऐमीन: संरचना, नामकरण, बनाना, क्षारकता और अभिक्रियाएँ – ऐमीन यानी अमोनिया, जिसके एक, दो या तीन H की जगह कार्बन समूह लग गए। N पर एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म बचा रहता है, इसलिए ऐमीन क्षार हैं। N पर लगे C गिनो: 1, 2 या 3 → प्राथमिक, द्वितीयक, तृतीयक। बनाने के तरीके: नाइट्रो, नाइट्राइल या एमाइड का अपचयन, ऐल्किल हैलाइड + NH₃, गैब्रिएल (केवल 1°), हॉफमान ब्रोमेमाइड (एक C कम)। ऐल्किल समूह क्षारकता बढ़ाते हैं; ऐनिलीन का वलय घटाता है। मुख्य अभिक्रियाएँ: अम्ल से लवण, ऐसीटिलन, कार्बिलऐमीन परीक्षण, हिन्सबर्ग परीक्षण, नाइट्रस अम्ल और ऐनिलीन के वलय पर प्रतिस्थापन।
- डाइऐज़ोनियम लवण: बनाना, गुण और ऐरोमैटिक यौगिक बनाने में उपयोग – डाइऐज़ोनियम लवण Ar–N₂⁺X⁻ होते हैं, जैसे बेंज़ीनडाइऐज़ोनियम क्लोराइड C₆H₅N₂⁺Cl⁻। बनाने का तरीका (डाइऐज़ोटीकरण): ऐनिलीन + NaNO₂ + HCl, 273–278 K पर। यह केवल ठंडे में टिकता है, इसलिए तुरंत इस्तेमाल होता है। गरम करने पर N₂ गैस निकल जाती है। दो तरह की अभिक्रियाएँ: (1) N₂ जाता है और उसकी जगह Cl, Br, CN (सैंडमेयर/गाटरमान), I (KI), F (HBF₄), H (H₃PO₂) या OH (गरम पानी) आता है; (2) N₂ रहता है और फ़ीनॉल या ऐनिलीन से युग्मन होकर रंगीन ऐज़ो रंजक बनते हैं।
10. जैव-अणु
कार्बोहाइड्रेट · प्रोटीन और एंज़ाइम · विटामिन, न्यूक्लिक अम्ल, हॉर्मोन
- कार्बोहाइड्रेट: वर्गीकरण, ग्लूकोज़, डाइसैकेराइड और पॉलीसैकेराइड – कार्बोहाइड्रेट यानी शर्कराएँ और शर्करा से बने बड़े अणु। रसायन की भाषा में ये पॉलीहाइड्रॉक्सी ऐल्डिहाइड या कीटोन हैं (बहुत सारे –OH और एक C=O), या वे पदार्थ जो जल-अपघटन पर ऐसे अणु देते हैं। इकाइयों की गिनती से इन्हें बाँटते हैं: एक (मोनोसैकेराइड), दो से दस (ऑलिगोसैकेराइड), बहुत सारी (पॉलीसैकेराइड)। ग्लूकोज़ छह कार्बन वाला ऐल्डोज़ है, फ्रक्टोज़ कीटोज़। दो इकाइयाँ –O– पुल (ग्लाइकोसाइडी बंध) से जुड़कर सुक्रोज़, माल्टोज़, लैक्टोज़ बनाती हैं; सैकड़ों जुड़कर स्टार्च, सेलुलोज़, ग्लाइकोजन।
- प्रोटीन और एंज़ाइम: ऐमीनो अम्ल, पेप्टाइड बंध, संरचना और विकृतीकरण – प्रोटीन ऐमीनो अम्लों की लंबी शृंखलाएँ हैं। हर ऐमीनो अम्ल के एक कार्बन पर ऐमीनो समूह (–NH₂), अम्ल समूह (–COOH), एक हाइड्रोजन और एक पार्श्व समूह R होता है। एक का –COOH अगले के –NH₂ से पानी निकालकर जुड़ता है: यह पेप्टाइड बंध (–CO–NH–) है। ऐमीनो अम्लों का क्रम प्राथमिक संरचना; कुंडली और परत द्वितीयक; पूरा 3D मोड़ तृतीयक; कई शृंखलाएँ साथ में चतुर्धातुक संरचना। गर्मी, अम्ल या ऐल्कोहॉल मोड़ खोल देते हैं (विकृतीकरण)। एंज़ाइम ज़्यादातर प्रोटीन हैं जो शरीर की अभिक्रियाएँ तेज़ करते हैं।
- विटामिन, न्यूक्लिक अम्ल और हॉर्मोन: प्रकार, कार्य, DNA और RNA – विटामिन छोटे कार्बनिक यौगिक हैं जो भोजन से बहुत थोड़ी मात्रा में चाहिए; A, D, E, K वसा में और B, C पानी में घुलते हैं, और हर एक की कमी से एक खास रोग होता है। न्यूक्लिक अम्ल (DNA और RNA) न्यूक्लियोटाइड की लंबी शृंखलाएँ हैं। हर न्यूक्लियोटाइड = पेंटोज़ शर्करा + फॉस्फेट + नाइट्रोजनी क्षार। DNA में डीऑक्सीराइबोज़, क्षार A, G, C, T और द्विकुंडली में दो लड़ियाँ, जहाँ A–T और G–C जोड़े बनते हैं। RNA में राइबोज़, T की जगह U, और प्रायः एक लड़ी। हॉर्मोन ग्रंथियों के बनाए रासायनिक संदेशवाहक हैं: स्टेरॉयड, प्रोटीन/पेप्टाइड या ऐमीनो अम्ल व्युत्पन्न।
11. केवल रचनात्मक आकलन हेतु विषय
पृष्ठ रसायन · तत्वों के निष्कर्षण के सिद्धांत · बहुलक · दैनिक जीवन में रसायन
- कोलॉइड और परिक्षिप्त तंत्र – परिक्षिप्त तंत्र (dispersed system) में एक पदार्थ छोटे-छोटे कणों के रूप में (परिक्षिप्त प्रावस्था) दूसरे पदार्थ (परिक्षेपण माध्यम) में फैला होता है। कणों के आकार से यह वास्तविक विलयन (लगभग 1 nm से छोटे), कोलॉइड (लगभग 1–100 nm) या निलंबन (100 nm से बड़े) होता है। कोलॉइड के कण दिखते नहीं और बैठते नहीं, पर रोशनी बिखेरने लायक बड़े होते हैं, इसलिए उनमें से गुज़रती किरण का रास्ता दिखता है – टिंडल प्रभाव। दोनों प्रावस्थाओं की अवस्था से कोलॉइड के प्रकार बनते हैं (कोहरा, धुआँ, दूध, झाग, जेल)। कोलॉइड कणों पर अक्सर एक जैसा आवेश होता है; विद्युत अपघट्य (नमक) डालने से आवेश ख़त्म होता है और कण जुड़कर बैठ जाते हैं – स्कंदन (coagulation)।
- धातुकर्म: धात्विक बंध से अयस्क से धातु निकालने तक – धातुएँ मुक्त इलेक्ट्रॉनों के समुद्र में बँधे धनायनों से बनी हैं। यही धात्विक बंध बताता है कि वे क्यों चमकती, चालन करती और मुड़ती हैं। ज़्यादातर धातुएँ चट्टानों में यौगिकों के रूप में मिलती हैं, जिन्हें अयस्क कहते हैं। धातुकर्म अयस्क से शुद्ध धातु निकालने का विज्ञान है: पहले अयस्क का सांद्रण, फिर यौगिक को गर्मी (उत्ताप धातुकर्म), विलयन (जल धातुकर्म) या बिजली (विद्युत धातुकर्म) से धातु में बदलना, फिर शोधन। धातु जितनी ज़्यादा सक्रिय, उसे निकालना उतना कठिन और उसका संक्षारण उतना तेज़।
- बहुलक (Polymers) – बहुलक एक विशाल अणु है जो कई छोटे अणुओं (एकलकों) को लंबी श्रृंखला में जोड़कर बनता है। योगात्मक बहुलकीकरण में C=C द्विबंध वाले एकलक खुलकर जुड़ते हैं और कुछ नहीं निकलता (एथीन → पॉलीएथीन)। संघनन बहुलकीकरण में दोनों सिरों पर क्रियाशील समूह वाले दो तरह के एकलक जुड़ते हैं और हर जोड़ पर पानी जैसा छोटा अणु निकलता है (नायलॉन, पॉलिएस्टर)। प्रकृति भी बहुलक बनाती है: स्टार्च, सेलुलोज़, प्रोटीन, DNA, रबर। अलग-अलग श्रृंखलाएँ थर्मोप्लास्टिक बनाती हैं जो पिघलकर पुनः चक्रित होते हैं; अनुप्रस्थ-बंधित श्रृंखलाएँ थर्मोसेट बनाती हैं जो कभी नहीं पिघलते। ज़्यादातर प्लास्टिक सड़ते नहीं, इसलिए कम इस्तेमाल, दोबारा इस्तेमाल और पुनः चक्रण ज़रूरी है।
- दैनिक जीवन में रसायन: दवाएँ, भोजन, सफ़ाई और मिट्टी – रसायन हर दिन आपके घर में काम करता है। प्रतिअम्ल (एंटासिड) दुर्बल क्षार हैं जो पेट का ज़्यादा अम्ल शांत करते हैं। दवाओं को उनके काम से बाँटते हैं: पीड़ाहारी, प्रतिजैविक, रोगाणुरोधक, प्रतिहिस्टैमिन, प्रशांतक। खाद्य रसायन भोजन को सुरक्षित और स्वादिष्ट रखते हैं: परिरक्षक, प्रतिऑक्सीकारक और मधुरक। साबुन इसलिए साफ़ करता है क्योंकि उसके अणु का एक सिरा पानी-प्रेमी और दूसरा तेल-प्रेमी है। किसान अम्लीय मिट्टी में चूना और फ़सल के पोषण के लिए उर्वरक डालते हैं। कुछ धातु आयन शरीर को चाहिए, कुछ विषैले हैं, इसलिए भी हम पुनर्चक्रण करते हैं।