संयोजकता आबंध सिद्धांत (VBT)
VBT में धातु आयन कुछ खाली कक्षकों को मिलाकर बराबर संकर कक्षक बनाता है। हर संकर कक्षक लिगैंड से एक एकाकी युग्म लेता है।
| संख्या | संकरण | आकार | उदाहरण |
|---|---|---|---|
| 4 | sp³ | चतुष्फलकीय | [NiCl₄]²⁻ |
| 4 | dsp² | वर्ग समतली | [Ni(CN)₄]²⁻ |
| 6 | d²sp³ (आंतरिक, 3d) | अष्टफलकीय | [Co(NH₃)₆]³⁺ |
| 6 | sp³d² (बाह्य, 4d) | अष्टफलकीय | [CoF₆]³⁻ |
आंतरिक कक्षक (निम्न चक्रण) संकुल (n−1)d कक्षक लेते हैं; इलेक्ट्रॉन पहले जोड़े बनाते हैं। बाह्य कक्षक (उच्च चक्रण) संकुल nd कक्षक लेते हैं; इलेक्ट्रॉन अयुग्मित रहते हैं।
चुंबकीय आघूर्ण
हर अयुग्मित इलेक्ट्रॉन एक छोटा चुंबक है। केवल-चक्रण आघूर्ण μ = √(n(n+2)) BM, n = अयुग्मित इलेक्ट्रॉन। मापे गए μ से n और फिर आबंधन पता चलता है।
VBT की कमियाँ
- रंग नहीं समझाता।
- नहीं बताता कि कौन-सा लिगैंड प्रबल है, कौन दुर्बल।
- ऊर्जा के मान नहीं देता, दुर्बल और प्रबल क्षेत्र को ठीक से अलग नहीं कर पाता।
क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धांत (CFT)
CFT धातु-लिगैंड बंध को सिर्फ़ विद्युत आकर्षण मानता है: लिगैंड बिंदु ऋण आवेश (या द्विध्रुव) हैं। अकेले धातु आयन में पाँचों d कक्षकों की ऊर्जा बराबर (समभ्रंश) है। लिगैंड पास आएँ तो जो कक्षक उनकी ओर हैं, ज़्यादा ऊपर जाते हैं।
अष्टफलकीय क्षेत्र
dx²−y² और dz² सीधे लिगैंडों की ओर हैं → 0.6Δo ऊपर (e_g समूह)। dxy, dyz, dxz बीच में हैं → 0.4Δo नीचे (t₂g समूह)। Δo = क्रिस्टल क्षेत्र विपाटन ऊर्जा।
चतुष्फलकीय क्षेत्र
क्रम उलट जाता है: e नीचे, t₂ ऊपर, और अंतर छोटा: Δt ≈ (4/9)Δo। इसलिए चतुष्फलकीय संकुल लगभग हमेशा उच्च चक्रण होते हैं।
स्पेक्ट्रमरासायनिक श्रेणी
बढ़ती क्षेत्र-प्रबलता (बढ़ते Δ) के क्रम में लिगैंड: I⁻ < Br⁻ < SCN⁻ < Cl⁻ < S²⁻ < F⁻ < OH⁻ < C₂O₄²⁻ < H₂O < NCS⁻ < EDTA⁴⁻ < NH₃ < en < CN⁻ < CO।
उच्च चक्रण और निम्न चक्रण
d⁴ से d⁷ में विकल्प होता है। P = युग्मन ऊर्जा (एक कक्षक में दो इलेक्ट्रॉन रखने की कीमत)।
- Δo < P (दुर्बल लिगैंड): इलेक्ट्रॉन ऊपर → उच्च चक्रण, जैसे d⁴ = t₂g³e_g¹।
- Δo > P (प्रबल लिगैंड): t₂g में जोड़ा → निम्न चक्रण, जैसे d⁴ = t₂g⁴e_g⁰।
क्रिस्टल क्षेत्र स्थायीकरण ऊर्जा (CFSE)
CFSE (अष्टफलकीय) = (−0.4 × n(t₂g) + 0.6 × n(e_g)) Δo (+ अतिरिक्त जोड़ों की युग्मन ऊर्जा)।
CFT से रंग और चुंबकत्व
सफ़ेद प्रकाश पड़ने पर t₂g का इलेक्ट्रॉन ठीक Δo ऊर्जा वाला प्रकाश सोखकर e_g में कूद सकता है। इसे d-d संक्रमण कहते हैं। सोखा गया रंग हट जाता है; हमें उसका पूरक रंग दिखता है।
- [Ti(H₂O)₆]³⁺ हरा-पीला (~500 nm) सोखता है → बैंगनी दिखता है।
- d इलेक्ट्रॉन न हों (d⁰, जैसे Sc³⁺, Ti⁴⁺) या d पूरा भरा हो (d¹⁰, जैसे Zn²⁺, Cu⁺): कूदना नहीं → रंगहीन।
- लिगैंड नहीं → विपाटन नहीं → d-d रंग नहीं। इसीलिए निर्जल CuSO₄ सफ़ेद पर CuSO₄·5H₂O नीला।
- लिगैंड बदलो तो Δo बदलता है, रंग बदलता है: [Ni(H₂O)₆]²⁺ हरा, [Ni(en)₃]²⁺ बैंगनी।
CFT की कमियाँ: लिगैंड को बिंदु आवेश मानता है, इसलिए नहीं समझा पाता कि उदासीन CO, ऋणात्मक F⁻ से ज़्यादा विपाटन क्यों करता है; बंध के सहसंयोजी भाग को अनदेखा करता है।
धातु कार्बोनिलों में आबंधन
धातु कार्बोनिल धातु (अक्सर 0 ऑक्सीकरण अवस्था) और CO के संकुल हैं: [Ni(CO)₄] (चतुष्फलकीय), [Fe(CO)₅] (त्रिकोणीय द्विपिरैमिडी), [Cr(CO)₆] (अष्टफलकीय), [Mn₂(CO)₁₀] और [Co₂(CO)₈] (धातु-धातु बंध के साथ)।
M–C बंध के दो भाग हैं:
- σ बंध: CO का कार्बन अपना एकाकी युग्म धातु के खाली कक्षक में देता है।
- π पश्च-बंध: धातु का भरा d कक्षक इलेक्ट्रॉन वापस CO के खाली प्रतिआबंधी π* कक्षक में देता है।
दोनों एक-दूसरे की मदद करते हैं (सहक्रियाशील आबंधन): σ दान से धातु पर इलेक्ट्रॉन बढ़ते हैं, तो वह ज़्यादा वापस दे पाती है; वापस देने से धातु पर आवेश घटता है, तो वह और ले पाती है। नतीजा: मज़बूत M–C बंध, और थोड़ा कमज़ोर, लंबा C≡O बंध।
उपसहसंयोजन यौगिकों का महत्व और उपयोग
- जीव विज्ञान: क्लोरोफिल (Mg), हीमोग्लोबिन (Fe), विटामिन B12 (Co) संकुल हैं।
- विश्लेषण: EDTA अनुमापन से Ca²⁺ और Mg²⁺, यानी पानी की कठोरता नापते हैं। डाइमेथिलग्लाइऑक्सिम Ni²⁺ के साथ लाल अवक्षेप देता है। Cu²⁺, Fe³⁺ के रंग परीक्षण संकुल बनने पर आधारित हैं।
- धातुकर्म: सोना-चाँदी सायनाइड संकुल [Au(CN)₂]⁻, [Ag(CN)₂]⁻ के रूप में निकाले जाते हैं। निकेल का शोधन [Ni(CO)₄] से (मॉन्ड विधि)।
- दवा: सिसप्लैटिन कैंसर में; EDTA सीसा विषाक्तता हटाने में; D-पेनिसिलैमीन अतिरिक्त कॉपर हटाने में।
- उद्योग: हाइड्रोजनीकरण में विल्किंसन उत्प्रेरक [(Ph₃P)₃RhCl]; चिकनी चाँदी/सोने की परत चढ़ाने में [Ag(CN)₂]⁻ और [Au(CN)₂]⁻; फ़ोटोग्राफ़ी में स्थायीकरण [Ag(S₂O₃)₂]³⁻ बनाकर।
करके देखो: पहले अंदाज़ा, फिर जाँच
3D छूने से पहले अंदाज़ा लगाओ: Fe³⁺ (d⁵) में F⁻ (दुर्बल) के साथ और CN⁻ (प्रबल) के साथ कितने अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होंगे? लिख लो। अब आखिरी चरण में dⁿ = 5 करो, पहले दुर्बल फिर प्रबल चुनो। तुम्हें 5 और 1 अयुग्मित, और μ = 5.92 BM और 1.73 BM दिखना चाहिए। घर पर (किसी बड़े के साथ): हल्के नीले कॉपर सल्फेट घोल में अमोनिया की कुछ बूँदें डालो। रंग गहरा नीला हो जाता है: Cu²⁺ के चारों ओर पानी की जगह NH₃ आया, Δo बदला, रंग बदला।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- μ (केवल-चक्रण) = √(n(n + 2)) BM, n = अयुग्मित इलेक्ट्रॉन
- अष्टफलकीय: t₂g −0.4Δo पर, e_g +0.6Δo पर
- CFSE (अष्ट.) = (−0.4 n_t₂g + 0.6 n_eg) Δo [+ हर अतिरिक्त जोड़े के लिए P]
- Δt ≈ (4/9) Δo
- Δo < P → उच्च चक्रण · Δo > P → निम्न चक्रण
- E = hc/λ: सोखी गई तरंगदैर्घ्य से Δo
हल किए गए उदाहरण
1. [Fe(H₂O)₆]²⁺ (उच्च चक्रण) का केवल-चक्रण चुंबकीय आघूर्ण ज्ञात करो।
चरण 1: Fe²⁺ = 3d⁶। H₂O दुर्बल → उच्च चक्रण: t₂g⁴e_g²। चरण 2: अयुग्मित: t₂g में 1 जोड़ा + 2 अकेले, e_g में 2 अकेले → n = 4। चरण 3: μ = √(4 × 6) = √24 = 4.90 BM। उत्तर: 4.90 BM।
2. [Ni(CN)₄]²⁻ का संकरण और चुंबकीय प्रकृति बताओ।
चरण 1: Ni²⁺ = 3d⁸। चरण 2: CN⁻ प्रबल: 8 इलेक्ट्रॉन 4 3d कक्षकों में जोड़े बनाते हैं, एक 3d खाली। चरण 3: 1 d + 1 s + 2 p → dsp², वर्ग समतली। चरण 4: n = 0। उत्तर: dsp², वर्ग समतली, प्रतिचुंबकीय।
3. [NiCl₄]²⁻ अनुचुंबकीय है पर [Ni(CO)₄] प्रतिचुंबकीय, जबकि दोनों चतुष्फलकीय हैं। क्यों?
चरण 1: [NiCl₄]²⁻: Ni²⁺ = 3d⁸, Cl⁻ दुर्बल, जोड़े नहीं बनते → 2 अयुग्मित → sp³, अनुचुंबकीय। चरण 2: [Ni(CO)₄]: Ni(0) = 3d⁸4s²। CO प्रबल: 4s इलेक्ट्रॉन 3d में चले जाते हैं → 3d¹⁰, सब युग्मित → sp³। उत्तर: 2 अयुग्मित बनाम 0।
4. प्रबल क्षेत्र (निम्न चक्रण) अष्टफलकीय d⁶ आयन की CFSE निकालो।
चरण 1: निम्न चक्रण d⁶ = t₂g⁶e_g⁰। चरण 2: CFSE = 6 × (−0.4Δo) + 0 = −2.4Δo। चरण 3: अकेले आयन (1 जोड़ा) की तुलना में 2 अतिरिक्त जोड़े बने (कुल 3), तो +2P जोड़ो। उत्तर: −2.4Δo + 2P (अक्सर सिर्फ़ −2.4Δo लिखते हैं)।
5. किसी संकुल का μ = 3.87 BM है। कितने अयुग्मित इलेक्ट्रॉन हैं?
चरण 1: √(n(n+2)) = 3.87 → n(n+2) = 15। चरण 2: n = 3 रखो: 3 × 5 = 15 ✓ उत्तर: 3 अयुग्मित (जैसे Cr³⁺, d³)।
6. [Ti(H₂O)₆]³⁺ 498 nm तरंगदैर्घ्य का प्रकाश सोखता है। Δo kJ mol⁻¹ में निकालो। (h = 6.626 × 10⁻³⁴ J s, c = 3 × 10⁸ m s⁻¹, N_A = 6.022 × 10²³)
चरण 1: एक आयन के लिए E = hc/λ = (6.626 × 10⁻³⁴ × 3 × 10⁸) / (498 × 10⁻⁹) = 3.99 × 10⁻¹⁹ J। चरण 2: प्रति मोल: 3.99 × 10⁻¹⁹ × 6.022 × 10²³ = 2.40 × 10⁵ J mol⁻¹। उत्तर: Δo ≈ 240 kJ mol⁻¹।
7. d⁵ का (a) उच्च चक्रण और (b) निम्न चक्रण अष्टफलकीय विन्यास लिखो। दोनों के n और μ बताओ।
चरण 1: उच्च चक्रण (दुर्बल, जैसे [Fe(H₂O)₆]³⁺ या [MnCl₆]⁴⁻): t₂g³e_g², n = 5, μ = √35 = 5.92 BM। चरण 2: निम्न चक्रण (प्रबल, जैसे [Fe(CN)₆]³⁻): t₂g⁵e_g⁰, n = 1, μ = √3 = 1.73 BM। उत्तर: 5.92 BM बनाम 1.73 BM।
आम गलतियाँ
- अष्टफलकीय क्षेत्र में e_g को t₂g के नीचे रखना। अष्टफलक में e_g लिगैंडों की ओर है, इसलिए ऊपर है। सिर्फ़ चतुष्फलक में क्रम उलटा है।
- μ = √(n(n+2)) में n = कुल d इलेक्ट्रॉन लेना। n सिर्फ़ अयुग्मित इलेक्ट्रॉन है।
- सोचना कि चतुष्फलकीय संकुल अक्सर निम्न चक्रण होते हैं। Δt छोटा (≈ 4/9 Δo) है, इसलिए लगभग हमेशा उच्च चक्रण।
- कहना कि संकुल वही रंग दिखाता है जो सोखता है। वह सोखे गए रंग का पूरक रंग दिखाता है।