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उपसहसंयोजन यौगिकों में आबंधन: VBT, क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धांत और धातु कार्बोनिल

संयोजकता आबंध सिद्धांत (VBT) कहता है कि धातु अपने खाली कक्षकों को मिलाकर संकर कक्षक (जैसे d²sp³ या sp³d²) बनाती है, जो लिगैंड के इलेक्ट्रॉन-युग्म लेते हैं; इससे आकार और चुंबकत्व पता चलता है। क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धांत (CFT) लिगैंड को ऋण आवेश मानता है जो कुछ d कक्षकों को ज़्यादा ऊपर धकेलते हैं: अष्टफलक में 5 d कक्षक t₂g (नीचे) और e_g (ऊपर) में Δo के अंतर से बँटते हैं। प्रबल लिगैंड Δo बड़ा करते हैं और इलेक्ट्रॉन जोड़े बनाते हैं (निम्न चक्रण)। प्रकाश सोखकर इलेक्ट्रॉन Δo पार करे तो रंग दिखता है। धातु कार्बोनिल में CO σ युग्म देता है और π इलेक्ट्रॉन वापस लेता है (सहक्रियाशील आबंधन)।

🎬 कदम-दर-कदम कहानी

  1. [Co(NH₃)₆]³⁺ को संयोजकता आबंध की नज़र से देखो। Co³⁺ के 6 d इलेक्ट्रॉन हैं। प्रबल NH₃ उन्हें जोड़े बनाकर 3 डिब्बों में सिकुड़ने पर मजबूर करता है। दो 3d डिब्बे खाली हो जाते हैं। 2 d + 1 s + 3 p = 6 संकर कक्षक (d²sp³), हर एक में एक नीला लिगैंड युग्म। कोई अयुग्मित इलेक्ट्रॉन नहीं: चुंबकीय नहीं।
  2. अब [CoF₆]³⁻। F⁻ दुर्बल है, इसलिए 3d इलेक्ट्रॉन फैले रहते हैं: 4 अयुग्मित। धातु को बाहर वाले 4d डिब्बे लेने पड़ते हैं: sp³d²। चार अयुग्मित इलेक्ट्रॉन इसे चुंबकीय बनाते हैं: आघूर्ण √(4×6) ≈ 4.9 BM।
  3. अब क्रिस्टल क्षेत्र की नज़र। पाँच d कक्षक पहले एक ही ऊँचाई (ऊर्जा) पर हैं। छह लिगैंड x, y, z अक्षों पर आते हैं। जो 2 कक्षक सीधे उनकी ओर हैं (e_g) ऊपर धकेले जाते हैं। जो 3 बीच में हैं (t₂g) नीचे आते हैं। बीच का अंतर Δo है।
  4. 4 इलेक्ट्रॉन भरो। दुर्बल लिगैंड में अंतर छोटा है, इसलिए 4था इलेक्ट्रॉन ऊपर e_g में कूद जाता है (उच्च चक्रण, 4 अयुग्मित)। लिगैंड प्रबल करो: अंतर बढ़ता है, और t₂g में जोड़ा बनाना सस्ता पड़ता है (निम्न चक्रण, 2 अयुग्मित)।
  5. रंग क्यों? [Ti(H₂O)₆]³⁺ में एक इलेक्ट्रॉन t₂g में है। हरा-पीला प्रकाश उसे ठीक Δo जितनी ऊर्जा देता है, और इलेक्ट्रॉन e_g में कूद जाता है। वह प्रकाश निकल जाता है, और बचा हुआ रंग दिखता है: बैंगनी।
  6. अब तुम्हारी बारी। d इलेक्ट्रॉनों की संख्या खिसकाओ, लिगैंड दुर्बल से प्रबल करो और आकार चतुष्फलकीय करो। नीचे अयुग्मित इलेक्ट्रॉन, चुंबकीय आघूर्ण और CFSE बदलते देखो।

टिप: 3D दृश्य को घुमाने के लिए खींचें। ज़ूम के लिए दो उंगलियाँ इस्तेमाल करें।

🤔 आम शंकाएँ और उनके जवाब

प्रबल लिगैंड इलेक्ट्रॉनों को जोड़ा बनाने पर क्यों मजबूर करता है?

जोड़ा बनाने की कीमत P है और ऊपर कूदने की कीमत Δo। इलेक्ट्रॉन सस्ता रास्ता चुनता है। Δo > P हो तो t₂g में जोड़ा सस्ता है। चरण 4 में यही बदलाव दिखता है।

e_g ऊपर क्यों जाते हैं, t₂g क्यों नहीं?

e_g कक्षक अक्षों पर सीधे लिगैंडों की ओर हैं, इसलिए उनके इलेक्ट्रॉन ऋण लिगैंडों से सबसे ज़्यादा प्रतिकर्षण महसूस करते हैं। t₂g अक्षों के बीच हैं। चरण 3 में लिगैंड आते देखो।

[CoF₆]³⁻ के लिए VBT को 4d क्यों चाहिए?

दुर्बल F⁻ के साथ 3d के छह इलेक्ट्रॉन जोड़े नहीं बनाते, तो पाँचों 3d डिब्बे भरे रहते हैं। खाली d डिब्बे सिर्फ़ 4d में हैं: sp³d²। चरण 2 देखो।

हरा-पीला सोखा गया तो बैंगनी क्यों दिखता है?

सफ़ेद प्रकाश में से हरा-पीला निकाल दो तो बचा मिश्रण हमारी आँख को बैंगनी दिखता है — पूरक रंग। चरण 5 में सोखा गया फ़ोटॉन और बैंगनी चमक है।

आंतरिक कक्षक संकुल का क्या मतलब है?

जो संकरण में अंदर वाले (n−1)d कक्षक (जैसे कोबाल्ट के 3d) इस्तेमाल करे (d²sp³)। ये अक्सर निम्न चक्रण होते हैं। चरण 1 में खाली हुए दो 3d डिब्बे देखो।

क्या चतुष्फलकीय संकुल कभी निम्न चक्रण होते हैं?

लगभग कभी नहीं। Δt, Δo का सिर्फ़ लगभग 4/9 है, युग्मन ऊर्जा से छोटा। मुक्त खेल में चतुष्फलकीय चुनो: लिगैंड बदलने का असर नहीं होता और संकुल उच्च चक्रण रहता है।

संयोजकता आबंध सिद्धांत (VBT)

VBT में धातु आयन कुछ खाली कक्षकों को मिलाकर बराबर संकर कक्षक बनाता है। हर संकर कक्षक लिगैंड से एक एकाकी युग्म लेता है।

संख्यासंकरणआकारउदाहरण
4sp³चतुष्फलकीय[NiCl₄]²⁻
4dsp²वर्ग समतली[Ni(CN)₄]²⁻
6d²sp³ (आंतरिक, 3d)अष्टफलकीय[Co(NH₃)₆]³⁺
6sp³d² (बाह्य, 4d)अष्टफलकीय[CoF₆]³⁻

आंतरिक कक्षक (निम्न चक्रण) संकुल (n−1)d कक्षक लेते हैं; इलेक्ट्रॉन पहले जोड़े बनाते हैं। बाह्य कक्षक (उच्च चक्रण) संकुल nd कक्षक लेते हैं; इलेक्ट्रॉन अयुग्मित रहते हैं।

चुंबकीय आघूर्ण

हर अयुग्मित इलेक्ट्रॉन एक छोटा चुंबक है। केवल-चक्रण आघूर्ण μ = √(n(n+2)) BM, n = अयुग्मित इलेक्ट्रॉन। मापे गए μ से n और फिर आबंधन पता चलता है।

VBT की कमियाँ

क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धांत (CFT)

CFT धातु-लिगैंड बंध को सिर्फ़ विद्युत आकर्षण मानता है: लिगैंड बिंदु ऋण आवेश (या द्विध्रुव) हैं। अकेले धातु आयन में पाँचों d कक्षकों की ऊर्जा बराबर (समभ्रंश) है। लिगैंड पास आएँ तो जो कक्षक उनकी ओर हैं, ज़्यादा ऊपर जाते हैं।

अष्टफलकीय क्षेत्र

dx²−y² और dz² सीधे लिगैंडों की ओर हैं → 0.6Δo ऊपर (e_g समूह)। dxy, dyz, dxz बीच में हैं → 0.4Δo नीचे (t₂g समूह)। Δo = क्रिस्टल क्षेत्र विपाटन ऊर्जा।

चतुष्फलकीय क्षेत्र

क्रम उलट जाता है: e नीचे, t₂ ऊपर, और अंतर छोटा: Δt ≈ (4/9)Δo। इसलिए चतुष्फलकीय संकुल लगभग हमेशा उच्च चक्रण होते हैं।

स्पेक्ट्रमरासायनिक श्रेणी

बढ़ती क्षेत्र-प्रबलता (बढ़ते Δ) के क्रम में लिगैंड: I⁻ < Br⁻ < SCN⁻ < Cl⁻ < S²⁻ < F⁻ < OH⁻ < C₂O₄²⁻ < H₂O < NCS⁻ < EDTA⁴⁻ < NH₃ < en < CN⁻ < CO।

उच्च चक्रण और निम्न चक्रण

d⁴ से d⁷ में विकल्प होता है। P = युग्मन ऊर्जा (एक कक्षक में दो इलेक्ट्रॉन रखने की कीमत)।

क्रिस्टल क्षेत्र स्थायीकरण ऊर्जा (CFSE)

CFSE (अष्टफलकीय) = (−0.4 × n(t₂g) + 0.6 × n(e_g)) Δo (+ अतिरिक्त जोड़ों की युग्मन ऊर्जा)।

CFT से रंग और चुंबकत्व

सफ़ेद प्रकाश पड़ने पर t₂g का इलेक्ट्रॉन ठीक Δo ऊर्जा वाला प्रकाश सोखकर e_g में कूद सकता है। इसे d-d संक्रमण कहते हैं। सोखा गया रंग हट जाता है; हमें उसका पूरक रंग दिखता है।

CFT की कमियाँ: लिगैंड को बिंदु आवेश मानता है, इसलिए नहीं समझा पाता कि उदासीन CO, ऋणात्मक F⁻ से ज़्यादा विपाटन क्यों करता है; बंध के सहसंयोजी भाग को अनदेखा करता है।

धातु कार्बोनिलों में आबंधन

धातु कार्बोनिल धातु (अक्सर 0 ऑक्सीकरण अवस्था) और CO के संकुल हैं: [Ni(CO)₄] (चतुष्फलकीय), [Fe(CO)₅] (त्रिकोणीय द्विपिरैमिडी), [Cr(CO)₆] (अष्टफलकीय), [Mn₂(CO)₁₀] और [Co₂(CO)₈] (धातु-धातु बंध के साथ)।

M–C बंध के दो भाग हैं:

  1. σ बंध: CO का कार्बन अपना एकाकी युग्म धातु के खाली कक्षक में देता है।
  2. π पश्च-बंध: धातु का भरा d कक्षक इलेक्ट्रॉन वापस CO के खाली प्रतिआबंधी π* कक्षक में देता है।

दोनों एक-दूसरे की मदद करते हैं (सहक्रियाशील आबंधन): σ दान से धातु पर इलेक्ट्रॉन बढ़ते हैं, तो वह ज़्यादा वापस दे पाती है; वापस देने से धातु पर आवेश घटता है, तो वह और ले पाती है। नतीजा: मज़बूत M–C बंध, और थोड़ा कमज़ोर, लंबा C≡O बंध।

उपसहसंयोजन यौगिकों का महत्व और उपयोग

करके देखो: पहले अंदाज़ा, फिर जाँच

3D छूने से पहले अंदाज़ा लगाओ: Fe³⁺ (d⁵) में F⁻ (दुर्बल) के साथ और CN⁻ (प्रबल) के साथ कितने अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होंगे? लिख लो। अब आखिरी चरण में dⁿ = 5 करो, पहले दुर्बल फिर प्रबल चुनो। तुम्हें 5 और 1 अयुग्मित, और μ = 5.92 BM और 1.73 BM दिखना चाहिए। घर पर (किसी बड़े के साथ): हल्के नीले कॉपर सल्फेट घोल में अमोनिया की कुछ बूँदें डालो। रंग गहरा नीला हो जाता है: Cu²⁺ के चारों ओर पानी की जगह NH₃ आया, Δo बदला, रंग बदला।

मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ

हल किए गए उदाहरण

1. [Fe(H₂O)₆]²⁺ (उच्च चक्रण) का केवल-चक्रण चुंबकीय आघूर्ण ज्ञात करो।

चरण 1: Fe²⁺ = 3d⁶। H₂O दुर्बल → उच्च चक्रण: t₂g⁴e_g²। चरण 2: अयुग्मित: t₂g में 1 जोड़ा + 2 अकेले, e_g में 2 अकेले → n = 4। चरण 3: μ = √(4 × 6) = √24 = 4.90 BM। उत्तर: 4.90 BM।

2. [Ni(CN)₄]²⁻ का संकरण और चुंबकीय प्रकृति बताओ।

चरण 1: Ni²⁺ = 3d⁸। चरण 2: CN⁻ प्रबल: 8 इलेक्ट्रॉन 4 3d कक्षकों में जोड़े बनाते हैं, एक 3d खाली। चरण 3: 1 d + 1 s + 2 p → dsp², वर्ग समतली। चरण 4: n = 0। उत्तर: dsp², वर्ग समतली, प्रतिचुंबकीय।

3. [NiCl₄]²⁻ अनुचुंबकीय है पर [Ni(CO)₄] प्रतिचुंबकीय, जबकि दोनों चतुष्फलकीय हैं। क्यों?

चरण 1: [NiCl₄]²⁻: Ni²⁺ = 3d⁸, Cl⁻ दुर्बल, जोड़े नहीं बनते → 2 अयुग्मित → sp³, अनुचुंबकीय। चरण 2: [Ni(CO)₄]: Ni(0) = 3d⁸4s²। CO प्रबल: 4s इलेक्ट्रॉन 3d में चले जाते हैं → 3d¹⁰, सब युग्मित → sp³। उत्तर: 2 अयुग्मित बनाम 0।

4. प्रबल क्षेत्र (निम्न चक्रण) अष्टफलकीय d⁶ आयन की CFSE निकालो।

चरण 1: निम्न चक्रण d⁶ = t₂g⁶e_g⁰। चरण 2: CFSE = 6 × (−0.4Δo) + 0 = −2.4Δo। चरण 3: अकेले आयन (1 जोड़ा) की तुलना में 2 अतिरिक्त जोड़े बने (कुल 3), तो +2P जोड़ो। उत्तर: −2.4Δo + 2P (अक्सर सिर्फ़ −2.4Δo लिखते हैं)।

5. किसी संकुल का μ = 3.87 BM है। कितने अयुग्मित इलेक्ट्रॉन हैं?

चरण 1: √(n(n+2)) = 3.87 → n(n+2) = 15। चरण 2: n = 3 रखो: 3 × 5 = 15 ✓ उत्तर: 3 अयुग्मित (जैसे Cr³⁺, d³)।

6. [Ti(H₂O)₆]³⁺ 498 nm तरंगदैर्घ्य का प्रकाश सोखता है। Δo kJ mol⁻¹ में निकालो। (h = 6.626 × 10⁻³⁴ J s, c = 3 × 10⁸ m s⁻¹, N_A = 6.022 × 10²³)

चरण 1: एक आयन के लिए E = hc/λ = (6.626 × 10⁻³⁴ × 3 × 10⁸) / (498 × 10⁻⁹) = 3.99 × 10⁻¹⁹ J। चरण 2: प्रति मोल: 3.99 × 10⁻¹⁹ × 6.022 × 10²³ = 2.40 × 10⁵ J mol⁻¹। उत्तर: Δo ≈ 240 kJ mol⁻¹।

7. d⁵ का (a) उच्च चक्रण और (b) निम्न चक्रण अष्टफलकीय विन्यास लिखो। दोनों के n और μ बताओ।

चरण 1: उच्च चक्रण (दुर्बल, जैसे [Fe(H₂O)₆]³⁺ या [MnCl₆]⁴⁻): t₂g³e_g², n = 5, μ = √35 = 5.92 BM। चरण 2: निम्न चक्रण (प्रबल, जैसे [Fe(CN)₆]³⁻): t₂g⁵e_g⁰, n = 1, μ = √3 = 1.73 BM। उत्तर: 5.92 BM बनाम 1.73 BM।

आम गलतियाँ

अभ्यास क्विज़

1. अष्टफलकीय क्षेत्र में e_g समूह में हैं:
2. सबसे ज़्यादा विपाटन कौन करता है?
3. [Co(NH₃)₆]³⁺ का संकरण:
4. 2 अयुग्मित इलेक्ट्रॉन वाले संकुल का केवल-चक्रण μ:
5. धातु कार्बोनिल में M–CO बंध में होता है:

अभ्यास: खुद जवाब दो

अपना जवाब लिखो या चुनो, फिर जाँचें दबाओ। अटको तो संकेत देखो; जवाब देने के बाद पूरा हल दिखेगा।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

VBT और CFT में क्या अंतर है?

VBT बंध को संकर कक्षकों वाला सहसंयोजी मानता है और आकार व चुंबकत्व बताता है। CFT बंध को विद्युत आकर्षण मानता है, d कक्षकों का विपाटन समझाता है, इसलिए रंग और लिगैंड की प्रबलता भी समझाता है।

[Fe(CN)₆]³⁻ निम्न चक्रण पर [FeF₆]³⁻ उच्च चक्रण क्यों?

CN⁻ प्रबल क्षेत्र लिगैंड है, Δo युग्मन ऊर्जा से बड़ा है, इसलिए इलेक्ट्रॉन t₂g में जोड़े बनाते हैं। F⁻ दुर्बल है, Δo छोटा, इलेक्ट्रॉन अयुग्मित रहते हैं।

Zn²⁺ के संकुल रंगहीन क्यों होते हैं?

Zn²⁺ d¹⁰ है: t₂g और e_g दोनों भरे हैं, कोई इलेक्ट्रॉन Δo पार नहीं कर सकता। d-d संक्रमण नहीं, रंग नहीं।

यह कहाँ पढ़ाया जाता है

सीबीएसई (भारत)कक्षा 12उपसहसंयोजन यौगिक

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