सक्रियण ऊर्जा: ऊर्जा की पहाड़ी
अभिकारक सीधे उत्पाद नहीं बनते। पहले वे थोड़ी देर के लिए ऊँची ऊर्जा वाली अवस्था बनाते हैं जिसे सक्रियित संकुल (संक्रमण अवस्था) कहते हैं। वहाँ पहुँचने के लिए लगने वाली अतिरिक्त ऊर्जा सक्रियण ऊर्जा, Ea है।
ऊर्जा आरेख में Ea अभिकारक से पहाड़ी की चोटी तक की ऊँचाई है। अभिकारक और उत्पाद का अंतर ΔH है। कम Ea → तेज़ अभिक्रिया; ज़्यादा Ea → धीमी।
ताप का प्रभाव: गर्मी से वेग क्यों बढ़ता है
किसी भी ताप पर अणुओं की ऊर्जा अलग-अलग होती है (मैक्सवेल–बोल्ट्ज़मान वितरण)। सिर्फ़ ऊँची ऊर्जा वाले थोड़े अणुओं में ऊर्जा ≥ Ea होती है। ताप बढ़ने पर पूरा वितरण ऊँची ऊर्जा की ओर खिसकता है और Ea से ऊपर वाला हिस्सा बहुत बड़ा हो जाता है।
बहुत-सी अभिक्रियाओं में 10 °C बढ़ाने पर वेग लगभग दोगुना होता है। अनुपात k(T+10)/k(T) को ताप गुणांक कहते हैं, जो आमतौर पर 2 से 3 होता है।
आरेनियस समीकरण
k = A e^(−Ea/RT)
- A = आवृत्ति गुणांक (पूर्व-घातांकी गुणांक): अणु कितनी बार टकराते हैं, उससे जुड़ा।
- e^(−Ea/RT) = ऊर्जा ≥ Ea वाले अणुओं का अंश।
- R = 8.314 J K⁻¹ mol⁻¹, T केल्विन में।
ln लेने पर: ln k = ln A − Ea/RT। ln k बनाम 1/T का ग्राफ़ सीधी रेखा है, ढलान −Ea/R।
दो तापों के लिए (दोनों ln समीकरण घटाकर, चरण-दर-चरण):
log(k₂/k₁) = (Ea/2.303R) × (T₂ − T₁)/(T₁T₂)
उत्प्रेरक
उत्प्रेरक अभिक्रिया तेज़ करता है और अंत में उसका द्रव्यमान और रासायनिक स्वभाव नहीं बदलता। यह कम Ea वाला दूसरा रास्ता देता है (अक्सर एक अल्पजीवी मध्यवर्ती बनाकर)।
- यह ΔH या ΔG नहीं बदलता।
- आगे और पीछे दोनों अभिक्रियाएँ बराबर तेज़ करता है, इसलिए साम्य स्थिरांक नहीं बदलता; साम्य बस जल्दी आता है।
- थोड़ी मात्रा काफ़ी है। जो अभिक्रिया संभव नहीं (ΔG धनात्मक), उसे यह शुरू नहीं कर सकता।
उदाहरण: अमोनिया बनाने में लोहा; लार में एमाइलेज़ जैसे एंज़ाइम।
संघट्ट सिद्धांत
अणुओं को कठोर गोले मानते हैं। अभिक्रिया सिर्फ़ प्रभावी संघट्ट से होती है, जिसके लिए दो बातें ज़रूरी हैं:
- पर्याप्त ऊर्जा: कम से कम देहली ऊर्जा (औसत से Ea ज़्यादा)।
- सही अभिविन्यास (दिशा): सही परमाणु आपस में मिलें। CH₃Br + OH⁻ में OH⁻ को कार्बन पर Br के उल्टी ओर से टकराना होगा।
वेग = P × Z_AB × e^(−Ea/RT), जहाँ Z_AB संघट्ट आवृत्ति है और P प्रायिकता (त्रिविम) गुणांक है।
सीमा: यह अणुओं को साधारण गोले मानता है और उनकी संरचना को नज़रअंदाज़ करता है, इसलिए सरल गैस अणुओं पर सबसे अच्छा लागू होता है।
करके देखो: पहले अनुमान, फिर जाँच
3D में T = 300 K और Ea = 60 kJ/mol रखो। अनुमान लगाओ कि 310 K पर k 2 गुना होगा या 10 गुना, फिर रीडआउट देखो। उत्प्रेरक चालू करो और गेंद को पार होते देखो। घर पर: एक कप गुनगुने दूध और एक कप ठंडे दूध में एक-एक चम्मच दही डालो। गुनगुने वाला जल्दी जमता है: गर्मी ज़्यादा अणुओं को पहाड़ी पार कराती है।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- k = A e^(−Ea/RT)
- ln k = ln A − Ea/RT (ln k बनाम 1/T का ढलान = −Ea/R)
- log k = log A − Ea/(2.303RT)
- log(k₂/k₁) = (Ea/2.303R) × (T₂ − T₁)/(T₁T₂)
- वेग (संघट्ट सिद्धांत) = P Z_AB e^(−Ea/RT)
- ताप गुणांक = k(T+10)/k(T) ≈ 2 से 3
हल किए गए उदाहरण
1. ताप 300 K से 310 K करने पर वेग 2 गुना होता है। Ea निकालो।
log 2 = (Ea/2.303 × 8.314) × 10/(300 × 310)। 0.301 = Ea × 10/(19.147 × 93000)। Ea = 0.301 × 19.147 × 9300 ≈ 53 600 J/mol ≈ 53.6 kJ/mol।
2. किसी अभिक्रिया में Ea = 0 है। k क्या होगा?
k = A e^0 = A। वेग स्थिरांक आवृत्ति गुणांक के बराबर है और ताप पर निर्भर नहीं।
3. Ea = 57.4 kJ/mol और T = 300 K पर ऊर्जा ≥ Ea वाले अणुओं का अंश निकालो।
अंश = e^(−Ea/RT)। Ea/RT = 57400/(8.314 × 300) = 23.0। log x = −23.0/2.303 = −10.0। x ≈ 1 × 10⁻¹⁰।
4. ln k बनाम 1/T का ढलान −6000 K है। Ea निकालो।
ढलान = −Ea/R। Ea = 6000 × 8.314 = 49 884 J/mol ≈ 49.9 kJ/mol।
5. 300 K पर उत्प्रेरक Ea को 100 से 80 kJ/mol कर देता है (A वही)। k कितने गुना बढ़ेगा?
k₂/k₁ = e^(20000/(8.314 × 300)) = e^8.02। log = 8.02/2.303 = 3.48। k₂/k₁ ≈ 3 × 10³, लगभग 3000 गुना।
6. 300 K पर k = 2 × 10⁻² s⁻¹ और Ea = 60 kJ/mol। 320 K पर k निकालो।
log(k₂/k₁) = 60000/(2.303 × 8.314) × 20/(300 × 320) = 3133.6 × 2.083×10⁻⁴ = 0.653। k₂/k₁ = 4.5। k₂ ≈ 9.0 × 10⁻² s⁻¹।
7. log k = 14.34 − 1.25 × 10⁴ K/T के लिए Ea निकालो।
log k = log A − Ea/(2.303RT) से तुलना: Ea/2.303R = 1.25 × 10⁴। Ea = 1.25 × 10⁴ × 2.303 × 8.314 ≈ 239 kJ/mol।
आम गलतियाँ
- आरेनियस समीकरण में °C लगाना। हमेशा केल्विन लो: T(K) = t(°C) + 273।
- kJ और J मिलाना: R = 8.314 J K⁻¹ mol⁻¹ है, इसलिए Ea जूल में लो।
- यह कहना कि उत्प्रेरक ΔH या साम्य स्थिरांक बदलता है। वह सिर्फ़ रास्ता और Ea बदलता है।
- यह मानना कि हर टक्कर से अभिक्रिया होती है। सिर्फ़ पर्याप्त ऊर्जा और सही दिशा वाली टक्करें काम करती हैं।