Netherlands VWO 5 Chemistry
अध्याय: 3
1. Chemical processes (part 2)
Conservation laws and cycles · Reaction kinetics · Chemical equilibrium · Energy calculations · Quality of energy · Activation energy in experiments
- द्रव्यमान संरक्षण का नियम – रासायनिक अभिक्रिया में द्रव्यमान न बनता है, न नष्ट होता है। अभिक्रिया से पहले पदार्थों का कुल द्रव्यमान, बाद के पदार्थों के कुल द्रव्यमान के बराबर होता है। कारण: परमाणु सिर्फ़ नए ढंग से जुड़ते हैं; वही परमाणु, उतनी ही संख्या में, पहले भी होते हैं और बाद में भी। अगर कोई गैस बाहर निकल जाए या हवा से आकर जुड़ जाए, तो तराज़ू का पाठ बदलता दिखता है, पर हर पदार्थ गिनें तो कुल द्रव्यमान वही रहता है। इससे जुड़ा नियम, स्थिर अनुपात का नियम, कहता है कि शुद्ध यौगिक में तत्व हमेशा एक ही द्रव्यमान अनुपात में होते हैं (पानी में हमेशा 1 g हाइड्रोजन : 8 g ऑक्सीजन)।
- रासायनिक अभिक्रिया का वेग – अभिक्रिया वेग बताता है कि प्रति इकाई समय में अभिकारक कितना ख़र्च होता है या उत्पाद कितना बनता है। वेग = −Δ[R]/Δt = +Δ[P]/Δt (इकाई mol L⁻¹ s⁻¹)। वेग नियम, वेग = k[A]^x[B]^y, प्रयोग से मिलता है; x + y कोटि है। आण्विकता = एक प्राथमिक चरण में टकराने वाले कणों की संख्या।
- रासायनिक साम्य: Kc, Kp, Q और गिब्स ऊर्जा – बंद बर्तन में उत्क्रमणीय अभिक्रिया दोनों ओर चलती है। कुछ देर बाद अग्र और पश्च अभिक्रिया का वेग बराबर हो जाता है। मात्राएँ बदलना बंद हो जाती हैं, पर अभिक्रिया रुकती नहीं। इसे गतिक साम्य कहते हैं। साम्य पर उत्पादों और अभिकारकों का अनुपात (हर एक अपने गुणांक की घात में) एक निश्चित संख्या होता है, जिसे साम्य स्थिरांक K कहते हैं। Kc सांद्रता से, Kp आंशिक दाब से, और Kp = Kc(RT)^Δn। शुद्ध ठोस और द्रव K में नहीं लिखे जाते। Q < K हो तो अभिक्रिया आगे, Q > K हो तो पीछे जाती है। ΔG° = −RT ln K।
- एन्थैल्पी, कैलोरीमिति और हेस का नियम – एन्थैल्पी H = U + pV। स्थिर दाब पर ली या दी गई ऊष्मा ΔH के बराबर होती है; स्थिर आयतन पर ΔU के बराबर। ΔU को बंद बम कैलोरीमीटर में और ΔH को खुले कप कैलोरीमीटर में मापते हैं: q = CΔT या q = mcΔT। गैसों के लिए ΔH = ΔU + Δn_g RT। ऊष्माक्षेपी अभिक्रिया में ΔrH ऋणात्मक, ऊष्माशोषी में धनात्मक; ΔrH° = ΣΔfH°(उत्पाद) − ΣΔfH°(अभिकारक)। हेस का नियम: अभिक्रिया एक चरण में हो या कई में, कुल एन्थैल्पी परिवर्तन एक ही रहता है, इसलिए ऊष्मारासायनिक समीकरणों को बीजगणित की तरह जोड़ सकते हैं।
- ताप, सक्रियण ऊर्जा, उत्प्रेरक और संघट्ट सिद्धांत – उत्पाद बनने के लिए अभिकारक अणुओं को एक ऊर्जा पहाड़ी चढ़नी होती है, जिसे सक्रियण ऊर्जा Ea कहते हैं। आरेनियस समीकरण k = A e^(−Ea/RT) बताता है कि ताप थोड़ा बढ़ने पर बहुत ज़्यादा अणु पहाड़ी पार करते हैं, इसलिए k तेज़ी से बढ़ता है। उत्प्रेरक नीची पहाड़ी देता है, ΔH नहीं बदलता। संघट्ट सिद्धांत: अणु तभी अभिक्रिया करते हैं जब पर्याप्त ऊर्जा और सही दिशा से टकराएँ।
2. Synthesis and modelling
Chemical synthesis · Molecular modelling
- कार्बनिक संश्लेषण – कार्बनिक संश्लेषण का मतलब है सरल प्रारंभिक पदार्थों से योजनाबद्ध अभिक्रियाओं की शृंखला द्वारा लक्ष्य अणु बनाना। हर चरण एक क्रियात्मक समूह बदलता है और उसके लिए सही अभिकर्मक और परिस्थितियाँ (ताप, उत्प्रेरक, विलायक, रिफ्लक्स या आसवन) चाहिए। यौगिकों के परिवार आपस में जुड़े हैं (ऐल्केन ↔ ऐल्कीन → हैलोऐल्केन → ऐल्कोहॉल → ऐल्डिहाइड/कीटोन → कार्बोक्सिलिक अम्ल → एस्टर; हैलोऐल्केन → ऐमीन या नाइट्राइल), इसलिए हम नक्शे के स्टेशनों की तरह इनके बीच चल सकते हैं। रसायनज्ञ लक्ष्य से उल्टा योजना बनाते हैं (रेट्रोसंश्लेषण), कम चरण, अधिक लब्धि और परमाणु दक्षता वाले मार्ग चुनते हैं, फिर अभिक्रिया करके उत्पाद को अलग, शुद्ध और जाँचते हैं।
- आणविक मॉडलिंग: अणुओं को 3D में देखना – आणविक मॉडल अणु की एक छोटी नकल है जिसे हम देख और घुमा सकते हैं। बॉल-स्टिक मॉडल आबंध और कोण दिखाता है, स्पेस-फ़िलिंग मॉडल आकार दिखाता है, और कंप्यूटर मॉडल यह भी दिखा सकते हैं कि अभिक्रिया कदम-दर-कदम कैसे होती है। मॉडल से हम अणु का आकार और अभिक्रिया की क्रियाविधि समझ सकते हैं।
3. Innovation and chemical research
Chemical research · Selectivity and specificity · Sustainability · New materials · Research and design task
- संरचना से पदार्थ के गुण कैसे तय होते हैं – कण आपस में कैसे जुड़े हैं, यही तय करता है कि पदार्थ कैसा व्यवहार करेगा। आयनिक और विशाल सहसंयोजी पदार्थों में पूरे ढाँचे में मज़बूत बंध होते हैं, इसलिए वे बहुत ऊँचे ताप पर पिघलते हैं। छोटे अणुओं के बीच बल कमज़ोर होता है, इसलिए वे जल्दी पिघलते और उबलते हैं। धातुओं में मुक्त इलेक्ट्रॉन होते हैं, इसलिए वे बिजली चलाती हैं।
- पदार्थ की संरचना और गुण – पदार्थ क्या करता है (उसका गुण), यह इस पर निर्भर है कि उसके अंदर क्या है (उसकी संरचना)। धातुओं में मुक्त इलेक्ट्रॉन होते हैं, इसलिए वे बिजली चलाती हैं। ठोस नमक के आयन जमे होते हैं, इसलिए वह नहीं चलाता, पर पिघला या घुला नमक चलाता है क्योंकि आयन चल सकते हैं। चीनी घुलती है पर उसके अणु उदासीन हैं, इसलिए वह नहीं चलाती। प्लास्टिक की लंबी लड़ियाँ मज़बूत होती हैं; कमज़ोर जोड़ वाली लड़ी को बैक्टीरिया काट देते हैं, यानी वह जैव-अपघटनीय है। OH समूह वाली लड़ियाँ पानी खींचती हैं और जेल की तरह फूलती हैं। गुण का अनुमान लगाने के लिए पूछो: कण कौन-से हैं, क्या उन पर आवेश है, क्या वे चल सकते हैं, और वे आपस में या पानी से कितना खिंचते हैं?
- एंजाइम (Enzymes) – एंजाइम प्रोटीन होते हैं जो जैव उत्प्रेरक (biological catalyst) का काम करते हैं: ये कोशिका की क्रियाओं को तेज़ करते हैं और ख़ुद ख़र्च नहीं होते। हर एंजाइम का एक सक्रिय स्थल (active site) होता है जिसमें सिर्फ़ एक तरह का सब्सट्रेट फिट होता है (विशिष्टता)। एंजाइम सक्रियण ऊर्जा घटाकर काम करते हैं। ये एक इष्टतम तापमान और pH पर सबसे अच्छा काम करते हैं; ज़्यादा गर्मी या ग़लत pH से इनका आकार बिगड़ जाता है (विकृतीकरण)।
- संधारणीयता (Sustainability) – संधारणीयता यानी आज अपनी ज़रूरतें ऐसे पूरी करना कि आने वाली पीढ़ियाँ भी अपनी ज़रूरतें पूरी कर सकें। यह तीन स्तंभों पर टिकी है — पर्यावरण, समाज और अर्थव्यवस्था। कोई संसाधन तभी टिकाऊ ढंग से इस्तेमाल होता है जब हम उसे उसके नवीकरण से तेज़ न लें। आज मानवता हर साल लगभग 1.7 पृथ्वी जितना इस्तेमाल करती है, और यह इस्तेमाल बहुत असमान है। देखभाल (stewardship), समझदार योजना और GIS जैसे औज़ार हमें संधारणीयता की ओर ले जाते हैं।
- पदार्थों का नवाचार: प्रयोगशाला के विचार से नए उत्पाद तक – रासायनिक नवाचार विचार को चरणों में उत्पाद बनाता है: विचार, प्रयोगशाला जाँच, पायलट, कारख़ाना, बाज़ार। नए पदार्थ (मिश्रधातु, जैव-प्लास्टिक, स्मार्ट पदार्थ) और भोजन की नई प्रक्रियाएँ संरचना से डिज़ाइन होती हैं और प्रदर्शन, लागत और सुरक्षा पर परखी जाती हैं। ग्राम से टन तक स्केल-अप और बाज़ार तय करते हैं कि कौन-सा विचार सफल होगा।
- वैज्ञानिक विधि – वैज्ञानिक विधि वह सावधान तरीका है जिससे वैज्ञानिक पता लगाते हैं कि दुनिया कैसे चलती है। कुछ देखो (प्रेक्षण), परखने लायक प्रश्न पूछो, परिकल्पना बनाओ (साफ़, परखने योग्य अनुमान), निष्पक्ष प्रयोग से परखो (एक चर बदलो, एक मापो, बाकी सब एक जैसा), दोहराओ और आँकड़े लिखो, विश्लेषण करो, निष्कर्ष निकालो और साझा करो ताकि दूसरे जाँच सकें। जो नतीजे परिकल्पना से मेल न खाएँ, वे भी काम के हैं: वे नई परिकल्पना की ओर ले जाते हैं।