United Grade 11 AP Chemistry
अध्याय: 9
1. Atomic Structure and Properties
Moles and Molar Mass · Mass Spectra of Elements · Elemental Composition of Pure Substances · Composition of Mixtures · Atomic Structure and Electron Configuration · Photoelectron Spectroscopy · Periodic Trends · Valence Electrons and Ionic Compounds
- मोल संकल्पना, मोलर द्रव्यमान और रासायनिक सूत्र – परमाणु इतने छोटे हैं कि एक-एक गिनना नामुमकिन है, इसलिए रसायनज्ञ उन्हें तौलकर गिनते हैं। परमाणु द्रव्यमान u में होता है; 1 u = कार्बन-12 परमाणु के द्रव्यमान का 1/12। एक मोल = 6.022 × 10²³ कण, और उसका ग्राम में द्रव्यमान u वाले सूत्र द्रव्यमान के बराबर। मोल से हम यौगिक में हर तत्व का प्रतिशत निकालते हैं, और प्रतिशत से उल्टा चलकर मूलानुपाती और आण्विक सूत्र।
- परमाणु और अणु – रासायनिक अभिक्रिया में द्रव्यमान न बनता है, न नष्ट होता है (द्रव्यमान संरक्षण), और यौगिक में तत्व हमेशा द्रव्यमान के एक ही अनुपात में होते हैं (स्थिर अनुपात)। डाल्टन ने दोनों को समझाया: पदार्थ छोटे-छोटे परमाणुओं से बना है जो पूरी संख्याओं में जुड़ते हैं। परमाणु जुड़कर अणु बनाते हैं; आवेश वाले परमाणु या समूह आयन हैं। सूत्र संयोजकता को क्रॉस करके लिखते हैं। आण्विक द्रव्यमान (आयनिक यौगिक के लिए सूत्र इकाई द्रव्यमान) सूत्र के सभी परमाणु द्रव्यमानों का योग है, u में।
- क्वांटम यांत्रिक मॉडल: क्वांटम संख्याएँ, कक्षक और इलेक्ट्रॉनिक विन्यास – चलते इलेक्ट्रॉन तरंग जैसे भी हैं: λ = h/mv (दे ब्रॉग्ली)। इसलिए स्थिति और संवेग एक साथ ठीक-ठीक नहीं जान सकते: Δx·Δp ≥ h/4π (हाइज़ेनबर्ग)। इसलिए पक्की कक्षाएँ छोड़कर कक्षक (orbital) लेते हैं: वह जगह जहाँ इलेक्ट्रॉन मिलने की संभावना ज़्यादा है (श्रोडिंगर समीकरण, ψ² = संभावना)। चार क्वांटम संख्याएँ हर इलेक्ट्रॉन बताती हैं: n (कोश, आकार, ऊर्जा), l (उपकोश, आकृति: 0 से n−1), mₗ (दिशा: −l से +l) और mₛ (चक्रण: +½ या −½)। s गोल, p डम्बल, d ज़्यादातर चार पत्ती जैसा। इलेक्ट्रॉन आउफबाऊ (n + l), पाउली (अधिकतम 2, उल्टे चक्रण) और हुंड (पहले अकेले) नियम से भरते हैं। आधे और पूरे भरे उपकोश ज़्यादा स्थायी, इसलिए Cr = 3d⁵4s¹ और Cu = 3d¹⁰4s¹।
- गुणधर्मों में आवर्ती प्रवृत्तियाँ – लगभग हर प्रवृत्ति दो बातों से तय होती है: नाभिक का खिंचाव (प्रभावी नाभिकीय आवेश) और बाहरी कोश की दूरी। आवर्त में बाएँ से दाएँ खिंचाव बढ़ता है पर कोश वही रहता है, इसलिए परमाणु छोटे होते हैं, आयनन एन्थैल्पी बढ़ती है, इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी अधिक ऋणात्मक होती है और विद्युतऋणात्मकता बढ़ती है। वर्ग में नीचे नया कोश जुड़ता है, इसलिए परमाणु बड़े और ये मान कम होते हैं। धनायन छोटा, ऋणायन बड़ा। संयोजकता बाहरी इलेक्ट्रॉनों से आती है; धातु-क्रियाशीलता नीचे-बाएँ और अधातु-क्रियाशीलता ऊपर-दाएँ सबसे ज़्यादा।
- कॉसेल-लुईस उपागम और आयनिक आबंध – परमाणु आपस में इसलिए जुड़ते हैं ताकि हर एक के बाहरी कोश में 8 इलेक्ट्रॉन (अष्टक) हो जाएँ, बिल्कुल उत्कृष्ट गैस जैसे। कॉसेल ने बताया कि परमाणु इलेक्ट्रॉन देकर या लेकर आयन बनाते हैं (आयनिक आबंध)। लुईस ने बताया कि परमाणु इलेक्ट्रॉन-युग्म बाँट भी सकते हैं (सहसंयोजी आबंध)। लुईस संरचना इन इलेक्ट्रॉनों को बिंदु और रेखा से दिखाती है। फ़ॉर्मल आवेश (V − L − B/2) सबसे अच्छी संरचना चुनने में मदद करता है। आयन जुड़कर क्रिस्टल बनाते हैं; इसमें निकली ऊर्जा का संबंध जालक एन्थैल्पी से है।
2. Compound Structure and Properties
Types of Chemical Bonds · Intramolecular Force and Potential Energy · Structure of Ionic Solids · Structure of Metals and Alloys · Lewis Diagrams · Resonance and Formal Charge · VSEPR and Hybridization
- कॉसेल-लुईस उपागम और आयनिक आबंध – परमाणु आपस में इसलिए जुड़ते हैं ताकि हर एक के बाहरी कोश में 8 इलेक्ट्रॉन (अष्टक) हो जाएँ, बिल्कुल उत्कृष्ट गैस जैसे। कॉसेल ने बताया कि परमाणु इलेक्ट्रॉन देकर या लेकर आयन बनाते हैं (आयनिक आबंध)। लुईस ने बताया कि परमाणु इलेक्ट्रॉन-युग्म बाँट भी सकते हैं (सहसंयोजी आबंध)। लुईस संरचना इन इलेक्ट्रॉनों को बिंदु और रेखा से दिखाती है। फ़ॉर्मल आवेश (V − L − B/2) सबसे अच्छी संरचना चुनने में मदद करता है। आयन जुड़कर क्रिस्टल बनाते हैं; इसमें निकली ऊर्जा का संबंध जालक एन्थैल्पी से है।
- परमाणु और अणु – रासायनिक अभिक्रिया में द्रव्यमान न बनता है, न नष्ट होता है (द्रव्यमान संरक्षण), और यौगिक में तत्व हमेशा द्रव्यमान के एक ही अनुपात में होते हैं (स्थिर अनुपात)। डाल्टन ने दोनों को समझाया: पदार्थ छोटे-छोटे परमाणुओं से बना है जो पूरी संख्याओं में जुड़ते हैं। परमाणु जुड़कर अणु बनाते हैं; आवेश वाले परमाणु या समूह आयन हैं। सूत्र संयोजकता को क्रॉस करके लिखते हैं। आण्विक द्रव्यमान (आयनिक यौगिक के लिए सूत्र इकाई द्रव्यमान) सूत्र के सभी परमाणु द्रव्यमानों का योग है, u में।
- मोल संकल्पना, मोलर द्रव्यमान और रासायनिक सूत्र – परमाणु इतने छोटे हैं कि एक-एक गिनना नामुमकिन है, इसलिए रसायनज्ञ उन्हें तौलकर गिनते हैं। परमाणु द्रव्यमान u में होता है; 1 u = कार्बन-12 परमाणु के द्रव्यमान का 1/12। एक मोल = 6.022 × 10²³ कण, और उसका ग्राम में द्रव्यमान u वाले सूत्र द्रव्यमान के बराबर। मोल से हम यौगिक में हर तत्व का प्रतिशत निकालते हैं, और प्रतिशत से उल्टा चलकर मूलानुपाती और आण्विक सूत्र।
- रासायनिक आबंधन: आयनिक, सहसंयोजक और धात्विक बंध – परमाणु आपस में जुड़कर (बंध बनाकर) ज़्यादा स्थिर होते हैं। इसमें सिर्फ़ बाहरी इलेक्ट्रॉन काम आते हैं। ज़्यादातर परमाणु बाहरी कोश में 8 इलेक्ट्रॉन होने पर सबसे स्थिर होते हैं: यही अष्टक नियम है। इसके तीन मुख्य रास्ते हैं। आयनिक बंध में धातु अधातु को इलेक्ट्रॉन दे देती है; विपरीत आवेश वाले आयन बनते हैं और एक-दूसरे को खींचते हैं। सहसंयोजक बंध में दो अधातुएँ इलेक्ट्रॉन जोड़े बाँटती हैं और अणु बनते हैं। धात्विक बंध में धातु परमाणु अपने बाहरी इलेक्ट्रॉन एक साझा 'सागर' में छोड़ देते हैं जो धनायनों को जोड़े रखता है। विद्युत-ऋणात्मकता का अंतर बताता है कि कौन-सा बंध बनेगा। बंध का प्रकार ही गलनांक, बिजली चलाने और पानी में घुलने जैसे गुण तय करता है।
- आबंध प्राचल, अनुनाद और ध्रुवता – सहसंयोजी आबंध को चार संख्याएँ बताती हैं: आबंध लंबाई (नाभिकों के बीच दूरी), आबंध कोण (किसी परमाणु पर दो आबंधों के बीच कोण), आबंध एन्थैल्पी (1 मोल आबंध तोड़ने की ऊर्जा) और आबंध कोटि (साझा युग्मों की संख्या)। ज़्यादा आबंध कोटि = छोटा और मज़बूत आबंध। जब एक लुईस संरचना काफ़ी न हो, तो असली अणु कई संरचनाओं का अनुनाद संकर होता है। असमान बँटवारा आबंध को ध्रुवीय बनाता है; द्विध्रुव आघूर्ण μ = q × d इसे मापता है, और अणु की आकृति तय करती है कि द्विध्रुव कटेंगे या जुड़ेंगे।
- वीएसईपीआर सिद्धांत: अणुओं की आकृतियाँ – VSEPR का अर्थ है संयोजकता कोश इलेक्ट्रॉन युग्म प्रतिकर्षण। केंद्रीय परमाणु के चारों ओर के इलेक्ट्रॉन युग्म एक-दूसरे को धकेलते हैं और जितना हो सके दूर चले जाते हैं। युग्मों की संख्या मूल व्यवस्था तय करती है: 2 रैखिक, 3 त्रिकोणीय समतलीय, 4 चतुष्फलकीय, 5 त्रिकोणीय द्विपिरामिडी, 6 अष्टफलकीय। एकाकी युग्म आबंध युग्म से ज़्यादा जगह घेरते हैं (lp–lp > lp–bp > bp–bp), इसलिए आबंध कोण घटाते और दिखने वाली आकृति बदलते हैं, जैसे NH₃ (पिरामिडी, 107°) और H₂O (बंकित, 104.5°)।
3. Properties of Substances and Mixtures
Intermolecular and Interparticle Forces · Properties of Solids · Solids, Liquids, and Gases · Ideal Gas Law · Kinetic Molecular Theory · Deviation from Ideal Gas Law · Solutions and Mixtures · Representations of Solutions · Separation of Solutions and Mixtures · Solubility · Spectroscopy and the Electromagnetic Spectrum · Properties of Photons · Beer-Lambert Law
- हाइड्रोजन आबंधन – हाइड्रोजन आबंध एक कमज़ोर आकर्षण है, जो किसी छोटे और बहुत विद्युतऋणी परमाणु (F, O या N) से जुड़े H और दूसरे ऐसे परमाणु के एकाकी युग्म के बीच होता है। इसे बिंदुदार रेखा से दिखाते हैं: X–H···Y। यह सहसंयोजी आबंध से बहुत कमज़ोर (लगभग 10–40 kJ mol⁻¹) है, पर इतना मज़बूत कि क्वथनांक बढ़ा दे, बर्फ़ को तैरा दे और DNA को जोड़े रखे। अंतरअणुक H-आबंध अलग अणुओं को जोड़ता है; अंतराअणुक एक ही अणु के अंदर बनता है।
- अंतराअणुक बल – अंतराअणुक बल अणुओं के बीच के कमज़ोर आकर्षण हैं। समान आकार के अणुओं में कमज़ोर से मज़बूत: लंदन परिक्षेपण < द्विध्रुव–द्विध्रुव < हाइड्रोजन आबंध। बल जितना मज़बूत, गलनांक और क्वथनांक, श्यानता और पृष्ठ तनाव उतने ज़्यादा; यही तय करते हैं कि क्या किसमें घुलेगा।
- आदर्श गैस समीकरण PV = nRT और गैस को दबाने में कार्य – गैस अनगिनत छोटे-छोटे अणुओं से बनी है जो हर तरफ़ भागते रहते हैं। दीवारों पर उनकी टक्कर से दाब बनता है। कम घनत्व वाली गैस के लिए तीन आसान नियम हैं: ताप स्थिर हो तो P × V स्थिर (बॉयल); दाब स्थिर हो तो V केल्विन ताप के साथ बढ़ता है (चार्ल्स); एक जैसे P और T पर बराबर आयतन में बराबर अणु (आवोगाद्रो)। तीनों मिलकर बनते हैं PV = nRT = N k T। एक मोल में 6.022 × 10²³ कण होते हैं, यही आवोगाद्रो संख्या है। पिस्टन को अंदर धकेलने में गैस पर कार्य होता है; यह कार्य P–V ग्राफ़ के नीचे के क्षेत्रफल के बराबर है, और स्थिर ताप पर W = nRT ln(V₁/V₂)।
- गैसों का अणुगति सिद्धांत: दाब, ताप और वर्ग-माध्य-मूल चाल – अणुगति सिद्धांत गैस को बहुत छोटे, तेज़, बेतरतीब चलते अणुओं का समूह मानता है, जो प्रत्यास्थ रूप से टकराते हैं और एक-दूसरे को खींचते नहीं। दीवार से टकराने पर अणु का वेग उलटता है और दीवार को 2mvₓ संवेग मिलता है। सब अणुओं की टक्करें जोड़ने पर दाब P = ⅓ n m v̄² = ⅓ ρ v̄² आता है। इसे PV = N k T से मिलाने पर एक अणु की औसत गतिज ऊर्जा (3/2) k T मिलती है: ताप अणुओं की औसत गतिज ऊर्जा का माप है। वर्ग-माध्य-मूल चाल v_rms = √(3RT/M) है, इसलिए समान ताप पर हल्की गैस तेज़ चलती है।
- गैस के नियम: दाब, आयतन और ताप का आपसी रिश्ता – गैस का दाब कणों के दीवार से टकराने से बनता है। गैस की तय मात्रा के लिए: बॉयल का नियम P₁V₁ = P₂V₂ (ताप स्थिर); चार्ल्स का नियम V₁/T₁ = V₂/T₂ (दाब स्थिर); दाब (गे-लुसाक) नियम P₁/T₁ = P₂/T₂ (आयतन स्थिर)। ताप हमेशा केल्विन में। संयुक्त नियम: P₁V₁/T₁ = P₂V₂/T₂। डाल्टन: मिश्रण का कुल दाब = आंशिक दाबों का योग; आंशिक दाब = मोल अंश × कुल दाब।
- विलयन: प्रकार, सांद्रता और हेनरी का नियम – विलयन दो या ज़्यादा पदार्थों का एकसमान मिश्रण है। जो ज़्यादा मात्रा में हो वह विलायक, जो कम हो वह विलेय। विलयन कितना 'गाढ़ा' है, यह सांद्रता के पदों से बताते हैं: द्रव्यमान %, आयतन %, ppm, मोल अंश, मोलरता (1 लीटर विलयन में) और मोललता (1 kg विलायक में)। ठोस अक्सर गर्म करने पर ज़्यादा घुलते हैं। गैस दाब बढ़ाने पर ज़्यादा घुलती है (हेनरी का नियम, p = KH·x) और गर्म करने पर कम।
- विलयन: चीज़ें कैसे घुलती हैं और कितनी घुल सकती हैं – विलयन विलायक में घुले विलेय का समांगी मिश्रण है। पानी में (जलीय विलयन) विलेय इतने छोटे कणों में टूटता है कि दिखता नहीं, नीचे नहीं बैठता और फ़िल्टर पेपर से निकल जाता है। सांद्रता बताती है कितना विलेय है (द्रव्यमान % = विलेय ÷ विलयन × 100)। विलेयता किसी ताप पर 100 g विलायक में घुल सकने वाली अधिकतम मात्रा है; उसके बाद विलयन संतृप्त है। वाष्पीकरण, क्रिस्टलीकरण और आसवन से विलयन अलग होता है।
- विद्युत चुंबकीय तरंगें – बदलता हुआ विद्युत क्षेत्र धारा जैसा काम करता है। इसे विस्थापन धारा कहते हैं और यह चुंबकीय क्षेत्र बनाती है। बदलता चुंबकीय क्षेत्र विद्युत क्षेत्र बनाता है। दोनों मिलकर विद्युत चुंबकीय तरंग बनकर c = 3 × 10⁸ m/s से चलते हैं, खाली जगह में भी। E और B एक-दूसरे से और चलने की दिशा से 90° पर होते हैं, इसलिए ये तरंगें अनुप्रस्थ हैं। तरंगदैर्घ्य के क्रम में: रेडियो, सूक्ष्म तरंग, अवरक्त, दृश्य, पराबैंगनी, एक्स-किरणें, गामा किरणें।
- स्पेक्ट्रोस्कोपी और बियर-लैम्बर्ट नियम – स्पेक्ट्रोस्कोपी यह अध्ययन है कि पदार्थ प्रकाश को कैसे सोखता या छोड़ता है। प्रकाश फ़ोटॉनों से बना है, जिनकी ऊर्जा E = hf = hc/λ है। परमाणु रेखा स्पेक्ट्रम देते हैं क्योंकि इलेक्ट्रॉन तय ऊर्जा स्तरों के बीच कूदते हैं। रंगीन घोल अपना पूरक रंग सोखता है। स्पेक्ट्रोफ़ोटोमीटर पारगम्यता T = I/I₀ और अवशोषकता A = log₁₀(I₀/I) मापता है। बियर-लैम्बर्ट नियम A = εlc है, इसलिए A बनाम c की अंशांकन रेखा से अज्ञात सांद्रता मिलती है।
4. Chemical Reactions
Introduction for Reactions · Net Ionic Equations · Representations of Reactions · Physical and Chemical Changes · Stoichiometry · Introduction to Titration · Types of Chemical Reactions · Introduction to Acid-Base Reactions · Oxidation-Reduction (Redox) Reactions
- रासायनिक अभिक्रियाएँ: समीकरण, प्रकार, अनुमान और युग्मित अभिक्रियाएँ – रासायनिक अभिक्रिया में परमाणु नए ढंग से जुड़कर नए पदार्थ बनाते हैं; परमाणु और द्रव्यमान संरक्षित रहते हैं, इसलिए समीकरण संतुलित होना चाहिए। एक ही अभिक्रिया को शब्द समीकरण, अवस्था-चिह्नों वाले संतुलित सूत्र समीकरण, पूर्ण आयनिक समीकरण और नेट आयनिक समीकरण (दर्शक आयनों के बिना) में लिख सकते हैं। प्रकार: संयोजन, वियोजन, एकल विस्थापन, द्विविस्थापन (अवक्षेपण, उदासीनीकरण, गैस बनना), दहन; और क्या स्थानांतरित होता है: इलेक्ट्रॉन (रेडॉक्स) या प्रोटॉन (अम्ल–क्षार)। बाहरी (संयोजकता) इलेक्ट्रॉन से उत्पाद का अनुमान लगता है: धातु इलेक्ट्रॉन खोती है, अधातु लेती है, और दोनों संख्याएँ बराबर होनी चाहिए। जो अभिक्रिया अकेले नहीं चलती (ΔG > 0), उसे किसी बहुत अनुकूल अभिक्रिया से जोड़कर चलाया जा सकता है, बशर्ते कुल ΔG ऋणात्मक हो।
- रासायनिक आबंधन: आयनिक, सहसंयोजक और धात्विक बंध – परमाणु आपस में जुड़कर (बंध बनाकर) ज़्यादा स्थिर होते हैं। इसमें सिर्फ़ बाहरी इलेक्ट्रॉन काम आते हैं। ज़्यादातर परमाणु बाहरी कोश में 8 इलेक्ट्रॉन होने पर सबसे स्थिर होते हैं: यही अष्टक नियम है। इसके तीन मुख्य रास्ते हैं। आयनिक बंध में धातु अधातु को इलेक्ट्रॉन दे देती है; विपरीत आवेश वाले आयन बनते हैं और एक-दूसरे को खींचते हैं। सहसंयोजक बंध में दो अधातुएँ इलेक्ट्रॉन जोड़े बाँटती हैं और अणु बनते हैं। धात्विक बंध में धातु परमाणु अपने बाहरी इलेक्ट्रॉन एक साझा 'सागर' में छोड़ देते हैं जो धनायनों को जोड़े रखता है। विद्युत-ऋणात्मकता का अंतर बताता है कि कौन-सा बंध बनेगा। बंध का प्रकार ही गलनांक, बिजली चलाने और पानी में घुलने जैसे गुण तय करता है।
- कॉसेल-लुईस उपागम और आयनिक आबंध – परमाणु आपस में इसलिए जुड़ते हैं ताकि हर एक के बाहरी कोश में 8 इलेक्ट्रॉन (अष्टक) हो जाएँ, बिल्कुल उत्कृष्ट गैस जैसे। कॉसेल ने बताया कि परमाणु इलेक्ट्रॉन देकर या लेकर आयन बनाते हैं (आयनिक आबंध)। लुईस ने बताया कि परमाणु इलेक्ट्रॉन-युग्म बाँट भी सकते हैं (सहसंयोजी आबंध)। लुईस संरचना इन इलेक्ट्रॉनों को बिंदु और रेखा से दिखाती है। फ़ॉर्मल आवेश (V − L − B/2) सबसे अच्छी संरचना चुनने में मदद करता है। आयन जुड़कर क्रिस्टल बनाते हैं; इसमें निकली ऊर्जा का संबंध जालक एन्थैल्पी से है।
- अम्ल, क्षारक, लवण और अनुमापन – ज़्यादातर अकार्बनिक यौगिक चार वर्गों में आते हैं: ऑक्साइड, अम्ल, क्षारक और लवण। ये आपस में जुड़े हैं: धातु से क्षारीय ऑक्साइड, ऑक्साइड से क्षारक, और क्षारक + अम्ल से लवण और पानी। अनुमापन (titration) इसी उदासीनीकरण से अज्ञात सांद्रता नापता है: ब्यूरेट से ज्ञात सांद्रता का क्षारक तब तक डालते हैं जब तक सारा अम्ल खत्म न हो जाए (तुल्यता बिंदु)। 1 : 1 अभिक्रिया के लिए C₁V₁ = C₂V₂।
- रससमीकरणमिति, सीमांत अभिकर्मक और सांद्रता के पद – रससमीकरणमिति का मतलब है अभिक्रिया में पदार्थों की मात्रा मापना। संतुलित समीकरण एक नुस्खे जैसा है: उसकी संख्याएँ अभिकारकों और उत्पादों का मोल अनुपात बताती हैं। इससे किसी भी द्रव्यमान को मोल में बदलकर, अनुपात लगाकर, किसी दूसरे पदार्थ का द्रव्यमान निकाल सकते हैं। जो अभिकारक पहले खत्म हो वह सीमांत अभिकर्मक है; वही तय करता है कितना उत्पाद बनेगा। विलयन की सांद्रता द्रव्यमान %, मोल अंश, मोलरता या मोललता से बताते हैं।
- अम्ल और क्षारक: गुण, सूचक और अभिक्रियाएँ – अम्ल पानी में H⁺ आयन देता है और क्षारक OH⁻ आयन। सूचक रंग या गंध बदलकर बताता है कि कौन मौजूद है। H⁺ और OH⁻ मिलकर पानी बनाते हैं और पीछे लवण बच जाता है।
- अपचयोपचय अभिक्रियाएँ: ऑक्सीजन से इलेक्ट्रॉन तक – पहले ऑक्सीकरण का मतलब था ऑक्सीजन जुड़ना या हाइड्रोजन हटना। अपचयन इसका उल्टा था। आज हम बड़ा विचार लेते हैं: इलेक्ट्रॉन खोना ऑक्सीकरण है और इलेक्ट्रॉन पाना अपचयन। दोनों हमेशा साथ होते हैं, इसलिए इन्हें अपचयोपचय (रेडॉक्स) अभिक्रिया कहते हैं। ज़्यादा सक्रिय धातु कम सक्रिय धातु के आयन को इलेक्ट्रॉन देती है।
5. Kinetics
Reaction Rates · Introduction to Rate Law · Concentration Changes Over Time · Elementary Reactions · Collision Model · Reaction Energy Profile · Introduction to Reaction Mechanisms · Reaction Mechanism and Rate Law · Pre-Equilibrium Approximation · Multistep Reaction Energy Profile · Catalysis
- रासायनिक अभिक्रिया का वेग – अभिक्रिया वेग बताता है कि प्रति इकाई समय में अभिकारक कितना ख़र्च होता है या उत्पाद कितना बनता है। वेग = −Δ[R]/Δt = +Δ[P]/Δt (इकाई mol L⁻¹ s⁻¹)। वेग नियम, वेग = k[A]^x[B]^y, प्रयोग से मिलता है; x + y कोटि है। आण्विकता = एक प्राथमिक चरण में टकराने वाले कणों की संख्या।
- समाकलित वेग समीकरण: शून्य और प्रथम कोटि – समाकलित वेग समीकरण सांद्रता को समय से जोड़ते हैं। शून्य कोटि: [R] = [R]₀ − kt (सीधी रेखा), t½ = [R]₀/2k। प्रथम कोटि: k = (2.303/t) log([R]₀/[R]); ln[R] बनाम t सीधी रेखा, ढलान −k; t½ = 0.693/k, जो शुरुआती मात्रा पर निर्भर नहीं।
- ताप, सक्रियण ऊर्जा, उत्प्रेरक और संघट्ट सिद्धांत – उत्पाद बनने के लिए अभिकारक अणुओं को एक ऊर्जा पहाड़ी चढ़नी होती है, जिसे सक्रियण ऊर्जा Ea कहते हैं। आरेनियस समीकरण k = A e^(−Ea/RT) बताता है कि ताप थोड़ा बढ़ने पर बहुत ज़्यादा अणु पहाड़ी पार करते हैं, इसलिए k तेज़ी से बढ़ता है। उत्प्रेरक नीची पहाड़ी देता है, ΔH नहीं बदलता। संघट्ट सिद्धांत: अणु तभी अभिक्रिया करते हैं जब पर्याप्त ऊर्जा और सही दिशा से टकराएँ।
6. Thermochemistry
Endothermic and Exothermic Processes · Energy Diagrams · Heat Transfer and Thermal Equilibrium · Heat Capacity and Calorimetry · Energy of Phase Changes · Introduction to Enthalpy of Reaction · Bond Enthalpies · Enthalpy of Formation · Hess's Law
- ऊष्मागतिकी का प्रथम नियम: निकाय, ऊष्मा, कार्य और ΔU – ऊष्मागतिकी ऊर्जा का हिसाब रखती है। जिस भाग को हम पढ़ते हैं वह निकाय है, बाकी सब परिवेश, और दोनों के बीच की दीवार परिसीमा। निकाय खुला, बंद या विलगित हो सकता है। आंतरिक ऊर्जा U निकाय में भरी कुल ऊर्जा है। यह केवल दो तरह से बदलती है: ऊष्मा q से या कार्य w से। प्रथम नियम: ΔU = q + w (IUPAC नियम: निकाय में आने वाली ऊर्जा धनात्मक)। U अवस्था फलन है; q और w पथ फलन हैं। स्थिर बाहरी दाब पर प्रसार में w = −p_ext ΔV; आदर्श गैस के उत्क्रमणीय समतापी प्रसार में w = −2.303 nRT log(V₂/V₁)।
- एन्थैल्पी, कैलोरीमिति और हेस का नियम – एन्थैल्पी H = U + pV। स्थिर दाब पर ली या दी गई ऊष्मा ΔH के बराबर होती है; स्थिर आयतन पर ΔU के बराबर। ΔU को बंद बम कैलोरीमीटर में और ΔH को खुले कप कैलोरीमीटर में मापते हैं: q = CΔT या q = mcΔT। गैसों के लिए ΔH = ΔU + Δn_g RT। ऊष्माक्षेपी अभिक्रिया में ΔrH ऋणात्मक, ऊष्माशोषी में धनात्मक; ΔrH° = ΣΔfH°(उत्पाद) − ΣΔfH°(अभिकारक)। हेस का नियम: अभिक्रिया एक चरण में हो या कई में, कुल एन्थैल्पी परिवर्तन एक ही रहता है, इसलिए ऊष्मारासायनिक समीकरणों को बीजगणित की तरह जोड़ सकते हैं।
- रासायनिक साम्य: Kc, Kp, Q और गिब्स ऊर्जा – बंद बर्तन में उत्क्रमणीय अभिक्रिया दोनों ओर चलती है। कुछ देर बाद अग्र और पश्च अभिक्रिया का वेग बराबर हो जाता है। मात्राएँ बदलना बंद हो जाती हैं, पर अभिक्रिया रुकती नहीं। इसे गतिक साम्य कहते हैं। साम्य पर उत्पादों और अभिकारकों का अनुपात (हर एक अपने गुणांक की घात में) एक निश्चित संख्या होता है, जिसे साम्य स्थिरांक K कहते हैं। Kc सांद्रता से, Kp आंशिक दाब से, और Kp = Kc(RT)^Δn। शुद्ध ठोस और द्रव K में नहीं लिखे जाते। Q < K हो तो अभिक्रिया आगे, Q > K हो तो पीछे जाती है। ΔG° = −RT ln K।
- अम्ल, क्षारक, लवण और अनुमापन – ज़्यादातर अकार्बनिक यौगिक चार वर्गों में आते हैं: ऑक्साइड, अम्ल, क्षारक और लवण। ये आपस में जुड़े हैं: धातु से क्षारीय ऑक्साइड, ऑक्साइड से क्षारक, और क्षारक + अम्ल से लवण और पानी। अनुमापन (titration) इसी उदासीनीकरण से अज्ञात सांद्रता नापता है: ब्यूरेट से ज्ञात सांद्रता का क्षारक तब तक डालते हैं जब तक सारा अम्ल खत्म न हो जाए (तुल्यता बिंदु)। 1 : 1 अभिक्रिया के लिए C₁V₁ = C₂V₂।
- विभिन्न प्रकार की अभिक्रियाओं की एन्थैल्पी – हर तरह के बदलाव की अपनी नाम वाली एन्थैल्पी है, हमेशा 1 mol के लिए। अवस्था परिवर्तन: संगलन (पिघलना), वाष्पन (उबलना), ऊर्ध्वपातन (ΔsubH = ΔfusH + ΔvapH); तीनों ऊष्माशोषी। दहन: 1 mol पदार्थ का ऑक्सीजन में पूरा जलना; हमेशा ऊष्माक्षेपी। परमाणुकरण: 1 mol पदार्थ का पूरी तरह गैसीय परमाणुओं में टूटना। बंध वियोजन एन्थैल्पी: गैस अवस्था में किसी बंध के 1 mol तोड़ना; बहुपरमाणुक अणुओं में औसत बंध एन्थैल्पी। ΔrH ≈ Σ(तोड़े गए बंध) − Σ(बने बंध)। जालक एन्थैल्पी: 1 mol आयनिक ठोस का गैसीय आयनों में टूटना (बॉर्न–हेबर चक्र से)। विलयन एन्थैल्पी = जालक एन्थैल्पी + जलयोजन एन्थैल्पी।
7. Equilibrium
Introduction to Equilibrium · Direction of Reversible Reactions · Reaction Quotient and Equilibrium Constant · Calculating the Equilibrium Constant · Magnitude of the Equilibrium Constant · Properties of the Equilibrium Constant · Calculating Equilibrium Concentrations · Representations of Equilibrium · Introduction to Le Châtelier's Principle · Reaction Quotient and Le Châtelier's Principle · Introduction to Solubility Equilibria · Common-Ion Effect
- रासायनिक साम्य: Kc, Kp, Q और गिब्स ऊर्जा – बंद बर्तन में उत्क्रमणीय अभिक्रिया दोनों ओर चलती है। कुछ देर बाद अग्र और पश्च अभिक्रिया का वेग बराबर हो जाता है। मात्राएँ बदलना बंद हो जाती हैं, पर अभिक्रिया रुकती नहीं। इसे गतिक साम्य कहते हैं। साम्य पर उत्पादों और अभिकारकों का अनुपात (हर एक अपने गुणांक की घात में) एक निश्चित संख्या होता है, जिसे साम्य स्थिरांक K कहते हैं। Kc सांद्रता से, Kp आंशिक दाब से, और Kp = Kc(RT)^Δn। शुद्ध ठोस और द्रव K में नहीं लिखे जाते। Q < K हो तो अभिक्रिया आगे, Q > K हो तो पीछे जाती है। ΔG° = −RT ln K।
- ला-शातेलिए सिद्धांत: साम्य को प्रभावित करने वाले कारक – ला-शातेलिए सिद्धांत कहता है: साम्य पर किसी निकाय को छेड़ो, तो वह उस दिशा में खिसकता है जिससे वह छेड़छाड़ कम हो। अभिकारक डालो या उत्पाद निकालो → आगे। दाब बढ़ाओ (आयतन घटाओ) → कम गैस मोल वाली ओर। ताप बढ़ाओ → ऊष्माशोषी दिशा में, और K बदलता है। उत्प्रेरक सिर्फ़ जल्दी साम्य लाता है, उसे खिसकाता नहीं। स्थिर आयतन पर अक्रिय गैस से कुछ नहीं बदलता; स्थिर दाब पर यह दाब घटाने जैसा है। K सिर्फ़ ताप से बदलता है।
- बफ़र विलयन और विलेयता गुणनफल – बफ़र वह विलयन है जिसमें थोड़ा अम्ल या क्षारक डालने पर भी pH लगभग वही रहता है। अम्लीय बफ़र = दुर्बल अम्ल + उसका लवण (CH₃COOH + CH₃COONa); क्षारीय बफ़र = दुर्बल क्षारक + उसका लवण (NH₄OH + NH₄Cl)। pH हेंडरसन समीकरण से: pH = pKa + log([लवण]/[अम्ल])। अल्प-विलेय लवण अपने संतृप्त घोल में आयनों से साम्य बनाता है; आयन सांद्रताओं का गुणनफल (गुणांक की घात में) विलेयता गुणनफल Ksp है। AB के लिए Ksp = s², AB₂ या A₂B के लिए Ksp = 4s³। आयनिक गुणनफल Q > Ksp हो तो अवक्षेप बनता है। सम-आयन विलेयता घटाता है।
8. Acids and Bases
Introduction to Acids and Bases · pH and pOH of Strong Acids and Bases · Weak Acid and Base Equilibria · Acid-Base Reactions and Buffers · Acid-Base Titrations · Molecular Structure of Acids and Bases · pH and pKa · Properties of Buffers · Henderson-Hasselbalch Equation · Buffer Capacity · pH and Solubility
- आयनिक साम्य: अम्ल, क्षारक, आयनन और pH – अम्ल और क्षारक की तीन परिभाषाएँ हैं: आरेनियस (पानी में H⁺ या OH⁻ देना), ब्रॉन्स्टेड–लोरी (प्रोटॉन दाता या ग्राही) और लुइस (इलेक्ट्रॉन-युग्म ग्राही या दाता)। प्रबल अम्ल-क्षारक पूरे आयनित होते हैं; दुर्बल थोड़े, और उनका साम्य Ka या Kb से लिखा जाता है। पानी भी थोड़ा आयनित होता है: 25 °C पर Kw = [H⁺][OH⁻] = 1.0 × 10⁻¹⁴। pH = −log[H⁺], pH + pOH = 14। दुर्बल वैद्युत-अपघट्य के लिए α ≈ √(K/C), यानी तनु करने पर α बढ़ता है (ओस्टवाल्ड तनुता नियम)। संयुग्मी युग्म के लिए Ka × Kb = Kw। दुर्बल अम्ल या क्षारक से बने लवण पानी से क्रिया करते हैं (जल-अपघटन)।
- बफ़र विलयन और विलेयता गुणनफल – बफ़र वह विलयन है जिसमें थोड़ा अम्ल या क्षारक डालने पर भी pH लगभग वही रहता है। अम्लीय बफ़र = दुर्बल अम्ल + उसका लवण (CH₃COOH + CH₃COONa); क्षारीय बफ़र = दुर्बल क्षारक + उसका लवण (NH₄OH + NH₄Cl)। pH हेंडरसन समीकरण से: pH = pKa + log([लवण]/[अम्ल])। अल्प-विलेय लवण अपने संतृप्त घोल में आयनों से साम्य बनाता है; आयन सांद्रताओं का गुणनफल (गुणांक की घात में) विलेयता गुणनफल Ksp है। AB के लिए Ksp = s², AB₂ या A₂B के लिए Ksp = 4s³। आयनिक गुणनफल Q > Ksp हो तो अवक्षेप बनता है। सम-आयन विलेयता घटाता है।
- अम्ल, क्षारक, लवण और अनुमापन – ज़्यादातर अकार्बनिक यौगिक चार वर्गों में आते हैं: ऑक्साइड, अम्ल, क्षारक और लवण। ये आपस में जुड़े हैं: धातु से क्षारीय ऑक्साइड, ऑक्साइड से क्षारक, और क्षारक + अम्ल से लवण और पानी। अनुमापन (titration) इसी उदासीनीकरण से अज्ञात सांद्रता नापता है: ब्यूरेट से ज्ञात सांद्रता का क्षारक तब तक डालते हैं जब तक सारा अम्ल खत्म न हो जाए (तुल्यता बिंदु)। 1 : 1 अभिक्रिया के लिए C₁V₁ = C₂V₂।
- परमाणु और अणु – रासायनिक अभिक्रिया में द्रव्यमान न बनता है, न नष्ट होता है (द्रव्यमान संरक्षण), और यौगिक में तत्व हमेशा द्रव्यमान के एक ही अनुपात में होते हैं (स्थिर अनुपात)। डाल्टन ने दोनों को समझाया: पदार्थ छोटे-छोटे परमाणुओं से बना है जो पूरी संख्याओं में जुड़ते हैं। परमाणु जुड़कर अणु बनाते हैं; आवेश वाले परमाणु या समूह आयन हैं। सूत्र संयोजकता को क्रॉस करके लिखते हैं। आण्विक द्रव्यमान (आयनिक यौगिक के लिए सूत्र इकाई द्रव्यमान) सूत्र के सभी परमाणु द्रव्यमानों का योग है, u में।
- मोल संकल्पना, मोलर द्रव्यमान और रासायनिक सूत्र – परमाणु इतने छोटे हैं कि एक-एक गिनना नामुमकिन है, इसलिए रसायनज्ञ उन्हें तौलकर गिनते हैं। परमाणु द्रव्यमान u में होता है; 1 u = कार्बन-12 परमाणु के द्रव्यमान का 1/12। एक मोल = 6.022 × 10²³ कण, और उसका ग्राम में द्रव्यमान u वाले सूत्र द्रव्यमान के बराबर। मोल से हम यौगिक में हर तत्व का प्रतिशत निकालते हैं, और प्रतिशत से उल्टा चलकर मूलानुपाती और आण्विक सूत्र।
9. Thermodynamics and Electrochemistry
Introduction to Entropy · Absolute Entropy and Entropy Change · Gibbs Free Energy and Thermodynamic Favorability · Thermodynamic and Kinetic Control · Free Energy and Equilibrium · Free Energy of Dissolution · Coupled Reactions · Galvanic (Voltaic) and Electrolytic Cells · Cell Potential and Free Energy · Cell Potential Under Nonstandard Conditions · Electrolysis and Faraday's Law
- स्वतः प्रवर्तिता, एन्ट्रॉपी और गिब्स ऊर्जा – स्वतः प्रक्रम बिना बाहरी मदद के अपने-आप होता है (तेज़ या धीमा)। केवल ΔH से इसका पता नहीं चलता: बर्फ़ ऊष्मा लेकर भी अपने-आप पिघलती है। एन्ट्रॉपी S बताती है कि ऊर्जा और पदार्थ कितने बिखरे हैं; ΔS = q_rev/T। द्वितीय नियम: हर स्वतः परिवर्तन में ΔS_कुल = ΔS_निकाय + ΔS_परिवेश > 0; साम्य पर शून्य। तृतीय नियम: 0 K पर पूर्ण क्रिस्टल की एन्ट्रॉपी शून्य। गिब्स ऊर्जा G = H − TS दोनों को जोड़ती है: स्थिर T और p पर ΔG = ΔH − TΔS; ΔG < 0 तो स्वतः, ΔG = 0 तो साम्य। साम्य स्थिरांक से संबंध: ΔG° = −RT ln K = −2.303 RT log K।
- ऊष्मागतिकी का प्रथम नियम – आंतरिक ऊर्जा U निकाय के अंदर के अणुओं की कुल ऊर्जा है। यह दो ही तरीकों से बदलती है: ऊष्मा Q (ताप के अंतर से बहने वाली ऊर्जा) और कार्य W (बल से दी गई ऊर्जा, जैसे खिसकता पिस्टन)। प्रथम नियम: ΔQ = ΔU + ΔW. गैस को दी गई ऊष्मा का एक भाग आंतरिक ऊर्जा बढ़ाता है, बाकी से गैस कार्य करती है। स्थिर दाब पर कार्य PΔV है। आदर्श गैस के लिए Cp − Cv = R.
- विलयन: चीज़ें कैसे घुलती हैं और कितनी घुल सकती हैं – विलयन विलायक में घुले विलेय का समांगी मिश्रण है। पानी में (जलीय विलयन) विलेय इतने छोटे कणों में टूटता है कि दिखता नहीं, नीचे नहीं बैठता और फ़िल्टर पेपर से निकल जाता है। सांद्रता बताती है कितना विलेय है (द्रव्यमान % = विलेय ÷ विलयन × 100)। विलेयता किसी ताप पर 100 g विलायक में घुल सकने वाली अधिकतम मात्रा है; उसके बाद विलयन संतृप्त है। वाष्पीकरण, क्रिस्टलीकरण और आसवन से विलयन अलग होता है।
- रासायनिक अभिक्रियाएँ: समीकरण, प्रकार, अनुमान और युग्मित अभिक्रियाएँ – रासायनिक अभिक्रिया में परमाणु नए ढंग से जुड़कर नए पदार्थ बनाते हैं; परमाणु और द्रव्यमान संरक्षित रहते हैं, इसलिए समीकरण संतुलित होना चाहिए। एक ही अभिक्रिया को शब्द समीकरण, अवस्था-चिह्नों वाले संतुलित सूत्र समीकरण, पूर्ण आयनिक समीकरण और नेट आयनिक समीकरण (दर्शक आयनों के बिना) में लिख सकते हैं। प्रकार: संयोजन, वियोजन, एकल विस्थापन, द्विविस्थापन (अवक्षेपण, उदासीनीकरण, गैस बनना), दहन; और क्या स्थानांतरित होता है: इलेक्ट्रॉन (रेडॉक्स) या प्रोटॉन (अम्ल–क्षार)। बाहरी (संयोजकता) इलेक्ट्रॉन से उत्पाद का अनुमान लगता है: धातु इलेक्ट्रॉन खोती है, अधातु लेती है, और दोनों संख्याएँ बराबर होनी चाहिए। जो अभिक्रिया अकेले नहीं चलती (ΔG > 0), उसे किसी बहुत अनुकूल अभिक्रिया से जोड़कर चलाया जा सकता है, बशर्ते कुल ΔG ऋणात्मक हो।
- गैल्वेनी सेल और नेर्न्स्ट समीकरण – गैल्वेनी सेल अपने-आप होने वाली रेडॉक्स अभिक्रिया की ऊर्जा को बिजली में बदलता है। ऐनोड (−) पर ऑक्सीकरण और कैथोड (+) पर अपचयन होता है। हर इलेक्ट्रोड का विभव मानक हाइड्रोजन इलेक्ट्रोड (0 V) से नापा जाता है। E°सेल = E°कैथोड − E°ऐनोड। नेर्न्स्ट समीकरण E = E° − (0.059/n) log Q (298 K पर) किसी भी सांद्रता पर वोल्टेज बताता है, और ΔG = −nFE वोल्टेज को ऊर्जा से जोड़ता है।
- वैद्युत अपघटन, बैटरी, ईंधन सेल और संक्षारण – वैद्युत-अपघटनी सेल में बाहर का बिजली स्रोत ऐसी अभिक्रिया करवाता है जो अपने-आप नहीं होती: धनायन कैथोड (−) पर अपचयित और ऋणायन ऐनोड (+) पर ऑक्सीकृत होते हैं। फैराडे के नियम द्रव्यमान को आवेश से जोड़ते हैं: m = (M/nF) × I × t। कौन-सा उत्पाद बनेगा यह इलेक्ट्रोड विभव और अधिविभव पर निर्भर है। बैटरियाँ गैल्वेनी सेल हैं: प्राथमिक (शुष्क सेल, मर्करी सेल) दोबारा चार्ज नहीं होतीं; द्वितीयक (लेड संचायक, Ni–Cd) होती हैं। ईंधन सेल H₂ और O₂ से सीधे बिजली बनाता है। संक्षारण (जंग) धातु की सतह पर बना एक अनचाहा गैल्वेनी सेल है।