अंदर बनाम बीच में: बंध और अंतराअणुक बल
रासायनिक बंध (सहसंयोजी, आयनिक, धात्विक) परमाणुओं को कण के अंदर जोड़ता है। अंतराअणुक बल अलग-अलग अणुओं के बीच का आकर्षण है।
बंध मज़बूत होते हैं (सैकड़ों kJ प्रति मोल)। अंतराअणुक बल कमज़ोर (आमतौर पर 1–40 kJ प्रति मोल)। पानी उबलने पर H–O बंध नहीं टूटते; सिर्फ़ अणुओं के बीच का खिंचाव टूटता है। भाप भी H₂O ही है।
ये सारे बल विद्युत आवेशों से आते हैं: थोड़ा ऋणात्मक भाग (δ−) थोड़े धनात्मक भाग (δ+) को खींचता है।
ध्रुवता: δ+ और δ− कहाँ से आते हैं?
विद्युतऋणात्मकता बताती है कि परमाणु साझा इलेक्ट्रॉनों को कितनी ज़ोर से खींचता है। दो अलग परमाणु इलेक्ट्रॉन बाँटें तो ज़्यादा खींचने वाला δ− और दूसरा δ+ बनता है। ऐसा बंध ध्रुवीय है।
पूरा अणु तभी ध्रुवीय है जब उसकी आकृति खिंचावों को रद्द न करे। CO₂ सीधा है, दोनों खिंचाव रद्द: अध्रुवीय। H₂O मुड़ा है, रद्द नहीं: ध्रुवीय। CCl₄ सममित (अध्रुवीय), CHCl₃ नहीं (ध्रुवीय)।
क्रियात्मक समूह भी असर डालते हैं: –OH, –NH₂, –COOH हाइड्रोजन आबंध बनवाते हैं; लंबी C–H शृंखलाएँ अध्रुवीय होती हैं।
तीन मुख्य प्रकार
लंदन परिक्षेपण बल
इलेक्ट्रॉन हमेशा चलते रहते हैं। पल भर को एक तरफ़ ज़्यादा हो जाते हैं और क्षणिक द्विध्रुव बनता है। यह पड़ोसी में भी प्रेरित द्विध्रुव बना देता है और दोनों खिंचते हैं। यह हर अणु में है। इलेक्ट्रॉन ज़्यादा (बड़ा अणु) हों और आकृति लंबी हो (ज़्यादा सतह छूए) तो बल बढ़ता है।
द्विध्रुव–द्विध्रुव बल
ध्रुवीय अणुओं में स्थायी δ+ और δ− सिरे होते हैं। वे + को − की ओर करके जमते हैं (HCl, ऐसीटोन)। समान आकार के अणुओं में ये लंदन बल में जुड़ जाते हैं, इसलिए ध्रुवीय पदार्थ ऊँचे ताप पर उबलते हैं।
हाइड्रोजन आबंध
एक विशेष, मज़बूत द्विध्रुव आकर्षण। शर्त: H किसी N, O या F से जुड़ा हो और दूसरे N, O या F पर एकाकी युग्म हो। उदाहरण: पानी, अमोनिया, HF, ऐल्कोहॉल, DNA के क्षार युग्म। इसी से बर्फ़ तैरती है: हाइड्रोजन आबंध बर्फ़ के अणुओं को खुले जाल में रखते हैं, इसलिए बर्फ़ का घनत्व पानी से कम है।
आयन–द्विध्रुव बल (पानी से घिरा Na⁺) और भी मज़बूत है; इसी से नमक पानी में घुलता है।
'वान्डरवाल्स बल' लंदन और द्विध्रुव–द्विध्रुव बलों का साझा नाम है।
बल गुणों को कैसे तय करते हैं
- गलनांक और क्वथनांक: बल ज़्यादा → ऊँचा। H₂O 100 °C, H₂S −60 °C (हाइड्रोजन आबंध नहीं), CH₄ −162 °C।
- समूह में प्रवृत्ति: उत्कृष्ट गैसों और हैलोजनों में नीचे जाने पर क्वथनांक बढ़ता है (ज़्यादा इलेक्ट्रॉन → ज़्यादा लंदन बल)। I₂ कमरे के ताप पर ठोस है, F₂ गैस।
- श्यानता और पृष्ठ तनाव: ग्लिसरॉल (तीन –OH) गाढ़ा है; पानी का पृष्ठ तनाव ऊँचा है।
- वाष्प दाब और वाष्पन: बल कम → जल्दी उड़ता है (ऐसीटोन पानी से जल्दी सूखता है)।
- विलेयता: 'समान समान को घोलता है'। ध्रुवीय ध्रुवीय में (चीनी, नमक पानी में), अध्रुवीय अध्रुवीय में (ग्रीस पेट्रोल में)। तेल और पानी अलग रहते हैं।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- बल का क्रम (समान आकार): लंदन < द्विध्रुव–द्विध्रुव < हाइड्रोजन आबंध < आयन–द्विध्रुव
- हाइड्रोजन आबंध की शर्त: H–N, H–O या H–F + N, O या F पर एकाकी युग्म
- ज़्यादा इलेक्ट्रॉन → ज़्यादा लंदन बल
- ज़्यादा अंतराअणुक बल → ऊँचा गलनांक, क्वथनांक, श्यानता, पृष्ठ तनाव; कम वाष्प दाब
- समान समान को घोलता है
हल किए गए उदाहरण
1. F₂ और Cl₂ में किसका क्वथनांक ज़्यादा है? क्यों?
Cl₂ का। दोनों अध्रुवीय हैं, केवल लंदन बल हैं। Cl₂ में इलेक्ट्रॉन ज़्यादा हैं, इसलिए उसके लंदन बल ज़्यादा हैं।
2. सबसे मज़बूत अंतराअणुक बल बताइए: (a) CH₄ (b) HCl (c) NH₃।
(a) केवल लंदन (अध्रुवीय)। (b) द्विध्रुव–द्विध्रुव (ध्रुवीय, पर H क्लोरीन पर है)। (c) हाइड्रोजन आबंध (H नाइट्रोजन पर)।
3. एथेनॉल (78 °C) डाइमेथिल ईथर (−24 °C) से इतने ऊँचे ताप पर क्यों उबलता है? दोनों का सूत्र C₂H₆O है।
एथेनॉल में O–H है, इसलिए हाइड्रोजन आबंध बनते हैं। ईथर में O पर H नहीं है, केवल कमज़ोर द्विध्रुव और लंदन बल हैं।
4. CO₂ भारी होकर भी गैस क्यों है, जबकि H₂O द्रव?
CO₂ रैखिक है, बंध द्विध्रुव रद्द हो जाते हैं: केवल लंदन बल। H₂O मुड़ा और ध्रुवीय है और हाइड्रोजन आबंध बनाता है, जो बहुत मज़बूत हैं।
5. आयोडीन पानी में ज़्यादा घुलेगी या हेक्सेन में?
हेक्सेन में। I₂ अध्रुवीय है और अध्रुवीय विलायक में घुलती है (समान समान को घोलता है)।
आम गलतियाँ
- सोचना कि उबलने पर अणु के अंदर के बंध टूटते हैं। केवल अणु अलग होते हैं; भाप भी H₂O है।
- हर H वाले अणु को हाइड्रोजन आबंध वाला मानना। H का N, O या F पर होना ज़रूरी है (CH₄, HCl नहीं)।
- कहना कि अध्रुवीय अणुओं में कोई आकर्षण नहीं। हर अणु में लंदन बल है; I₂ जैसे बड़े अणु ठोस भी होते हैं।
- केवल बंध देखकर ध्रुवता तय करना। सममित आकृति (CO₂, CCl₄) ध्रुवीय बंधों को रद्द करके अणु को अध्रुवीय बना देती है।