United Grade 11 Chemistry
अध्याय: 3
1. Structure and properties of matter
Periodic table patterns from electron structure · Bulk properties and electrical forces between particles · Nuclear processes: fission, fusion, decay · Designing materials from molecular structure
- गुणधर्मों में आवर्ती प्रवृत्तियाँ – लगभग हर प्रवृत्ति दो बातों से तय होती है: नाभिक का खिंचाव (प्रभावी नाभिकीय आवेश) और बाहरी कोश की दूरी। आवर्त में बाएँ से दाएँ खिंचाव बढ़ता है पर कोश वही रहता है, इसलिए परमाणु छोटे होते हैं, आयनन एन्थैल्पी बढ़ती है, इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी अधिक ऋणात्मक होती है और विद्युतऋणात्मकता बढ़ती है। वर्ग में नीचे नया कोश जुड़ता है, इसलिए परमाणु बड़े और ये मान कम होते हैं। धनायन छोटा, ऋणायन बड़ा। संयोजकता बाहरी इलेक्ट्रॉनों से आती है; धातु-क्रियाशीलता नीचे-बाएँ और अधातु-क्रियाशीलता ऊपर-दाएँ सबसे ज़्यादा।
- अंतराअणुक बल – अंतराअणुक बल अणुओं के बीच के कमज़ोर आकर्षण हैं। समान आकार के अणुओं में कमज़ोर से मज़बूत: लंदन परिक्षेपण < द्विध्रुव–द्विध्रुव < हाइड्रोजन आबंध। बल जितना मज़बूत, गलनांक और क्वथनांक, श्यानता और पृष्ठ तनाव उतने ज़्यादा; यही तय करते हैं कि क्या किसमें घुलेगा।
- नाभिक: आकार, नाभिकीय बल, बंधन ऊर्जा, विखंडन और संलयन – नाभिक में Z प्रोटॉन और N न्यूट्रॉन होते हैं (A = Z + N न्यूक्लिऑन)। इसकी त्रिज्या R = R₀A^(1/3), R₀ ≈ 1.2 fm, इसलिए सब नाभिकों का घनत्व लगभग एक जैसा और बहुत ज़्यादा है। एक बहुत तेज़, कम दूरी वाला नाभिकीय बल न्यूक्लिऑनों को बाँधे रखता है। नाभिक अपने अलग-अलग कणों से थोड़ा हल्का होता है; यह द्रव्यमान क्षति Δm ही बंधन ऊर्जा है, E = Δm c² (1 u = 931.5 MeV)। प्रति न्यूक्लिऑन बंधन ऊर्जा लोहे (A ≈ 56) के पास सबसे ज़्यादा है, इसलिए भारी नाभिक टूटकर (विखंडन) और हल्के नाभिक जुड़कर (संलयन) ऊर्जा देते हैं।
- रासायनिक आबंधन: आयनिक, सहसंयोजक और धात्विक बंध – परमाणु आपस में जुड़कर (बंध बनाकर) ज़्यादा स्थिर होते हैं। इसमें सिर्फ़ बाहरी इलेक्ट्रॉन काम आते हैं। ज़्यादातर परमाणु बाहरी कोश में 8 इलेक्ट्रॉन होने पर सबसे स्थिर होते हैं: यही अष्टक नियम है। इसके तीन मुख्य रास्ते हैं। आयनिक बंध में धातु अधातु को इलेक्ट्रॉन दे देती है; विपरीत आवेश वाले आयन बनते हैं और एक-दूसरे को खींचते हैं। सहसंयोजक बंध में दो अधातुएँ इलेक्ट्रॉन जोड़े बाँटती हैं और अणु बनते हैं। धात्विक बंध में धातु परमाणु अपने बाहरी इलेक्ट्रॉन एक साझा 'सागर' में छोड़ देते हैं जो धनायनों को जोड़े रखता है। विद्युत-ऋणात्मकता का अंतर बताता है कि कौन-सा बंध बनेगा। बंध का प्रकार ही गलनांक, बिजली चलाने और पानी में घुलने जैसे गुण तय करता है।
- कॉसेल-लुईस उपागम और आयनिक आबंध – परमाणु आपस में इसलिए जुड़ते हैं ताकि हर एक के बाहरी कोश में 8 इलेक्ट्रॉन (अष्टक) हो जाएँ, बिल्कुल उत्कृष्ट गैस जैसे। कॉसेल ने बताया कि परमाणु इलेक्ट्रॉन देकर या लेकर आयन बनाते हैं (आयनिक आबंध)। लुईस ने बताया कि परमाणु इलेक्ट्रॉन-युग्म बाँट भी सकते हैं (सहसंयोजी आबंध)। लुईस संरचना इन इलेक्ट्रॉनों को बिंदु और रेखा से दिखाती है। फ़ॉर्मल आवेश (V − L − B/2) सबसे अच्छी संरचना चुनने में मदद करता है। आयन जुड़कर क्रिस्टल बनाते हैं; इसमें निकली ऊर्जा का संबंध जालक एन्थैल्पी से है।
2. Chemical reactions
Predicting simple reactions from outer electrons · Energy change in reactions (bond energy) · Reaction rates and collisions · Equilibrium and Le Chatelier · Conservation of mass and stoichiometry
- रासायनिक अभिक्रियाएँ: समीकरण, प्रकार, अनुमान और युग्मित अभिक्रियाएँ – रासायनिक अभिक्रिया में परमाणु नए ढंग से जुड़कर नए पदार्थ बनाते हैं; परमाणु और द्रव्यमान संरक्षित रहते हैं, इसलिए समीकरण संतुलित होना चाहिए। एक ही अभिक्रिया को शब्द समीकरण, अवस्था-चिह्नों वाले संतुलित सूत्र समीकरण, पूर्ण आयनिक समीकरण और नेट आयनिक समीकरण (दर्शक आयनों के बिना) में लिख सकते हैं। प्रकार: संयोजन, वियोजन, एकल विस्थापन, द्विविस्थापन (अवक्षेपण, उदासीनीकरण, गैस बनना), दहन; और क्या स्थानांतरित होता है: इलेक्ट्रॉन (रेडॉक्स) या प्रोटॉन (अम्ल–क्षार)। बाहरी (संयोजकता) इलेक्ट्रॉन से उत्पाद का अनुमान लगता है: धातु इलेक्ट्रॉन खोती है, अधातु लेती है, और दोनों संख्याएँ बराबर होनी चाहिए। जो अभिक्रिया अकेले नहीं चलती (ΔG > 0), उसे किसी बहुत अनुकूल अभिक्रिया से जोड़कर चलाया जा सकता है, बशर्ते कुल ΔG ऋणात्मक हो।
- विभिन्न प्रकार की अभिक्रियाओं की एन्थैल्पी – हर तरह के बदलाव की अपनी नाम वाली एन्थैल्पी है, हमेशा 1 mol के लिए। अवस्था परिवर्तन: संगलन (पिघलना), वाष्पन (उबलना), ऊर्ध्वपातन (ΔsubH = ΔfusH + ΔvapH); तीनों ऊष्माशोषी। दहन: 1 mol पदार्थ का ऑक्सीजन में पूरा जलना; हमेशा ऊष्माक्षेपी। परमाणुकरण: 1 mol पदार्थ का पूरी तरह गैसीय परमाणुओं में टूटना। बंध वियोजन एन्थैल्पी: गैस अवस्था में किसी बंध के 1 mol तोड़ना; बहुपरमाणुक अणुओं में औसत बंध एन्थैल्पी। ΔrH ≈ Σ(तोड़े गए बंध) − Σ(बने बंध)। जालक एन्थैल्पी: 1 mol आयनिक ठोस का गैसीय आयनों में टूटना (बॉर्न–हेबर चक्र से)। विलयन एन्थैल्पी = जालक एन्थैल्पी + जलयोजन एन्थैल्पी।
- रासायनिक अभिक्रिया का वेग – अभिक्रिया वेग बताता है कि प्रति इकाई समय में अभिकारक कितना ख़र्च होता है या उत्पाद कितना बनता है। वेग = −Δ[R]/Δt = +Δ[P]/Δt (इकाई mol L⁻¹ s⁻¹)। वेग नियम, वेग = k[A]^x[B]^y, प्रयोग से मिलता है; x + y कोटि है। आण्विकता = एक प्राथमिक चरण में टकराने वाले कणों की संख्या।
- ला-शातेलिए सिद्धांत: साम्य को प्रभावित करने वाले कारक – ला-शातेलिए सिद्धांत कहता है: साम्य पर किसी निकाय को छेड़ो, तो वह उस दिशा में खिसकता है जिससे वह छेड़छाड़ कम हो। अभिकारक डालो या उत्पाद निकालो → आगे। दाब बढ़ाओ (आयतन घटाओ) → कम गैस मोल वाली ओर। ताप बढ़ाओ → ऊष्माशोषी दिशा में, और K बदलता है। उत्प्रेरक सिर्फ़ जल्दी साम्य लाता है, उसे खिसकाता नहीं। स्थिर आयतन पर अक्रिय गैस से कुछ नहीं बदलता; स्थिर दाब पर यह दाब घटाने जैसा है। K सिर्फ़ ताप से बदलता है।
- रससमीकरणमिति, सीमांत अभिकर्मक और सांद्रता के पद – रससमीकरणमिति का मतलब है अभिक्रिया में पदार्थों की मात्रा मापना। संतुलित समीकरण एक नुस्खे जैसा है: उसकी संख्याएँ अभिकारकों और उत्पादों का मोल अनुपात बताती हैं। इससे किसी भी द्रव्यमान को मोल में बदलकर, अनुपात लगाकर, किसी दूसरे पदार्थ का द्रव्यमान निकाल सकते हैं। जो अभिकारक पहले खत्म हो वह सीमांत अभिकर्मक है; वही तय करता है कितना उत्पाद बनेगा। विलयन की सांद्रता द्रव्यमान %, मोल अंश, मोलरता या मोललता से बताते हैं।
3. Common course additions (beyond NGSS PEs)
Gas laws · Solutions and concentration · Acids, bases and pH · Molecular shape
- आदर्श गैस समीकरण PV = nRT और गैस को दबाने में कार्य – गैस अनगिनत छोटे-छोटे अणुओं से बनी है जो हर तरफ़ भागते रहते हैं। दीवारों पर उनकी टक्कर से दाब बनता है। कम घनत्व वाली गैस के लिए तीन आसान नियम हैं: ताप स्थिर हो तो P × V स्थिर (बॉयल); दाब स्थिर हो तो V केल्विन ताप के साथ बढ़ता है (चार्ल्स); एक जैसे P और T पर बराबर आयतन में बराबर अणु (आवोगाद्रो)। तीनों मिलकर बनते हैं PV = nRT = N k T। एक मोल में 6.022 × 10²³ कण होते हैं, यही आवोगाद्रो संख्या है। पिस्टन को अंदर धकेलने में गैस पर कार्य होता है; यह कार्य P–V ग्राफ़ के नीचे के क्षेत्रफल के बराबर है, और स्थिर ताप पर W = nRT ln(V₁/V₂)।
- विलयन: प्रकार, सांद्रता और हेनरी का नियम – विलयन दो या ज़्यादा पदार्थों का एकसमान मिश्रण है। जो ज़्यादा मात्रा में हो वह विलायक, जो कम हो वह विलेय। विलयन कितना 'गाढ़ा' है, यह सांद्रता के पदों से बताते हैं: द्रव्यमान %, आयतन %, ppm, मोल अंश, मोलरता (1 लीटर विलयन में) और मोललता (1 kg विलायक में)। ठोस अक्सर गर्म करने पर ज़्यादा घुलते हैं। गैस दाब बढ़ाने पर ज़्यादा घुलती है (हेनरी का नियम, p = KH·x) और गर्म करने पर कम।
- आयनिक साम्य: अम्ल, क्षारक, आयनन और pH – अम्ल और क्षारक की तीन परिभाषाएँ हैं: आरेनियस (पानी में H⁺ या OH⁻ देना), ब्रॉन्स्टेड–लोरी (प्रोटॉन दाता या ग्राही) और लुइस (इलेक्ट्रॉन-युग्म ग्राही या दाता)। प्रबल अम्ल-क्षारक पूरे आयनित होते हैं; दुर्बल थोड़े, और उनका साम्य Ka या Kb से लिखा जाता है। पानी भी थोड़ा आयनित होता है: 25 °C पर Kw = [H⁺][OH⁻] = 1.0 × 10⁻¹⁴। pH = −log[H⁺], pH + pOH = 14। दुर्बल वैद्युत-अपघट्य के लिए α ≈ √(K/C), यानी तनु करने पर α बढ़ता है (ओस्टवाल्ड तनुता नियम)। संयुग्मी युग्म के लिए Ka × Kb = Kw। दुर्बल अम्ल या क्षारक से बने लवण पानी से क्रिया करते हैं (जल-अपघटन)।
- वीएसईपीआर सिद्धांत: अणुओं की आकृतियाँ – VSEPR का अर्थ है संयोजकता कोश इलेक्ट्रॉन युग्म प्रतिकर्षण। केंद्रीय परमाणु के चारों ओर के इलेक्ट्रॉन युग्म एक-दूसरे को धकेलते हैं और जितना हो सके दूर चले जाते हैं। युग्मों की संख्या मूल व्यवस्था तय करती है: 2 रैखिक, 3 त्रिकोणीय समतलीय, 4 चतुष्फलकीय, 5 त्रिकोणीय द्विपिरामिडी, 6 अष्टफलकीय। एकाकी युग्म आबंध युग्म से ज़्यादा जगह घेरते हैं (lp–lp > lp–bp > bp–bp), इसलिए आबंध कोण घटाते और दिखने वाली आकृति बदलते हैं, जैसे NH₃ (पिरामिडी, 107°) और H₂O (बंकित, 104.5°)।