द्रव्य का द्वैत व्यवहार: दे ब्रॉग्ली
प्रकाश तरंग भी है और कण भी। 1924 में दे ब्रॉग्ली ने कहा कि द्रव्य भी ऐसा ही होना चाहिए: हर चलते कण का एक तरंगदैर्ध्य है
λ = h/mv = h/p (p = संवेग)।
क्रिकेट गेंद का λ बहुत ही छोटा (लगभग 10−34 m) है, इसलिए कोई तरंग असर नहीं दिखता। इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान बहुत कम है, इसलिए उसका λ परमाणु जितना होता है और तरंग असर मायने रखता है। इलेक्ट्रॉन विवर्तन ने इसे सिद्ध किया और इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी इसी पर चलता है।
बोर से जोड़: कक्षा पर पूरी तरंगें फिट हों तो 2πr = nλ = nh/mv, यानी mvr = nh/2π: ठीक बोर का नियम।
हाइज़ेनबर्ग का अनिश्चितता सिद्धांत
इलेक्ट्रॉन की ठीक स्थिति और ठीक संवेग (या वेग) एक साथ जानना असंभव है:
Δx × Δp ≥ h/4π, या Δx × Δv ≥ h/(4πm)।
क्यों: इलेक्ट्रॉन को "देखने" के लिए उस जगह से छोटे तरंगदैर्ध्य का प्रकाश चाहिए। ऐसे प्रकाश में बहुत ऊर्जा होती है, वह इलेक्ट्रॉन को धक्का देकर उसका संवेग बदल देता है। स्थिति जितनी पक्की, संवेग उतना धुँधला।
मतलब: इलेक्ट्रॉन का पक्का रास्ता (कक्षा) बेमानी है, इसलिए बोर मॉडल छोड़ना पड़ा। बड़ी चीज़ों (गेंद) में अनिश्चितता इतनी छोटी है कि पता ही नहीं चलती।
क्वांटम यांत्रिक मॉडल और कक्षक
श्रोडिंगर (1926) ने इलेक्ट्रॉन को तरंग मानकर एक समीकरण लिखा। उसके हल तरंग फलन ψ हैं। ψ का सीधा अर्थ नहीं, पर ψ² प्रायिकता घनत्व बताता है: किसी बिंदु पर इलेक्ट्रॉन मिलने की संभावना।
- कक्षक नाभिक के चारों ओर वह जगह है जहाँ इलेक्ट्रॉन मिलने की संभावना सबसे ज़्यादा है (आमतौर पर 90 % संभावना वाली सीमा)।
- कक्षा (बोर) एक पक्का गोल रास्ता है; कक्षक 3D संभावना बादल है। एक कक्षक में अधिकतम 2 इलेक्ट्रॉन।
- इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा क्वांटित है; मान्य ऊर्जाएँ समीकरण से अपने-आप मिलती हैं।
- नोड: जहाँ ψ² = 0। त्रिज्य नोड = n − l − 1; कोणीय नोड = l; कुल = n − 1।
क्वांटम संख्याएँ
| क्वांटम संख्या | मान | क्या बताती है |
|---|---|---|
| मुख्य n | 1, 2, 3 … (K, L, M …) | कोश, आकार और ऊर्जा। कोश n में कक्षक = n²; इलेक्ट्रॉन = 2n²। |
| दिगंशी l | 0 से n − 1 (s, p, d, f) | उपकोश और आकृति। उपकोश में कक्षक = 2l + 1। |
| चुंबकीय mₗ | −l … 0 … +l | कक्षक की दिशा। |
| चक्रण mₛ | +½ या −½ | इलेक्ट्रॉन के घूमने की दिशा (↑ या ↓)। |
उदाहरण: n = 3 के लिए l = 0, 1, 2 (3s, 3p, 3d); कक्षक = 1 + 3 + 5 = 9 = 3²; इलेक्ट्रॉन = 18।
कक्षीय कोणीय संवेग = √(l(l+1)) · h/2π।
s, p और d कक्षकों की आकृतियाँ
- s (l = 0): गोलाकार। आकार 1s < 2s < 3s। 2s में 1 त्रिज्य नोड, 3s में 2।
- p (l = 1): तीन डम्बल, pₓ, py, pz, तीनों अक्षों पर, नाभिक से होकर एक नोडीय तल। परमाणु में तीनों की ऊर्जा बराबर (समभ्रंश)। n = 2 से शुरू।
- d (l = 2): n = 3 से पाँच कक्षक। dxy, dyz, dxz में अक्षों के बीच चार पत्तियाँ; dx²−y² में x और y अक्षों पर चार पत्तियाँ; dz² z अक्ष पर डम्बल और बीच में छल्ला।
कक्षकों की ऊर्जा और (n + l) नियम
हाइड्रोजन में ऊर्जा सिर्फ़ n पर निर्भर: 2s = 2p। बहु-इलेक्ट्रॉन परमाणुओं में ऊर्जा l पर भी निर्भर है, क्योंकि अंदर के इलेक्ट्रॉन बाहर वालों को परिरक्षित करते हैं, और s इलेक्ट्रॉन नाभिक के ज़्यादा पास पहुँचते (भेदन) हैं, फिर p, फिर d।
(n + l) नियम: n + l कम तो ऊर्जा कम। बराबर हो तो कम n पहले। इसलिए 4s (4+0 = 4) 3d (3+2 = 5) से पहले भरता है।
क्रम: 1s, 2s, 2p, 3s, 3p, 4s, 3d, 4p, 5s, 4d, 5p, 6s, 4f, 5d, 6p, 7s …
भरने के नियम: आउफबाऊ, पाउली और हुंड
- आउफबाऊ सिद्धांत: इलेक्ट्रॉन पहले सबसे कम ऊर्जा वाले कक्षक में जाते हैं ("आउफबाऊ" = ऊपर बनाना)।
- पाउली अपवर्जन सिद्धांत: एक परमाणु में किन्हीं दो इलेक्ट्रॉनों की चारों क्वांटम संख्याएँ समान नहीं हो सकतीं। इसलिए एक कक्षक में अधिकतम दो इलेक्ट्रॉन, उल्टे चक्रण के साथ (↑↓)।
- हुंड का अधिकतम बहुलता नियम: बराबर ऊर्जा वाले कक्षकों (p, d, f) में पहले एक-एक इलेक्ट्रॉन समान चक्रण से जाता है; सबमें एक-एक होने के बाद ही जोड़ी बनती है। N (2p³) = ↑ ↑ ↑, न कि ↑↓ ↑।
इलेक्ट्रॉनिक विन्यास और स्थायित्व
उपकोश लिखकर ऊपर इलेक्ट्रॉन संख्या लिखते हैं: O (8) = 1s² 2s² 2p⁴; K (19) = 1s² 2s² 2p⁶ 3s² 3p⁶ 4s¹ = [Ar] 4s¹। सबसे बाहरी इलेक्ट्रॉन संयोजी इलेक्ट्रॉन, बाकी आंतरिक (core) इलेक्ट्रॉन।
आधे और पूरे भरे उपकोशों का विशेष स्थायित्व:
- सममिति: बराबर भरा उपकोश ज़्यादा सममित और कम ऊर्जा वाला।
- विनिमय ऊर्जा: बराबर ऊर्जा के कक्षकों में समान चक्रण वाले इलेक्ट्रॉन जगह बदल सकते हैं; हर अदला-बदली ऊर्जा छोड़ती है। ज़्यादा समान चक्रण = ज़्यादा विनिमय = ज़्यादा स्थायित्व। d⁵ में सबसे ज़्यादा।
इसलिए Cr (24) = [Ar] 3d⁵ 4s¹, 3d⁴4s² नहीं; और Cu (29) = [Ar] 3d¹⁰ 4s¹, 3d⁹4s² नहीं।
आयन: सबसे बड़े n वाले इलेक्ट्रॉन पहले निकालो। Fe (26) = [Ar]3d⁶4s²; Fe²⁺ = [Ar]3d⁶; Fe³⁺ = [Ar]3d⁵ (आधा भरा, इसलिए Fe³⁺ ज़्यादा स्थायी)।
करके देखें: भरिए और जाँचिए
आखिरी स्टेप में पहले नाइट्रोजन (Z = 7) का विन्यास कॉपी में बक्सों और तीरों से बनाइए। फिर Z = 7 करके देखिए कि तीनों 2p इलेक्ट्रॉन अकेले और एक ही दिशा में हैं। फिर Z = 23, 24, 25 की तुलना कीजिए: Cr पर 4s का इलेक्ट्रॉन 3d में जाता दिखेगा।
बोर्ड परीक्षा कोना
आम प्रश्न: दे ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य और अनिश्चितता के आंकिक (2–3 अंक); क्वांटम संख्याओं के संभव/असंभव समूह; कोश में कक्षक/इलेक्ट्रॉन की संख्या; नोड; कक्षकों की आकृतियाँ (चित्र); आउफबाऊ, पाउली, हुंड लिखना और समझाना; Z = 1–30 के विन्यास, Cr और Cu अपवाद और कारण।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- λ = h/mv = h/p (दे ब्रॉग्ली)
- Δx · Δp ≥ h/4π; Δx · Δv ≥ h/4πm
- l = 0 से n − 1; mₗ = −l से +l; mₛ = ±½
- कोश में कक्षक = n²; इलेक्ट्रॉन = 2n²
- उपकोश में कक्षक = 2l + 1; इलेक्ट्रॉन = 2(2l + 1)
- त्रिज्य नोड = n − l − 1; कोणीय नोड = l; कुल = n − 1
- कक्षीय कोणीय संवेग = √(l(l+1)) h/2π
- भरने के क्रम के लिए (n + l) नियम
हल किए गए उदाहरण
1. 10 m/s से चलती 0.1 kg की गेंद का दे ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य निकालिए।
λ = h/mv = 6.626 × 10⁻³⁴ ÷ (0.1 × 10) = 6.626 × 10⁻³⁴ m। इतना छोटा कि पता ही न चले।
2. 2.19 × 10⁶ m/s से चलते इलेक्ट्रॉन (m = 9.1 × 10⁻³¹ kg) का दे ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य?
λ = 6.626 × 10⁻³⁴ ÷ (9.1 × 10⁻³¹ × 2.19 × 10⁶) = 6.626 × 10⁻³⁴ ÷ 1.993 × 10⁻²⁴ = 3.32 × 10⁻¹⁰ m = 332 pm, परमाणु जितना। (यह H की पहली कक्षा की परिधि 2πr है: एक पूरी तरंग फिट।)
3. 25 g की गेंद की स्थिति 10⁻⁵ m तक पता है। वेग की न्यूनतम अनिश्चितता?
Δv = h/(4πmΔx) = 6.626 × 10⁻³⁴ ÷ (4 × 3.14 × 0.025 × 10⁻⁵) = 2.1 × 10⁻²⁸ m/s। नगण्य।
4. इलेक्ट्रॉन की स्थिति 0.1 Å (10⁻¹¹ m) तक पता है। वेग की न्यूनतम अनिश्चितता?
Δv = 6.626 × 10⁻³⁴ ÷ (4 × 3.14 × 9.1 × 10⁻³¹ × 10⁻¹¹) = 5.8 × 10⁶ m/s। परमाणु में उसकी अपनी चाल से भी ज़्यादा, इसलिए पक्की कक्षा बेमानी है।
5. 3d उपकोश के सभी कक्षकों की क्वांटम संख्याएँ और त्रिज्य व कोणीय नोड लिखिए।
n = 3, l = 2, mₗ = −2, −1, 0, +1, +2 (पाँच कक्षक)। त्रिज्य नोड = 3 − 2 − 1 = 0; कोणीय नोड = 2।
6. कौन-से समूह संभव नहीं? (a) n = 2, l = 2, mₗ = 0 (b) n = 3, l = 1, mₗ = −1 (c) n = 1, l = 0, mₗ = +1 (d) n = 4, l = 3, mₗ = −3
(a) असंभव: l ≤ n − 1 = 1 होना चाहिए। (c) असंभव: l = 0 पर mₗ सिर्फ़ 0। (b) 3p और (d) 4f ठीक हैं।
7. किसी परमाणु में कितने इलेक्ट्रॉनों के n = 3 और mₛ = −½ हो सकते हैं?
n = 3 में n² = 9 कक्षक। हर एक में mₛ = −½ वाला एक इलेक्ट्रॉन। उत्तर 9।
8. (n + l) नियम से 4s, 3d, 4p, 5s को ऊर्जा क्रम में लगाइए।
4s: 4, 3d: 5, 4p: 5, 5s: 5। 4s सबसे कम। n + l = 5 वालों में कम n पहले: 3d < 4p < 5s। क्रम: 4s < 3d < 4p < 5s।
9. Cr (24) और Cu (29) के विन्यास लिखिए और कारण बताइए।
Cr: 1s² 2s² 2p⁶ 3s² 3p⁶ 3d⁵ 4s¹। Cu: 1s² 2s² 2p⁶ 3s² 3p⁶ 3d¹⁰ 4s¹। एक 4s इलेक्ट्रॉन 3d में जाने से 3d आधा (Cr) या पूरा (Cu) भर जाता है। ये ज़्यादा सममित हैं और इनमें विनिमय ऊर्जा ज़्यादा है, इसलिए ज़्यादा स्थायी।
10. Fe³⁺ (Fe, Z = 26) में कितने अयुग्मित इलेक्ट्रॉन हैं?
Fe = [Ar] 3d⁶ 4s²। पहले 4s² फिर एक 3d निकालो: Fe³⁺ = [Ar] 3d⁵। हुंड नियम से पाँचों अकेले: 5 अयुग्मित।
आम गलतियाँ
- उदासीन परमाणु में 4s से पहले 3d भरना, या आयन में 4s से पहले 3d के इलेक्ट्रॉन निकालना। 4s पहले भरो; 4s पहले निकालो।
- 2d या 1p लिखना। l, n से छोटा होना चाहिए: 1 में सिर्फ़ s; 2 में s, p; d तीसरे कोश से।
- कक्षा और कक्षक को एक समझना। कक्षा पक्का रास्ता (बोर); कक्षक संभावना बादल।
- p या d उपकोश में सबमें एक-एक होने से पहले जोड़ी बना देना (हुंड नियम तोड़ना)।