Ukraine 11 клас Chemistry (profile level)
अध्याय: 4
1. Review and deepening of theory
Atomic structure · Periodic trends · Bonding and structure · Solutions and redox
- क्वांटम यांत्रिक मॉडल: क्वांटम संख्याएँ, कक्षक और इलेक्ट्रॉनिक विन्यास – चलते इलेक्ट्रॉन तरंग जैसे भी हैं: λ = h/mv (दे ब्रॉग्ली)। इसलिए स्थिति और संवेग एक साथ ठीक-ठीक नहीं जान सकते: Δx·Δp ≥ h/4π (हाइज़ेनबर्ग)। इसलिए पक्की कक्षाएँ छोड़कर कक्षक (orbital) लेते हैं: वह जगह जहाँ इलेक्ट्रॉन मिलने की संभावना ज़्यादा है (श्रोडिंगर समीकरण, ψ² = संभावना)। चार क्वांटम संख्याएँ हर इलेक्ट्रॉन बताती हैं: n (कोश, आकार, ऊर्जा), l (उपकोश, आकृति: 0 से n−1), mₗ (दिशा: −l से +l) और mₛ (चक्रण: +½ या −½)। s गोल, p डम्बल, d ज़्यादातर चार पत्ती जैसा। इलेक्ट्रॉन आउफबाऊ (n + l), पाउली (अधिकतम 2, उल्टे चक्रण) और हुंड (पहले अकेले) नियम से भरते हैं। आधे और पूरे भरे उपकोश ज़्यादा स्थायी, इसलिए Cr = 3d⁵4s¹ और Cu = 3d¹⁰4s¹।
- गुणधर्मों में आवर्ती प्रवृत्तियाँ – लगभग हर प्रवृत्ति दो बातों से तय होती है: नाभिक का खिंचाव (प्रभावी नाभिकीय आवेश) और बाहरी कोश की दूरी। आवर्त में बाएँ से दाएँ खिंचाव बढ़ता है पर कोश वही रहता है, इसलिए परमाणु छोटे होते हैं, आयनन एन्थैल्पी बढ़ती है, इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी अधिक ऋणात्मक होती है और विद्युतऋणात्मकता बढ़ती है। वर्ग में नीचे नया कोश जुड़ता है, इसलिए परमाणु बड़े और ये मान कम होते हैं। धनायन छोटा, ऋणायन बड़ा। संयोजकता बाहरी इलेक्ट्रॉनों से आती है; धातु-क्रियाशीलता नीचे-बाएँ और अधातु-क्रियाशीलता ऊपर-दाएँ सबसे ज़्यादा।
- संयोजकता आबंध सिद्धांत और संकरण – संयोजकता आबंध सिद्धांत कहता है कि सहसंयोजी आबंध तब बनता है जब दो परमाणुओं के अर्धपूरित कक्षक अतिव्यापन करते हैं और दोनों इलेक्ट्रॉन उलटे चक्रण के साथ युग्म बनाते हैं। आमने-सामने अतिव्यापन से मज़बूत σ (सिग्मा) आबंध बनता है; p कक्षकों के बगल से अतिव्यापन से कमज़ोर π (पाई) आबंध। असली आकृतियाँ समझाने के लिए परमाणु पहले अपने कक्षक मिलाकर बराबर संकर कक्षक बनाता है: sp (रैखिक, 180°), sp² (त्रिकोणीय समतलीय, 120°), sp³ (चतुष्फलकीय, 109.5°), sp³d (त्रिकोणीय द्विपिरामिडी) और sp³d² (अष्टफलकीय)।
- अपचयोपचय अभिक्रियाएँ: ऑक्सीजन से इलेक्ट्रॉन तक – पहले ऑक्सीकरण का मतलब था ऑक्सीजन जुड़ना या हाइड्रोजन हटना। अपचयन इसका उल्टा था। आज हम बड़ा विचार लेते हैं: इलेक्ट्रॉन खोना ऑक्सीकरण है और इलेक्ट्रॉन पाना अपचयन। दोनों हमेशा साथ होते हैं, इसलिए इन्हें अपचयोपचय (रेडॉक्स) अभिक्रिया कहते हैं। ज़्यादा सक्रिय धातु कम सक्रिय धातु के आयन को इलेक्ट्रॉन देती है।
2. Non-metallic elements and compounds
Hydrogen · Halogens · Chalcogens · Group VA elements · Group IVA elements
- हाइड्रोजन: सबसे हल्का तत्व – हाइड्रोजन (H) तत्व संख्या 1 है: एक प्रोटॉन और एक इलेक्ट्रॉन। यह H₂ अणुओं के रूप में रहता है, एक रंगहीन, गंधहीन गैस जो सभी गैसों में सबसे कम घनत्व वाली है और पानी में लगभग नहीं घुलती। प्रयोगशाला में इसे सक्रिय धातु और तनु अम्ल से बनाते हैं (Zn + 2HCl → ZnCl₂ + H₂) और पानी के ऊपर इकट्ठा करते हैं। यह पॉप की आवाज़ के साथ जलकर सिर्फ़ पानी बनाती है। अधातुओं से मिलकर यह HCl, NH₃ और H₂S जैसे हाइड्राइड बनाती है और कुछ धातु ऑक्साइडों का अपचयन करती है। इसके तीन समस्थानिक हैं: प्रोटियम, ड्यूटीरियम और ट्रिटियम। उपयोग: अमोनिया और उर्वरक, वनस्पति घी, रॉकेट ईंधन और ईंधन सेल।
- हैलोजन: समूह 17 के तत्व – फ़्लोरीन, क्लोरीन, ब्रोमीन, आयोडीन और एस्टेटीन आवर्त सारणी के समूह 17 में हैं, इन्हें हैलोजन कहते हैं। हर परमाणु के बाहरी कोश में 7 इलेक्ट्रॉन होते हैं, इसलिए यह 1 इलेक्ट्रॉन लेकर हैलाइड आयन (X⁻) बनाता है। समूह में नीचे जाने पर परमाणु बड़े होते हैं, रंग गहरा होता है, गलनांक-क्वथनांक बढ़ते हैं और अभिक्रियाशीलता घटती है। अधिक अभिक्रियाशील हैलोजन कम अभिक्रियाशील हैलोजन को उसके लवण से हटा देता है।
- सल्फर (गंधक) और उसके यौगिक – सल्फर (S, परमाणु संख्या 16, इलेक्ट्रॉन 2, 8, 6) एक पीली अधातु है जो ऑक्सीजन के साथ समूह 16 में है। ठोस सल्फर S₈ छल्लों से बना है और इसके विषमलंबाक्ष तथा एकनताक्ष अपररूप हैं। यह जलकर सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) बनाता है, जो विरंजन करती है और अम्ल वर्षा का कारण है। संपर्क विधि में SO₂ को V₂O₅ उत्प्रेरक पर SO₃ बनाया जाता है और फिर सल्फ्यूरिक अम्ल (H₂SO₄)। यह प्रबल अम्ल है, निर्जलीकारक और ऑक्सीकारक भी। H₂S की गंध सड़े अंडे जैसी होती है। सल्फेट आयन की पहचान: BaCl₂ डालने पर सफ़ेद BaSO₄ अवक्षेप, जो तनु HCl में नहीं घुलता।
- नाइट्रोजन और उसके यौगिक – हवा का 78% नाइट्रोजन गैस (N₂) है। इसका त्रिबंध इसे बहुत निष्क्रिय बनाता है, इसलिए पौधे इसे सीधे इस्तेमाल नहीं कर पाते। स्थिरीकरण N₂ को यौगिकों में बदलता है: बिजली और जीवाणु प्राकृतिक रूप से, और हैबर प्रक्रम उद्योग में अमोनिया (NH₃) बनाता है। अमोनिया क्षारीय गैस है जो अमोनियम लवण बनाती है। ऊँचे ताप पर N₂ और O₂ से NO बनता है, जो भूरी NO₂ बन जाती है; बारिश में NO₂ नाइट्रिक अम्ल और अम्ल वर्षा बनाती है।
3. Metallic elements and compounds
General properties of metals · Group IA–IIIA metals · Iron
- धातुकर्म: धात्विक बंध से अयस्क से धातु निकालने तक – धातुएँ मुक्त इलेक्ट्रॉनों के समुद्र में बँधे धनायनों से बनी हैं। यही धात्विक बंध बताता है कि वे क्यों चमकती, चालन करती और मुड़ती हैं। ज़्यादातर धातुएँ चट्टानों में यौगिकों के रूप में मिलती हैं, जिन्हें अयस्क कहते हैं। धातुकर्म अयस्क से शुद्ध धातु निकालने का विज्ञान है: पहले अयस्क का सांद्रण, फिर यौगिक को गर्मी (उत्ताप धातुकर्म), विलयन (जल धातुकर्म) या बिजली (विद्युत धातुकर्म) से धातु में बदलना, फिर शोधन। धातु जितनी ज़्यादा सक्रिय, उसे निकालना उतना कठिन और उसका संक्षारण उतना तेज़।
- क्षार धातुएँ और सोडियम के यौगिक – क्षार धातुएँ (लीथियम, सोडियम, पोटैशियम, रूबिडियम, सीज़ियम) आवर्त सारणी का समूह 1 हैं। हर परमाणु के बाहरी कोश में एक इलेक्ट्रॉन होता है, जिसे वह आसानी से खोकर M⁺ आयन बनाता है। ये नरम, हल्की और बहुत क्रियाशील हैं: पानी से हाइड्रोजन और क्षार बनाती हैं और हवा में जलती हैं। नीचे जाने पर क्रियाशीलता बढ़ती है। सोडियम से Na₂O, Na₂O₂, Na₂CO₃ (धावन सोडा) और NaHCO₃ (बेकिंग सोडा) बनते हैं, और हर धातु लौ को अपना रंग देती है।
- संक्रमण तत्व (d-ब्लॉक) – संक्रमण तत्व समूह 3 से 12 की d-ब्लॉक धातुएँ हैं। इनका आखिरी इलेक्ट्रॉन अंदर के (n−1)d कक्षक में जाता है। d-कक्षक आधे-अधूरे भरे होने से ये कई ऑक्सीकरण अवस्थाएँ, रंगीन आयन, चुंबकत्व (μ = √(n(n+2)) BM), अच्छा उत्प्रेरण और आसानी से मिश्रधातु बनाते हैं।
4. General review of chemistry
Basic laws and theories · Bonding and complex compounds · Chemical reactions · Dispersed systems · Chemistry in society
- रासायनिक संयोजन के नियम और डाल्टन का परमाणु सिद्धांत – पाँच नियम बताते हैं कि तत्व कैसे जुड़ते हैं। अभिक्रिया में द्रव्यमान बना रहता है। एक यौगिक में तत्व हमेशा एक ही द्रव्यमान अनुपात में होते हैं। दो तत्व एक से ज़्यादा यौगिक बनाएँ तो एक तत्व के स्थिर द्रव्यमान से जुड़ने वाले दूसरे के द्रव्यमान छोटी पूर्ण संख्याओं के अनुपात में होते हैं। गैसें सरल पूर्ण-संख्या आयतन अनुपात में जुड़ती हैं, और बराबर आयतन में बराबर अणु होते हैं। डाल्टन का सिद्धांत इन सबको परमाणुओं से समझाता है।
- उपसहसंयोजन यौगिक: वर्नर का सिद्धांत, मुख्य पद और IUPAC नाम – उपसहसंयोजन यौगिक में बीच में एक धातु परमाणु या आयन होता है, जिससे कुछ तय संख्या में आयन या अणु जुड़े रहते हैं। इन्हें लिगैंड कहते हैं। हर लिगैंड धातु को एक इलेक्ट्रॉन-युग्म देता है। धातु और उसके लिगैंड मिलकर बड़े कोष्ठक [ ] में रहते हैं — यही उपसहसंयोजन क्षेत्र है। धातु से सीधे जुड़े दाता परमाणुओं की गिनती उपसहसंयोजन संख्या है। वर्नर ने बताया कि धातु की दो संयोजकताएँ होती हैं: प्राथमिक (आयनित होने वाली, कोष्ठक के बाहर) और द्वितीयक (स्थिर, कोष्ठक के अंदर)।
- एन्थैल्पी, कैलोरीमिति और हेस का नियम – एन्थैल्पी H = U + pV। स्थिर दाब पर ली या दी गई ऊष्मा ΔH के बराबर होती है; स्थिर आयतन पर ΔU के बराबर। ΔU को बंद बम कैलोरीमीटर में और ΔH को खुले कप कैलोरीमीटर में मापते हैं: q = CΔT या q = mcΔT। गैसों के लिए ΔH = ΔU + Δn_g RT। ऊष्माक्षेपी अभिक्रिया में ΔrH ऋणात्मक, ऊष्माशोषी में धनात्मक; ΔrH° = ΣΔfH°(उत्पाद) − ΣΔfH°(अभिकारक)। हेस का नियम: अभिक्रिया एक चरण में हो या कई में, कुल एन्थैल्पी परिवर्तन एक ही रहता है, इसलिए ऊष्मारासायनिक समीकरणों को बीजगणित की तरह जोड़ सकते हैं।
- कोलॉइड और परिक्षिप्त तंत्र – परिक्षिप्त तंत्र (dispersed system) में एक पदार्थ छोटे-छोटे कणों के रूप में (परिक्षिप्त प्रावस्था) दूसरे पदार्थ (परिक्षेपण माध्यम) में फैला होता है। कणों के आकार से यह वास्तविक विलयन (लगभग 1 nm से छोटे), कोलॉइड (लगभग 1–100 nm) या निलंबन (100 nm से बड़े) होता है। कोलॉइड के कण दिखते नहीं और बैठते नहीं, पर रोशनी बिखेरने लायक बड़े होते हैं, इसलिए उनमें से गुज़रती किरण का रास्ता दिखता है – टिंडल प्रभाव। दोनों प्रावस्थाओं की अवस्था से कोलॉइड के प्रकार बनते हैं (कोहरा, धुआँ, दूध, झाग, जेल)। कोलॉइड कणों पर अक्सर एक जैसा आवेश होता है; विद्युत अपघट्य (नमक) डालने से आवेश ख़त्म होता है और कण जुड़कर बैठ जाते हैं – स्कंदन (coagulation)।
- विज्ञान, प्रौद्योगिकी और समाज: खोजें हमारा जीवन कैसे बदलती हैं – विज्ञान पता लगाता है कि प्रकृति कैसे काम करती है; प्रौद्योगिकी (तकनीक) उस ज्ञान से औज़ार बनाती और समस्याएँ सुलझाती है। समाज भी विज्ञान को दिशा देता है: सवाल पूछकर, शोध के लिए पैसा देकर और नियम बनाकर। छापाख़ाना, भाप इंजन, बिजली, टीके और इंटरनेट ने काम करने, जीने और सोचने का तरीक़ा बदल दिया। हर तकनीक के लाभ और जोखिम दोनों होते हैं। सही फ़ैसले के लिए हम प्रमाण देखते हैं, लाभ और जोखिम तौलते हैं, पूछते हैं किसे फ़ायदा और किसे नुक़सान, नैतिकता और भविष्य सोचते हैं, और सुरक्षा नियम अपनाते हैं।