CBSE कक्षा 11 रसायन विज्ञान
अध्याय: 10
1. रसायन विज्ञान की कुछ मूल अवधारणाएँ
द्रव्य और उसका मापन · रासायनिक संयोजन के नियम और डाल्टन का सिद्धांत · मोल संकल्पना · रससमीकरणमिति
- द्रव्य और उसका मापन – द्रव्य वह सब कुछ है जिसमें द्रव्यमान हो और जो जगह घेरे। यह ठोस, द्रव या गैस हो सकता है, और तत्व, यौगिक या मिश्रण हो सकता है। रसायनज्ञ SI मात्रकों में मापते हैं। हर माप में थोड़ा संदेह होता है, इसलिए हम उसे सही सार्थक अंकों के साथ लिखते हैं, बहुत बड़ी-छोटी संख्या वैज्ञानिक संकेतन में लिखते हैं और इकाई को इकाई-गुणक से बदलते हैं।
- रासायनिक संयोजन के नियम और डाल्टन का परमाणु सिद्धांत – पाँच नियम बताते हैं कि तत्व कैसे जुड़ते हैं। अभिक्रिया में द्रव्यमान बना रहता है। एक यौगिक में तत्व हमेशा एक ही द्रव्यमान अनुपात में होते हैं। दो तत्व एक से ज़्यादा यौगिक बनाएँ तो एक तत्व के स्थिर द्रव्यमान से जुड़ने वाले दूसरे के द्रव्यमान छोटी पूर्ण संख्याओं के अनुपात में होते हैं। गैसें सरल पूर्ण-संख्या आयतन अनुपात में जुड़ती हैं, और बराबर आयतन में बराबर अणु होते हैं। डाल्टन का सिद्धांत इन सबको परमाणुओं से समझाता है।
- मोल संकल्पना, मोलर द्रव्यमान और रासायनिक सूत्र – परमाणु इतने छोटे हैं कि एक-एक गिनना नामुमकिन है, इसलिए रसायनज्ञ उन्हें तौलकर गिनते हैं। परमाणु द्रव्यमान u में होता है; 1 u = कार्बन-12 परमाणु के द्रव्यमान का 1/12। एक मोल = 6.022 × 10²³ कण, और उसका ग्राम में द्रव्यमान u वाले सूत्र द्रव्यमान के बराबर। मोल से हम यौगिक में हर तत्व का प्रतिशत निकालते हैं, और प्रतिशत से उल्टा चलकर मूलानुपाती और आण्विक सूत्र।
- रससमीकरणमिति, सीमांत अभिकर्मक और सांद्रता के पद – रससमीकरणमिति का मतलब है अभिक्रिया में पदार्थों की मात्रा मापना। संतुलित समीकरण एक नुस्खे जैसा है: उसकी संख्याएँ अभिकारकों और उत्पादों का मोल अनुपात बताती हैं। इससे किसी भी द्रव्यमान को मोल में बदलकर, अनुपात लगाकर, किसी दूसरे पदार्थ का द्रव्यमान निकाल सकते हैं। जो अभिकारक पहले खत्म हो वह सीमांत अभिकर्मक है; वही तय करता है कितना उत्पाद बनेगा। विलयन की सांद्रता द्रव्यमान %, मोल अंश, मोलरता या मोललता से बताते हैं।
2. परमाणु की संरचना
उप-परमाणुक कण और प्रारंभिक मॉडल · बोर मॉडल की ओर · क्वांटम यांत्रिक मॉडल
- उप-परमाणुक कण और परमाणु के शुरुआती मॉडल – परमाणु तीन मुख्य कणों से बना है। इलेक्ट्रॉन (आवेश −1, बहुत हल्का) कैथोड किरण नली से मिला। प्रोटॉन (आवेश +1, इलेक्ट्रॉन से लगभग 1836 गुना भारी) कैनाल किरणों से मिला। न्यूट्रॉन (कोई आवेश नहीं, द्रव्यमान लगभग प्रोटॉन जितना) 1932 में चैडविक ने खोजा। टॉमसन ने परमाणु को धन आवेश का गोला माना जिसमें इलेक्ट्रॉन धँसे हैं। रदरफोर्ड ने सोने की पन्नी पर अल्फा कण मारकर बीच में छोटा, भारी, धनावेशित नाभिक खोजा। परमाणु क्रमांक Z = प्रोटॉन की संख्या; द्रव्यमान संख्या A = प्रोटॉन + न्यूट्रॉन। रदरफोर्ड मॉडल परमाणु का स्थायित्व और रेखा स्पेक्ट्रम नहीं समझा पाया, इसलिए बोर मॉडल आया।
- बोर मॉडल की ओर: प्रकाश, फोटॉन, स्पेक्ट्रम और बोर का परमाणु – प्रकाश एक विद्युत-चुंबकीय तरंग है: c = νλ और तरंग संख्या ν̄ = 1/λ। पर कुछ बातों के लिए कण चाहिए: प्लांक ने कहा ऊर्जा पैकेट (क्वांटम) में आती है, E = hν। आइंस्टीन ने फोटॉन से प्रकाश-विद्युत प्रभाव समझाया: इलेक्ट्रॉन तभी निकलता है जब hν, कार्य फलन W₀ = hν₀ से ज़्यादा हो; उसकी गतिज ऊर्जा hν − hν₀। परमाणु रेखा स्पेक्ट्रम देते हैं, यानी इलेक्ट्रॉन की ऊर्जाएँ तय हैं। बोर ने इलेक्ट्रॉन को तय कक्षाओं में रखा जहाँ कोणीय संवेग nh/2π; ऊर्जा Eₙ = −2.18 × 10⁻¹⁸ Z²/n² J, त्रिज्या rₙ = 52.9 n²/Z pm। कक्षा बदलने पर फोटॉन निकलता है, 1/λ = R_H(1/n₁² − 1/n₂²) से लाइमन, बामर, पाशन, ब्रैकेट, फुंड श्रेणियाँ मिलती हैं। बोर मॉडल सिर्फ़ एक-इलेक्ट्रॉन वाले कणों पर चलता है।
- क्वांटम यांत्रिक मॉडल: क्वांटम संख्याएँ, कक्षक और इलेक्ट्रॉनिक विन्यास – चलते इलेक्ट्रॉन तरंग जैसे भी हैं: λ = h/mv (दे ब्रॉग्ली)। इसलिए स्थिति और संवेग एक साथ ठीक-ठीक नहीं जान सकते: Δx·Δp ≥ h/4π (हाइज़ेनबर्ग)। इसलिए पक्की कक्षाएँ छोड़कर कक्षक (orbital) लेते हैं: वह जगह जहाँ इलेक्ट्रॉन मिलने की संभावना ज़्यादा है (श्रोडिंगर समीकरण, ψ² = संभावना)। चार क्वांटम संख्याएँ हर इलेक्ट्रॉन बताती हैं: n (कोश, आकार, ऊर्जा), l (उपकोश, आकृति: 0 से n−1), mₗ (दिशा: −l से +l) और mₛ (चक्रण: +½ या −½)। s गोल, p डम्बल, d ज़्यादातर चार पत्ती जैसा। इलेक्ट्रॉन आउफबाऊ (n + l), पाउली (अधिकतम 2, उल्टे चक्रण) और हुंड (पहले अकेले) नियम से भरते हैं। आधे और पूरे भरे उपकोश ज़्यादा स्थायी, इसलिए Cr = 3d⁵4s¹ और Cu = 3d¹⁰4s¹।
3. तत्वों का वर्गीकरण एवं गुणधर्मों में आवर्तिता
आवर्त वर्गीकरण · इलेक्ट्रॉनिक विन्यास और ब्लॉक · आवर्ती प्रवृत्तियाँ
- तत्वों का आवर्त वर्गीकरण – वैज्ञानिकों ने मिलते-जुलते तत्वों को एक साथ रखने की कोशिश की। डॉबेराइनर ने त्रिक बनाए, न्यूलैंड्स ने देखा कि हर 8वाँ तत्व पहले जैसा है (अष्टक), मेंडेलीफ़ ने परमाणु द्रव्यमान के क्रम में तत्व रखे और अनजान तत्वों के लिए खाली जगह छोड़ी। मोसले ने बताया कि असली आधार परमाणु संख्या है। आधुनिक आवर्त नियम: तत्वों के गुण उनकी परमाणु संख्या के आवर्ती फलन हैं। आधुनिक सारणी में 7 आवर्त और 18 वर्ग हैं। Z > 100 वाले तत्वों के अस्थायी IUPAC नाम अंकों के मूल (nil, un, bi, tri, quad, pent, hex, sept, oct, enn) + ium से बनते हैं।
- इलेक्ट्रॉनिक विन्यास और s, p, d, f ब्लॉक – आवर्त सारणी असल में इलेक्ट्रॉन-भरने का नक्शा है। आवर्त संख्या = विन्यास में सबसे बड़ा n। ब्लॉक = वह उपकोश जिसमें आख़िरी इलेक्ट्रॉन गया: s-ब्लॉक (वर्ग 1–2, ns¹⁻²), p-ब्लॉक (वर्ग 13–18, ns² np¹⁻⁶), d-ब्लॉक (वर्ग 3–12, (n−1)d¹⁻¹⁰ ns⁰⁻²), f-ब्लॉक (लैन्थेनॉयड, ऐक्टिनॉयड, (n−2)f¹⁻¹⁴ (n−1)d⁰⁻¹ ns²)। वर्ग: s-ब्लॉक = ns इलेक्ट्रॉन; p-ब्लॉक = 10 + ns + np; d-ब्लॉक = ns + (n−1)d।
- गुणधर्मों में आवर्ती प्रवृत्तियाँ – लगभग हर प्रवृत्ति दो बातों से तय होती है: नाभिक का खिंचाव (प्रभावी नाभिकीय आवेश) और बाहरी कोश की दूरी। आवर्त में बाएँ से दाएँ खिंचाव बढ़ता है पर कोश वही रहता है, इसलिए परमाणु छोटे होते हैं, आयनन एन्थैल्पी बढ़ती है, इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी अधिक ऋणात्मक होती है और विद्युतऋणात्मकता बढ़ती है। वर्ग में नीचे नया कोश जुड़ता है, इसलिए परमाणु बड़े और ये मान कम होते हैं। धनायन छोटा, ऋणायन बड़ा। संयोजकता बाहरी इलेक्ट्रॉनों से आती है; धातु-क्रियाशीलता नीचे-बाएँ और अधातु-क्रियाशीलता ऊपर-दाएँ सबसे ज़्यादा।
4. रासायनिक आबंधन तथा आण्विक संरचना
कॉसेल-लुईस उपागम और आयनिक आबंध · आबंध प्राचल · वीएसईपीआर सिद्धांत · संयोजकता आबंध सिद्धांत और संकरण · आण्विक कक्षक सिद्धांत · हाइड्रोजन आबंधन
- रासायनिक आबंधन: आयनिक, सहसंयोजक और धात्विक बंध – परमाणु आपस में जुड़कर (बंध बनाकर) ज़्यादा स्थिर होते हैं। इसमें सिर्फ़ बाहरी इलेक्ट्रॉन काम आते हैं। ज़्यादातर परमाणु बाहरी कोश में 8 इलेक्ट्रॉन होने पर सबसे स्थिर होते हैं: यही अष्टक नियम है। इसके तीन मुख्य रास्ते हैं। आयनिक बंध में धातु अधातु को इलेक्ट्रॉन दे देती है; विपरीत आवेश वाले आयन बनते हैं और एक-दूसरे को खींचते हैं। सहसंयोजक बंध में दो अधातुएँ इलेक्ट्रॉन जोड़े बाँटती हैं और अणु बनते हैं। धात्विक बंध में धातु परमाणु अपने बाहरी इलेक्ट्रॉन एक साझा 'सागर' में छोड़ देते हैं जो धनायनों को जोड़े रखता है। विद्युत-ऋणात्मकता का अंतर बताता है कि कौन-सा बंध बनेगा। बंध का प्रकार ही गलनांक, बिजली चलाने और पानी में घुलने जैसे गुण तय करता है।
- कॉसेल-लुईस उपागम और आयनिक आबंध – परमाणु आपस में इसलिए जुड़ते हैं ताकि हर एक के बाहरी कोश में 8 इलेक्ट्रॉन (अष्टक) हो जाएँ, बिल्कुल उत्कृष्ट गैस जैसे। कॉसेल ने बताया कि परमाणु इलेक्ट्रॉन देकर या लेकर आयन बनाते हैं (आयनिक आबंध)। लुईस ने बताया कि परमाणु इलेक्ट्रॉन-युग्म बाँट भी सकते हैं (सहसंयोजी आबंध)। लुईस संरचना इन इलेक्ट्रॉनों को बिंदु और रेखा से दिखाती है। फ़ॉर्मल आवेश (V − L − B/2) सबसे अच्छी संरचना चुनने में मदद करता है। आयन जुड़कर क्रिस्टल बनाते हैं; इसमें निकली ऊर्जा का संबंध जालक एन्थैल्पी से है।
- आबंध प्राचल, अनुनाद और ध्रुवता – सहसंयोजी आबंध को चार संख्याएँ बताती हैं: आबंध लंबाई (नाभिकों के बीच दूरी), आबंध कोण (किसी परमाणु पर दो आबंधों के बीच कोण), आबंध एन्थैल्पी (1 मोल आबंध तोड़ने की ऊर्जा) और आबंध कोटि (साझा युग्मों की संख्या)। ज़्यादा आबंध कोटि = छोटा और मज़बूत आबंध। जब एक लुईस संरचना काफ़ी न हो, तो असली अणु कई संरचनाओं का अनुनाद संकर होता है। असमान बँटवारा आबंध को ध्रुवीय बनाता है; द्विध्रुव आघूर्ण μ = q × d इसे मापता है, और अणु की आकृति तय करती है कि द्विध्रुव कटेंगे या जुड़ेंगे।
- वीएसईपीआर सिद्धांत: अणुओं की आकृतियाँ – VSEPR का अर्थ है संयोजकता कोश इलेक्ट्रॉन युग्म प्रतिकर्षण। केंद्रीय परमाणु के चारों ओर के इलेक्ट्रॉन युग्म एक-दूसरे को धकेलते हैं और जितना हो सके दूर चले जाते हैं। युग्मों की संख्या मूल व्यवस्था तय करती है: 2 रैखिक, 3 त्रिकोणीय समतलीय, 4 चतुष्फलकीय, 5 त्रिकोणीय द्विपिरामिडी, 6 अष्टफलकीय। एकाकी युग्म आबंध युग्म से ज़्यादा जगह घेरते हैं (lp–lp > lp–bp > bp–bp), इसलिए आबंध कोण घटाते और दिखने वाली आकृति बदलते हैं, जैसे NH₃ (पिरामिडी, 107°) और H₂O (बंकित, 104.5°)।
- संयोजकता आबंध सिद्धांत और संकरण – संयोजकता आबंध सिद्धांत कहता है कि सहसंयोजी आबंध तब बनता है जब दो परमाणुओं के अर्धपूरित कक्षक अतिव्यापन करते हैं और दोनों इलेक्ट्रॉन उलटे चक्रण के साथ युग्म बनाते हैं। आमने-सामने अतिव्यापन से मज़बूत σ (सिग्मा) आबंध बनता है; p कक्षकों के बगल से अतिव्यापन से कमज़ोर π (पाई) आबंध। असली आकृतियाँ समझाने के लिए परमाणु पहले अपने कक्षक मिलाकर बराबर संकर कक्षक बनाता है: sp (रैखिक, 180°), sp² (त्रिकोणीय समतलीय, 120°), sp³ (चतुष्फलकीय, 109.5°), sp³d (त्रिकोणीय द्विपिरामिडी) और sp³d² (अष्टफलकीय)।
- आण्विक कक्षक सिद्धांत – आण्विक कक्षक (MO) सिद्धांत में जुड़ने वाले परमाणुओं के परमाणु कक्षक मिलकर आण्विक कक्षक बनाते हैं, जो पूरे अणु के होते हैं। LCAO से दो परमाणु कक्षक जोड़ने पर कम ऊर्जा वाला आबंधी MO और घटाने पर ज़्यादा ऊर्जा वाला प्रतिआबंधी MO बनता है। इलेक्ट्रॉन आउफ़बाऊ, पाउली और हुंड नियम से भरते हैं। आबंध कोटि = ½ (Nb − Na)। धनात्मक आबंध कोटि = अणु का अस्तित्व; अयुग्मित इलेक्ट्रॉन = अनुचुंबकीय। यह सिद्धांत बताता है कि He₂ क्यों नहीं बनता और O₂ अनुचुंबकीय क्यों है।
- हाइड्रोजन आबंधन – हाइड्रोजन आबंध एक कमज़ोर आकर्षण है, जो किसी छोटे और बहुत विद्युतऋणी परमाणु (F, O या N) से जुड़े H और दूसरे ऐसे परमाणु के एकाकी युग्म के बीच होता है। इसे बिंदुदार रेखा से दिखाते हैं: X–H···Y। यह सहसंयोजी आबंध से बहुत कमज़ोर (लगभग 10–40 kJ mol⁻¹) है, पर इतना मज़बूत कि क्वथनांक बढ़ा दे, बर्फ़ को तैरा दे और DNA को जोड़े रखे। अंतरअणुक H-आबंध अलग अणुओं को जोड़ता है; अंतराअणुक एक ही अणु के अंदर बनता है।
5. ऊष्मागतिकी
ऊष्मागतिकी शब्दावली · ΔU और ΔH का मापन · विभिन्न अभिक्रियाओं की एन्थैल्पी · स्वतः प्रवर्तिता और गिब्स ऊर्जा
- ऊष्मागतिकी का प्रथम नियम: निकाय, ऊष्मा, कार्य और ΔU – ऊष्मागतिकी ऊर्जा का हिसाब रखती है। जिस भाग को हम पढ़ते हैं वह निकाय है, बाकी सब परिवेश, और दोनों के बीच की दीवार परिसीमा। निकाय खुला, बंद या विलगित हो सकता है। आंतरिक ऊर्जा U निकाय में भरी कुल ऊर्जा है। यह केवल दो तरह से बदलती है: ऊष्मा q से या कार्य w से। प्रथम नियम: ΔU = q + w (IUPAC नियम: निकाय में आने वाली ऊर्जा धनात्मक)। U अवस्था फलन है; q और w पथ फलन हैं। स्थिर बाहरी दाब पर प्रसार में w = −p_ext ΔV; आदर्श गैस के उत्क्रमणीय समतापी प्रसार में w = −2.303 nRT log(V₂/V₁)।
- ऊष्मागतिकी का प्रथम नियम – आंतरिक ऊर्जा U निकाय के अंदर के अणुओं की कुल ऊर्जा है। यह दो ही तरीकों से बदलती है: ऊष्मा Q (ताप के अंतर से बहने वाली ऊर्जा) और कार्य W (बल से दी गई ऊर्जा, जैसे खिसकता पिस्टन)। प्रथम नियम: ΔQ = ΔU + ΔW. गैस को दी गई ऊष्मा का एक भाग आंतरिक ऊर्जा बढ़ाता है, बाकी से गैस कार्य करती है। स्थिर दाब पर कार्य PΔV है। आदर्श गैस के लिए Cp − Cv = R.
- एन्थैल्पी, कैलोरीमिति और हेस का नियम – एन्थैल्पी H = U + pV। स्थिर दाब पर ली या दी गई ऊष्मा ΔH के बराबर होती है; स्थिर आयतन पर ΔU के बराबर। ΔU को बंद बम कैलोरीमीटर में और ΔH को खुले कप कैलोरीमीटर में मापते हैं: q = CΔT या q = mcΔT। गैसों के लिए ΔH = ΔU + Δn_g RT। ऊष्माक्षेपी अभिक्रिया में ΔrH ऋणात्मक, ऊष्माशोषी में धनात्मक; ΔrH° = ΣΔfH°(उत्पाद) − ΣΔfH°(अभिकारक)। हेस का नियम: अभिक्रिया एक चरण में हो या कई में, कुल एन्थैल्पी परिवर्तन एक ही रहता है, इसलिए ऊष्मारासायनिक समीकरणों को बीजगणित की तरह जोड़ सकते हैं।
- विभिन्न प्रकार की अभिक्रियाओं की एन्थैल्पी – हर तरह के बदलाव की अपनी नाम वाली एन्थैल्पी है, हमेशा 1 mol के लिए। अवस्था परिवर्तन: संगलन (पिघलना), वाष्पन (उबलना), ऊर्ध्वपातन (ΔsubH = ΔfusH + ΔvapH); तीनों ऊष्माशोषी। दहन: 1 mol पदार्थ का ऑक्सीजन में पूरा जलना; हमेशा ऊष्माक्षेपी। परमाणुकरण: 1 mol पदार्थ का पूरी तरह गैसीय परमाणुओं में टूटना। बंध वियोजन एन्थैल्पी: गैस अवस्था में किसी बंध के 1 mol तोड़ना; बहुपरमाणुक अणुओं में औसत बंध एन्थैल्पी। ΔrH ≈ Σ(तोड़े गए बंध) − Σ(बने बंध)। जालक एन्थैल्पी: 1 mol आयनिक ठोस का गैसीय आयनों में टूटना (बॉर्न–हेबर चक्र से)। विलयन एन्थैल्पी = जालक एन्थैल्पी + जलयोजन एन्थैल्पी।
- स्वतः प्रवर्तिता, एन्ट्रॉपी और गिब्स ऊर्जा – स्वतः प्रक्रम बिना बाहरी मदद के अपने-आप होता है (तेज़ या धीमा)। केवल ΔH से इसका पता नहीं चलता: बर्फ़ ऊष्मा लेकर भी अपने-आप पिघलती है। एन्ट्रॉपी S बताती है कि ऊर्जा और पदार्थ कितने बिखरे हैं; ΔS = q_rev/T। द्वितीय नियम: हर स्वतः परिवर्तन में ΔS_कुल = ΔS_निकाय + ΔS_परिवेश > 0; साम्य पर शून्य। तृतीय नियम: 0 K पर पूर्ण क्रिस्टल की एन्ट्रॉपी शून्य। गिब्स ऊर्जा G = H − TS दोनों को जोड़ती है: स्थिर T और p पर ΔG = ΔH − TΔS; ΔG < 0 तो स्वतः, ΔG = 0 तो साम्य। साम्य स्थिरांक से संबंध: ΔG° = −RT ln K = −2.303 RT log K।
6. साम्यावस्था
भौतिक और रासायनिक प्रक्रमों में साम्य · आयनिक साम्य
- रासायनिक साम्य: Kc, Kp, Q और गिब्स ऊर्जा – बंद बर्तन में उत्क्रमणीय अभिक्रिया दोनों ओर चलती है। कुछ देर बाद अग्र और पश्च अभिक्रिया का वेग बराबर हो जाता है। मात्राएँ बदलना बंद हो जाती हैं, पर अभिक्रिया रुकती नहीं। इसे गतिक साम्य कहते हैं। साम्य पर उत्पादों और अभिकारकों का अनुपात (हर एक अपने गुणांक की घात में) एक निश्चित संख्या होता है, जिसे साम्य स्थिरांक K कहते हैं। Kc सांद्रता से, Kp आंशिक दाब से, और Kp = Kc(RT)^Δn। शुद्ध ठोस और द्रव K में नहीं लिखे जाते। Q < K हो तो अभिक्रिया आगे, Q > K हो तो पीछे जाती है। ΔG° = −RT ln K।
- ला-शातेलिए सिद्धांत: साम्य को प्रभावित करने वाले कारक – ला-शातेलिए सिद्धांत कहता है: साम्य पर किसी निकाय को छेड़ो, तो वह उस दिशा में खिसकता है जिससे वह छेड़छाड़ कम हो। अभिकारक डालो या उत्पाद निकालो → आगे। दाब बढ़ाओ (आयतन घटाओ) → कम गैस मोल वाली ओर। ताप बढ़ाओ → ऊष्माशोषी दिशा में, और K बदलता है। उत्प्रेरक सिर्फ़ जल्दी साम्य लाता है, उसे खिसकाता नहीं। स्थिर आयतन पर अक्रिय गैस से कुछ नहीं बदलता; स्थिर दाब पर यह दाब घटाने जैसा है। K सिर्फ़ ताप से बदलता है।
- बफ़र विलयन और विलेयता गुणनफल – बफ़र वह विलयन है जिसमें थोड़ा अम्ल या क्षारक डालने पर भी pH लगभग वही रहता है। अम्लीय बफ़र = दुर्बल अम्ल + उसका लवण (CH₃COOH + CH₃COONa); क्षारीय बफ़र = दुर्बल क्षारक + उसका लवण (NH₄OH + NH₄Cl)। pH हेंडरसन समीकरण से: pH = pKa + log([लवण]/[अम्ल])। अल्प-विलेय लवण अपने संतृप्त घोल में आयनों से साम्य बनाता है; आयन सांद्रताओं का गुणनफल (गुणांक की घात में) विलेयता गुणनफल Ksp है। AB के लिए Ksp = s², AB₂ या A₂B के लिए Ksp = 4s³। आयनिक गुणनफल Q > Ksp हो तो अवक्षेप बनता है। सम-आयन विलेयता घटाता है।
- आयनिक साम्य: अम्ल, क्षारक, आयनन और pH – अम्ल और क्षारक की तीन परिभाषाएँ हैं: आरेनियस (पानी में H⁺ या OH⁻ देना), ब्रॉन्स्टेड–लोरी (प्रोटॉन दाता या ग्राही) और लुइस (इलेक्ट्रॉन-युग्म ग्राही या दाता)। प्रबल अम्ल-क्षारक पूरे आयनित होते हैं; दुर्बल थोड़े, और उनका साम्य Ka या Kb से लिखा जाता है। पानी भी थोड़ा आयनित होता है: 25 °C पर Kw = [H⁺][OH⁻] = 1.0 × 10⁻¹⁴। pH = −log[H⁺], pH + pOH = 14। दुर्बल वैद्युत-अपघट्य के लिए α ≈ √(K/C), यानी तनु करने पर α बढ़ता है (ओस्टवाल्ड तनुता नियम)। संयुग्मी युग्म के लिए Ka × Kb = Kw। दुर्बल अम्ल या क्षारक से बने लवण पानी से क्रिया करते हैं (जल-अपघटन)।
7. अपचयोपचय अभिक्रियाएँ
अपचयोपचय अभिक्रियाएँ
- रेडॉक्स अभिक्रियाओं का संतुलन: ऑक्सीकरण संख्या और अर्ध-अभिक्रिया विधि – संतुलित रेडॉक्स समीकरण में तीन चीज़ें बराबर होनी चाहिए: परमाणु, आवेश और इलेक्ट्रॉन। अपचायक के खोए इलेक्ट्रॉन = ऑक्सीकारक के पाए इलेक्ट्रॉन। ऑक्सीकरण संख्या विधि पहले संख्याओं का बदलाव बराबर करती है; अर्ध-अभिक्रिया विधि अभिक्रिया को दो हिस्सों में तोड़कर जोड़ती है। O को H₂O से और H को अम्ल में H⁺ से या क्षार में OH⁻ से संतुलित करते हैं।
- ऑक्सीकरण संख्या: नियम, गणना और रेडॉक्स के प्रकार – ऑक्सीकरण संख्या एक मान लिया गया आवेश है। हम मानते हैं कि साझा इलेक्ट्रॉन पूरे उस परमाणु को मिलते हैं जो ज़्यादा ज़ोर से खींचता है। कुछ आसान नियमों से किसी भी परमाणु की संख्या निकलती है, और सबका जोड़ उस कण के आवेश के बराबर होता है। संख्या बढ़े तो ऑक्सीकरण, घटे तो अपचयन। इसी से रेडॉक्स को संयोजन, वियोजन, विस्थापन और असमानुपातन में बाँटते हैं।
- अपचयोपचय अभिक्रियाएँ और इलेक्ट्रोड प्रक्रम – अगर ऑक्सीकरण वाला आधा और अपचयन वाला आधा अलग-अलग बीकर में रखें और तार व लवण सेतु से जोड़ें, तो इलेक्ट्रॉन तार से होकर जाते हैं। यही सेल है। अपने आयनों के घोल में रखी हर धातु एक इलेक्ट्रोड है जिसका अपना विभव है। हाइड्रोजन इलेक्ट्रोड को 0.00 V माना जाता है। मानक विभव के क्रम में लगाने पर विद्युत-रासायनिक श्रेणी बनती है, और E°सेल = E°(कैथोड) − E°(ऐनोड)।
- अपचयोपचय अभिक्रियाएँ: ऑक्सीजन से इलेक्ट्रॉन तक – पहले ऑक्सीकरण का मतलब था ऑक्सीजन जुड़ना या हाइड्रोजन हटना। अपचयन इसका उल्टा था। आज हम बड़ा विचार लेते हैं: इलेक्ट्रॉन खोना ऑक्सीकरण है और इलेक्ट्रॉन पाना अपचयन। दोनों हमेशा साथ होते हैं, इसलिए इन्हें अपचयोपचय (रेडॉक्स) अभिक्रिया कहते हैं। ज़्यादा सक्रिय धातु कम सक्रिय धातु के आयन को इलेक्ट्रॉन देती है।
8. कार्बनिक रसायन: कुछ आधारभूत सिद्धांत तथा तकनीकें
संरचना और निरूपण · नामपद्धति और समावयवता · अभिक्रिया क्रियाविधि की मूल बातें · शोधन और विश्लेषण
- कार्बनिक यौगिक: संरचना, सूत्र और वर्गीकरण – कार्बनिक रसायन कार्बन के यौगिकों का रसायन है। कार्बन के बाहरी कोश में 4 इलेक्ट्रॉन होते हैं, इसलिए वह हमेशा 4 आबंध बनाता है। इसे चतुःसंयोजकता कहते हैं। चार एकल आबंध हों तो कार्बन sp³ होता है और आकृति चतुष्फलकीय (109.5°) होती है। एक द्विआबंध हो तो sp², समतल (120°)। त्रिआबंध हो तो sp, सीधी रेखा (180°)। एक ही अणु को पूर्ण, संघनित, आबंध-रेखा और 3D वेज-डैश सूत्र से लिख सकते हैं। फिर हम यौगिकों को खुली शृंखला और वलय वाले यौगिकों में, और क्रियात्मक समूह के आधार पर परिवारों में बाँटते हैं। एक परिवार के सदस्य सजातीय श्रेणी बनाते हैं, जिनमें हर अगला सदस्य एक CH₂ से अलग होता है।
- कार्बनिक यौगिकों की IUPAC नामपद्धति और समावयवता – कार्बनिक यौगिक लाखों हैं, इसलिए हर एक का साफ़ और अलग नाम चाहिए। IUPAC पद्धति में नाम के तीन भाग हैं: मूल शब्द (मुख्य शृंखला में कार्बनों की संख्या), अनुलग्न (आबंध का प्रकार और मुख्य क्रियात्मक समूह) और पूर्वलग्न (शाखाएँ)। मुख्य समूह वाली सबसे लंबी शृंखला चुनो, ऐसे अंक दो कि मुख्य समूह और शाखाओं को सबसे छोटे अंक मिलें, और शाखाओं को वर्णक्रम में लिखो। समावयवी वे यौगिक हैं जिनका अणुसूत्र एक है पर बनावट अलग। संरचनात्मक समावयवियों में परमाणु अलग ढंग से जुड़े होते हैं (शृंखला, स्थिति, क्रियात्मक समूह, मध्यावयवता)। त्रिविम समावयवियों में जुड़ाव एक जैसा पर 3D व्यवस्था अलग होती है (ज्यामितीय सिस/ट्रांस और प्रकाशिक)।
- कार्बनिक अभिक्रिया क्रियाविधि की मूल बातें – अभिक्रिया क्रियाविधि एक-एक चरण की कहानी है: कौन-से आबंध टूटते हैं, कौन-से बनते हैं और इलेक्ट्रॉन कहाँ जाते हैं। सहसंयोजी आबंध दो तरह से टूटता है। समांश विखंडन में हर परमाणु एक इलेक्ट्रॉन लेता है और मुक्त मूलक बनते हैं। विषमांश विखंडन में एक परमाणु दोनों इलेक्ट्रॉन ले लेता है, जिससे कार्बधनायन (C पर + आवेश) और कार्बऋणायन या ऋणायन बनते हैं। इलेक्ट्रॉन की कमी वाले, इलेक्ट्रॉन ढूँढने वाले कण इलेक्ट्रॉनस्नेही हैं; इलेक्ट्रॉन देने वाले कण नाभिकस्नेही हैं। अणु के अंदर इलेक्ट्रॉनों की चाल चार प्रभाव तय करते हैं: प्रेरणिक प्रभाव (σ आबंधों पर खिंचाव), अनुनाद प्रभाव (π इलेक्ट्रॉनों का फैलना), इलेक्ट्रोमेरी प्रभाव (अभिकर्मक के हमले पर अस्थायी पूरा खिसकना) और अतिसंयुग्मन (C–H के σ इलेक्ट्रॉनों का पास के खाली p कक्षक या π आबंध में फैलना)।
- कार्बनिक यौगिकों का शोधन और विश्लेषण – प्रयोगशाला में बना या पौधे से निकाला यौगिक शुरू में शुद्ध नहीं होता। हम किसी गुण के अंतर से उसे शुद्ध करते हैं: विलेयता (क्रिस्टलन), क्वथनांक (आसवन और उसके प्रकार), ऊर्ध्वपातन, दो द्रवों में विलेयता (विभेदी निष्कर्षण) या किसी सतह पर चिपकने की ताकत (वर्णलेखन)। शुद्ध ठोस का गलनांक तीक्ष्ण होता है। फिर हम पता करते हैं कौन-से तत्व हैं (गुणात्मक विश्लेषण): कॉपर(II) ऑक्साइड से C और H, और लैसें सोडियम संगलन परीक्षण से N, S, हैलोजन और P। अंत में हम हर तत्व की मात्रा निकालते हैं (मात्रात्मक विश्लेषण): C और H के लिए लीबिग विधि, N के लिए ड्यूमा और कैल्डाल विधि, हैलोजन और S के लिए कैरिअस विधि, और ऑक्सीजन अंतर से। प्रतिशतों से मूलानुपाती सूत्र मिलता है।
9. हाइड्रोकार्बन
ऐल्केन · ऐल्कीन · ऐल्काइन · ऐरोमैटिक हाइड्रोकार्बन
- ऐल्केन – ऐल्केन ऐसे हाइड्रोकार्बन हैं जिनमें केवल एकल C–C आबंध होते हैं। इनका सामान्य सूत्र CnH2n+2 है। इन्हें ऐल्कीन में हाइड्रोजन जोड़कर, वुर्ट्ज़ अभिक्रिया से, ऐल्किल हैलाइड के अपचयन से और विकार्बोक्सिलन से बनाते हैं। ये अध्रुवीय होते हैं, जलने पर बहुत ऊष्मा देते हैं और प्रकाश में H की जगह Cl ले लेते हैं। C–C आबंध के चारों ओर घूमने से सांतरित और ग्रहणित आकार बनते हैं, जिन्हें संरूपण कहते हैं।
- ऐल्कीन – ऐल्कीन वे हाइड्रोकार्बन हैं जिनमें एक C=C द्वि-आबंध होता है; सूत्र CₙH₂ₙ। द्वि-आबंध = एक σ + एक π आबंध, इसलिए उसके आसपास अणु चपटा है और घूम नहीं सकता। इसी से समपक्ष (cis) और विपक्ष (trans) समावयवी बनते हैं। ऐल्कीन छोटे अणु (H₂O, HX, X₂) हटाकर या ऐल्काइन में आंशिक H₂ जोड़कर बनते हैं। ये मुख्य रूप से योगज अभिक्रियाएँ करते हैं: H₂, X₂, HX (मारकोनीकॉफ़ नियम, या परॉक्साइड के साथ उल्टा), पानी, ओज़ोन, KMnO₄ और बहुलकीकरण।
- ऐल्काइन – ऐल्काइन में C≡C त्रि-आबंध होता है; सूत्र CₙH₂ₙ₋₂। त्रि-आबंध के दोनों कार्बन sp संकरित हैं, इसलिए अणु सीधी रेखा है। त्रि-आबंध वाले कार्बन पर लगा H हल्का अम्लीय है, क्योंकि sp कार्बन इलेक्ट्रॉनों को कसकर पकड़ता है: NaNH₂ जैसे प्रबल क्षारक उसे हटा देते हैं। त्रि-आबंध दो बार खुल सकता है, इसलिए ऐल्काइन H₂, X₂ या HX के दो अणु जोड़ते हैं। पानी (Hg²⁺ उत्प्रेरक) से ऐल्डिहाइड या कीटोन बनते हैं, और तीन एथाइन जुड़कर बेंज़ीन बनाते हैं।
- बेंज़ीन और ऐरोमैटिकता – बेंज़ीन (C₆H₆) छह sp² कार्बनों का चपटा वलय है। इसके छह π इलेक्ट्रॉन पूरे वलय में फैले हैं, इसलिए सभी C–C आबंध बराबर हैं और वलय बहुत स्थायी है। ऐसा वलय ऐरोमैटिक कहलाता है जब वह चक्रीय, समतलीय, पूर्ण संयुग्मित हो और उसमें 4n + 2 π इलेक्ट्रॉन हों (हकेल नियम)। बेंज़ीन योग की जगह इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन (नाइट्रीकरण, हैलोजनीकरण, सल्फ़ोनीकरण, फ़्रीडेल–क्राफ़्ट्स) पसंद करती है, क्योंकि इससे स्थायी वलय बचा रहता है। वलय पर पहले से लगा समूह तय करता है कि अगला समूह ऑर्थो/पैरा जाएगा या मेटा। बेंज़ीन और संगलित-वलय हाइड्रोकार्बन विषैले हैं और कैंसर कर सकते हैं।
10. केवल रचनात्मक आकलन हेतु विषय
s- और p-ब्लॉक तत्व · गैसीय अवस्था
- s और p ब्लॉक तत्व: विन्यास और प्रवृत्तियाँ – s-ब्लॉक = समूह 1 और 2 (बाहरी विन्यास ns¹ या ns²); p-ब्लॉक = समूह 13 से 18 (ns² np¹⁻⁶)। समूह में नीचे परमाणु बड़े होते हैं और आयनन एन्थैल्पी घटती है; आवर्त में आगे परमाणु छोटे और आयनन एन्थैल्पी (कुल मिलाकर) बढ़ती है। छोटे आयनों की जलयोजन एन्थैल्पी बड़ी होती है। हर समूह का पहला तत्व अलग व्यवहार करता है (छोटा आकार, ऊँचा आवेश घनत्व, d कक्षक नहीं) और अक्सर अपने तिरछे नीचे वाले तत्व जैसा होता है।
- आदर्श गैस समीकरण: PV = nRT – बॉयल (P ∝ 1/V), चार्ल्स (V ∝ T) और आवोगाद्रो (V ∝ n) मिलकर एक नियम बनाते हैं: PV = nRT, जहाँ R = 8.314 J mol⁻¹ K⁻¹। ताप हमेशा केल्विन में। इससे मोलर द्रव्यमान M = dRT/P भी निकलता है। कम दाब और ऊँचे ताप पर वास्तविक गैसें इस नियम को मानती हैं; ऊँचे दाब या कम ताप पर विचलन होता है, जिसे Z = PV/nRT से नापते हैं।