अभिक्रिया क्रियाविधि क्या है?
कार्बनिक अभिक्रिया में मुख्य अणु क्रियाधार (substrate) और हमला करने वाला अभिकर्मक (reagent) कहलाता है। क्रियाविधि हर चरण दिखाती है: आबंध टूटना, कम समय जीने वाले अभिक्रियाशील मध्यवर्ती, और नए आबंध बनना। इलेक्ट्रॉन की चाल वक्र तीरों से: पूरा तीर एक इलेक्ट्रॉन-युग्म खिसकाता है; आधे सिर वाला 'मछली-काँटा' तीर एक इलेक्ट्रॉन।
क्रियाधार + अभिकर्मक → [मध्यवर्ती] → उत्पाद
सहसंयोजी आबंध का विखंडन
समांश विखंडन
आबंध युग्म बराबर बँटता है: हर परमाणु एक इलेक्ट्रॉन लेता है। मुक्त मूलक (अयुग्मित इलेक्ट्रॉन वाले परमाणु/समूह) बनते हैं। इसके लिए ऊष्मा या प्रकाश चाहिए; अध्रुवीय आबंध और गैस अवस्था में होता है। उदाहरण: UV में Cl–Cl → 2 Cl•।
विषमांश विखंडन
आबंध युग्म अधिक विद्युतऋणी परमाणु के पास जाता है। आयन बनते हैं। कार्बन युग्म खोए तो कार्बधनायन; कार्बन युग्म रखे तो कार्बऋणायन। ध्रुवीय आबंध और ध्रुवीय विलायक इसे बढ़ाते हैं। उदाहरण: (CH₃)₃C–Br → (CH₃)₃C⁺ + Br⁻।
अभिक्रियाशील मध्यवर्ती: कार्बधनायन, कार्बऋणायन, मुक्त मूलक
| मध्यवर्ती | आवेश / इलेक्ट्रॉन | संकरण, आकृति | स्थायित्व क्रम |
|---|---|---|---|
| कार्बधनायन C⁺ | +, C के चारों ओर 6 इलेक्ट्रॉन | sp², त्रिकोणीय समतल (खाली p कक्षक) | 3° > 2° > 1° > CH₃⁺ |
| कार्बऋणायन C⁻ | −, 8 इलेक्ट्रॉन (एक एकाकी युग्म) | sp³, पिरामिडी | CH₃⁻ > 1° > 2° > 3° |
| मुक्त मूलक C• | उदासीन, 7 इलेक्ट्रॉन | sp², लगभग समतल | 3° > 2° > 1° > CH₃• |
3° कार्बधनायन सबसे स्थायी क्यों: ऐल्किल समूह इलेक्ट्रॉन धकेलते हैं (+I) और अतिसंयुग्मन से σ इलेक्ट्रॉन बाँटते हैं, जिससे धन आवेश फैल जाता है। कार्बऋणायन में यही धकेलना ऋण आवेश और बढ़ाता है, इसलिए क्रम उलट जाता है। C=C या बेंज़ीन के पास वाले कार्बधनायन (ऐलिल, बेंज़िल) अनुनाद से और भी स्थायी हैं।
इलेक्ट्रॉनस्नेही और नाभिकस्नेही
नाभिकस्नेही (Nu:) इलेक्ट्रॉन से भरपूर, युग्म देता है: OH⁻, CN⁻, Cl⁻, RO⁻, और एकाकी युग्म वाले उदासीन अणु जैसे H₂O, NH₃, R–NH₂।
इलेक्ट्रॉनस्नेही (E⁺) इलेक्ट्रॉन की कमी वाला, युग्म लेता है: H⁺, NO₂⁺, Br⁺, कार्बधनायन, और उदासीन BF₃, AlCl₃, C=O का कार्बन।
नाभिकस्नेही इलेक्ट्रॉन-कमी वाले केंद्र पर हमला करता है; इलेक्ट्रॉनस्नेही C=C या बेंज़ीन जैसे इलेक्ट्रॉन-धनी केंद्र पर। वक्र तीर नाभिकस्नेही से इलेक्ट्रॉनस्नेही की ओर जाता है।
कार्बनिक अभिक्रियाओं के प्रकार (झलक)
प्रतिस्थापन (एक समूह दूसरे की जगह), योगज (बहु-आबंध पर परमाणु जुड़ते हैं), विलोपन (छोटा अणु निकलता है, बहु-आबंध बनता है) और पुनर्विन्यास (उसी अणु में परमाणु नए ढंग से सजते हैं)।
प्रेरणिक प्रभाव
जब σ आबंध अलग विद्युतऋणता वाले परमाणुओं को जोड़ता है, तो इलेक्ट्रॉन युग्म अधिक विद्युतऋणी की ओर खिसकता है। यह खिसकाव शृंखला में आगे जाता है पर लगभग 3 कार्बन बाद खत्म हो जाता है। यह स्थायी प्रभाव है।
- −I समूह इलेक्ट्रॉन खींचते हैं: –NO₂ > –CN > –COOH > –F > –Cl > –Br > –I > –OH > –C₆H₅।
- +I समूह इलेक्ट्रॉन धकेलते हैं: ऐल्किल समूह, (CH₃)₃C– > (CH₃)₂CH– > CH₃CH₂– > CH₃–।
उपयोग: क्लोरोऐसीटिक अम्ल ऐसीटिक अम्ल से प्रबल है, क्योंकि –Cl इलेक्ट्रॉन खींचकर ऋणायन को स्थायी बनाता है।
अनुनाद प्रभाव (मेसोमेरी प्रभाव)
जब π इलेक्ट्रॉन या एकाकी युग्म π आबंधों के पास हों (संयुग्मन), तो वे कई परमाणुओं पर फैल जाते हैं। एक लुइस संरचना काफ़ी नहीं; असली अणु कई विहित संरचनाओं का अनुनादी संकर है, जो किसी भी एक संरचना से अधिक स्थायी है (अनुनाद ऊर्जा)। बेंज़ीन में छहों C–C आबंध बराबर (139 pm)।
- +R प्रभाव: समूह π तंत्र में इलेक्ट्रॉन देता है: –OH, –OR, –NH₂, –Cl। वलय ऑर्थो और पैरा पर धनी होती है।
- −R प्रभाव: समूह π इलेक्ट्रॉन खींचता है: –NO₂, –CHO, –COOH, –CN, >C=O।
विहित संरचनाओं के नियम: परमाणुओं की जगह वही, अयुग्मित इलेक्ट्रॉन बराबर; ज़्यादा सहसंयोजी आबंध और कम आवेश-पृथक्करण वाली संरचना ज़्यादा योगदान देती है।
इलेक्ट्रोमेरी प्रभाव
यह अस्थायी प्रभाव है: जब अभिकर्मक बहु-आबंध के पास आता है, तो पूरा π युग्म एक परमाणु पर चला जाता है। अभिकर्मक हटते ही यह खत्म।
- +E: π इलेक्ट्रॉन उस परमाणु की ओर जाते हैं जिससे इलेक्ट्रॉनस्नेही जुड़ता है (जैसे ऐल्कीन पर H⁺)।
- −E: π इलेक्ट्रॉन उस परमाणु से दूर जाते हैं जिससे नाभिकस्नेही जुड़ता है (जैसे C=O पर CN⁻; इलेक्ट्रॉन O पर)।
प्रेरणिक और इलेक्ट्रोमेरी प्रभाव उलटे हों तो अभिकर्मक रहते तक इलेक्ट्रोमेरी प्रभाव जीतता है।
अतिसंयुग्मन
धनावेशित कार्बन (या C=C) के पड़ोसी कार्बन के C–H आबंध के σ इलेक्ट्रॉन खाली p कक्षक या π आबंध में फैल सकते हैं। इसे आबंध-रहित अनुनाद भी कहते हैं। जितने ज़्यादा α-हाइड्रोजन, उतना ज़्यादा अतिसंयुग्मन।
(CH₃)₃C⁺ में 9 α-H, (CH₃)₂CH⁺ में 6, CH₃CH₂⁺ में 3, CH₃⁺ में 0। यह 3° > 2° > 1° > मेथिल क्रम से मेल खाता है, और बताता है कि अधिक प्रतिस्थापित ऐल्कीन अधिक स्थायी क्यों हैं।
करके देखो
पेंसिल तोड़ने का खेल (समांश बनाम विषमांश)। फिर कागज़ पर हर कार्बधनायन के α-हाइड्रोजन गिनकर क्रम बनाओ और 3D के तीसरे चरण से मिलाओ।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- समांश: A–B → A• + B• (मछली-काँटा तीर)
- विषमांश: A–B → A⁺ + B:⁻ (B अधिक विद्युतऋणी)
- कार्बधनायन / मूलक स्थायित्व: 3° > 2° > 1° > CH₃
- कार्बऋणायन स्थायित्व: CH₃⁻ > 1° > 2° > 3°
- अतिसंयुग्मी संरचनाओं की संख्या = α-H की संख्या
- −I: –NO₂ > –CN > –COOH > –F > –Cl > –Br > –I; +I: ऐल्किल समूह
हल किए गए उदाहरण
1. UV प्रकाश में CH₃–CH₃ का विखंडन दिखाओ और उत्पादों के नाम बताओ।
पंक्ति 1: C–C अध्रुवीय है, प्रकाश ऊर्जा देता है → समांश। पंक्ति 2: CH₃–CH₃ → CH₃• + CH₃•। पंक्ति 3: दो मेथिल मुक्त मूलक, हर कार्बन के पास 7 इलेक्ट्रॉन।
2. (CH₃)₃C–Cl के विषमांश विखंडन के उत्पाद बताओ।
पंक्ति 1: Cl अधिक विद्युतऋणी है, वह युग्म लेता है। पंक्ति 2: (CH₃)₃C–Cl → (CH₃)₃C⁺ + Cl⁻। पंक्ति 3: तृतीयक-ब्यूटिल (3°) कार्बधनायन बना; यह काफ़ी स्थायी है।
3. स्थायित्व क्रम लिखो: CH₃⁺, (CH₃)₂CH⁺, (CH₃)₃C⁺, CH₃CH₂⁺।
पंक्ति 1: α-H गिनो: 0, 6, 9, 3। पंक्ति 2: ज़्यादा α-H और ज़्यादा +I ऐल्किल = ज़्यादा स्थायी। पंक्ति 3: (CH₃)₃C⁺ > (CH₃)₂CH⁺ > CH₃CH₂⁺ > CH₃⁺।
4. इलेक्ट्रॉनस्नेही या नाभिकस्नेही बताओ: NH₃, BF₃, CN⁻, NO₂⁺, H₂O, AlCl₃।
पंक्ति 1: एकाकी युग्म / ऋण आवेश → नाभिकस्नेही: NH₃, CN⁻, H₂O। पंक्ति 2: इलेक्ट्रॉन-कमी (अपूर्ण अष्टक या +) → इलेक्ट्रॉनस्नेही: BF₃, NO₂⁺, AlCl₃। पंक्ति 3: सुझाव: केंद्रीय परमाणु के चारों ओर इलेक्ट्रॉन गिनो।
5. प्रबल अम्ल कौन: CH₃COOH या ClCH₂COOH? क्यों?
पंक्ति 1: Cl का −I प्रभाव इलेक्ट्रॉन अपनी ओर खींचता है। पंक्ति 2: ClCH₂COO⁻ में ऋण आवेश फैलकर स्थायी होता है। पंक्ति 3: अधिक स्थायी ऋणायन = प्रबल अम्ल → ClCH₂COOH।
6. (CH₃)₃C⁺ और CH₃CH₂⁺ में कितनी अतिसंयुग्मी संरचनाएँ हैं?
पंक्ति 1: हर α-C–H आबंध एक संरचना देता है। पंक्ति 2: (CH₃)₃C⁺: 3 CH₃ × 3 H = 9। पंक्ति 3: CH₃CH₂⁺: 1 CH₃ × 3 H = 3।
7. प्रोपीन CH₃–CH=CH₂ पर H⁺ के हमले में इलेक्ट्रोमेरी प्रभाव दिखाओ।
पंक्ति 1: π युग्म उस कार्बन की ओर जाता है जिससे H⁺ जुड़ेगा (+E)। पंक्ति 2: H⁺ सिरे वाले CH₂ से जुड़ता है, CH₃–CH⁺–CH₃ बनता है। पंक्ति 3: यह अधिक स्थायी 2° कार्बधनायन है (1° नहीं)।
आम गलतियाँ
- वक्र तीर धन परमाणु से इलेक्ट्रॉन की ओर बनाना। तीर हमेशा इलेक्ट्रॉनों से शुरू होता है।
- कार्बऋणायन के लिए कार्बधनायन वाला क्रम लगाना। कार्बऋणायन में क्रम उलटा है: CH₃⁻ सबसे स्थायी।
- मानना कि प्रेरणिक प्रभाव शृंखला में दूर तक जाता है। लगभग 3 कार्बन बाद यह नगण्य है।
- इलेक्ट्रोमेरी प्रभाव को स्थायी कहना। यह केवल अभिकर्मक रहने तक रहता है।