हैलोऐल्केन का वर्गीकरण
हैलोऐल्केन को दो-तीन तरह से बाँटते हैं।
- हैलोजन की संख्या से: मोनो (CH₃Cl), डाइ (CH₂Cl₂), ट्राइ (CHCl₃), पॉली।
- X वाले कार्बन से: उससे जुड़े दूसरे कार्बन गिनो। 1 → प्राथमिक (1°), 2 → द्वितीयक (2°), 3 → तृतीयक (3°)।
- स्थिति से: ऐलिलिक (C=C के बगल वाले कार्बन पर X), बेंज़िलिक (बेंज़ीन वलय के बगल वाले कार्बन पर X), वाइनिलिक (सीधे C=C वाले कार्बन पर X)।
उदाहरण: CH₃CH₂Br 1°, (CH₃)₂CHBr 2°, (CH₃)₃CBr 3° है।
हैलोऐल्केन का नामकरण
सामान्य नाम में "ऐल्किल हैलाइड" कहते हैं: CH₃Cl = मेथिल क्लोराइड। IUPAC में हैलोजन पूर्वलग्न (फ़्लुओरो, क्लोरो, ब्रोमो, आयोडो) बनता है।
- हैलोजन वाली सबसे लंबी शृंखला चुनो।
- ऐसे क्रमांक दो कि पहले प्रतिस्थापी को सबसे छोटी संख्या मिले।
- पूर्वलग्न वर्णमाला (अंग्रेज़ी) क्रम में लिखो।
(CH₃)₂CHCl → 2-क्लोरोप्रोपेन। CH₃CHBrCH₂CH₃ → 2-ब्रोमोब्यूटेन। (CH₃)₃CCl → 2-क्लोरो-2-मेथिलप्रोपेन।
C–X आबंध की प्रकृति
हैलोजन कार्बन से ज़्यादा विद्युतऋणात्मक है, इसलिए कार्बन पर δ+ और X पर δ− आवेश आता है। F → Cl → Br → I जाने पर परमाणु बड़ा होता है, इसलिए आबंध लंबा और कमज़ोर होता जाता है। कमज़ोर आबंध = X आसानी से निकलता है। अतः क्रियाशीलता: R–I > R–Br > R–Cl > R–F।
हैलोऐल्केन बनाने की विधियाँ
- ऐल्कोहॉल से (सबसे अच्छी): R–OH + HCl (ZnCl₂ के साथ); R–OH + PCl₅ या PCl₃; R–OH + SOCl₂ (थायोनिल क्लोराइड) — सबसे अच्छा, क्योंकि SO₂ और HCl गैसें उड़ जाती हैं और शुद्ध R–Cl बचता है।
- ऐल्केन से: UV प्रकाश में Cl₂ (मुक्त मूलक)। मिश्रण बनता है, इसलिए प्रयोगशाला के लिए ठीक नहीं।
- ऐल्कीन से: HX जोड़ो। असममित ऐल्कीन में H उस कार्बन पर जाता है जिस पर पहले से ज़्यादा H हैं (मार्कोनीकॉफ़ नियम)। HBr और परॉक्साइड हो तो उल्टा।
- हैलोजन विनिमय: फ़िंकेल्स्टाइन (R–Cl + NaI, शुष्क ऐसीटोन → R–I; NaCl अवक्षेपित) और स्वार्ट्स (R–Br + AgF → R–F)।
भौतिक गुण
- क्वथनांक मूल ऐल्केन से ज़्यादा (अणु बड़े और ध्रुवीय)। RF से RI तक और शृंखला लंबी होने पर बढ़ता है।
- शाखन से क्वथनांक घटता है (गोल अणु का सतही संपर्क कम)।
- पानी में लगभग अघुलनशील: पानी से मज़बूत H-आबंध नहीं बना पाते। कार्बनिक विलायकों में घुलते हैं।
- ब्रोमो, आयोडो और पॉलीक्लोरो यौगिक पानी से भारी होते हैं।
रासायनिक गुण: SN1 और SN2
नाभिकस्नेही (nucleophile) इलेक्ट्रॉन-समृद्ध स्पीशीज़ है, जैसे OH⁻, CN⁻, NH₃। यह δ+ कार्बन पर हमला करके X⁻ को बाहर निकालता है। इसे नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन कहते हैं।
| SN2 | SN1 | |
|---|---|---|
| चरण | एक | दो (पहले कार्बोधनायन) |
| दर किस पर | [RX] और [Nu⁻] | केवल [RX] |
| सबसे तेज़ | CH₃X > 1° > 2° > 3° | 3° > 2° > 1° > CH₃X |
| किरेल C पर | प्रतीपन | रेसिमीकरण |
| मदद | अप्रोटिक विलायक, प्रबल Nu⁻ | ध्रुवीय प्रोटिक विलायक (पानी, ऐल्कोहॉल) |
क्यों? SN2 में नाभिकस्नेही को कार्बन के पीछे पहुँचना है, बड़े समूह रास्ता रोकते हैं। SN1 में कार्बोधनायन स्थिर होना चाहिए; ज़्यादा ऐल्किल समूह इलेक्ट्रॉन देकर उसे स्थिर करते हैं। बेंज़िलिक और ऐलिलिक हैलाइड अनुनाद के कारण आसानी से SN1 देते हैं।
अन्य: KCN से R–CN (सायनाइड), AgCN से R–NC (आइसोसायनाइड); KNO₂ से R–ONO, AgNO₂ से R–NO₂। वुर्ट्ज़ अभिक्रिया: 2R–X + 2Na → R–R + 2NaX (शुष्क ईथर)। Mg के साथ ग्रिन्यार अभिकर्मक RMgX बनता है।
ध्रुवण घूर्णकता और किरेलता
जिस कार्बन से चार अलग-अलग समूह जुड़े हों, वह किरेल (असममित) कार्बन है। ऐसा अणु और उसका दर्पण-प्रतिबिंब एक-दूसरे पर ठीक नहीं बैठते, जैसे बायाँ और दायाँ हाथ। ये प्रतिबिंबरूपी (enantiomers) हैं। एक समतल ध्रुवित प्रकाश को दाईं ओर (दक्षिण-ध्रुवण घूर्णक, +) और दूसरा बाईं ओर (वाम-ध्रुवण घूर्णक, −) उतना ही घुमाता है।
50:50 मिश्रण = रेसेमिक मिश्रण: घूर्णन कट जाते हैं, मिश्रण ध्रुवण अघूर्णक होता है। किरेल कार्बन पर SN2 से प्रतीपन (वाल्डेन प्रतीपन) और SN1 से ज़्यादातर रेसेमिक उत्पाद मिलता है।
उदाहरण: 2-ब्रोमोब्यूटेन का C2 किरेल है (H, CH₃, C₂H₅, Br)। 1-ब्रोमोब्यूटेन में कोई किरेल C नहीं।
विलोपन अभिक्रियाएँ
हैलोऐल्केन को ऐल्कोहॉली KOH के साथ गरम करो: क्षारक β-कार्बन (पड़ोसी कार्बन) से H हटाता है और α-कार्बन से X निकलता है। C=C बनता है। इसे β-विलोपन (विहाइड्रोहैलोजनन) कहते हैं।
सेत्ज़ेफ़ (ज़ैतसेव) नियम: एक से ज़्यादा ऐल्कीन बन सकें तो मुख्य उत्पाद वह होगा जिसके द्वि-आबंध वाले कार्बनों पर ज़्यादा ऐल्किल समूह हों। 2-ब्रोमोब्यूटेन से मुख्यतः ब्यूट-2-ईन।
जलीय KOH → प्रतिस्थापन (ऐल्कोहॉल)। ऐल्कोहॉली KOH → विलोपन (ऐल्कीन)।
बोर्ड परीक्षा पर ध्यान
इस इकाई के लगभग 6 अंक। आम प्रश्न: समावयवी के नाम/संरचना, SN1 या SN2 दर के क्रम में लगाना, SOCl₂ क्यों बेहतर, मुख्य उत्पाद बताना (मार्कोनीकॉफ़, सेत्ज़ेफ़), "रेसेमिक मिश्रण क्या है?"। 2 अंक वाले "कारण दीजिए" उत्तरों का अभ्यास करो।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- R–OH + SOCl₂ → R–Cl + SO₂↑ + HCl↑
- R–Cl + NaI → R–I + NaCl (Finkelstein, dry acetone)
- R–Br + AgF → R–F + AgBr (Swarts)
- SN2 rate = k[RX][Nu⁻]; SN1 rate = k[RX]
- R–X + KOH(aq) → R–OH + KX (substitution)
- R–CH₂–CH₂–X + KOH(alc) → R–CH=CH₂ + KX + H₂O (elimination)
- प्रतिबिंबरूपी आधिक्य % = (मुख्य − गौण) ÷ कुल × 100; प्रेक्षित घूर्णन = आधिक्य × शुद्ध रूप का घूर्णन
हल किए गए उदाहरण
1. CH₃CH₂CH₂Br, CH₃CHBrCH₃ और (CH₃)₃CBr को 1°, 2°, 3° में बाँटो।
Br वाले C से जुड़े कार्बन गिनो। CH₃CH₂CH₂Br: 1 → 1°। CH₃CHBrCH₃: 2 → 2°। (CH₃)₃CBr: 3 → 3°।
2. CH₃–CH(CH₃)–CH₂–CHCl–CH₃ का IUPAC नाम लिखो।
सबसे लंबी शृंखला = 5 C। दाईं ओर से क्रमांक दो ताकि Cl को 2 और CH₃ को 4 मिले: 2-क्लोरो-4-मेथिलपेंटेन (वर्णक्रम में chloro पहले)।
3. C₄H₉Br के कितने संरचनात्मक समावयवी हैं? कितने किरेल हैं?
1-ब्रोमोब्यूटेन, 2-ब्रोमोब्यूटेन, 1-ब्रोमो-2-मेथिलप्रोपेन, 2-ब्रोमो-2-मेथिलप्रोपेन = 4। केवल 2-ब्रोमोब्यूटेन के एक कार्बन पर चार अलग समूह (H, Br, CH₃, C₂H₅) हैं, इसलिए 1 किरेल।
4. SN2 दर के क्रम में लगाओ: (CH₃)₃CBr, CH₃Br, CH₃CH₂Br, (CH₃)₂CHBr।
SN2 को पीछे खुली जगह चाहिए। कम समूह = तेज़: CH₃Br > CH₃CH₂Br > (CH₃)₂CHBr > (CH₃)₃CBr।
5. एक नमूने में 80% (+) रूप और 20% (−) रूप है। शुद्ध (+) रूप +23° घुमाता है। प्रेक्षित घूर्णन निकालो।
आधिक्य = (80 − 20) = 60%। प्रेक्षित घूर्णन = 0.60 × (+23°) = +13.8°।
6. 2-ब्रोमोब्यूटेन को ऐल्कोहॉली KOH के साथ गरम करने पर मुख्य उत्पाद और कारण बताओ।
β-H, C1 और C3 पर हैं। C3 से H हटे तो ब्यूट-2-ईन (C=C पर दो ऐल्किल समूह), C1 से हटे तो ब्यूट-1-ईन। सेत्ज़ेफ़ नियम से अधिक प्रतिस्थापित ब्यूट-2-ईन मुख्य।
7. (CH₃)₃CBr पानी के साथ (SN1) CH₃CH₂Br से तेज़ क्यों?
SN1 की गति कार्बोधनायन की स्थिरता पर है। (CH₃)₃C⁺ पर तीन CH₃ इलेक्ट्रॉन देते हैं (+I प्रभाव, अतिसंयुग्मन), इसलिए यह CH₃CH₂⁺ से बहुत स्थिर है। स्थिर कार्बोधनायन → तेज़ SN1।
आम गलतियाँ
- 1°/2°/3° में हाइड्रोजन गिन लेना: C–X वाले कार्बन से जुड़े कार्बन गिनने हैं।
- क्रम उलट देना: SN2 में 1° सबसे तेज़ (कम भीड़), SN1 में 3° सबसे तेज़ (स्थिर कार्बोधनायन)।
- जलीय और ऐल्कोहॉली KOH को एक समझना: जलीय से ऐल्कोहॉल, ऐल्कोहॉली से ऐल्कीन।
- हर हैलोजन वाले यौगिक को किरेल कहना: कार्बन पर चार अलग समूह होने चाहिए।