फ़ोटॉन के रूप में प्रकाश
प्रकाश तरंग की तरह भी व्यवहार करता है और छोटे ऊर्जा पैकेटों की धारा की तरह भी, जिन्हें फ़ोटॉन कहते हैं।
- तरंग की चाल: c = fλ (c = 3.00 × 10⁸ m/s, f = आवृत्ति Hz में, λ = तरंगदैर्ध्य m में)।
- फ़ोटॉन की ऊर्जा: E = hf = hc/λ, प्लांक नियतांक h = 6.63 × 10⁻³⁴ J s।
- छोटी तरंगदैर्ध्य → ज़्यादा आवृत्ति → हर फ़ोटॉन में ज़्यादा ऊर्जा। पराबैंगनी (UV) फ़ोटॉन त्वचा को नुक़सान पहुँचा सकते हैं; अवरक्त (IR) सिर्फ़ गरम करते हैं।
दृश्य प्रकाश लगभग 400 nm (बैंगनी) से 700 nm (लाल) तक होता है।
उत्सर्जन और अवशोषण स्पेक्ट्रम
परमाणु में इलेक्ट्रॉनों की केवल कुछ तय ऊर्जाएँ हो सकती हैं, जिन्हें ऊर्जा स्तर कहते हैं। जब इलेक्ट्रॉन ऊँचे स्तर से नीचे गिरता है, तो वह एक फ़ोटॉन छोड़ता है जिसकी ऊर्जा ΔE = hf, यानी दोनों स्तरों का अंतर।
- उत्सर्जन स्पेक्ट्रम: काली पृष्ठभूमि पर चमकीली रंगीन रेखाएँ (गरम गैस से)।
- अवशोषण स्पेक्ट्रम: इंद्रधनुष पर काली रेखाएँ, जहाँ गैस ने ठीक वही फ़ोटॉन सोख लिए।
दोनों में रेखाएँ एक ही तरंगदैर्ध्य पर होती हैं। हर तत्व का अपना पैटर्न है, जैसे सोडियम लैंप की पीली रेखाएँ; हीलियम पहली बार सूर्य के स्पेक्ट्रम में ही मिला था।
घोल का रंग और तरंगदैर्ध्य चुनना
घोल रंगीन दिखता है क्योंकि वह कुछ तरंगदैर्ध्य सोखता है और बाकी आगे जाने देता है। हमें जो रंग दिखता है वह सोखे गए रंग का पूरक रंग है (रंग-चक्र पर सामने वाला)।
- नीला कॉपर(II) सल्फ़ेट नारंगी-लाल प्रकाश सोखता है।
- बैंगनी पोटैशियम परमैंगनेट हरा-पीला प्रकाश (लगभग 525 nm) सोखता है।
मापने के लिए हम वह तरंगदैर्ध्य चुनते हैं जिसे घोल सबसे ज़्यादा सोखता है, इसे λmax कहते हैं। रंगीन फ़िल्टर या मोनोक्रोमेटर इसे चुनता है। रंगीन प्रकाश मिलाने पर रंग जुड़ते हैं (योगात्मक मिश्रण); पेंट और फ़िल्टर रंग घटाते हैं (व्यवकलनात्मक मिश्रण)।
स्पेक्ट्रोफ़ोटोमीटर: पारगम्यता और अवशोषकता
स्पेक्ट्रोफ़ोटोमीटर में एक लैंप, तरंगदैर्ध्य चुनने वाला भाग, नमूने का पात्र क्युवेट (आमतौर पर 1 cm चौड़ा) और एक डिटेक्टर होता है।
- I₀ = अंदर जाता प्रकाश, I = बाहर आता प्रकाश।
- पारगम्यता T = I/I₀ (अक्सर % में)।
- अवशोषकता A = log₁₀(I₀/I) = −log₁₀ T। A की कोई इकाई नहीं।
A = 0 यानी सारा प्रकाश पार; A = 1 यानी 10% पार; A = 2 यानी 1% पार। पहले मशीन को ब्लैंक (सिर्फ़ विलायक वाला क्युवेट) से शून्य किया जाता है।
बियर-लैम्बर्ट नियम और अंशांकन वक्र
A = ε l c
- ε = मोलर अवशोषकता गुणांक (L mol⁻¹ cm⁻¹): उस तरंगदैर्ध्य पर पदार्थ कितनी ज़ोर से सोखता है।
- l = नमूने में प्रकाश का पथ (cm)।
- c = सांद्रता (mol/L)।
अंशांकन वक्र (calibration curve): ज्ञात c वाले 4–6 मानक घोल बनाइए, λmax पर हर एक का A मापिए और A बनाम c का ग्राफ़ बनाइए। सबसे अच्छी रेखा शून्य से गुज़रती है। अज्ञात घोल का A मापकर रेखा से c पढ़िए। उत्तर अनिश्चितता के साथ लिखिए, जैसे c = 0.60 ± 0.02 mmol/L। यह नियम पतले घोलों में सबसे अच्छा चलता है (A लगभग 1.5 से कम); ज़्यादा सांद्रता पर रेखा मुड़ जाती है।
अवरक्त (IR) स्पेक्ट्रोस्कोपी संक्षेप में
IR फ़ोटॉन में इलेक्ट्रॉन हिलाने लायक ऊर्जा नहीं होती, पर वे बंधों को कंपन कराते हैं। हर बंध अपनी तरंग-संख्या (cm⁻¹) पर सोखता है:
- O–H (ऐल्कोहॉल): 3200–3550 cm⁻¹ के पास चौड़ा बैंड।
- C=O (कीटोन, अम्ल, एस्टर): 1700 cm⁻¹ के पास तेज़, पतला बैंड।
- C–H: 2850–3000 cm⁻¹ के पास।
इसलिए IR स्पेक्ट्रम बताता है कि अणु में कौन-से क्रियात्मक समूह हैं।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- c = fλ
- E = hf = hc/λ
- ΔE = E(ऊँचा) − E(नीचा) = hf
- T = I/I₀
- A = log₁₀(I₀/I) = −log₁₀ T
- A = ε l c (बियर-लैम्बर्ट नियम)
हल किए गए उदाहरण
1. 500 nm तरंगदैर्ध्य वाले फ़ोटॉन की ऊर्जा निकालिए।
E = hc/λ = (6.63 × 10⁻³⁴ × 3.00 × 10⁸) / (500 × 10⁻⁹) = 3.98 × 10⁻¹⁹ J।
2. नमूने में 100 इकाई प्रकाश जाता है और 25 इकाई बाहर आता है। T और A निकालिए।
T = 25/100 = 0.25 (25%)। A = log₁₀(100/25) = log₁₀ 4 = 0.60।
3. 1 cm क्युवेट में घोल का A = 0.45 है। ε = 1500 L mol⁻¹ cm⁻¹। c निकालिए।
c = A/(εl) = 0.45/(1500 × 1) = 3.0 × 10⁻⁴ mol/L।
4. वही घोल 2 cm क्युवेट में रखा गया। अब A कितना होगा?
A, l के समानुपाती है, इसलिए A दोगुना: 0.90।
5. मानक घोल c = 1, 2, 4 mg/L पर A = 0.10, 0.20, 0.40 देते हैं। अज्ञात का A = 0.30 है। c निकालिए।
ढाल = 0.10 प्रति mg/L। c = 0.30/0.10 = 3 mg/L।
6. इलेक्ट्रॉन 3.0 × 10⁻¹⁹ J अंतर वाले स्तरों के बीच गिरता है। फ़ोटॉन की तरंगदैर्ध्य निकालिए।
λ = hc/ΔE = (6.63 × 10⁻³⁴ × 3.00 × 10⁸)/(3.0 × 10⁻¹⁹) = 6.63 × 10⁻⁷ m = 663 nm (लाल)।
आम गलतियाँ
- यह सोचना कि नीला घोल नीला प्रकाश सोखता है। वह नीला आगे जाने देता है और नारंगी सोखता है।
- T और A को उलझाना: ज़्यादा अवशोषकता यानी कम पारगम्यता।
- E = hc/λ में nm को m में न बदलना (1 nm = 10⁻⁹ m)।
- बहुत गाढ़े घोल पर बियर-लैम्बर्ट नियम लगाना, जहाँ ग्राफ़ सीधा नहीं रहता, या ब्लैंक से शून्य करना भूल जाना।