नए विचारों का समय (छठी सदी ई.पू.)
छठी सदी ई.पू. के आसपास का समय एक मोड़ था। ईरान में ज़रथुस्त्र, चीन में खुंग त्सी (कन्फ़्यूशियस) और यूनान में सुकरात लगभग इसी समय के हैं। भारत में भी कई नए गुरु आए।
पुरानी परंपराएँ
- वैदिक यज्ञ: शुरू में घर के लोग यज्ञ करते; बड़े यज्ञ (जैसे राजसूय और अश्वमेध) सरदार और राजा ब्राह्मण पुरोहितों से करवाते।
- उपनिषद: विचारकों ने जीवन का अर्थ, आत्मा (आत्मन्), ब्रह्मांड (ब्रह्म) और पुनर्जन्म पर सवाल पूछे।
वाद-विवाद
गुरु घूमते और कुटागारशाला (नुकीली छत वाली झोपड़ी) या उपवनों में बहस करते थे। कुछ, जैसे नियतिवादी (सब पहले से तय है) और भौतिकवादी (मृत्यु के बाद कुछ नहीं), वैदिक विचारों के ख़िलाफ़ बोलते थे। बौद्ध ग्रंथ 64 संप्रदायों का ज़िक्र करते हैं।
जैन धर्म: महावीर का संदेश
वर्धमान महावीर 24वें तीर्थंकर ('जो लोगों को संसार रूपी नदी पार कराए') थे। जैन विचार उनसे पहले भी थे।
- पूरा संसार जीवित है: पत्थर, चट्टान और पानी में भी जीवन है।
- कीड़ों और पौधों समेत सब जीवों के प्रति अहिंसा सबसे ज़रूरी है।
- जन्म-पुनर्जन्म का चक्र कर्म से बनता है। इससे छूटने के लिए इच्छाएँ छोड़नी और कठोर अनुशासन अपनाना होता है।
- पाँच व्रत: हत्या न करना, चोरी न करना, झूठ न बोलना, संपत्ति न रखना और ब्रह्मचर्य (संयम)।
व्यापारियों के सहयोग से जैन धर्म भारत के कई भागों में फैला। जैन विद्वानों ने प्राकृत, संस्कृत और तमिल में लिखा, और जैन मूर्तियाँ व मंदिर बने।
बुद्ध और संघ
शाक्य राजकुमार सिद्धार्थ बूढ़े, रोगी, शव और संन्यासी को देखकर विचलित हुए। उन्होंने महल छोड़ा, कठोर उपवास आज़माया, फिर मध्यम मार्ग चुना और ज्ञान पाया। तब वे बुद्ध यानी ज्ञानी कहलाए।
उनकी शिक्षाएँ
- संसार लगातार बदलता है (अनिच्च); कुछ भी स्थायी नहीं।
- जीवन में दुख (दुक्ख) है, जिसका कारण इच्छा है। इच्छा ख़त्म, तो दुख ख़त्म।
- अति सुख और अति कष्ट के बीच संयम का रास्ता अपनाओ।
- कर्मकांड से ज़्यादा दया और अच्छा आचरण ज़रूरी; उन्होंने ईश्वर पर चर्चा नहीं की।
- लक्ष्य निब्बान है, यानी अहं और इच्छा का अंत।
ये शिक्षाएँ त्रिपिटक ('तीन टोकरियाँ') में संकलित हुईं: विनय पिटक (भिक्खुओं के नियम), सुत्त पिटक (उपदेश) और अभिधम्म पिटक (दर्शन)।
संघ
बुद्ध ने संघ बनाया, भिक्खुओं का समूह जो भिक्षा पर सादा जीवन जीते थे। बाद में आनंद के कहने पर स्त्रियाँ भिक्खुनी बनकर आईं; बुद्ध की धाय माँ महापजापति गोतमी पहली थीं। सदस्य हर पृष्ठभूमि से थे (राजा, धनी, मज़दूर, दास)। संघ में सब बराबर थे।
स्तूप और बौद्ध मूर्तिकला
स्तूप क्यों?
कुछ स्थान बुद्ध के जीवन से पवित्र बने: लुंबिनी (जन्म), बोधगया (ज्ञान), सारनाथ (पहला उपदेश) और कुशीनगर (मृत्यु, महापरिनिब्बान)। बुद्ध के अवशेष टीलों में गाड़े गए जिन्हें स्तूप कहते हैं। कहा जाता है अशोक ने कई जगह स्तूप बनवाए।
स्तूप के भाग
- अंड: मिट्टी का आधा गोल टीला, अंदर अवशेष।
- हर्मिका: ऊपर छज्जे जैसा चबूतरा, देवताओं का निवास।
- यष्टि और छत्री: छतरियों वाला डंडा।
- वेदिका: पवित्र स्थान को अलग करने वाला घेरा।
- तोरण: साँची में चार नक़्क़ाशीदार द्वार। भक्त पूर्वी द्वार से आकर दक्षिणावर्त प्रदक्षिणा करते थे।
स्तूप राजाओं, व्यापारियों, शिल्पियों (जैसे हाथीदाँत कारीगर), भिक्खुओं और भिक्खुनियों के दान से बने, जिनके नाम अभिलेखों में हैं।
साँची कैसे बचा
अमरावती का स्तूप 19वीं सदी में तोड़ा गया और उसके टुकड़े अलग-अलग जगह ले जाए गए। साँची बच गया: भोपाल की शासक शाहजहाँ बेगम और सुल्तान जहाँ बेगम ने इसके संरक्षण के लिए धन दिया, और एच.एच. कोल ने स्मारकों को उनकी जगह पर रखने की बात कही।
मूर्तिकला पढ़ना
आरंभिक मूर्तिकारों ने प्रतीक बनाए: ख़ाली आसन (ध्यान), स्तूप (महापरिनिब्बान), चक्र (सारनाथ में पहला उपदेश), पेड़ (ज्ञान)। द्वारों पर जातक कथाएँ (बुद्ध के पिछले जन्म) खुदी हैं। लोक परंपराएँ भी दिखती हैं: शालभंजिका (पेड़ की डाल पकड़े स्त्री, उर्वरता का प्रतीक), हाथी और सर्प।
नई धार्मिक परंपराएँ
महायान बौद्ध धर्म
ईसवी सदी की शुरुआत तक बुद्ध को उद्धारक माना जाने लगा। बोधिसत्व दयालु प्राणी माने गए जो दूसरों को निर्वाण तक पहुँचाने में मदद करते हैं। बुद्ध की मूर्तियाँ बनीं (मथुरा और तक्षशिला)। इस नए रास्ते को महायान ('बड़ा वाहन') कहा गया; पुराने रास्ते को उन्होंने हीनयान ('छोटा वाहन') कहा, जबकि उसके अनुयायी उसे थेरवाद कहते थे।
पौराणिक हिंदू धर्म
वैष्णव (विष्णु मुख्य देवता, अवतारों के साथ) और शैव (शिव, अक्सर लिंग रूप में) परंपराएँ बढ़ीं। पुराणों ने सरल संस्कृत में कहानियाँ कहीं, जो स्त्रियों और शूद्रों समेत सबके लिए थीं।
मंदिर
आरंभिक मंदिरों में एक छोटा चौकोर कमरा, गर्भगृह, था, जिसके दरवाज़े से पूजा होती। बाद में ऊपर ऊँचा शिखर जुड़ा। उदाहरण: देवगढ़ (उत्तर प्रदेश, पाँचवीं सदी ई.), बराबर जैसी चट्टान काटकर बनी गुफाएँ (आजीविकों के लिए), एलोरा का कैलाशनाथ मंदिर (आठवीं सदी)।
अपरिचित को समझना
19वीं सदी के यूरोपीय विद्वान अक्सर भारतीय मूर्तियों को यूनानी कला से मापते थे। आज इतिहासकार ग्रंथों की मदद से मूर्तियाँ समझते हैं, और जहाँ ग्रंथ नहीं हैं वहाँ सावधान रहते हैं।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- तीर्थंकर = संसार-नदी पार कराने वाले जैन गुरु (महावीर = 24वें)
- अहिंसा = सब जीवों के प्रति अहिंसा
- मध्यम मार्ग = सुख और कष्ट की अति से बचना
- त्रिपिटक = विनय + सुत्त + अभिधम्म
- संघ = भिक्खुओं और भिक्खुनियों का समुदाय
- स्तूप = अंड + हर्मिका + छत्री + वेदिका + तोरण
- प्रदक्षिणा = पवित्र स्थान के चारों ओर दक्षिणावर्त चलना
- महायान = बुद्ध उद्धारक, बोधिसत्व, मूर्तियाँ
हल किए गए उदाहरण
1. छठी सदी ई.पू. के आसपास इतने नए विचार क्यों आए?
चरण 1: नए राज्य और नगर बढ़ रहे थे, जिनसे नए सवाल उठे। चरण 2: कुछ लोग महँगे वैदिक यज्ञों से असंतुष्ट थे। चरण 3: विचारक घूमते और खुली सभाओं में बहस करते थे। इसलिए महावीर और बुद्ध जैसे गुरुओं को श्रोता मिले।
2. पूजा में स्तूप का उपयोग कैसे होता है, समझाओ।
चरण 1: बुद्ध के अवशेष अंड के अंदर रखे जाते हैं। चरण 2: भक्त तोरण से प्रवेश करते हैं। चरण 3: वेदिका के रास्ते टीले के चारों ओर दक्षिणावर्त प्रदक्षिणा करते हैं। चरण 4: द्वारों की नक़्क़ाशी बुद्ध के जीवन और पिछले जन्मों की याद दिलाती है।
3. बिना मानव आकृति वाले पट्ट में बुद्ध की उपस्थिति कैसे पता चले?
प्रतीक उनका स्थान लेते हैं: ख़ाली आसन मतलब ध्यान, चक्र मतलब पहला उपदेश, पेड़ मतलब ज्ञान, स्तूप मतलब महापरिनिब्बान। बुद्ध के जीवन के ग्रंथ इतिहासकारों को ये प्रतीक पढ़ने में मदद करते हैं।
4. महायान आरंभिक बौद्ध धर्म से कैसे अलग था?
आरंभिक बौद्ध धर्म में निब्बान अपने प्रयास से मिलता था और प्रतीक चलते थे। महायान ने बुद्ध को उद्धारक माना, उनकी और बोधिसत्वों की मूर्तियों की पूजा की और उनसे मदद में विश्वास किया।
आम गलतियाँ
- मानना कि महावीर ने जैन धर्म की स्थापना की। वे 24वें तीर्थंकर थे; परंपरा पुरानी है।
- कहना कि आरंभिक बौद्ध कला में बुद्ध को मानव रूप में दिखाया गया। पहले प्रतीक थे; मूर्तियाँ बाद में आईं।
- अंड और हर्मिका को मिलाना। अंड गुंबद है; हर्मिका ऊपर का छोटा चबूतरा।
- सोचना कि संघ केवल पुरुषों का था। स्त्रियाँ भिक्खुनी बनकर शामिल हुईं।