मूल विचार: इमारत खड़ी कैसे रहती है
स्थापत्य (architecture) यानी इमारतों की योजना बनाने और उन्हें बनाने की कला और विज्ञान। हर इमारत को अपना भार उठाना होता है और खुली जगह को ढकना होता है।
स्तंभ-धरन (ट्रेबीट शैली)
दो खड़े खंभों पर एक सीधी धरन (लिंटल) रखी जाती है। यह आसान और मज़बूत है, पर पत्थर की धरन छोटी दूरी ही पाट सकती है। इसलिए पुराने मंदिर-मंडपों में बहुत खंभे होते हैं।
मेहराब और गुंबद (आर्कुएट शैली)
मेहराब फान जैसे पत्थरों से बनती है। सबसे ऊपर का पत्थर कुंजी पत्थर (keystone) है। भार किनारों से होकर नीचे दीवारों में जाता है, इसलिए मेहराब चौड़ी जगह पाट लेती है। मेहराब को गोल घुमाओ तो गुंबद बनता है। भारत में सच्ची मेहराब और गुंबद लगभग 13वीं सदी से आम हुए।
मुख्य शैलियाँ
- बौद्ध: स्तूप, चैत्य (प्रार्थना-कक्ष), विहार (मठ); कई चट्टान काटकर बने।
- हिंदू मंदिर: नागर, द्रविड़ और वेसर।
- इंडो-इस्लामिक: मेहराब, गुंबद, मीनार, जाली और बाग।
- किले और महल, बावड़ियाँ और औपनिवेशिक इमारतें।
स्तूप और शैलकृत गुफाएँ
स्तूप बुद्ध या किसी महान गुरु के अवशेषों पर बना ठोस टीला है। इसके भाग:
- अंड: अर्धगोल गुंबद।
- हर्मिका: ऊपर रेलिंग वाला छोटा डिब्बा।
- छत्र: डंडे पर छतरी जैसी तश्तरियाँ, सम्मान का चिह्न।
- वेदिका: चारों ओर की रेलिंग, और घूमने के लिए प्रदक्षिणा पथ।
- तोरण: नक्काशीदार द्वार, अक्सर चार।
साँची का महान स्तूप अशोक के समय (तीसरी सदी ई.पू.) में शुरू हुआ। कारीगरों ने चट्टान में सीधे कक्ष भी काटे, जैसे अजंता और कार्ले। एलोरा का कैलाश मंदिर पहाड़ी को ऊपर से नीचे की ओर काटकर मूर्ति की तरह बनाया गया।
मंदिर शैलियाँ: नागर, द्रविड़ और वेसर
हर हिंदू मंदिर में मुख्य मूर्ति वाला छोटा अँधेरा कक्ष गर्भगृह, एक सभा-कक्ष मंडप और गर्भगृह के ऊपर एक ऊँचा भाग होता है।
| नागर (उत्तर) | द्रविड़ (दक्षिण) | |
|---|---|---|
| ऊपरी भाग | घुमावदार शिखर, ऊपर गोल धारीदार पत्थर (आमलक) और कलश | सीढ़ीदार, पिरामिड जैसा विमान |
| द्वार | प्रायः बड़ा द्वार नहीं | ऊँचा गोपुरम, बाद के मंदिरों में विमान से भी ऊँचा |
| दीवार | प्रायः घेरने वाली दीवार नहीं | बड़े आँगन के चारों ओर ऊँची दीवारें, अक्सर जलकुंड |
| उदाहरण | खजुराहो, कोणार्क, मोढेरा | बृहदीश्वर (तंजावुर), मीनाक्षी (मदुरै) |
वेसर शैली दोनों का मेल है और दक्कन के कुछ हिस्सों में, जैसे होयसल मंदिरों में, दिखती है। द्रविड़ विचार दक्षिण-पूर्व एशिया तक गए; कंबोडिया का अंगकोर वाट सीढ़ीदार मंदिर-पर्वत योजना दिखाता है।
मस्जिदें, मकबरे और किले
लगभग 1200 ई. से कारीगरों ने कुंजी पत्थर वाली सच्ची मेहराब, बड़े गुंबद, ऊँची मीनारें, पत्थर की जाली, सुलेख और रंगीन पत्थर जड़ने की कला (पच्चीकारी) अपनाई। मकबरे चारबाग में बनाए गए: पानी की नालियों से चार भागों में बँटा बाग। उदाहरण: कुतुब मीनार, हुमायूँ का मकबरा, ताजमहल (1632–1653)।
किले रक्षा और शासन के लिए बने: मोटी दीवारें, गोल बुर्ज (bastion), कीलों वाले मज़बूत द्वार, पानी भरी खाई (moat), और पहाड़ी या रेगिस्तान जैसे प्राकृतिक पहरेदार। उदाहरण: चित्तौड़गढ़, गोलकोंडा, मेहरानगढ़, लाल किला।
नगर योजना की परंपरा
हड़प्पा के नगरों (लगभग 2600–1900 ई.पू.) में सड़कें एक-दूसरे को समकोण पर काटती थीं, पक्की ईंटों के घर थे और ढकी नालियाँ थीं। बाद में वास्तु और शिल्प शास्त्रों ने जगह, दिशा और माप के नियम दिए। मदुरै जैसे मंदिर-नगर मंदिर के चारों ओर घेरों में बढ़े। जयपुर (1727 में बसा) चौड़ी सड़कों और खंडों की जाली (grid) पर बना। प्रोजेक्ट: अपने पास के किसी मंदिर या पुराने मोहल्ले का नक्शा बनाओ और गलियाँ, पानी का स्रोत और मुख्य इमारत दिखाओ।
आज विरासत क्यों ज़रूरी है
पुरानी इमारतें बताती हैं कि लोग कैसे रहते, सोचते, व्यापार करते और बनाते थे। ये पर्यटन और शिल्प से रोज़गार देती हैं और समझदार विचार सिखाती हैं: मोटी दीवारें और जालियाँ कमरे ठंडे रखती हैं, बावड़ियाँ पानी जमा करती हैं। भारत के कई स्थल यूनेस्को विश्व धरोहर हैं। खतरे: प्रदूषण, भीड़, लापरवाह मरम्मत और पास में नई इमारतें। हम मदद कर सकते हैं: दीवारों पर न लिखें, कचरा न फैलाएँ, नियम मानें और अपने पास के स्मारक की कहानी जानें।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- ट्रेबीट = खंभा + धरन (सीधी बीम) → छोटी दूरी, बहुत खंभे
- आर्कुएट = कुंजी पत्थर वाली मेहराब / गुंबद → चौड़ी दूरी
- स्तूप = अंड + हर्मिका + छत्र + वेदिका + तोरण
- मंदिर = गर्भगृह + मंडप + शिखर या विमान
- नागर: घुमावदार शिखर, उत्तर | द्रविड़: सीढ़ीदार विमान + गोपुरम, दक्षिण | वेसर: मेल
- इंडो-इस्लामिक: सच्ची मेहराब + गुंबद + मीनार + जाली + चारबाग
- किला: दीवार + बुर्ज + द्वार + खाई
हल किए गए उदाहरण
1. एक मंदिर में गर्भगृह के ऊपर सीढ़ीदार ऊँचा भाग, दीवारों से घिरा आँगन और बहुत बड़ा प्रवेश-द्वार है। कौन-सी शैली है?
द्रविड़। सीढ़ीदार भाग विमान है और प्रवेश का ऊँचा भाग गोपुरम है; आँगन के चारों ओर दीवारें भी द्रविड़ शैली की पहचान हैं।
2. पुराने पत्थर के मंडपों में इतने खंभे क्यों होते हैं, जबकि ताजमहल में गुंबद के नीचे बड़ा खुला कक्ष है?
पत्थर की सीधी धरन लंबी होने पर टूट जाती है, इसलिए खंभे पास-पास चाहिए। गुंबद गोल घूमी कई मेहराबों जैसा है: वह भार को किनारों से मोटी दीवारों में भेजता है, इसलिए बिना खंभों के बड़ा कक्ष ढक लेता है।
3. स्तूप के भाग ऊपर से नीचे बताओ।
छत्र → हर्मिका → अंड → आधार; चारों ओर प्रदक्षिणा पथ, वेदिका (रेलिंग) और तोरण।
4. एक नगर में सड़कें समकोण पर कटती हैं और नालियाँ ढकी हैं। यह किस परंपरा से सबसे ज़्यादा मेल खाता है?
हड़प्पा की नगर योजना से; बाद में जयपुर भी जाली (grid) योजना पर बना।
आम गलतियाँ
- हर ऊँचे भाग को शिखर कहना। दक्षिण में गर्भगृह के ऊपर विमान होता है और प्रवेश का ऊँचा भाग गोपुरम।
- स्तूप को मंदिर की तरह खोखला समझना। यह ठोस टीला है; लोग इसके चारों ओर घूमते हैं, अंदर नहीं जाते।
- मेहराब और धरन को एक मानना। धरन सीधी बीम है; मेहराब घुमावदार और फान जैसे पत्थरों से बनी होती है।
- विरासत को केवल दूर की बड़ी इमारतें मानना। पास के कुएँ, द्वार और पुराने घर भी विरासत हैं।