CBSE कक्षा 12 भारत की ज्ञान परंपराएँ एवं प्रथाएँ
अध्याय: 8
1. कृषि: एक सर्वेक्षण
कृषि: एक सर्वेक्षण
- पारंपरिक कृषि: खेती का ज्ञान और तरीके – हज़ारों सालों तक किसानों ने मिट्टी, पानी, मौसम, पौधों और पशुओं को देखकर गहरा ज्ञान बनाया। पारंपरिक तरीके: पहाड़ी ढलान पर सीढ़ीदार खेत ताकि मिट्टी न बहे; मिश्रित और अंतर-फ़सल (ऊँचे अनाज के साथ नीची दालें, या मक्का-सेम-कद्दू की 'तीन बहनें'); फ़सल चक्र और परती से मिट्टी की उर्वरता लौटाना (दालें नाइट्रोजन जोड़ती हैं); तालाब, बावड़ी, चेक डैम और भूमिगत नालियों से जल संचयन; गोबर, कम्पोस्ट और हरी खाद; नीम और राख से कीट नियंत्रण; स्थानीय बीज बचाना और बाँटना; बैल और लकड़ी का हल, सीड ड्रिल, हँसिया जैसे औज़ार; और बादल, हवा, तारों को देखकर बुवाई का समय तय करना। कृषि पराशर और वृक्षायुर्वेद जैसे ग्रंथों में यह ज्ञान लिखा गया। लाभ: कम लागत, टिकाऊ, स्थानीय परिस्थिति के अनुकूल। सीमाएँ: कम उपज, ज़्यादा मेहनत। आज वैज्ञानिक दोनों का मेल करते हैं।
2. स्थापत्य: एक सर्वेक्षण
स्थापत्य: एक सर्वेक्षण
- भारतीय स्थापत्य कला: स्तूप, मंदिर, गुंबद और किले – भारतीय इमारतों में खाली जगह ढकने के दो मूल तरीके हैं: खंभों पर सीधी धरन (स्तंभ-धरन या ट्रेबीट शैली) और मेहराब व गुंबद (आर्कुएट शैली)। स्तूप अवशेषों पर बना ठोस अर्धगोल टीला है। मंदिरों की दो बड़ी शैलियाँ बनीं: नागर (उत्तर, घुमावदार शिखर) और द्रविड़ (दक्षिण, सीढ़ीदार विमान और गोपुरम); बीच में मिली-जुली वेसर शैली। मस्जिदों और मकबरों में सच्ची मेहराब, बड़ा गुंबद, मीनार और चारबाग आए। किलों में मोटी दीवारें, बुर्ज, द्वार और खाई होती थी। हड़प्पा से जयपुर तक नगर योजना से बसाए गए। यह सब हमारी विरासत है, जिसे आज बचाना ज़रूरी है।
3. नृत्य: एक सर्वेक्षण
नृत्य: एक सर्वेक्षण
- भारतीय शास्त्रीय नृत्य – भारतीय शास्त्रीय नृत्य की जड़ें नाट्य शास्त्र (भरत मुनि, लगभग 2,000 साल पुराना) और अभिनय दर्पण (नंदिकेश्वर) में हैं। हर शैली में तीन भाग होते हैं: नृत्त (सिर्फ़ ताल और चाल), नृत्य (भाव के साथ नाच) और नाट्य (नाटक)। आठ शैलियाँ प्रमुख मानी जाती हैं: भरतनाट्यम, कथक, कथकली, कुचिपुड़ी, ओडिसी, मणिपुरी, मोहिनीअट्टम और सत्रिया। नर्तक चार तरह के अभिनय (आंगिक, वाचिक, आहार्य, सात्त्विक) से भाव दिखाता है, ताकि दर्शक नौ में से कोई रस महसूस करे।
4. शिक्षा प्रणालियाँ और प्रथाएँ: एक सर्वेक्षण
शिक्षा प्रणालियाँ और प्रथाएँ
- प्राचीन भारतीय शिक्षा: गुरुकुल, बड़े ज्ञान केंद्र और शिक्षण विधियाँ – प्राचीन भारत में बच्चे अक्सर गुरु के साथ गुरुकुल में रहकर पढ़ते थे: छोटा समूह, हर छात्र पर ध्यान, रोज़ के काम और कोई तय फ़ीस नहीं; अंत में धन्यवाद के रूप में गुरु-दक्षिणा। पढ़ाई ज़्यादातर मौखिक थी। सीखने के तीन चरण थे: श्रवण (सुनना), मनन (सोचना और सवाल करना) और निदिध्यासन (गहराई से आत्मसात करना)। शास्त्रार्थ, प्रश्नोत्तर और करके सीखना आम थे। भाषा, व्याकरण, गणित, खगोल, चिकित्सा से लेकर तर्क, कला, शिल्प और शासन तक पढ़ाया जाता था। तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला और वलभी जैसे बड़े केंद्रों में पूरे एशिया से छात्र आते थे, बड़े पुस्तकालय थे और द्वार पर परीक्षा होती थी।
5. नीतिशास्त्र: व्यक्तिगत और सामाजिक
नीतिशास्त्र: व्यक्तिगत और सामाजिक
- नीतिशास्त्र: कैसे तय करें कि क्या सही है – नीतिशास्त्र (नैतिक दर्शन) पूछता है कि हमें क्या करना चाहिए और क्यों। ईमानदारी, दया, न्याय और सम्मान जैसे मूल्य चुनाव में राह दिखाते हैं। तीन मुख्य सिद्धांत: परिणाम (उपयोगितावाद, बेंथम और मिल: ज़्यादा से ज़्यादा लोगों का ज़्यादा भला), कर्तव्य (कांट: ऐसा नियम अपनाओ जो सब अपना सकें; लोगों को साध्य मानो, सिर्फ़ साधन नहीं) और सद्गुण (अरस्तू: अच्छा चरित्र बनाओ; सद्गुण दो अतियों का मध्य है)। अंतरात्मा सही-ग़लत की भीतरी समझ है। स्वतंत्रता ज़िम्मेदारी लाती है। अधिनीतिशास्त्र पूछता है "अच्छा" का अर्थ क्या है और मूल्य सार्वभौमिक हैं या सापेक्ष। व्यावहारिक नीतिशास्त्र पर्यावरण, पशु, काम, मित्रता और शांति पर लागू होता है।
6. युद्ध कला परंपराएँ: एक सर्वेक्षण
युद्ध कला परंपराएँ
- भारतीय युद्ध कला परंपराएँ: शैलियाँ, प्रशिक्षण और फ़ायदे – भारत में कई क्षेत्रीय युद्ध कलाएँ हैं। कलरीपयट्टु (केरल) का अभ्यास कलरी में शरीर-व्यायाम, लाठी, धातु के हथियार और खाली हाथ की लड़ाई के चरणों में होता है, और इसमें उपचार भी सिखाया जाता है। सिलंबम (तमिलनाडु) में बाँस की लाठी, गतका (पंजाब) में लकड़ी की तलवार-लाठी और ढाल, थांग-ता (मणिपुर) में तलवार और भाला, मर्दानी खेल (महाराष्ट्र) में लंबी पट्टा तलवार, मल्लखंब में खंभे या रस्सी पर व्यायाम, कुश्ती अखाड़े में और लाठी खेला लाठी से होता है। सब मुद्रा, संतुलन और साँस पर नियंत्रण से शुरू होती हैं और अनुशासन व गुरु-सम्मान पर ज़ोर देती हैं। आज इनका अभ्यास फ़िटनेस, आत्मरक्षा, प्रदर्शन, खेल और सांस्कृतिक विरासत के लिए होता है।
7. भाषा और व्याकरण
भाषा और व्याकरण
जल्द आ रहा है
8. अन्य प्रौद्योगिकियाँ: एक सर्वेक्षण
अन्य प्रौद्योगिकियाँ
- भारतीय ज्ञान परंपरा – भारतीय ज्ञान परंपरा (IKS) वे विचार, कौशल और विधियाँ हैं जो भारतीय उपमहाद्वीप में हज़ारों वर्षों में गणित, खगोल, धातुकर्म, रसायन, चिकित्सा, वास्तु, भाषा और कलाओं में विकसित हुईं। मुख्य उदाहरण: शून्य सहित स्थानीय मान, जंग-रोधी लोहा, बड़े पैमाने पर जस्ते का आसवन, वुट्ज़ इस्पात, रंगबंधक के साथ प्राकृतिक रंग, आयुर्वेद और शल्य ग्रंथ, पाणिनि का व्याकरण, और बावड़ी, जाली व आँगन वाले घर जैसी जलवायु-अनुकूल डिज़ाइन। इसे पढ़ने का मतलब है दावों को प्रमाण से जाँचना और पुराने विचारों को आज के विज्ञान-डिज़ाइन से जोड़ना।