शास्त्रीय नृत्य कहाँ से आया
भारत में नृत्य बहुत पुराना है। पुराने मंदिरों की मूर्तियों में वही मुद्राएँ दिखती हैं जो आज भी नाची जाती हैं। मुख्य विचार कुछ ग्रंथों में लिखे गए:
- नाट्य शास्त्र: इसे भरत मुनि का माना जाता है (लगभग 200 ई.पू. से 200 ई.)। यह नाटक, नृत्य और संगीत की बड़ी किताब है। इसमें रस, भाव, हाथ की मुद्राएँ और मंच समझाए गए हैं। कथा है कि ब्रह्मा ने सबके लिए एक "पाँचवाँ वेद" बनाया, यानी नाट्य।
- अभिनय दर्पण ("भावों का आईना"), नंदिकेश्वर का ग्रंथ। इसमें हस्त-मुद्राएँ, सिर, आँख और गर्दन की चालें, और अच्छे नर्तक के गुण दिए हैं। भरतनाट्यम और ओडिसी में इसका सबसे ज़्यादा उपयोग होता है।
- अभिनय चंद्रिका (ओडिसी का ग्रंथ) और हस्तलक्षण दीपिका (कथकली की 24 मूल मुद्राओं का आधार)।
समय के साथ नृत्य को मंदिर की नर्तकियों (दक्षिण में देवदासी, ओडिशा में महारी), कथा कहने वालों (कथाकार, जिनसे कथक का नाम पड़ा), राजदरबारों और बीसवीं सदी के गुरुओं ने ज़िंदा रखा और आम मंच तक पहुँचाया।
मूल बातें: नृत्त, नृत्य, नाट्य, तांडव, लास्य
- नृत्त: शुद्ध नृत्य। सिर्फ़ ताल, कदम और आकार, कोई कहानी नहीं। जैसे जतिस्वरम या तत्कार।
- नृत्य: अर्थ और भाव दिखाने वाला नाच, अक्सर किसी गीत पर।
- नाट्य: नाटक। पात्र, संवाद (अक्सर गाकर) और पूरी कहानी।
- तांडव: ज़ोरदार, ऊर्जा भरा रूप, शिव से जुड़ा।
- लास्य: कोमल, सुंदर रूप, पार्वती से जुड़ा।
शरीर के अंग और लय
शरीर को बाँटा गया है: अंग (बड़े हिस्से: सिर, हाथ, छाती, कमर, बगल, पैर), प्रत्यंग (गर्दन, कंधे, बाँहें, पेट, जाँघें, घुटने) और उपांग (छोटे हिस्से: आँखें, भौंहें, होंठ, गाल, ठुड्डी)। लय के लिए ताल (मात्राओं का चक्र), मात्रा (एक धड़कन) और लय (गति: विलंबित, मध्य, द्रुत) काम आते हैं।
अभिनय, भाव और नवरस
अभिनय का अर्थ है "बात को दर्शक तक ले जाना"। इसके चार भाग हैं:
- आंगिक: शरीर से – हाथ, चेहरा, आँखें, कदम।
- वाचिक: शब्दों से – गीत, कविता और बोल।
- आहार्य: वेशभूषा, गहने, श्रृंगार और मंच-सज्जा से।
- सात्त्विक: सच्ची भीतरी भावना से – आँसू, शर्म से लाल होना, काँपती आवाज़।
नर्तक एक भाव दिखाता है। जब भाव ठीक से दिखे, तो दर्शक को रस (मज़ा, स्वाद) मिलता है। नौ रस (नवरस): श्रृंगार (प्रेम), हास्य (हँसी), करुण (दुःख), रौद्र (क्रोध), वीर (साहस), भयानक (डर), बीभत्स (घृणा), अद्भुत (आश्चर्य) और शांत (शांति)। नाट्य शास्त्र में आठ रस हैं; शांत रस बाद में जोड़ा गया।
आठ शास्त्रीय शैलियाँ एक नज़र में
- भरतनाट्यम (तमिलनाडु): मज़बूत आधा बैठना (अरैमंडी), साफ़ रेखाएँ। तंजौर चतुष्टय (चार भाई, 1800 के आसपास) ने इसका प्रस्तुति-क्रम तय किया। शैलियाँ (बाणी): पंडनल्लूर, तंजावुर, वझुवूर।
- कथक (उत्तर भारत): घुंघरू के साथ तेज़ तत्कार, चक्कर और उपज (तुरंत रचना)। घराने: लखनऊ (भाव और नज़ाकत), जयपुर (ज़ोरदार पैर का काम), बनारस।
- कथकली (केरल): नृत्य-नाटक, हरा-लाल चेहरा-रंग, बड़े मुकुट, आट्टकथा नाम की कहानियाँ और सोपान संगीत।
- कुचिपुड़ी (आंध्र प्रदेश): एक गाँव के नाम पर; नाच के साथ अभिनय और बोलना; तरंगम में नर्तक पीतल की थाली के किनारे पर नाचता है।
- ओडिसी (ओडिशा): मूर्ति जैसी मुद्राएँ, चौक और त्रिभंग।
- मणिपुरी (मणिपुर): कोमल गोल चालें; पुराना लाई हराओबा उत्सव और वैष्णव रास लीला; पुंग ढोल।
- मोहिनीअट्टम (केरल): झूले जैसी कोमल चालें, भरपूर लास्य।
- सत्रिया (असम): सत्रों (मठों) में भक्ति-नाटकों के लिए बना।
इनके साथ कई लोक और अर्ध-शास्त्रीय नृत्य भी हैं, जैसे छऊ (मयूरभंज, सरायकेला और मुखौटे वाला पुरुलिया छऊ), बिहू, गरबा और भांगड़ा। शास्त्रीय नृत्य लिखे नियमों और लंबी साधना से चलता है; लोक नृत्य उत्सवों में समाज के बीच सीखा जाता है।
महान गुरु और उनका काम
- रुक्मिणी देवी अरुंडेल ने चेन्नई में कलाक्षेत्र (1936) बनाया और भरतनाट्यम को आम मंच तक लाईं।
- टी. बालसरस्वती भरतनाट्यम में गहरे अभिनय के लिए प्रसिद्ध थीं।
- मीनाक्षीसुंदरम पिल्लै पंडनल्लूर शैली के बड़े गुरु थे।
- केलुचरण महापात्र, पंकज चरण दास, देबप्रसाद दास ने 1950 के दशक में ओडिसी को फिर से खड़ा किया।
- बिरजू महाराज (लखनऊ घराना) कथक के महान गुरु थे।
- वल्लत्तोल नारायण मेनन ने कथकली और मोहिनीअट्टम के लिए केरल कलामंडलम (1930) शुरू किया।
- वेम्पटि चिन्न सत्यम ने आधुनिक एकल कुचिपुड़ी को और गुरु बिपिन सिंह ने मणिपुरी को नया रूप दिया।
ख़ुद करके देखो
आईने के सामने खड़े हो। एक ही बात "मुझे एक सुंदर फूल दिख रहा है" तीन तरह दिखाओ: सिर्फ़ हाथ और आँखों से (आंगिक), बोलते हुए (वाचिक), फिर दुपट्टे को पोशाक बनाकर (आहार्य)। कौन-सा सबसे सच्चा लगा? वही सच्ची भावना सात्त्विक है। 3D के छठे चरण में हर शैली चुनो और उसकी एक पहचान बोलो।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- नृत्त = सिर्फ़ ताल और चाल (कहानी नहीं)
- नृत्य = नाच + भाव
- नाट्य = नाटक (पात्र + कहानी)
- अभिनय = आंगिक + वाचिक + आहार्य + सात्त्विक
- भाव (नर्तक दिखाता है) → रस (दर्शक महसूस करता है)
- नवरस = 9 रस
हल किए गए उदाहरण
1. कथक नर्तकी तीनताल में तेज़ तत्कार करती है, कोई कहानी नहीं। यह नृत्त है, नृत्य या नाट्य?
सिर्फ़ ताल और आकार है, कोई अर्थ या कहानी नहीं, इसलिए यह नृत्त है।
2. कथकली में कलाकार का हरा चेहरा और बड़ा मुकुट है। यह कौन-सा अभिनय है?
वेशभूषा और श्रृंगार आहार्य अभिनय है।
3. नर्तकी दिखाती है कि यशोदा नन्हे कृष्ण को डाँट रही हैं, और दर्शक प्यार से मुस्कुराते हैं। भाव और रस बताओ।
नर्तकी माँ के प्यार और हल्के ग़ुस्से का भाव दिखाती है; दर्शक मुख्य रूप से श्रृंगार (वात्सल्य वाला प्रेम) और थोड़ा हास्य महसूस करते हैं। याद रखो: भाव मंच पर दिखता है, रस दर्शक के मन में।
आम गलतियाँ
- नृत्त और नृत्य को मिला देना: नृत्त में अर्थ नहीं होता, नृत्य में भाव होता है।
- भाव और रस को एक समझना: भाव नर्तक दिखाता है, रस दर्शक महसूस करता है।
- हर भारतीय नाच को शास्त्रीय कहना: भांगड़ा, गरबा, बिहू लोक नृत्य हैं।
- मोहिनीअट्टम या कथकली को केरल के बाहर का बताना, या ओडिसी को आंध्र प्रदेश का कहना।