CBSE कक्षा 12 भरतनाट्यम नृत्य
अध्याय: 2
1. भरतनाट्यम सिद्धांत
प्रमुख कलाकार और ग्रंथ · संकल्पनाएँ · तकनीकी शब्द
- भारतीय शास्त्रीय नृत्य – भारतीय शास्त्रीय नृत्य की जड़ें नाट्य शास्त्र (भरत मुनि, लगभग 2,000 साल पुराना) और अभिनय दर्पण (नंदिकेश्वर) में हैं। हर शैली में तीन भाग होते हैं: नृत्त (सिर्फ़ ताल और चाल), नृत्य (भाव के साथ नाच) और नाट्य (नाटक)। आठ शैलियाँ प्रमुख मानी जाती हैं: भरतनाट्यम, कथक, कथकली, कुचिपुड़ी, ओडिसी, मणिपुरी, मोहिनीअट्टम और सत्रिया। नर्तक चार तरह के अभिनय (आंगिक, वाचिक, आहार्य, सात्त्विक) से भाव दिखाता है, ताकि दर्शक नौ में से कोई रस महसूस करे।
2. भरतनाट्यम प्रायोगिक
रचनाएँ · हस्त और संगीत
- शास्त्रीय नृत्य की तकनीक – अच्छी शास्त्रीय तकनीक पाँच चीज़ों पर टिकी है: मज़बूत आधार मुद्रा (समपाद, अरैमंडी/मंडल, चौक), शरीर की साफ़ रेखाएँ (जैसे त्रिभंग), एक, दो और चार गुनी गति में ताल में बँधा पद-संचालन, ताल-चक्र (सम और खाली) की पक्की समझ, और सटीक हस्त-मुद्राएँ। वार्म-अप, आँख-गर्दन के अभ्यास, चक्कर/भ्रमरी और सुरक्षित अभ्यास इन्हें जोड़ते हैं।
- भरतनाट्यम में हस्त और संगीत: मुद्राएँ, पादभेद, ताल और राग – भरतनाट्यम हाथों से बोलता है और कर्नाटक संगीत पर चलता है। अभिनय दर्पण में 28 असंयुत (एक हाथ) और लगभग 23–24 संयुत (दो हाथ) हस्त हैं; हर हस्त के कई विनियोग (उपयोग) हैं, और देव हस्त देवताओं को दिखाते हैं, जैसे दोनों हाथों में त्रिपताका से विष्णु। पादभेद पैरों से जुड़े हैं: मंडल (समपाद, अरमंडी, मुळुमंडी जैसी स्थितियाँ), उत्प्लवन (कूद), भ्रमरी (7 तरह के घुमाव), चारी और गति। संगीत में 7 सुलादि ताल (ध्रुव, मठ्य, रूपक, झम्प, त्रिपुट, अट, एक) लघु, द्रुत और अनुद्रुत से बनते हैं; लघु 5 जातियों से बदलती है, जिससे 35 ताल बनते हैं (आदि = चतुस्र जाति त्रिपुट = 8 मात्राएँ)। राग स्वरों का समूह है जिसका आरोहण और अवरोहण होता है; 72 मेलकर्ता जनक राग हैं, और मोहनम् जैसे जन्य राग उनसे बनते हैं।