प्रागैतिहासिक शैल चित्र: काल और स्थल
प्रागैतिहासिक का अर्थ है लिखावट से पहले का समय। इसके बारे में हम औज़ारों और चित्रों से जानते हैं।
- कहाँ: प्राकृतिक चट्टानी आश्रय (रॉक शेल्टर), ज़्यादातर मध्य भारत में। सबसे प्रसिद्ध भीमबेटका (मध्य प्रदेश) है, जहाँ सैकड़ों चित्रित आश्रय हैं। कैमूर की पहाड़ियाँ, मिर्ज़ापुर और कर्नाटक व आंध्र प्रदेश के कुछ भाग भी।
- कब: हज़ारों साल तक चित्र बनते रहे। विद्वान इन्हें तीन चरणों में बाँटते हैं: उच्च पुरापाषाण (सबसे पुराने, हरी और गहरी लाल रेखाओं में बड़े जानवर), मध्यपाषाण (सबसे समृद्ध: शिकार, नाच, शहद इकट्ठा करना, झुंड में जानवर) और ताम्रपाषाण (खेती करने वालों से संपर्क, बर्तन और ताँबे के औज़ार दिखते हैं)।
- रंग: लाल रंग गेरू (लोहे वाली मिट्टी) से, सफ़ेद चूना पत्थर से, हरा और पीला रंगीन पत्थरों से; इन्हें पीसकर पानी या चर्बी में मिलाया जाता था। ब्रश पौधों के रेशों से बनते थे।
- क्रम कैसे पता चलता है: नए चित्र अक्सर पुराने चित्रों के ऊपर बने, परतों की तरह।
सिंधु और मौर्य कला
सिंधु (हड़प्पा) नगरों ने छोटी चीज़ें बड़ी कुशलता से बनाईं: बैल जैसे जानवर खुदी चौकोर मुहरें, लाल पर काले डिज़ाइन वाले रंगे बर्तन, मिट्टी की मातृदेवी मूर्तियाँ और लुप्त-मोम विधि से बनी छोटी कांस्य नर्तकी।
अगला बड़ा कदम मौर्य साम्राज्य (लगभग 322–185 ई.पू.) है। सम्राट अशोक ने चुनार बलुआ पत्थर के ऊँचे स्तंभ खड़े किए, जिन्हें घिसकर काँच जैसी चमक दी गई और ऊपर पशु बनाए गए। सारनाथ का सिंह-शीर्ष सबसे प्रसिद्ध है। दीदारगंज यक्षी जैसी यक्ष-यक्षी (प्रकृति की आत्माएँ) की बड़ी मूर्तियों में भी यही चमक है।
बौद्ध, जैन और हिंदू कला; मंदिर, कांस्य और बाद की कला
- स्तूप (अवशेषों पर बने गुंबद) साँची और भरहुत में, तराशे हुए तोरण-द्वारों के साथ।
- कुषाण काल: बुद्ध की मूर्तियाँ दो शैलियों में एक साथ: गांधार (स्लेटी पत्थर, यूनानी-रोमन झलक) और मथुरा (लाल बलुआ पत्थर, भारतीय रूप)।
- गुप्त काल (लगभग 320–550 ई.): शांत, सुंदर बुद्ध; अजंता के गुफ़ा चित्र।
- मंदिर (लगभग 600–1300 ई.): उत्तर में नागर शिखर, दक्षिण में द्रविड़ विमान, दीवारें मूर्तियों से भरी।
- चोल कांस्य (लगभग 850–1250 ई.): लुप्त-मोम विधि से बने नटराज जैसे विग्रह।
- इंडो-इस्लामिक (लगभग 1200 ई. से): असली मेहराब, गुंबद, मीनार, सुलेख और ज्यामितीय नमूने।
- लघु चित्र (लगभग 1500–1850 ई.): मुग़ल, राजपूत और पहाड़ी दरबारों में काग़ज़ पर छोटे, चटकीले चित्र।
किसी कलाकृति को कैसे पढ़ें
हर कलाकृति से पाँच छोटे सवाल पूछिए: क्या है (चित्र, मूर्ति, इमारत)? किस सामग्री से? कब और कहाँ? क्या दिखाती है? कौन-सा सुराग शैली बताता है (चमक, लाल पत्थर, घुमावदार शिखर)?
करके देखिए
अपना "शैल चित्र" बनाइए: एक चुटकी ईंट का चूरा या हल्दी, कुछ बूँद पानी और तेल मिलाइए। किसी पत्थर या गत्ते पर टहनी या उँगली से दौड़ता जानवर बनाइए। देखिए पतली रेखा बनाना कितना कठिन है, ठीक पहले के चित्रकारों की तरह।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- क्रम: शैल चित्र → सिंधु → मौर्य → गुप्त → मंदिर → चोल कांस्य → इंडो-इस्लामिक → लघु चित्र
- शैल चित्र के चरण: उच्च पुरापाषाण → मध्यपाषाण → ताम्रपाषाण
- भीमबेटका = सबसे प्रसिद्ध शैल आश्रय स्थल (मध्य प्रदेश)
- सिंधु के सुराग: मुहरें, रंगे बर्तन, कांस्य नर्तकी
- मौर्य सुराग: चुनार बलुआ पत्थर पर काँच जैसी चमक
- कुषाण: गांधार (स्लेटी, यूनानी-रोमन) और मथुरा (लाल, भारतीय)
हल किए गए उदाहरण
1. चट्टान पर हरी रेखाओं वाला एक बड़ा हिरण है और उसके ऊपर भाले लिए छोटे लाल आदमी बने हैं। कौन पुराना है और क्यों?
हरा हिरण पुराना है। हरे और गहरे लाल रंग के बड़े जानवर सबसे पुराने चरण के हैं, और लाल शिकारी बाद में ऊपर बनाए गए। ऊपर वाला रंग नीचे वाले से नया ही होगा।
2. संग्रहालय में लिखा है: "बलुआ पत्थर, काँच जैसी चमक, लगभग 250 ई.पू., बिहार से।" यह किस काल का है?
मौर्य काल का। तारीख़ (322–185 ई.पू.) मेल खाती है और बलुआ पत्थर पर काँच जैसी चमक मौर्य कला की ख़ास पहचान है।
3. क्रम में लगाइए: अजंता चित्र, सिंधु मुहर, चोल नटराज, भीमबेटका चित्र।
भीमबेटका चित्र (प्रागैतिहासिक) → सिंधु मुहर (लगभग 2500 ई.पू.) → अजंता चित्र (मुख्यतः 5वीं सदी ई.) → चोल नटराज (लगभग 11वीं सदी ई.)।
आम गलतियाँ
- यह सोचना कि भीमबेटका के सारे चित्र एक ही समय बने। ये हज़ारों साल में, परतों में बने।
- सिंधु और मौर्य कला को मिला देना। सिंधु कला छोटी है (मुहरें, बर्तन, छोटी कांस्य मूर्तियाँ); मौर्य कला में बड़े चमकदार पत्थर के स्तंभ हैं।
- यह मानना कि पुराने रंग दुकान से आते थे। ये रंगीन मिट्टी और पत्थर पीसकर बनते थे।
- समयरेखा को बराबर दूरी वाला समझना। शैल चित्र बाकी सब से दसियों हज़ार साल पुराने हैं।