मौर्य कला: चमक और शक्ति
मौर्य सम्राट अशोक (लगभग 268–232 ई.पू.) ने अपने साम्राज्य में पत्थर के स्तंभ खड़े किए, कई पर उनके संदेश खुदे हैं।
- हर स्तंभ चुनार बलुआ पत्थर का एक ही टुकड़ा है, अक्सर 12 मी से ऊँचा।
- मौर्य पॉलिश: सतह को घिसकर काँच जैसी चमक दी गई। मौर्य कृति पहचानने का सबसे आसान तरीका यही चमक है।
- सारनाथ सिंह-शीर्ष: चार शेर पीठ से पीठ मिलाकर चार दिशाओं में देखते हैं। नीचे गोल पट्टी (अबेकस) पर चार चक्र और चार पशु हैं: हाथी, बैल, घोड़ा और शेर। उसके नीचे घंटी जैसा उल्टा कमल है। यह वह जगह बताता है जहाँ बुद्ध ने पहला उपदेश दिया।
- दीदारगंज यक्षी (पटना के पास मिली): चँवर पकड़े आदमक़द स्त्री, चमकदार सतह, गोल भरा शरीर और भारी गहने। यक्ष-यक्षी लोकप्रिय प्रकृति-आत्माएँ थे।
कुषाण काल: गांधार और मथुरा
लगभग पहली–तीसरी सदी ई. में बुद्ध को मानव रूप में दिखाया जाने लगा। दो शैलियाँ एक साथ बढ़ीं।
| गांधार | मथुरा | |
|---|---|---|
| क्षेत्र | उत्तर-पश्चिम (आज का पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान) | मथुरा के आस-पास, उत्तर भारत |
| पत्थर | स्लेटी-नीला शिस्ट | चित्तीदार लाल बलुआ पत्थर |
| चेहरा और बाल | शांत, लहराते बाल, यूनानी-रोमन नैन-नक़्श | गोल मुस्कुराता चेहरा, छोटे घुँघराले बाल या घुमावदार जूड़े वाला मुंडा सिर |
| वस्त्र | मोटा, गहरी भारी सलवटें, दोनों कंधे ढके | पतला, शरीर से सटा, अक्सर एक कंधा खुला |
| प्रभामंडल | सादा या छोटा | बड़ा, लहरदार किनारा |
मथुरा का कटरा बुद्ध पालथी मारकर बैठा है, दायाँ हाथ "डरो मत" (अभय) मुद्रा में, दो चँवरधारी साथ में और पीछे बड़ा प्रभामंडल।
गुप्त शैली, जैन प्रतिमाएँ और अजंता
- गुप्त शैली (लगभग 320–550 ई.): बुद्ध शांत और अंतर्मुखी; आँखें नीचे; छोटे घुँघराले बाल; वस्त्र इतना पतला कि गीला या पारदर्शी लगे; प्रभामंडल पर सुंदर नक़्क़ाशी। केंद्र: सारनाथ और मथुरा।
- जैन तीर्थंकर (जैन धर्म के 24 महान गुरु) ध्यान में बैठे या बाँहें सीधी नीचे करके खड़े (कायोत्सर्ग मुद्रा) दिखाए जाते हैं। मूर्तियाँ सादी, संतुलित और बहुत स्थिर हैं।
- अजंता (महाराष्ट्र): घोड़े की नाल जैसी चट्टान में कटी लगभग 30 गुफ़ाएँ, लगभग दूसरी सदी ई.पू. से छठी सदी ई. तक की। दीवारों और छतों पर मिट्टी के रंगों में जातक कथाएँ (बुद्ध के पिछले जन्म) बनी हैं।
शैलियों को कैसे पहचानें
चार चीज़ें देखिए: पत्थर का रंग, सतह की चमक, वस्त्र और चेहरा।
- बहुत चमकीला बलुआ पत्थर → मौर्य।
- स्लेटी पत्थर + गहरी सलवटें → गांधार।
- लाल चित्तीदार पत्थर + मुस्कान → मथुरा।
- शांत चेहरा + पारदर्शी वस्त्र → गुप्त।
करके देखिए
साबुन की एक टिकिया और भोथरा चम्मच लीजिए। एक छोटा चेहरा तराशिए, फिर आधे भाग को गीले कपड़े से दो मिनट रगड़िए। तुलना कीजिए: रगड़ा भाग चमकता है, मौर्य पॉलिश की तरह।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- मौर्य सुराग = चुनार बलुआ पत्थर पर काँच जैसी चमक
- सिंह-शीर्ष = 4 शेर + 4 चक्र + 4 पशु + घंटी जैसा कमल
- गांधार = स्लेटी शिस्ट + लहराते बाल + भारी सलवटें
- मथुरा = लाल चित्तीदार बलुआ पत्थर + मुस्कान + बड़ा प्रभामंडल
- गुप्त = शांत चेहरा + पतला पारदर्शी वस्त्र + नक़्क़ाशीदार प्रभामंडल
- कायोत्सर्ग = जैन खड़ी मुद्रा, बाँहें सीधी नीचे
हल किए गए उदाहरण
1. स्लेटी पत्थर के खड़े बुद्ध के बाल लहराते हैं और वस्त्र में कई गहरी सलवटें हैं। शैली और एक कारण बताइए।
गांधार। स्लेटी शिस्ट, लहराते बाल और भारी सलवटें यूनानी-रोमन प्रभाव दिखाते हैं, जो उत्तर-पश्चिम की पहचान है।
2. सारनाथ सिंह-शीर्ष की पट्टी (अबेकस) पर बने पशु गिनाइए।
हाथी, बैल, घोड़ा और शेर, जिनके बीच चार चक्र हैं।
3. गुप्त बुद्ध मथुरा बुद्ध से कैसे अलग है?
दोनों लाल बलुआ पत्थर में हो सकते हैं, पर गुप्त बुद्ध ज़्यादा शांत और अंतर्मुखी है: आँखें नीचे, पारदर्शी वस्त्र और नक़्क़ाशीदार प्रभामंडल। मथुरा (कुषाण) बुद्ध ज़्यादा खुला और मुस्कुराता है, बड़ा पर सादा प्रभामंडल।
आम गलतियाँ
- यह कहना कि सिंह-शीर्ष में तीन शेर हैं। चार हैं; सामने से तीन ही दिखते हैं।
- गांधार और मथुरा को मिलाना। याद रखिए: स्लेटी = गांधार, लाल = मथुरा।
- मौर्य चमक को रंग या धातु समझना। यह घिसा हुआ पत्थर है।
- अजंता को मंदिर की इमारत कहना। अजंता चट्टान में कटी गुफ़ाओं का समूह है, जिनमें चित्र और मूर्तियाँ हैं।