कांसा क्या है?
मिश्रधातु धातुओं का मिश्रण है। कांसा लगभग 90% ताँबा और 10% टिन है (मात्रा बदल सकती है)।
- यह शुद्ध ताँबे से कठोर और मज़बूत है।
- यह लगभग 950 °C पर पिघलता है, ताँबे (1,085 °C) से कम, और साँचे में अच्छी तरह बहता है।
- इसमें जंग नहीं लगता; समय के साथ इस पर हरी या गहरी परत बनती है जिसे पेटीना कहते हैं।
भारतीय मूर्तिकार पंचलोह भी इस्तेमाल करते थे, पाँच धातुओं का पवित्र मिश्रण (ताँबा, टिन, जस्ता या सीसा, और थोड़ा सोना-चाँदी)।
लुप्त-मोम विधि, चरण-दर-चरण
- मोम का मॉडल: आकृति मधुमोम में थोड़ी राल (कभी तेल) मिलाकर बनती है। बारीकियाँ जोड़ी जाती हैं।
- नलियाँ: मोम की छड़ें जोड़ी जाती हैं ताकि धातु अंदर आए और हवा व मोम बाहर निकलें।
- मिट्टी का लेप: पहली परत बहुत बारीक मिट्टी की होती है जो हर बारीकी पकड़ लेती है; फिर मोटी परतें। साँचा सूखता है।
- मोम निकालना: साँचा गर्म किया जाता है; मोम पिघलकर बह जाता है। बची खाली जगह बिल्कुल मूर्ति के आकार की होती है। मोम "लुप्त" हो गया।
- ढालना: नली से पिघला कांसा डाला जाता है जो खाली जगह भर देता है।
- तोड़ना और सजाना: ठंडा होने पर मिट्टी तोड़ी जाती है। नलियाँ काटी जाती हैं और सतह को रेती से घिसकर, बारीक रेखाएँ उकेरकर चमकाया जाता है।
ठोस बनाम खोखली ढलाई
- ठोस ढलाई: मोम का मॉडल पूरा ठोस होता है, इसलिए मूर्ति ठोस धातु की बनती है। छोटी मूर्तियों के लिए; ज़्यादातर दक्षिण भारतीय कांस्य ठोस हैं।
- खोखली ढलाई: मोम मिट्टी के कोर पर पतली परत होता है। धातु सिर्फ़ मोम की परत की जगह लेती है, इसलिए मूर्ति खोखली होती है। बहुत कम धातु लगती है, मूर्ति हल्की होती है और ठंडी होते समय कम दरकती है। बड़ी मूर्तियों के लिए।
भारतीय इतिहास में कांस्य और चोल नटराज
- सिंधु काल: मोहनजोदड़ो की छोटी कांस्य नर्तकी (लगभग 2500 ई.पू.) दिखाती है कि भारत में लुप्त-मोम विधि बहुत पुरानी है।
- बाद के केंद्र: गुप्त और गुप्तोत्तर बुद्ध कांस्य (जैसे सुल्तानगंज), पूर्वी भारत के पाल कांस्य, और सबसे बढ़कर तमिलनाडु के चोल कांस्य (लगभग 850–1250 ई.), जो उत्सव की शोभायात्राओं में ले जाने के लिए बने।
नटराज (नृत्य के स्वामी शिव) को पढ़ना
- अग्नि-चक्र (प्रभामंडल): ब्रह्मांड और समय का चक्र।
- ऊपरी दायाँ हाथ – डमरू: सृष्टि की ध्वनि।
- ऊपरी बायाँ हाथ – अग्नि: संहार, ताकि नई सृष्टि के लिए जगह बने।
- निचला दायाँ हाथ – अभय ("डरो मत"): रक्षा।
- निचला बायाँ हाथ उठे हुए बाएँ पैर की ओर इशारा करता है: मुक्ति का मार्ग।
- दायाँ पैर बौने (अपस्मार) पर: अज्ञान पर विजय।
- उड़ती जटाएँ और संतुलित मुद्रा अनंत, ऊर्जा भरी गति दिखाती हैं।
करके देखिए: मोम क्यों खो जाता है
किसी बड़े के साथ: एक छोटा खिलौना नरम मिट्टी या आटे के लोंदे में दबाइए और निकाल लीजिए। गड्ढा एक साँचा है। उसमें पिघला मोमबत्ती का मोम या प्लास्टर ऑफ़ पेरिस डालिए। जमने पर मिट्टी हटा दीजिए। यह एक सादा खुला साँचा है। लुप्त-मोम विधि में मॉडल ख़ुद पिघलकर निकल जाता है, इसलिए हाथ, कंगन जैसे उलझे आकार भी बन जाते हैं, पर साँचा दोबारा काम नहीं आता।
सावधानी: असली कांसा लगभग 1,000 °C पर डाला जाता है। इसे घर पर कभी मत आज़माइए।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- कांसा ≈ 90% ताँबा + 10% टिन; पिघलता ≈ 950 °C (ताँबा 1,085 °C)
- लुप्त-मोम: मोम मॉडल → मिट्टी लेप → गर्म करके मोम निकालो → कांसा डालो → साँचा तोड़ो → सजाओ
- ठोस ढलाई: ठोस मोम → ठोस धातु (छोटी मूर्तियाँ)
- खोखली ढलाई: मिट्टी के कोर पर मोम → पतला धातु खोल (बड़ी मूर्तियाँ, कम धातु)
- द्रव्यमान = घनत्व × आयतन; कांसे का घनत्व ≈ 8.8 ग्राम/सेमी³
- नटराज: डमरू = सृष्टि, अग्नि = संहार, अभय = रक्षा, बौने पर पैर = अज्ञान का अंत
हल किए गए उदाहरण
1. इसे 'लुप्त-मोम' विधि क्यों कहते हैं?
क्योंकि गर्म करने पर मोम का मॉडल पिघलकर साँचे से बह जाता है। मोम खो जाता है और उसकी जगह धातु ले लेती है।
2. एक ठोस कांस्य मूर्ति का आयतन 500 सेमी³ है। कांसे का घनत्व 8.8 ग्राम/सेमी³ है। द्रव्यमान निकालिए।
द्रव्यमान = घनत्व × आयतन = 8.8 × 500 = 4,400 ग्राम = 4.4 किग्रा।
3. अगर वही मूर्ति खोखली ढाली जाए और धातु आयतन का सिर्फ़ 25% हो, तो वज़न कितना होगा?
धातु का आयतन = 0.25 × 500 = 125 सेमी³। द्रव्यमान = 8.8 × 125 = 1,100 ग्राम = 1.1 किग्रा। खोखली ढलाई से 3.3 किग्रा धातु बची।
आम गलतियाँ
- यह सोचना कि साँचा दोबारा काम आता है। लुप्त-मोम विधि में मिट्टी का साँचा तोड़ा जाता है, इसलिए हर मूर्ति अनोखी है।
- कांसे को शुद्ध धातु कहना। यह मिश्रधातु है, मुख्य रूप से ताँबा और टिन।
- ठोस और खोखली ढलाई को मिलाना। खोखली ढलाई में मोम के अंदर मिट्टी का कोर चाहिए।
- नटराज की अग्नि को सृष्टि बताना। डमरू सृष्टि है; अग्नि संहार है।