उभार और पूर्ण मूर्ति
मूर्ति में ऊँचाई, चौड़ाई और गहराई होती है, इसलिए घूमने पर रोशनी और छाया बदलती है।
- उभार (रिलीफ़): आकृति सपाट पृष्ठभूमि से बाहर निकलती है। निम्न उभार थोड़ा, सिक्के जैसा; उच्च उभार इतना कि हिस्से लगभग अलग लगें। धँसा उभार सतह के अंदर काटा जाता है।
- पूर्ण मूर्ति (इन द राउंड): अलग खड़ी, हर तरफ़ से देखने के लिए, इसलिए हर दृश्य पर सोचना पड़ता है।
सामग्री, औज़ार और आकार देने की विधियाँ
घटाव विधि: तराशना
पत्थर, संगमरमर, लकड़ी या साबुन के टुकड़े से नुकीली छेनी, दाँतेदार छेनी, चपटी छेनी, रेती से सामग्री हटाएँ, फिर घिसें और चमकाएँ। ग़लती वापस नहीं होती, इसलिए पहले योजना।
जोड़ विधि: गढ़ना
मिट्टी, मोम, प्लास्टिसिन या प्लास्टर जोड़ें। औज़ार: तार-लूप, लकड़ी के गढ़ने वाले औज़ार, घूमने वाला स्टैंड। लंबे या पतले आकार को आर्मेचर (तार, लकड़ी या धातु का अंदरूनी ढाँचा) चाहिए। मिट्टी को काम करते समय नम रखें, धीरे सुखाएँ और भट्टी में पकाकर सिरेमिक बनाएँ।
ढलाई
मॉडल के चारों ओर साँचा (प्लास्टर, सिलिकॉन, रेत) बनाएँ, फिर प्लास्टर, रेज़िन, कंक्रीट या पिघली धातु डालें। लुप्त-मोम विधि में मोम के मॉडल पर मिट्टी चढ़ाकर गर्म करते हैं, मोम बह जाता है और खाली जगह में पिघला कांसा भरते हैं।
निर्माण और संयोजन
धातु की चादर, तार, लकड़ी, गत्ता या मिली हुई चीज़ें काटकर वेल्ड, नट-बोल्ट, गोंद या बाँधकर जोड़ें।
कार्यशाला में सुरक्षा
तराशते या घिसते समय चश्मा और धूल-मास्क पहनें, औज़ार तेज़ रखें और अपनी ओर न रखें, रेज़िन या गर्म धातु के साथ हवा का रास्ता रखें।
मूर्ति की रचना (डिज़ाइन)
विचार से वस्तु तक: खोज और कई कोणों से रेखाचित्र → छोटा प्रयोगात्मक मॉडल यानी मैकेट → बड़ा करना (ग्रिड या माप-बिंदुओं से) → बनाना → फ़िनिश (पेटिना, रंग, चमक) → प्रदर्शन (आधार, रोशनी, स्थान)। अच्छी रचना द्रव्यमान और आयतन, संतुलन (खड़ी रहेगी?), स्थान (खाली जगहें भी आकार का हिस्सा), बनावट और जगह पर कैसे दिखेगी, इन सब पर सोचती है।
यथार्थ का स्तर और गति
यथार्थ एक पैमाना है: यथार्थवादी मूर्ति प्रकृति की नकल करती है; शैलीकृत आकारों को एक तय ढंग से सरल या बढ़ा-चढ़ाकर दिखाती है; अमूर्त सिर्फ़ आकार, रेखा और भाव रखती है।
गति आभासी हो सकती है (मुड़ी या झुकी मुद्रा, बहते वस्त्र, तिरछी रेखाएँ, नर्तकी का बीच-कदम) या असली (गतिज मूर्ति, जैसे हवा या मोटर से घूमता मोबाइल)। दर्शक भी घूमते हैं, जिससे दृश्य बदलते हैं।
घर पर करके देखें
साबुन या आलू से भोथरे चम्मच से एक छोटी आकृति तराशें, और वही आकृति तार के ढाँचे पर आटे से गढ़ें। किसमें ग़लती सुधारना आसान था? किसे ढाँचे की ज़रूरत पड़ी? 3D के चरण 2 और 3 से मिलाएँ।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- उभार: पृष्ठभूमि से निकला (निम्न, उच्च, धँसा)।
- पूर्ण मूर्ति: अलग खड़ी, सब तरफ़ से।
- घटाव = तराशना (हटाना)।
- जोड़ = गढ़ना (जोड़ना)।
- ढलाई: मॉडल → साँचा → डालना → जमना → फ़िनिश।
- आर्मेचर: अंदरूनी सहारा ढाँचा।
- मैकेट: छोटा प्रयोगात्मक मॉडल।
- यथार्थ का पैमाना: यथार्थवादी → शैलीकृत → अमूर्त।
- गति: आभासी (मुद्रा) या असली (गतिज)।
हल किए गए उदाहरण
1. मूर्तिकार को मिट्टी के एक सिर की दस एक-जैसी कांसे की प्रतियाँ चाहिए। कौन-सी तकनीक और क्यों?
ढलाई। मिट्टी के मूल से साँचा बनाकर उसमें दस बार पिघला कांसा डालें (या लुप्त-मोम के लिए कई मोम प्रतियाँ)। हर एक को तराशने या गढ़ने से एक-जैसी प्रतियाँ नहीं बनेंगी।
2. पतली बाँहों वाली मिट्टी की आकृति बार-बार गिरती है। उपाय?
आधार से जुड़ा तार का आर्मेचर बनाएँ, फिर उस पर मिट्टी लगाएँ। ढाँचा वह वज़न उठाता है जो पतली मिट्टी नहीं उठा सकती।
3. वर्गीकरण करें: सिक्का, चौराहे की मूर्ति, मंदिर की दीवार की नक्काशी।
सिक्का = निम्न उभार। चौराहे की मूर्ति = पूर्ण मूर्ति। मंदिर की दीवार = उभार (अक्सर उच्च उभार)।
4. पत्थर की मूर्ति हिल नहीं सकती, फिर गति कैसे दिखाती है?
आभासी गति से: मुड़ा शरीर, एक पैर पर वज़न, बहते बाल या कपड़े और तिरछी रेखाएँ आँख को चलाती हैं और हलचल का अहसास देती हैं।
आम गलतियाँ
- यह मानना कि उभार हर तरफ़ से दिखता है। वह पृष्ठभूमि से जुड़ा है।
- बिना रेखाचित्र या मैकेट के बड़ी नक्काशी शुरू करना; हटाया पत्थर वापस नहीं लगता।
- लंबी पतली मिट्टी की आकृति बिना आर्मेचर बनाना, जिससे वह झुकती या टूटती है।
- अमूर्त को 'लापरवाह' समझना। अमूर्त मूर्ति आकार, स्थान और भाव के हिसाब से सोच-समझकर बनती है।