चित्रकला अभ्यास: स्याही-ब्रश और तैल रंग
अलग-अलग संस्कृतियों ने चित्रकला के अलग तरीके बनाए। दोनों सीखने लायक हैं।
स्याही-ब्रश (पूर्वी एशियाई परंपरा)
औज़ार हैं नरम ब्रश, स्याही और सोखने वाला कागज़ या रेशम। ब्रश का स्ट्रोक चित्र की जान है: मोटा या पतला, गीला या सूखा। चित्रकार कागज़ का कुछ भाग जानबूझकर खाली छोड़ता है; वह खाली जगह कुहासा, पानी या आसमान बन सकती है। स्याही सोख ली जाती है, इसलिए स्ट्रोक दोबारा नहीं किया जा सकता। कलाकार पहले देखता और सोचता है। प्राकृतिक दृश्य, बाँस, पक्षी और फूल पुराने विषय हैं।
तैल चित्र (पश्चिमी परंपरा)
रंग-चूर्ण को तेल में मिलाकर कैनवास पर लगाते हैं। तेल देर से सूखता है, इसलिए रंग मिलाए जा सकते हैं और परतें चढ़ाई जा सकती हैं: पहले पतला आधार, फिर मध्य रंग, फिर चमकदार ब्योरे। गहराई के लिए परिप्रेक्ष्य और रूप के लिए प्रकाश-छाया (काइरोस्क्यूरो) इस्तेमाल होती है।
क्लासिक चित्रों से सीखना
किसी बड़े कलाकार की ब्रश-शैली या रंग-योजना सीखने के लिए नकल करो, अपना बताने के लिए नहीं। फिर अपना चित्र बनाओ। भारत की भी अपनी क्लासिक कला है, जैसे लघुचित्र और मंदिरों के भित्तिचित्र।
मूर्ति की सामग्री और उनके तरीके
हर सामग्री का अपना स्वभाव है, इसलिए अपना तरीका भी।
- मिट्टी: नरम; जोड़कर और दबाकर गढ़ते हैं। बड़े काम एक ढाँचे पर बनते हैं जिसे आर्मेचर कहते हैं। मिट्टी सुखाकर पकाई जाती है (टेराकोटा)।
- पत्थर (संगमरमर, बलुआ पत्थर, ग्रेनाइट): कठोर; छेनी-हथौड़ी से सामग्री हटाकर तराशते हैं। पहले से योजना ज़रूरी है, क्योंकि उतरा टुकड़ा वापस नहीं जुड़ता।
- लकड़ी: दाने (रेशे) की दिशा में तराशो; उलटा काटने पर फट सकती है।
- धातु (काँसा, पीतल): अक्सर ढाली जाती है। मिट्टी के मॉडल से साँचा बनता है; उसमें पिघली धातु उड़ेलते हैं। कई प्रतियाँ बन सकती हैं।
- प्लास्टर: ढलाई और उभरे फलकों के लिए जल्दी बनने वाली सस्ती सामग्री।
- मिली-जुली और मिली हुई चीज़ें: तार, गत्ता, कबाड़, रेज़िन आदि, जिन्हें जोड़ा जाता है (संयोजन)।
मूर्ति के रूप
पूर्ण (चारों ओर से) मूर्ति हर तरफ से दिखती है। उभार (रिलीफ) पृष्ठभूमि से जुड़ा होता है (कम उभार उथला, ज़्यादा उभार बाहर निकला)। जालीदार काम में छेद कटे होते हैं जिनसे रोशनी निकलती है।
वास्तुकला के चित्र और मॉडल
वास्तुकार 3D इमारत समझाने के लिए सपाट चित्र बनाता है:
- नक्शा (प्लान): इमारत को खिड़की की ऊँचाई पर काटकर ऊपर से देखा दृश्य। इसमें कमरे, दीवारें, दरवाज़े दिखते हैं।
- सामने का दृश्य (एलिवेशन): बाहर के किसी एक पक्ष (आगे, बगल) का सपाट दृश्य।
- काट (सेक्शन): इमारत को बीच से कटा मानकर अंदर की मंज़िलें और ऊँचाई दिखाने वाला दृश्य।
ये सब पैमाने पर बनते हैं। 1:100 के पैमाने का मतलब है कागज़ पर 1 सेमी असल में 100 सेमी (1 मी) है। 5 मी की दीवार 5 सेमी की बनेगी।
गत्ते, फ़ोम बोर्ड या मिट्टी का मॉडल इमारत को हर तरफ से देखने देता है। उसे साफ़ बनाओ: सीधा काटो, साफ़ चिपकाओ, आधार लगाओ और पैमाने की एक छोटी मानव आकृति रखो। मॉडल से ग्राहक और लोग इमारत बनने से पहले ही विचार समझ लेते हैं।
परिसर डिज़ाइन प्रोजेक्ट
परिसर (स्कूल या कॉलेज का मैदान) एक डिज़ाइन प्रोजेक्ट है, जिसकी एक ब्रीफ़ होती है: कौन इस्तेमाल करेगा, क्या चाहिए, और कितना पैसा व ज़मीन है। चरण:
- जगह देखो: सूर्य का रास्ता, हवा, ढलान, पेड़, सड़क का शोर।
- उपयोग के क्षेत्र बाँटो: शांत (कक्षाएँ, पुस्तकालय), सक्रिय (खेल का मैदान), हरा शांत स्थान (बगीचा)।
- रास्ते (आवागमन) तय करो, ताकि चलना छोटा और सुरक्षित हो, व्हीलचेयर वालों के लिए भी।
- जाँचों से परखो: शोर, धूप-छाया, चलने की दूरी, सुरक्षा।
- नक्शा और मॉडल बनाओ, फिर उपयोग करने वालों से राय लेकर सुधारो।
अच्छे विचार: छायादार पेड़ और छज्जे, वर्षा-जल संग्रह, सोलर पैनल, साइकिल स्टैंड, सभा के लिए खुली जगह।
धूप, छाया और शोर: तीन जाँचें
धूप: उत्तरी गोलार्ध के ज़्यादातर भाग में (भारत सहित) दिन में अधिकतर समय सूर्य दक्षिण दिशा में होता है, इसलिए इमारत की छाया उत्तर में गिरती है। इमारत जितनी ऊँची, छाया उतनी लंबी। बगीचे और खेल की जगह धूप वाली तरफ रखो, उस छाया में नहीं।
शोर: खेल का मैदान और कैंटीन शोर करते हैं। उन्हें कक्षाओं से दूर रखो, या बीच में बगीचा या पुस्तकालय रखो।
चलने की दूरी: जो जगहें साथ इस्तेमाल होती हैं, जैसे कक्षा और पुस्तकालय, पास होनी चाहिए। रास्ते की दूरी नक्शे पर पैमाने से नापो।
करके देखो
3D में: स्याही का बटन दबाकर तीन स्ट्रोक बनते देखो; तैल का बटन दबाकर परतें अलग होते देखो। हर मूर्ति-सामग्री छुओ। फिर योजना A, B, C बदलो और मंज़िलें 4 कर दो। किस योजना में बगीचे को धूप मिलती रहती है?
घर पर: (1) एक ब्रश और पानी मिली काली स्याही से पहाड़ बनाओ, आसमान खाली छोड़ो। (2) मिट्टी या आटे से छोटी आकृति गढ़ो। (3) अपने कमरे का नक्शा 1:50 के पैमाने पर बनाओ और गत्ते का मॉडल बनाओ। (4) अपने स्कूल का मैदान बनाकर देखो कि कहाँ शोर है और धूप कहाँ पड़ती है।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- पैमाना: चित्र की लंबाई = असली लंबाई ÷ पैमाने की संख्या (1:100 यानी 100 गुना छोटा)
- असली लंबाई = चित्र की लंबाई × पैमाने की संख्या
- गढ़ना = जोड़ना; तराशना = हटाना; ढलाई = साँचे में उड़ेलना; संयोजन = हिस्से जोड़ना
- छाया की लंबाई इमारत की ऊँचाई के साथ बढ़ती है और सूर्य के उलटी तरफ गिरती है
- नक्शा = ऊपर से दृश्य; एलिवेशन = बगल का दृश्य; सेक्शन = कटे हुए भीतर का दृश्य
हल किए गए उदाहरण
1. एक दीवार 5 मी लंबी है। 1:100 के पैमाने पर कागज़ पर उसकी लंबाई कितनी होगी?
5 मी = 500 सेमी। 500 ÷ 100 = 5 सेमी।
2. 1:50 के नक्शे पर एक कमरा 8 सेमी × 6 सेमी है। असली कमरा कितना बड़ा है?
8 × 50 = 400 सेमी = 4 मी; 6 × 50 = 300 सेमी = 3 मी। असली माप 4 मी × 3 मी = 12 वर्ग मीटर।
3. एक मूर्तिकार एक छोटी आकृति की 12 एक जैसी प्रतियाँ चाहता है। कौन-सा तरीका ठीक है और क्यों?
ढलाई। एक साँचा बार-बार इस्तेमाल हो सकता है, इसलिए एक मॉडल से कई प्रतियाँ बन जाती हैं।
4. 1:200 के परिसर नक्शे पर कक्षा-भवन और पुस्तकालय 4.5 सेमी दूर हैं। विद्यार्थी को कितना चलना पड़ेगा?
4.5 × 200 = 900 सेमी = 9 मी (सीधी रेखा में; रास्ता थोड़ा लंबा हो सकता है)।
5. स्याही-ब्रश के चित्र में गलती हो जाए तो तैल रंग की तुलना में उसे सुधारना कठिन क्यों है?
स्याही कागज़ में सोख जाती है, उसे खुरचकर या ऊपर से रंगकर नहीं हटा सकते। तैल रंग देर तक काम लायक रहता है और उसे दूसरी परत से ढका जा सकता है।
6. आपके परिसर नक्शे में बगीचा 3 मंज़िला कक्षा-भवन के ठीक उत्तर में है। क्या यह अच्छी जगह है? बेहतर जगह बताओ।
नहीं। उत्तरी गोलार्ध में छाया उत्तर की ओर गिरती है, इसलिए बगीचा छाया में रहेगा। उसे भवन के दक्षिण में, या किसी और धूप वाली खुली जगह पर ले जाओ।
आम गलतियाँ
- किसी प्रसिद्ध चित्र की नकल करके उसे अपना बताना। क्लासिक से सीखो, फिर अपना काम बनाओ।
- पत्थर की तराश की योजना न बनाना। हटाई गई सामग्री वापस नहीं जुड़ती।
- नक्शे और एलिवेशन को मिला देना। नक्शा ऊपर से है; एलिवेशन बगल से।
- पैमाना उलटा पढ़ना: 1:100 के नक्शे में असली चीज़ चित्र से 100 गुना बड़ी है।