19वीं सदी के आंदोलन
- नवशास्त्रवाद (लगभग 1760–1830): शांत, साफ़ रेखाएँ, प्राचीन यूनानी-रोमन आदर्श; कर्तव्य और वीरता।
- रोमांटिसिज़्म (लगभग 1800–1850): तीव्र भावनाएँ, जंगली प्रकृति, तूफ़ान, सपने और राष्ट्रीय कहानियाँ।
- यथार्थवाद (लगभग 1840–1880): मज़दूर और रोज़मर्रा का जीवन, ईमानदारी से, सजाए बिना।
- प्रभाववाद (1870 के दशक से): जल्दी-जल्दी दिखते ब्रश के निशान, बाहर की रोशनी, गुज़रता पल; ट्यूब में रंग और गाँव तक रेलगाड़ी ने मदद की।
- उत्तर-प्रभाववाद (1880–1900 के दशक): ज़्यादा संरचना और भावना; रंग और आकार का खुला प्रयोग।
फ़ोटोग्राफ़ी (1839 से) ने चित्रकारों को हू-ब-हू नक़ल से दूर किया।
सपाट सतह पर जगह और गहराई
- प्राचीन मिस्र: सपाट आकृतियाँ, सिर और पैर बगल से, आँख और छाती सामने से; आकार से महत्व।
- मध्यकालीन आइकन: सुनहरी पृष्ठभूमि, कम गहराई, अर्थ पर ध्यान।
- पुनर्जागरण: रैखिक परिप्रेक्ष्य, समानांतर रेखाएँ एक लोप-बिंदु (vanishing point) पर मिलती हैं; साथ में वायुमंडलीय परिप्रेक्ष्य (दूर की चीज़ें हल्की और नीली)।
- फ़ारसी और मुगल लघुचित्र: परतों वाली जगह, पन्ने पर ऊपर यानी दूर।
- घनवाद (1907 से): एक साथ कई दृष्टिकोण, वस्तु पहलुओं में टूटी हुई।
- अमूर्तन: सपाट सतह ख़ुद विषय बन जाती है।
20वीं सदी की शुरुआत का अवांगार्द
अवांगार्द ("अगली टुकड़ी") वे कलाकार थे जो जानबूझकर नियम तोड़ते थे।
- फ़ॉविज़्म और अभिव्यंजनावाद: भावना दिखाने के लिए अप्राकृतिक, चटख रंग।
- घनवाद और भविष्यवाद: कई दृष्टिकोण, गति और मशीनें।
- अमूर्त कला (कैंडिंस्की, मॉन्ड्रियन): पहचानी जाने वाली वस्तु के बिना आकार और रंग।
- दादा (1916 से): युद्ध के विरोध में "कला-विरोधी" कला; रोज़मर्रा की वस्तुएँ कला के रूप में।
- अतियथार्थवाद (1924 से): सपने और अवचेतन मन।
- अमूर्त अभिव्यंजनावाद (1940–50 के दशक): विशाल कैनवास, हाव-भाव और टपकते रंग।
ग़ैर-पश्चिमी प्रभाव: जापानी काष्ठ-छापों (जापोनिस्म) ने प्रभाववादियों को सपाट रंग और अनोखी काट-छाँट दिखाई; अफ़्रीकी और ओशिनिया की मूर्तियों ने घनवादी रूपों को प्रेरित किया। आज हम पूछते हैं कि यह सम्मानजनक आदान-प्रदान था या बिना श्रेय दिए लेना, क्योंकि मूल कलाकार अक्सर बेनाम रहे और कई वस्तुएँ औपनिवेशिक शासन में ले जाई गईं।
1950 के बाद के समकालीन आंदोलन
- पॉप आर्ट (1950–60 के दशक): विज्ञापन, कॉमिक, फ़िल्मी सितारे और पैकेट के चित्र; दोहराए गए, चमकीले, छपे हुए (सिल्कस्क्रीन)। इसने "ऊँची" कला और लोकप्रिय संस्कृति की रेखा धुँधली की।
- न्यूनतमवाद: सरल ज्यामितीय आकार, औद्योगिक सामग्री, कोई कहानी नहीं।
- संकल्पनात्मक कला: वस्तु से ज़्यादा विचार महत्वपूर्ण।
- आर्ते पोवेरा (इटली, 1967 से): "ग़रीब कला", मिट्टी, चिथड़े, लकड़ी, पत्थर, पौधे जैसी सस्ती, प्राकृतिक, रोज़मर्रा सामग्री; अमीर, व्यापारी कला-जगत का विरोध और प्रकृति-संस्कृति का मेल।
- हैपनिंग और परफ़ॉर्मेंस कला: जीवंत घटनाएँ जहाँ कलाकार का शरीर, समय और दर्शक ही कलाकृति हैं; अक्सर दोहराई नहीं जा सकतीं, केवल फ़ोटो या वीडियो में दर्ज।
- लैंड आर्ट, इंस्टॉलेशन, स्ट्रीट आर्ट, वीडियो और डिजिटल कला: कला फ़्रेम और गैलरी से बाहर।
आंदोलन कैसे पहचानें
पाँच सवाल पूछें: कब बनी? विषय क्या है (प्रकृति, मज़दूर, वस्तुएँ, कुछ नहीं)? रंग कैसे हैं (प्राकृतिक या भावनात्मक)? गहराई कैसे दिखाई (परिप्रेक्ष्य, सपाट, कई दृष्टिकोण)? सामग्री क्या है (तैल रंग, छापा, मिली हुई वस्तुएँ, शरीर)? फिर उत्तर समय-रेखा से मिलाएँ।
करके देखें: पाँच आंदोलनों वाला स्केच
घर की कोई एक वस्तु, जैसे कप, चुनें। उसे पाँच तरह से जल्दी बनाएँ: हू-ब-हू (यथार्थवाद), रोशनी वाले छोटे रंगीन धब्बों से (प्रभाववाद), तीन तरफ़ से एक साथ (घनवाद), चमकीले दोहराए छापे की तरह (पॉप आर्ट), और असली सस्ती चीज़ों की सजावट से (आर्ते पोवेरा)। हर एक पर नाम लिखें।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- आंदोलन = कलाकार + साझा विचार + एक दौर
- अवांगार्द = जानबूझकर नियम तोड़ने वाले कलाकार
- रैखिक परिप्रेक्ष्य: समानांतर रेखाएँ लोप-बिंदु पर मिलती हैं
- पॉप आर्ट = लोकप्रिय संस्कृति विषय के रूप में
- आर्ते पोवेरा = सस्ती, रोज़मर्रा या प्राकृतिक सामग्री
हल किए गए उदाहरण
1. एक चित्र में सूर्यास्त के समय खेत है, ब्रश के छोटे दिखते निशान हैं और कोई तीखी रेखा नहीं। कौन-सा आंदोलन?
प्रभाववाद: जल्दी के निशानों से बाहर की रोशनी और गुज़रता पल पकड़ा गया है।
2. गैलरी में असली पत्थरों, चिथड़ों और एक जीवित पौधे का ढेर, इटली, 1968। कौन-सा आंदोलन और क्यों?
आर्ते पोवेरा: सस्ती, प्राकृतिक, रोज़मर्रा सामग्री और महँगे कला-बाज़ार पर सवाल।
3. घनवादियों ने गिटार को एक साथ कई तरफ़ से क्यों दिखाया?
वे एक तय दृश्य नहीं, बल्कि वस्तु के बारे में हमारा पूरा ज्ञान दिखाना चाहते थे। घूमकर देखने पर कई तरफ़ दिखते हैं; घनवाद उन्हें सपाट सतह पर साथ रख देता है।
आम गलतियाँ
- आंदोलनों की पक्की शुरुआत-अंत तारीख़ मानना: वे एक-दूसरे में मिलते हैं और तारीख़ें अनुमानित हैं।
- हर आधुनिक कलाकृति को "अमूर्त" कहना: पॉप आर्ट और अतियथार्थवाद में अक्सर साफ़ वस्तुएँ होती हैं।
- अवांगार्द विचारों के ग़ैर-पश्चिमी स्रोतों को भूलना।
- यह सोचना कि परफ़ॉर्मेंस कला चित्र या वस्तु ही होगी: उसमें शरीर और घटना ही कलाकृति है।