1900 के आसपास कला क्यों बदली?
आधुनिकतावाद लगभग 1880 से 1945 तक कलाओं में आए नए विचारों का नाम है। कई बदलावों ने कलाकारों को धकेला:
- फ़ोटोग्राफ़ी यथार्थ को चित्रकला से तेज़ और सटीक दर्ज करने लगी।
- विज्ञान और तकनीक: बिजली, कार, हवाई जहाज़ और समय, स्थान व मन के बारे में नए विचार।
- बड़े शहर और उद्योग ने जीने और काम करने का ढंग बदला।
- दूसरी संस्कृतियों से संपर्क: जापानी छापे, अफ़्रीकी और ओशिनिया की मूर्तियाँ, और भारतीय, फ़ारसी व चीनी कला यूरोपीय स्टूडियो तक पहुँची।
- दो विश्व युद्धों ने पुराने मूल्यों पर सवाल उठाए।
नया करने वाले कलाकार-समूहों को अवाँ-गार्द (फ़्रेंच में 'अग्रिम दस्ता') कहा गया। वे अक्सर अपने लक्ष्यों का साहसी बयान, घोषणापत्र, छापते थे।
रंग और भाव: उत्तर-प्रभाववाद और अभिव्यंजनावाद
उत्तर-प्रभाववादी (लगभग 1886–1905) प्रभाववाद की खुली रोशनी से आगे बढ़कर उसमें ढाँचा या भाव जोड़ते थे। सरा ने शुद्ध रंग के छोटे बिंदु पास-पास रखे; सेज़ान ने प्रकृति को बेलन, गोले और शंकु में घटाया; वान गॉग ने मोटे, घुमावदार स्ट्रोक लगाए; गोगाँ ने सपाट, तेज़ रंग लिए।
अभिव्यंजनावाद (लगभग 1905–1920, जर्मनी और ऑस्ट्रिया में सबसे मज़बूत) ने आकारों को विकृत किया और असली से अलग रंगों से डर या अकेलेपन जैसे भीतरी भाव दिखाए। फ़्रांस में मातिस के नेतृत्व में फ़ॉव ('जंगली जानवर') ने भी रंग को यथार्थ से आज़ाद किया।
कई दृष्टिकोण और गति: घनवाद और भविष्यवाद
घनवाद (लगभग 1908 से, पिकासो और ब्राक) ने वस्तुओं को चपटे फलकों में तोड़ा और एक साथ कई दृष्टिकोण दिखाए, क्योंकि हम किसी वस्तु को उसके चारों ओर घूमकर जानते हैं। बाद में घनवादियों ने असली कागज़ और अख़बार चित्रों में चिपकाए: पहला कोलाज।
भविष्यवाद (1909 का घोषणापत्र, इटली) को गति, मशीनें और आधुनिक शहर पसंद थे। वे गति दिखाने के लिए आकार दोहराते थे। उन्होंने युद्ध की प्रशंसा भी की, और बाद में फ़ासीवाद से जुड़ाव दिखाता है कि कला आंदोलन राजनीतिक प्रचार के काम भी आ सकते हैं।
शुद्ध आकार और रंग: अमूर्तन, डी स्टाइल और रचनावाद
अमूर्त कला में कोई पहचानी जा सकने वाली वस्तु नहीं होती। कान्दिन्स्की ने रंगों की तुलना संगीत की ध्वनियों से की; मालेविच ने 'शुद्ध अनुभूति' के रूप में काला वर्ग बनाया (सुप्रीमैटिज़्म)।
डी स्टाइल (नीदरलैंड, 1917) ने केवल सीधी रेखाएँ, समकोण और मूल रंग (साथ में काला, सफ़ेद, धूसर) लिए, एक सार्वभौमिक सामंजस्य की आशा में।
रचनावाद (रूस, 1917 की क्रांति के बाद) चाहता था कि कला नए समाज को बनाने में काम आए: पोस्टर, अक्षर-डिज़ाइन, फ़र्नीचर, मंच-सज्जा और इमारतें। इसके साहसी पोस्टर राज्य-प्रचार का साधन बने। बाद में कुछ सरकारों ने (जैसे 1930 के दशक में जर्मनी और सोवियत संघ) आधुनिक कला पर रोक लगाकर एक ही सरकारी शैली थोपी।
संयोग और सपने: दादा, अतियथार्थवाद और 'व्यवस्था की ओर वापसी'
दादा (1916 से, पहले विश्व युद्ध के दौरान) ने युद्ध तक ले जाने वाले 'तर्क' का मज़ाक उड़ाया: बेतुकी कविताएँ, प्रदर्शन और 'रेडीमेड', यानी साधारण वस्तुएँ कला के रूप में। माध्यमों का यह मेल (प्रदर्शन, पाठ, वस्तुएँ, फ़ोटो-मोंताज) अंतर-माध्यम प्रयोग कहलाता है।
अतियथार्थवाद (1924 का घोषणापत्र) ने सपनों और अवचेतन मन को खोजा: असली-से दिखते अजीब दृश्य या स्वचालित रेखांकन।
युद्ध के बाद कई कलाकार 'व्यवस्था की ओर वापसी' (1920 का दशक) की ओर गए: शांत, शास्त्रीय आकृतियाँ और साफ़ रेखांकन, पर आधुनिक सादगी के साथ।
आधुनिक वास्तुकला और डिज़ाइन
'रूप कार्य के पीछे चलता है': किसी इमारत या वस्तु का आकार उसके उपयोग से आए, ऊपर से जोड़ी सजावट से नहीं। जर्मनी का बाउहाउस विद्यालय (1919–1933) कला, शिल्प और उद्योग को जोड़कर बड़े पैमाने पर बनने वाली कुर्सियाँ, लैंप, फ़ॉन्ट और घर डिज़ाइन करता था।
आधुनिक आंदोलन (अंतरराष्ट्रीय शैली) ने प्रबलित कंक्रीट, इस्पात और काँच लिए: सपाट छत, खुला फ़र्श-नक्शा, लंबी पट्टी-खिड़कियाँ, सफ़ेद दीवारें और इमारत को उठाते खंभे (पिलोटी)। ल कार्बूज़िए, मीस वान डेर रोहे और ग्रोपियस मुख्य नाम हैं; भारत का चंडीगढ़ इन विचारों को शहर के पैमाने पर दिखाता है।
चित्रकला से आगे: संगीत, रंगमंच और नृत्य
- संगीत: शॉनबर्ग ने पारंपरिक सुर-केंद्र छोड़ा (अटोनैलिटी) और बाद में बारह-स्वर पद्धति बनाई; स्ट्राविन्स्की ने टकराती लयें लीं। अफ़्रीकी-अमेरिकी समुदायों से आए ब्लूज़ और जैज़ ने नई लय और तात्कालिक रचना (इम्प्रोवाइज़ेशन) दुनिया भर में फैलाई।
- रंगमंच: स्तानिस्लावस्की ने अभिनेताओं को भूमिका सच्चाई से जीना सिखाया (यथार्थवाद)। ब्रेख़्त का एपिक थिएटर इसका उलटा था: वह दर्शकों को याद दिलाता था कि यह नाटक है, ताकि वे आलोचनात्मक सोचें।
- नृत्य: बैले रूस ने आधुनिक संगीतकारों, चित्रकारों और नृत्य-निर्देशकों को जोड़ा; इसाडोरा डंकन जैसी शुरुआती आधुनिक नर्तकियाँ नंगे पाँव, मुक्त और स्वाभाविक गति से नाचीं।
सांस्कृतिक आदान-प्रदान, उपनिवेशवाद और भारत में आधुनिकता
यूरोपीय आधुनिकतावादियों ने अफ़्रीकी और ओशिनिया के मुखौटों और जापानी छापों से आकार उधार लिए, जो अक्सर औपनिवेशिक शासन में ले जाए गए थे, बिना बनाने वालों का नाम लिए या उनका अर्थ समझे। आज इसे सांस्कृतिक विनियोग के रूप में देखा जाता है, और संग्रहालय ऐसी वस्तुओं के स्रोत पर शोध करते हैं।
आधुनिकता वैश्विक भी थी। भारत में बंगाल स्कूल (अवनींद्रनाथ टैगोर) ने औपनिवेशिक अकादमिक कला छोड़कर एशियाई परंपराएँ अपनाईं; रवींद्रनाथ टैगोर और जामिनी रॉय ने अपनी नई शैलियाँ बनाईं; अमृता शेरगिल ने यूरोपीय प्रशिक्षण को भारतीय विषयों से जोड़ा; और प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स ग्रुप (1947: सूज़ा, रज़ा, हुसैन आदि) स्वतंत्र भारत में साहसी आधुनिक रूप लाया।
1945 के बाद समकालीन कला अमूर्त अभिव्यंजनावाद, पॉप आर्ट, अवधारणात्मक कला और नए माध्यमों के साथ आगे बढ़ी।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- उत्तर-प्रभाववाद ल. 1886 → अभिव्यंजनावाद/फ़ॉववाद ल. 1905 → घनवाद ल. 1908 → भविष्यवाद 1909 → अमूर्तन 1910 का दशक → दादा 1916 → डी स्टाइल 1917 → बाउहाउस 1919 → अतियथार्थवाद 1924
- मुख्य शब्द: अवाँ-गार्द, घोषणापत्र, अमूर्तन, विकृति, कई दृष्टिकोण, कोलाज, रेडीमेड
- डिज़ाइन नियम: रूप कार्य के पीछे चलता है
- आधुनिक आंदोलन: कंक्रीट + इस्पात + काँच, सपाट छत, खुला नक्शा, पट्टी-खिड़कियाँ, पिलोटी
हल किए गए उदाहरण
1. एक चित्र में गिटार सामने और बगल से एक साथ, भूरे-धूसर चपटे टुकड़ों में है और अख़बार का टुकड़ा चिपका है। कौन-सा आंदोलन?
घनवाद (कोलाज के कारण संश्लेषी घनवाद)।
2. एक पोस्टर लाल-काले रंग और तिरछे मोटे अक्षरों से नई सरकार का समर्थन करता है। कौन-सी शैली और कला का उपयोग किसलिए?
रचनावादी शैली; कला राजनीतिक प्रचार के लिए इस्तेमाल हो रही है।
3. बाउहाउस कुर्सी पर नक्काशीदार फूल क्यों नहीं होते?
रूप कार्य के पीछे चलता है: आकार आराम से बैठने और कारख़ाने में बनने से आता है, इसलिए सजावट छोड़ दी जाती है।
4. स्तानिस्लावस्की और ब्रेख़्त की तुलना एक-एक पंक्ति में कीजिए।
स्तानिस्लावस्की: अभिनेता सच्चे भाव जीते हैं ताकि दर्शक कहानी पर विश्वास करें। ब्रेख़्त: नाटक भ्रम तोड़ता है ताकि दर्शक समाज के बारे में आलोचनात्मक सोचें।
आम गलतियाँ
- सोचना कि आधुनिक कला मतलब 'हाल में बनी कला'। कला इतिहास में आधुनिक कला लगभग 1860/1880–1945 है; उसके बाद की समकालीन कहलाती है।
- सोचना कि अमूर्त कला बेतरतीब है। ज़्यादातर अमूर्त कलाकार रंग, संतुलन और लय बहुत सोच-समझकर रखते थे।
- प्रभाववाद (रोशनी, खुले में पल) और अभिव्यंजनावाद (भीतरी भाव, विकृत आकार) को एक समझना।
- मानना कि आधुनिकता केवल यूरोपीय थी। यह आदान-प्रदान से बढ़ी और भारत, लैटिन अमेरिका, जापान आदि में मज़बूत आंदोलन हुए।