यथार्थवाद क्या है? 19वीं सदी के अंत का समाज और इतिहास
यथार्थवाद लेखन की वह शैली है जो जीवन को वैसा दिखाती है जैसा वह है: आम लोग, असली जगहें, असली पैसे की परेशानियाँ। यह 19वीं सदी के उत्तरार्ध में ख़ूब फैली।
तब ही क्यों?
- शहर और कारख़ाने तेज़ी से बढ़े, कई लोग शहर आ गए।
- अख़बार और स्कूल फैले, इसलिए ज़्यादा लोग पढ़ने लगे।
- विज्ञान ने लोगों में तथ्य, कारण और सबूत की माँग बढ़ाई।
- नया मध्यम वर्ग (क्लर्क, दुकानदार, शिक्षक) अपने बारे में पढ़ना चाहता था।
रोमानी लेखकों को भावना, जंगली प्रकृति और महान नायक पसंद थे। यथार्थवादियों ने निरीक्षण से जवाब दिया: ध्यान से देखो, सच्चे ब्योरे चुनो, कारण समझाओ। कुछ यथार्थवादी लेखकों में पुराने शास्त्रीय विचार भी दिखते हैं: साफ़ क्रम, संतुलन और स्पष्ट सीख। यथार्थवाद ने पुरानी शैलियों को रातों-रात नहीं हटाया; दोनों अक्सर एक ही किताब में मिलती हैं।
समाज और मानव-प्रकार
यथार्थवादी लेखक एक छोटी जगह में पूरा समाज दिखाता है। पात्र अक्सर सामाजिक प्रकार होते हैं: महत्वाकांक्षी व्यापारी, चिंतित क्लर्क, घमंडी ज़मींदार, ग़रीब किसान, सपने देखता विद्यार्थी। प्रकार पूरे समूह का प्रतिनिधि होता है, पर अच्छा लेखक हर व्यक्ति को अपनी आवाज़, आदत और राज़ भी देता है।
लेखक यह भी दिखाता है कि पैसा, काम और वर्ग लोगों से उनके फ़ैसले कैसे करवाते हैं। कथानक असली कारणों पर चलता है: क़र्ज़, ख़राब फ़सल, रिश्वत, छूटी नौकरी। संयोग और जादू की जगह कम होती है।
साहित्यिक सभाएँ, पत्रिकाएँ और आलोचना
साहित्यिक सभा लेखकों, विचारकों और पाठकों का वह समूह है जो किताबों और विचारों पर बात करने के लिए मिलता है। यूरोप और दूसरी जगहों पर ऐसे कई समूह बने। एक उदाहरण रोमानिया के इयाशी शहर की जुनिमिया सभा (स्थापना 1863) है, जिसकी पत्रिका कॉन्वोरबिरी लिटेरारे नई कहानियाँ और निबंध छापती और उन्हें परखती थी।
पत्रिका रचनाएँ और राय पाठकों तक पहुँचाती है। लेखक, पत्रिकाएँ, आलोचक, स्कूल और पाठक मिलकर साहित्यिक तंत्र बनाते हैं।
साहित्यिक आलोचना
आलोचना किताबों को समझाती और परखती है। दिशा-आलोचना में आलोचक देखता है कि साहित्य समाज को कौन-सी दिशा देता है (जैसे राष्ट्र या जनता की सेवा)। दूसरे आलोचक ज़्यादातर सुंदरता और कौशल को परखते हैं। अच्छी आलोचना सिर्फ़ राय नहीं, पाठ से कारण भी देती है।
यथार्थवादी रूप: कहानी, संस्मरण, हास्य नाटक, आलोचनात्मक पाठ
कथा-साहित्य (फ़िक्शन) गढ़ी हुई कहानी है, पर यथार्थवादी लेखक उसे सच जैसा बनाता है। आम रूप:
- यथार्थवादी कहानी: कुछ पात्र, असली जगह, एक मोड़, शांत या उदास अंत।
- संस्मरण: लेखक के अपने अतीत का सच्चा ब्योरा, असली घटनाओं और लोगों के साथ।
- हास्य नाटक: हास्य किसी पात्र-प्रकार की कमज़ोरी (लालच, घमंड, बदनामी का डर) दिखाने से आता है, ताकि दर्शक हँसें और सोचें भी।
- आलोचनात्मक पाठ: निबंध जो किसी रचना या प्रवृत्ति को समझाता और परखता है।
यथार्थवादी पाठ कैसे पढ़ें (परीक्षा कौशल)
चार चरण अपनाइए: 1 परिवेश (कहाँ और कब?), 2 पात्र (कौन-से सामाजिक प्रकार?), 3 कारण (किससे क्या हुआ?), 4 स्वर (लेखक परखता है, हँसता है या सिर्फ़ दिखाता है?)। फिर प्रमाण में पाठ का एक ब्योरा उद्धृत कीजिए। रोमानी पाठ से तुलना कीजिए: महान नायक या जंगली प्रकृति कहाँ है?
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- यथार्थवाद = आम लोग + असली जगहें + असली कारण
- सामाजिक प्रकार = ऐसा पात्र जो पूरे समूह का प्रतिनिधि हो (क्लर्क, ज़मींदार, व्यापारी…)
- साहित्यिक तंत्र = लेखक + पत्रिकाएँ + आलोचक + स्कूल + पाठक
- हास्य = मानवीय कमज़ोरी जिसे देखकर हम हँसें और सोचें
- पढ़ने के चरण: परिवेश, पात्र, कारण, स्वर
हल किए गए उदाहरण
1. एक कहानी में क्लर्क बहन की शादी के लिए उधार लेता है और चुका नहीं पाता। यह यथार्थवादी क्यों है?
इसमें आम व्यक्ति (क्लर्क), असली पैसे की समस्या और असली कारणों की कड़ी (शादी, उधार, क़र्ज़) है। जादू या बड़ा रोमांच नहीं है।
2. रोमानी और यथार्थवादी ब्योरे पहचानिए: (क) धुंध भरे पहाड़ पर अकेला नायक, (ख) राशन की दुकान की कतार।
(क) रोमानी है: जंगली प्रकृति, गहरी भावना, महान नायक। (ख) यथार्थवादी है: रोज़ की जगह और आम लोग।
3. इन संकेतों से कौन-सा प्रकार पहचानेंगे: सिक्के गिनता है, ब्याज की चिंता करता है, अपने माल की तारीफ़ करता है?
व्यापारी। पैसा और मुनाफ़ा उसके काम तय करते हैं।
4. एक हास्य नाटक में आदमी पड़ोसियों की बातों से डरता है। यह हास्य कैसे बनता है?
बदनामी का डर मानवीय कमज़ोरी है। नाटक उसे बड़ा और मज़ेदार बनाता है, दर्शक हँसते हैं और फिर अपनी आदतों पर सोचते हैं।
5. किसान पर यथार्थवादी कहानी के लिए तीन घटनाओं की कारण-कड़ी लिखिए।
बारिश नहीं हुई, इसलिए फ़सल कमज़ोर रही। किसान ने बीज के लिए उधार लिया, इसलिए साहूकार का क़र्ज़ हो गया। चुका नहीं पाया, इसलिए शहर काम करने गया। हर घटना अगली को लाती है।
6. दिशा-आलोचना में आलोचक क्या पूछता है?
यह किताब समाज को कौन-सी दिशा देती है? क्या यह जनता, राष्ट्र, शिक्षा के काम आती है? फिर वह उसी उद्देश्य से रचना को परखता है और पाठ से कारण देता है।
आम गलतियाँ
- यह सोचना कि यथार्थवाद हर चीज़ की नक़ल है। लेखक फिर भी ब्योरे चुनता है और कहानी को आकार देता है।
- हर उदास कहानी को यथार्थवादी कह देना। यथार्थवाद ईमानदार, आम और कारण वाली घटनाओं की बात है, सिर्फ़ उदासी की नहीं।
- यह मान लेना कि यथार्थवाद ने रोमानी शैली को तुरंत ख़त्म कर दिया। दोनों शैलियाँ अक्सर एक ही किताब में मिलती हैं।
- सामाजिक प्रकार को पूरा व्यक्ति समझ लेना। अच्छा पात्र प्रकार से ज़्यादा होता है।