आरंभिक नगरीय केंद्र
यहाँ सभ्यता का मतलब है ऐसा जीवन जिसमें नगर, शिल्प, व्यापार और कोई शासन हो। इसका नाम हड़प्पा पर पड़ा, जो सबसे पहले मिला स्थल है। इसे सिंधु घाटी सभ्यता भी कहते हैं।
कब और कहाँ
- आरंभिक हड़प्पा: पहले की गाँव-बस्तियाँ।
- विकसित हड़प्पा: लगभग 2600 से 1900 ई.पू., बड़े नगरों का समय।
- परवर्ती हड़प्पा: 1900 ई.पू. के बाद, छोटी ग्रामीण बस्तियाँ।
स्थल सिंधु और उसकी सहायक नदियों, घग्गर-हाकरा, गुजरात आदि में फैले थे। बड़े स्थल: हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, धोलावीरा, कालीबंगन, राखीगढ़ी, लोथल। नागेश्वर और बालाकोट जैसे छोटे स्थल समुद्र के पास थे (शंख के लिए)।
भोजन और खेती
लोग गेहूँ, जौ, दाल, चना, तिल, बाजरा (गुजरात) और कुछ चावल खाते थे। हड्डियाँ बताती हैं कि मवेशी, भेड़, बकरी, भैंस, सूअर पाले जाते थे; मछली और जंगली जानवर भी खाए जाते थे। मिट्टी के हल के मॉडल और कालीबंगन का जुता खेत हल का सबूत है। नहरें (शोर्तुघई), कुएँ और जलाशय (धोलावीरा) पानी देते थे।
नियोजन, शिल्प और मुहरें
नगर योजना
मोहनजोदड़ो के दो भाग थे। दुर्ग छोटा था और कच्ची ईंटों के ऊँचे चबूतरे पर बना था। इसमें विशाल स्नानागार (ईंटों का टैंक, जिसे डामर से पानी-रोधी बनाया गया) और एक बड़ी इमारत (जिसे अक्सर मालगोदाम कहते हैं) थी। निचले शहर में घर थे। सड़कें ग्रिड में थीं। पहले नालियाँ बनीं, फिर घर। ईंटों का अनुपात तय था (लंबाई : चौड़ाई : ऊँचाई = 4 : 2 : 1)। घर आँगन के चारों ओर बने थे, सड़क की ओर खिड़की नहीं; कई घरों में अपना स्नानघर और कुआँ था।
शिल्प
चन्हुदड़ो लगभग पूरा शिल्प-नगर था। कारीगर मनके (कार्नीलियन, जैस्पर, स्फटिक, फ़यॉन्स, सेलखड़ी), शंख की चूड़ियाँ, तांबे-कांसे के औज़ार और बर्तन बनाते थे। कच्चा माल दूर से आता था: तांबा राजस्थान (खेतड़ी) और ओमान से, कार्नीलियन गुजरात से, लाजवर्द मणि अफ़गानिस्तान (शोर्तुघई) से, सोना दक्षिण भारत से।
बाट
बाट चर्ट पत्थर के छोटे घन थे, बिना निशान। छोटे बाट दुगने होते थे (1, 2, 4, 8, 16, 32…), बड़े दशमलव प्रणाली पर। कई नगरों में एक ही प्रणाली बताती है कि लेन-देन पर नियंत्रण था।
मुहरें और लिपि
मुहरें ज़्यादातर चौकोर, सेलखड़ी की, एक पशु और चिह्नों की छोटी पंक्ति वाली थीं। बोरी की गाँठ पर मिट्टी में दबाने से बनी मुद्रांकन (सीलिंग) बताती थी कि माल छुआ नहीं गया और किसने भेजा। लिपि में लगभग 375 से 400 चिह्न थे, दाएँ से बाएँ लिखी जाती थी और अब तक पढ़ी नहीं गई। हड़प्पा का माल ओमान (मगान) पहुँचता था और मेसोपोटामिया के लेख मेलुहा की बात करते हैं, जो शायद हड़प्पा क्षेत्र था।
सामाजिक जीवन, शासक और अंत
शवाधान: ज़्यादातर सादे गड्ढे; कुछ क़ब्रों में तांबे के दर्पण, मनके या शंख। यानी धन का अंतर था पर बहुत बड़ा नहीं। सोने और क़ीमती मनकों की जमाखोरी (निधि) भी अमीर मालिकों को दिखाती है।
शासन किसका? पक्का पता नहीं। योजनाबद्ध नगर, एक जैसी ईंटें और बाट बताते हैं कि कोई बड़े फ़ैसले लेता था। कुछ मानते हैं कि दुर्ग में शासक वर्ग या 'पुरोहित-राजा' रहता था; कुछ कहते हैं कई शासक थे या कोई नहीं। 'पुरोहित-राजा' सिर्फ़ एक पत्थर की मूर्ति को पुरातत्वविदों का दिया नाम है।
अंत: लगभग 1900 ई.पू. तक कई नगर छोड़ दिए गए। संभावित कारण: जलवायु बदलाव, नदियों का सूखना या रास्ता बदलना, बाढ़, वनों की कटाई और उस केंद्रीय सत्ता का टूटना जो सबको जोड़े रखती थी।
ASI और इतिहासकार: हड़प्पा की खोज
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) 1861 में बना। इसके पहले प्रमुख अलेक्ज़ैंडर कनिंघम ने 1875 में एक हड़प्पा मुहर देखी, पर उसकी उम्र नहीं समझ पाए। 1921 में दयाराम साहनी ने हड़प्पा में और 1922 में राखालदास बनर्जी ने मोहनजोदड़ो में खुदाई की। 1924 में जॉन मार्शल (ASI प्रमुख) ने दुनिया को एक नई, बहुत पुरानी सभ्यता के बारे में बताया।
मार्शल ने पूरे टीले पर बराबर क्षैतिज इकाइयों में खुदाई की और मिट्टी की परतें नहीं देखीं, इसलिए अलग-अलग समय की चीज़ें मिल गईं। आर.ई.एम. व्हीलर (1944) ने स्तर-विन्यास (मिट्टी की परतें) का पालन किया। 1947 के बाद बड़े स्थल पाकिस्तान में रह गए, तो भारतीय पुरातत्वविदों ने कई नए स्थल खोजे (कालीबंगन, लोथल, राखीगढ़ी, धोलावीरा)।
इतिहासकार अतीत को कैसे पढ़ते हैं
- चीज़ों को पदार्थ (पत्थर, धातु) और उपयोग से वर्गीकृत करते हैं।
- संदर्भ देखते हैं: चीज़ कहाँ मिली, इससे उसका काम पता चलता है।
- आज के शिल्प से तुलना करते हैं (जैसे खंभात का मनका-उद्योग)।
- धर्म के बारे में सावधान रहते हैं: 'मातृदेवी' मूर्तियाँ और 'आद्य-शिव' मुहर बाद के विचारों पर आधारित अनुमान हैं।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- विकसित हड़प्पा = लगभग 2600 से 1900 ई.पू.
- दुर्ग = ऊँचा, छोटा भाग; निचला शहर = घर
- ईंट का अनुपात = 4 : 2 : 1
- बाट: 1, 2, 4, 8, 16… (द्विआधारी), फिर दशमलव
- मुहर = सेलखड़ी, पशु + चिह्न; मुद्रांकन = मिट्टी पर उसकी छाप
- लिपि: लगभग 400 चिह्न, दाएँ से बाएँ, अपठित
- स्तर-विन्यास = परत दर परत खुदाई; गहरी = पुरानी
- ASI = भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (1861)
हल किए गए उदाहरण
1. इतिहासकार क्यों कहते हैं कि हड़प्पा नगर बनने से पहले योजना बनी?
चरण 1: नालियाँ सीधी हैं और सड़कें समकोण पर मिलती हैं। चरण 2: घर नालियों की सीध में हैं, यानी नालियाँ पहले बनीं। चरण 3: दुर्ग का चबूतरा इमारतों से पहले बना। चरण 4: कई नगरों में ईंटों का अनुपात एक है। तो किसी ने पहले से नक्शा सोचा था।
2. दुगने होते बाट हड़प्पा व्यापार के बारे में क्या बताते हैं?
चरण 1: 1, 2, 4, 8, 16 के बाट सटीक हैं और दूर-दूर के नगरों में एक जैसे हैं। चरण 2: लोथल और हड़प्पा का व्यापारी एक ही तरह तौलता था। चरण 3: इसके लिए नियम चाहिए, शायद शासक वर्ग जाँचता था। तो लेन-देन नियंत्रित था।
3. मार्शल की खुदाई की विधि में समस्या क्या थी?
चरण 1: उन्होंने पूरे टीले पर बराबर समतल पट्टियों में खोदा। चरण 2: पर ज़मीन समतल नहीं होती; पुरानी परतें ऊपर-नीचे होती हैं। चरण 3: इसलिए अलग समय की चीज़ें एक साथ गिनी गईं। चरण 4: व्हीलर ने परतों के हिसाब से खोदकर इसे सुधारा।
4. एक क़ब्र में तांबे का दर्पण और शंख के छल्ले हैं; दूसरी में केवल बर्तन। क्या निष्कर्ष निकलता है?
चरण 1: तांबा और शंख क़ीमती थे और दूर से आते थे। चरण 2: तो पहले व्यक्ति का परिवार ज़्यादा अमीर था। चरण 3: पर ज़्यादातर क़ब्रें सादी हैं, तो अंतर छोटा था। निष्कर्ष: कुछ सामाजिक अंतर था।
आम गलतियाँ
- कहना कि हड़प्पा लिपि पढ़ ली गई है। यह अब तक अपठित है।
- दुर्ग को पक्का राजा का महल मानना। वहाँ कौन रहता था, पता नहीं; वहाँ खास सार्वजनिक इमारतें थीं।
- मुहर और मुद्रांकन को एक समझना। मुहर पत्थर की है; मुद्रांकन मिट्टी पर उसकी छाप है।
- 'पुरोहित-राजा' और 'मातृदेवी' को तथ्य मानना। ये पुरातत्वविदों के अनुमान हैं।