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ईंटें, मनके तथा अस्थियाँ: हड़प्पा सभ्यता

हड़प्पा (सिंधु घाटी) सभ्यता में दक्षिण एशिया के पहले नगर बने, लगभग 2600 से 1900 ई.पू.। नगरों में ऊँचा दुर्ग, निचला शहर, सीधी सड़कें और ढकी नालियाँ थीं। लोग मनके, शंख और धातु की चीज़ें बनाते, एक जैसे पत्थर के बाट और मुहरें इस्तेमाल करते और ओमान व मेसोपोटामिया तक व्यापार करते थे। इनकी लिपि आज तक पढ़ी नहीं गई। 1920 के दशक में ASI ने इसे खोजा; इतिहासकार ईंटों, मनकों, हड्डियों और मुहरों से इसका जीवन समझते हैं।

🎬 कदम-दर-कदम कहानी

  1. नदियों को देखो। छह लाल बिंदु बड़े हड़प्पा स्थल हैं, जैसे हड़प्पा, मोहनजोदड़ो और धोलावीरा। विकसित नगर लगभग 2600 से 1900 ई.पू. तक रहे। नदियों से पानी, उपजाऊ मिट्टी और नाव के रास्ते मिले।
  2. यह मोहनजोदड़ो है। बाएँ दुर्ग है, ईंटों का ऊँचा चबूतरा, जिस पर विशाल स्नानागार है। दाएँ निचला शहर है, जहाँ घर हैं। सड़कें समकोण पर कटती हैं और नीचे ढकी नालियाँ चलती हैं।
  3. अब कारखाने देखो। लाल कार्नीलियन के मनके, शंख की चूड़ियाँ, तांबे के औज़ार। पत्थर के घन गिनो: 1, 2, 4, 8, 16। हर बाट दुगना है और कई नगरों में यही बाट चलते थे।
  4. यह एक मुहर है। इस पर एक पशु और कुछ चिह्न हैं। इसे बोरी की गाँठ पर गीली मिट्टी में दबाते थे, ताकि रास्ते में कोई खोल न सके। नावें सामान ओमान और मेसोपोटामिया ले जाती थीं।
  5. यह सब हमें कैसे पता चला? समय-रेखा देखो। ASI ने 1921 में हड़प्पा खोदा। 1924 में मार्शल ने इसे नई सभ्यता बताया। बाद में व्हीलर ने मिट्टी की परतों के हिसाब से खुदाई की। गहरी परत, पुरानी परत।
  6. अब तुम्हारी बारी। कोई सुराग चुनो: हड्डियाँ, अनाज, बाट, शवाधान या अंत। देखो इतिहासकार हर सुराग से क्या सीखते हैं।

टिप: 3D दृश्य को घुमाने के लिए खींचें। ज़ूम के लिए दो उंगलियाँ इस्तेमाल करें।

🤔 आम शंकाएँ और उनके जवाब

क्या हड़प्पा एक देश था?

नहीं। यह एक बड़ा सांस्कृतिक क्षेत्र था जिसमें मुहरें, बाट और ईंटें एक जैसी थीं। एक ही शासक था या नहीं, पता नहीं।

घरों से पहले नालियाँ क्यों?

क्योंकि नालियों की रेखा तय करती है कि घर कहाँ बनेंगे। ग्रिड के नीचे सीधी नालियाँ दिखाती हैं कि योजना पहले बनी।

कैसे पता कि बाट मानक थे?

एकदम एक जैसे आकार के चर्ट घन दूर-दूर के कई नगरों में मिले हैं।

लिपि पढ़ी नहीं जाती, तो व्यापार का पता कैसे चला?

चीज़ों से: ओमान और मेसोपोटामिया में हड़प्पा मुहरें और मनके मिले, और मेसोपोटामिया के लेखों में मेलुहा का ज़िक्र है।

परत वाली विधि क्यों ज़रूरी है?

मिट्टी समय के साथ परतों में जमती है। परत दर परत खोदने से पुरानी और नई चीज़ें अलग रहती हैं और तारीख़ सही आती है।

नगर ख़त्म क्यों हुए?

शायद कई कारण एक साथ: नदियाँ, जलवायु, जंगल और केंद्रीय नियंत्रण का टूटना।

आरंभिक नगरीय केंद्र

यहाँ सभ्यता का मतलब है ऐसा जीवन जिसमें नगर, शिल्प, व्यापार और कोई शासन हो। इसका नाम हड़प्पा पर पड़ा, जो सबसे पहले मिला स्थल है। इसे सिंधु घाटी सभ्यता भी कहते हैं।

कब और कहाँ

स्थल सिंधु और उसकी सहायक नदियों, घग्गर-हाकरा, गुजरात आदि में फैले थे। बड़े स्थल: हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, धोलावीरा, कालीबंगन, राखीगढ़ी, लोथल। नागेश्वर और बालाकोट जैसे छोटे स्थल समुद्र के पास थे (शंख के लिए)।

भोजन और खेती

लोग गेहूँ, जौ, दाल, चना, तिल, बाजरा (गुजरात) और कुछ चावल खाते थे। हड्डियाँ बताती हैं कि मवेशी, भेड़, बकरी, भैंस, सूअर पाले जाते थे; मछली और जंगली जानवर भी खाए जाते थे। मिट्टी के हल के मॉडल और कालीबंगन का जुता खेत हल का सबूत है। नहरें (शोर्तुघई), कुएँ और जलाशय (धोलावीरा) पानी देते थे।

नियोजन, शिल्प और मुहरें

नगर योजना

मोहनजोदड़ो के दो भाग थे। दुर्ग छोटा था और कच्ची ईंटों के ऊँचे चबूतरे पर बना था। इसमें विशाल स्नानागार (ईंटों का टैंक, जिसे डामर से पानी-रोधी बनाया गया) और एक बड़ी इमारत (जिसे अक्सर मालगोदाम कहते हैं) थी। निचले शहर में घर थे। सड़कें ग्रिड में थीं। पहले नालियाँ बनीं, फिर घर। ईंटों का अनुपात तय था (लंबाई : चौड़ाई : ऊँचाई = 4 : 2 : 1)। घर आँगन के चारों ओर बने थे, सड़क की ओर खिड़की नहीं; कई घरों में अपना स्नानघर और कुआँ था।

शिल्प

चन्हुदड़ो लगभग पूरा शिल्प-नगर था। कारीगर मनके (कार्नीलियन, जैस्पर, स्फटिक, फ़यॉन्स, सेलखड़ी), शंख की चूड़ियाँ, तांबे-कांसे के औज़ार और बर्तन बनाते थे। कच्चा माल दूर से आता था: तांबा राजस्थान (खेतड़ी) और ओमान से, कार्नीलियन गुजरात से, लाजवर्द मणि अफ़गानिस्तान (शोर्तुघई) से, सोना दक्षिण भारत से।

बाट

बाट चर्ट पत्थर के छोटे घन थे, बिना निशान। छोटे बाट दुगने होते थे (1, 2, 4, 8, 16, 32…), बड़े दशमलव प्रणाली पर। कई नगरों में एक ही प्रणाली बताती है कि लेन-देन पर नियंत्रण था।

मुहरें और लिपि

मुहरें ज़्यादातर चौकोर, सेलखड़ी की, एक पशु और चिह्नों की छोटी पंक्ति वाली थीं। बोरी की गाँठ पर मिट्टी में दबाने से बनी मुद्रांकन (सीलिंग) बताती थी कि माल छुआ नहीं गया और किसने भेजा। लिपि में लगभग 375 से 400 चिह्न थे, दाएँ से बाएँ लिखी जाती थी और अब तक पढ़ी नहीं गई। हड़प्पा का माल ओमान (मगान) पहुँचता था और मेसोपोटामिया के लेख मेलुहा की बात करते हैं, जो शायद हड़प्पा क्षेत्र था।

सामाजिक जीवन, शासक और अंत

शवाधान: ज़्यादातर सादे गड्ढे; कुछ क़ब्रों में तांबे के दर्पण, मनके या शंख। यानी धन का अंतर था पर बहुत बड़ा नहीं। सोने और क़ीमती मनकों की जमाखोरी (निधि) भी अमीर मालिकों को दिखाती है।

शासन किसका? पक्का पता नहीं। योजनाबद्ध नगर, एक जैसी ईंटें और बाट बताते हैं कि कोई बड़े फ़ैसले लेता था। कुछ मानते हैं कि दुर्ग में शासक वर्ग या 'पुरोहित-राजा' रहता था; कुछ कहते हैं कई शासक थे या कोई नहीं। 'पुरोहित-राजा' सिर्फ़ एक पत्थर की मूर्ति को पुरातत्वविदों का दिया नाम है।

अंत: लगभग 1900 ई.पू. तक कई नगर छोड़ दिए गए। संभावित कारण: जलवायु बदलाव, नदियों का सूखना या रास्ता बदलना, बाढ़, वनों की कटाई और उस केंद्रीय सत्ता का टूटना जो सबको जोड़े रखती थी।

ASI और इतिहासकार: हड़प्पा की खोज

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) 1861 में बना। इसके पहले प्रमुख अलेक्ज़ैंडर कनिंघम ने 1875 में एक हड़प्पा मुहर देखी, पर उसकी उम्र नहीं समझ पाए। 1921 में दयाराम साहनी ने हड़प्पा में और 1922 में राखालदास बनर्जी ने मोहनजोदड़ो में खुदाई की। 1924 में जॉन मार्शल (ASI प्रमुख) ने दुनिया को एक नई, बहुत पुरानी सभ्यता के बारे में बताया।

मार्शल ने पूरे टीले पर बराबर क्षैतिज इकाइयों में खुदाई की और मिट्टी की परतें नहीं देखीं, इसलिए अलग-अलग समय की चीज़ें मिल गईं। आर.ई.एम. व्हीलर (1944) ने स्तर-विन्यास (मिट्टी की परतें) का पालन किया। 1947 के बाद बड़े स्थल पाकिस्तान में रह गए, तो भारतीय पुरातत्वविदों ने कई नए स्थल खोजे (कालीबंगन, लोथल, राखीगढ़ी, धोलावीरा)।

इतिहासकार अतीत को कैसे पढ़ते हैं

मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ

हल किए गए उदाहरण

1. इतिहासकार क्यों कहते हैं कि हड़प्पा नगर बनने से पहले योजना बनी?

चरण 1: नालियाँ सीधी हैं और सड़कें समकोण पर मिलती हैं। चरण 2: घर नालियों की सीध में हैं, यानी नालियाँ पहले बनीं। चरण 3: दुर्ग का चबूतरा इमारतों से पहले बना। चरण 4: कई नगरों में ईंटों का अनुपात एक है। तो किसी ने पहले से नक्शा सोचा था।

2. दुगने होते बाट हड़प्पा व्यापार के बारे में क्या बताते हैं?

चरण 1: 1, 2, 4, 8, 16 के बाट सटीक हैं और दूर-दूर के नगरों में एक जैसे हैं। चरण 2: लोथल और हड़प्पा का व्यापारी एक ही तरह तौलता था। चरण 3: इसके लिए नियम चाहिए, शायद शासक वर्ग जाँचता था। तो लेन-देन नियंत्रित था।

3. मार्शल की खुदाई की विधि में समस्या क्या थी?

चरण 1: उन्होंने पूरे टीले पर बराबर समतल पट्टियों में खोदा। चरण 2: पर ज़मीन समतल नहीं होती; पुरानी परतें ऊपर-नीचे होती हैं। चरण 3: इसलिए अलग समय की चीज़ें एक साथ गिनी गईं। चरण 4: व्हीलर ने परतों के हिसाब से खोदकर इसे सुधारा।

4. एक क़ब्र में तांबे का दर्पण और शंख के छल्ले हैं; दूसरी में केवल बर्तन। क्या निष्कर्ष निकलता है?

चरण 1: तांबा और शंख क़ीमती थे और दूर से आते थे। चरण 2: तो पहले व्यक्ति का परिवार ज़्यादा अमीर था। चरण 3: पर ज़्यादातर क़ब्रें सादी हैं, तो अंतर छोटा था। निष्कर्ष: कुछ सामाजिक अंतर था।

आम गलतियाँ

अभ्यास क्विज़

1. विकसित हड़प्पा नगर लगभग किस समय थे?
2. कौन-सा हड़प्पा स्थल लगभग पूरा शिल्प-केंद्र था?
3. हड़प्पा के बाट ज़्यादातर किससे बने थे?
4. 1924 में नई सभ्यता की घोषणा किसने की?
5. बोरी पर मिट्टी में दबाई मुहर का काम था:

अभ्यास: खुद जवाब दो

अपना जवाब लिखो या चुनो, फिर जाँचें दबाओ। अटको तो संकेत देखो; जवाब देने के बाद पूरा हल दिखेगा।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

हड़प्पा नगर योजना की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं?

ऊँचा दुर्ग और निचला शहर, ग्रिड सड़कें, ढकी नालियाँ, मानक ईंटें और आँगन वाले घर।

हड़प्पा मुहरों का उपयोग किसलिए होता था?

माल पर मिट्टी की छाप लगाने के लिए, जिससे भेजने वाले का पता चलता और माल खुला नहीं है, यह साबित होता; इससे दूर का व्यापार आसान हुआ।

हड़प्पा सभ्यता की खोज किसने की?

1921 में दयाराम साहनी ने हड़प्पा और 1922 में राखालदास बनर्जी ने मोहनजोदड़ो खोदा; 1924 में ASI के जॉन मार्शल ने नई सभ्यता की घोषणा की।

यह कहाँ पढ़ाया जाता है

सीबीएसई (भारत)कक्षा 12भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग-1

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