संविधान सभा: उथल-पुथल का समय
उम्मीद और डर के साल
संविधान 1946 से 1949 के बीच लिखा गया। भारत आज़ाद हो रहा था, पर बँटवारे से दंगे हुए और करोड़ों लोग उजड़े। रियासतों को भी भारत में मिलाना था। इसलिए सदस्य ऐसा संविधान चाहते थे जो देश को जोड़े रखे और सबको न्याय दे।
इसे किसने बनाया
सभा को सभी लोगों ने सीधे नहीं चुना था। इसके सदस्य 1946 में चुनी गई प्रांतीय विधानसभाओं ने चुने। ज़्यादातर सीटें कांग्रेस की थीं, पर सदस्यों के विचार बहुत अलग-अलग थे, समाजवादी से लेकर परंपरावादी तक। बँटवारे के बाद लगभग 300 सदस्यों ने भाग लिया।
काम कैसे हुआ
पहली बैठक 9 दिसंबर 1946 को हुई। सभा ने 11 सत्रों में 165 दिन काम किया। बहसें अख़बारों में छपती थीं और जनता सुझाव भेजती थी। संविधान 26 नवंबर 1949 को अपनाया गया और 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ।
मुख्य आवाज़ें
- जवाहरलाल नेहरू ने 13 दिसंबर 1946 को उद्देश्य प्रस्ताव रखा। इसमें कहा गया कि भारत एक स्वतंत्र संप्रभु गणराज्य होगा, जो अपने लोगों को न्याय, बराबरी और आज़ादी देगा और अल्पसंख्यकों, पिछड़े वर्गों और आदिवासियों की रक्षा करेगा।
- डॉ. बी.आर. आंबेडकर, वकील और दलित वर्गों के नेता, प्रारूप समिति के अध्यक्ष थे। उन्होंने मसौदे को सभा में आगे बढ़ाया।
- डॉ. राजेंद्र प्रसाद सभा के अध्यक्ष थे।
- बी.एन. राऊ संवैधानिक सलाहकार थे, और एस.एन. मुखर्जी मुख्य प्रारूपकार थे, जिन्होंने कठिन विचारों को साफ़ क़ानूनी भाषा में लिखा।
बहस 1: जनता की इच्छा और अल्पसंख्यकों के अधिकार
पृथक निर्वाचिका
पृथक निर्वाचिका का मतलब है कि किसी समुदाय के प्रतिनिधि केवल उसी समुदाय के वोटर चुनें। बी. पोकर बहादुर जैसे कुछ सदस्यों ने मुसलमानों की रक्षा के लिए इसकी माँग की। गोविंद बल्लभ पंत जैसे ज़्यादातर सदस्यों ने कहा कि इसने लोगों को बाँटा और बँटवारे तक पहुँचाया। सभा ने संयुक्त निर्वाचिका चुनी: सब साथ वोट देंगे।
कमज़ोरों के लिए दूसरी आवाज़ें
- एन.जी. रंगा ने कहा कि असली अल्पसंख्यक ग़रीब और किसान हैं, जिन्हें सिर्फ़ बातें नहीं, आर्थिक हक़ चाहिए।
- जयपाल सिंह ने आदिवासियों की ओर से उनकी ज़मीन की रक्षा और विधानसभाओं में सीटों की माँग की।
- जे. नागप्पा और आंबेडकर जैसे दलित वर्गों के नेताओं ने कहा कि छुआछूत क़ानून से ख़त्म हो।
फ़ैसला: छुआछूत ख़त्म की गई, मंदिर सबके लिए खुले, और अनुसूचित जातियों व जनजातियों को आरक्षित सीटें और नौकरियाँ मिलीं।
बहस 2: केंद्र और राज्यों की शक्तियाँ
मसौदे में विषयों की तीन सूचियाँ थीं:
- संघ सूची (97 विषय, जैसे रक्षा और विदेश मामले): क़ानून केवल केंद्र बनाएगा।
- राज्य सूची (66 विषय, जैसे पुलिस और स्थानीय शासन): क़ानून केवल राज्य बनाएँगे।
- समवर्ती सूची (47 विषय): दोनों क़ानून बना सकते हैं।
मद्रास के के. संथानम ने कहा कि राज्यों को भी पर्याप्त पैसा और अधिकार चाहिए, वरना वे नाकाम होंगे। पर बँटवारे की हिंसा के बाद आंबेडकर समेत ज़्यादातर सदस्य शांति बनाए रखने और अर्थव्यवस्था की योजना के लिए मज़बूत केंद्र चाहते थे। आपातकालीन शक्तियों से संकट में केंद्र सब सँभाल सकता था।
बहस 3: राष्ट्र की भाषा
गांधीजी हिंदुस्तानी चाहते थे, जो हिंदी और उर्दू का मेल है और आम लोग बोलते थे। बँटवारे के बाद आर.वी. धुलेकर जैसे कुछ सदस्यों ने ज़ोर देकर हिंदी की माँग की। दक्षिण की श्रीमती जी. दुर्गाबाई जैसी सदस्यों को डर था कि हिंदी उन पर थोपी जाएगी। कुछ ने समय और सब भाषाओं के सम्मान की बात की।
समझौता: देवनागरी लिपि में हिंदी राजभाषा होगी, पर बदलाव धीरे होगा। सरकारी काम में अंग्रेज़ी 15 साल और चलेगी। हर राज्य अपने काम के लिए अपनी भाषा चुन सकता है।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- संविधान सभा: 9 दिसंबर 1946 → 26 नवंबर 1949 (अपनाया) → 26 जनवरी 1950 (लागू)
- 11 सत्र, 165 दिन की बैठकें
- उद्देश्य प्रस्ताव = नेहरू, 13 दिसंबर 1946
- पृथक निर्वाचिका = समुदाय सिर्फ़ अपने सदस्य चुने; संयुक्त निर्वाचिका = सब साथ वोट दें
- तीन सूचियाँ = संघ 97, राज्य 66, समवर्ती 47 (मूल)
- भाषा समझौता = हिंदी (देवनागरी) राजभाषा + अंग्रेज़ी 15 साल
हल किए गए उदाहरण
1. ज़्यादातर सदस्यों ने पृथक निर्वाचिका क्यों ठुकराई?
उन्हें लगता था कि पृथक निर्वाचिका ने भारतीयों को धर्म के आधार पर बाँटा और बँटवारे की ओर धकेला। वे चाहते थे कि नागरिक एक राष्ट्र के रूप में साथ वोट दें, और कमज़ोर वर्गों की रक्षा आरक्षित सीटों से हो।
2. सभा ने मज़बूत केंद्र क्यों चुना?
बँटवारे से दंगे हुए और देश टूटने का डर था। मज़बूत केंद्र व्यवस्था बनाए रख सकता था, रियासतों को मिला सकता था और आर्थिक विकास की योजना बना सकता था। इसलिए संघ सूची सबसे बड़ी बनाई गई।
3. भाषा का समझौता क्या था?
देवनागरी में हिंदी राजभाषा बनी, पर धीरे-धीरे। सरकारी काम में अंग्रेज़ी 15 साल और चली, और राज्य अपनी भाषा चुन सकते थे। इससे राष्ट्रभाषा की इच्छा और ग़ैर-हिंदी भाषियों के डर, दोनों का सम्मान हुआ।
4. सभा की बहसें सार्वजनिक क्यों की गईं?
ताकि लोग पढ़ें, चर्चा करें और सुझाव भेजें। इससे संविधान को जनता का समर्थन मिलता और वह लोगों का अपना दस्तावेज़ लगता।
आम गलतियाँ
- यह कहना कि सभा को सभी वयस्कों ने सीधे चुना। सदस्य प्रांतीय विधानसभाओं ने चुने थे।
- तारीख़ें मिलाना: 26 नवंबर 1949 को अपनाया, 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ।
- यह मानना कि सभा ने पृथक निर्वाचिका रखी। उसे ठुकराया गया, पर SC और ST के लिए आरक्षित सीटें रखी गईं।
- यह कहना कि हिंदी ने तुरंत अंग्रेज़ी की जगह ले ली। अंग्रेज़ी 15 साल और चली।