मुग़ल साम्राज्य में खेतिहर समाज (16वीं-17वीं सदी)
खेतिहर यानी खेती और ज़मीन से जुड़ा। 16वीं-17वीं सदी में भारत के लगभग 85 प्रतिशत लोग गाँवों में रहते थे। ज़्यादातर किसान थे।
हमारे स्रोत
- अबुल फ़ज़ल की आइन-ए-अकबरी, 1598 में पूरी हुई। यह अकबरनामा का तीसरा भाग है। इसमें शासन, ज़मीन के प्रकार, फ़सलें और राजस्व दर्ज हैं।
- गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान के 17वीं-18वीं सदी के राजस्व दस्तावेज़।
- पूर्वी भारत की खेती पर ईस्ट इंडिया कंपनी के रिकॉर्ड।
आइन दरबार की तरफ़ से लिखी गई, इसलिए यह राज्य क्या चाहता था, यह ज़्यादा बताती है, किसान क्या महसूस करते थे, यह कम।
किसान और उनकी ज़मीन
फ़ारसी स्रोतों में किसान को रैयत (बहुवचन रिआया) या मुज़रियान कहा गया, और किसान या आसामी भी।
- खुद-काश्त: जो किसान उसी गाँव में रहते थे जहाँ उनकी ज़मीन थी।
- पाहि-काश्त: जो दूसरे गाँव में ठेके पर खेती करते, कभी ग़रीबी में, कभी बेहतर शर्तों की तलाश में।
- अमीर किसान के पास कई हल-बैल होते; ग़रीब के पास बस ज़मीन और एक जोड़ी बैल, या उससे भी कम।
खेती और सिंचाई
ज़मीन बहुत थी, इसलिए गाँव जंगलों की ओर फैले। खेती ज़्यादातर मानसून पर टिकी थी। ज़्यादा पानी वाली फ़सलों के लिए कुएँ, तालाब और नहरें थीं। शाहजहाँ ने पंजाब में शाह नहर जैसी पुरानी नहरें ठीक करवाईं। किसान हल्का लकड़ी का हल और कहीं-कहीं पानी खींचने को रहट चलाते थे।
फ़सलें
दो मुख्य मौसम: ख़रीफ़ (पतझड़) और रबी (बसंत)। कई जगह साल में दो फ़सलें। अनाज के अलावा जिन्स-ए-कामिल (उम्दा फ़सलें) यानी नक़दी फ़सलें जैसे कपास और गन्ना, जिनसे ज़्यादा राजस्व मिलता। दुनिया के व्यापार से अमेरिका की नई फ़सलें आईं: मक्का, तंबाकू, मिर्च, आलू, टमाटर।
गाँव का समुदाय और पंचायत
- गाँव में कौन रहता था: किसान, भूमिहीन मज़दूर (अक्सर नीची मानी गई जातियों से), और कुम्हार, लोहार, बढ़ई, नाई जैसे कारीगर। कारीगरों को सेवा के बदले नक़द की जगह फ़सल का हिस्सा या ज़मीन का टुकड़ा मिलता, जिसे बाद में जजमानी कहा गया।
- पंचायत बुज़ुर्गों की सभा थी। मुखिया मुक़द्दम या मंडल कहलाता, जिसे बुज़ुर्ग चुनते और ज़मींदार मंज़ूरी देता। पटवारी गाँव का हिसाब रखता।
- पंचायत का साझा कोष मेहमानों, बाढ़ और सामूहिक काम पर ख़र्च होता। वह जाति के नियम मनवाती, झगड़े सुलझाती, जुर्माना लगाती या बाहर निकाल देती।
- हर जाति की अपनी पंचायत भी होती थी।
- किसान अन्यायी कर या अधिकारियों के ख़िलाफ़ पंचायत में अर्ज़ी दे सकते थे।
औरतें
औरतें मर्दों के साथ बुआई, निराई, कटाई, कताई, मिट्टी के बर्तन और कढ़ाई करती थीं। काम में ज़्यादा हाथ चाहिए थे, इसलिए औरतों की क़द्र थी, और कुछ समूहों में वर पक्ष दुल्हन की क़ीमत देता था। कुछ औरतें ज़मीन विरासत में पातीं और बेचती भी थीं।
जंगल और जनजातियाँ
बड़े जंगल (जंगल) फैले थे। जंगल के लोग शिकार करते, शहद, मोम, गोंद जमा करते और हाथियों का व्यापार करते। राज्य को जंगल की चीज़ें चाहिए थीं और कभी जंगल के सरदारों से पेशकश (भेंट) ली जाती। मुग़ल शिकार से बादशाह अपने इलाक़ों में घूमता और शिकायतें सुनता।
ज़मींदार
ज़मींदार आम किसानों से ऊपर के भू-स्वामी थे। वे ख़ुद खेती नहीं करते, पर गाँवों में उनकी बहुत ताक़त थी।
- उनकी निजी ज़मीन मिल्कियत कहलाती, जिसे मज़दूर जोतते; वे इसे बेच या विरासत में दे सकते थे।
- वे राज्य के लिए राजस्व वसूलते और हिस्सा पाते।
- कई के पास क़िले और हथियारबंद लोग थे: सैनिक, घोड़े, बंदूकें।
- कई ऊँची जातियों से, कुछ स्थानीय योद्धा समूहों से थे; कुछ नई ज़मीन बसाकर ज़मींदार बने।
- वे गाँव बसाते, कर्ज़ और बीज देते, बाज़ार चलाते। पर कठोर भी हो सकते थे। जब राज्य ज़्यादा दबाता, तो कभी वे किसान विद्रोह की अगुआई भी करते।
राज्य और खेती: भू-राजस्व
भू-राजस्व मुग़ल साम्राज्य की मुख्य आमदनी था। राज्य फ़सल का हिस्सा, अक्सर लगभग एक-तिहाई, लेता था।
कैसे चलता था
- दो चरण: जमा = तय की गई रक़म (माँग), और हासिल = असल में वसूली गई रक़म।
- राजस्व वसूलने वाला अमील-गुज़ार था। उसे नक़द पर ज़ोर देने को कहा गया, पर फ़सल भी ली जा सकती थी।
- अकबर के समय राजा टोडरमल ने ज़मीन नापने और दरें तय करने में मदद की (ज़ब्त व्यवस्था)। पहले रस्सी से, बाद में लोहे के छल्लों वाले बाँस से नाप होती।
आइन में ज़मीन के चार प्रकार
- पोलज: हर साल खेती, कभी ख़ाली नहीं छोड़ी।
- परौती: ताक़त लौटाने को थोड़े समय ख़ाली छोड़ी।
- चचर: तीन-चार साल ख़ाली छोड़ी।
- बंजर: पाँच साल या ज़्यादा ख़ाली छोड़ी।
पोलज और परौती को फिर अच्छी, मध्यम और ख़राब में बाँटा गया। हर प्रकार और फ़सल की दर तय थी।
मनसबदार और चाँदी का बहाव
राजस्व से मनसबदारों को वेतन मिलता, जो पद (मनसब) वाले अफ़सर थे और घुड़सवार रखते थे। कई को किसी इलाक़े का राजस्व लेने का हक़ (जागीर) मिलता। उधर दुनिया के व्यापार से अमेरिका की ढेर सारी चाँदी भारतीय सामान के बदले भारत आई। इससे नक़द में कर लेना आसान हुआ और बाज़ार चहल-पहल वाले हुए।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- आइन-ए-अकबरी: अबुल फ़ज़ल, 1598, अकबरनामा का तीसरा भाग
- खुद-काश्त = गाँव में रहने वाला मालिक किसान; पाहि-काश्त = दूसरे गाँव का किसान
- जमा = तय राजस्व; हासिल = वसूला गया राजस्व
- ज़मीन: पोलज (हर साल) → परौती (थोड़ा आराम) → चचर (3-4 साल) → बंजर (5+ साल)
- राजस्व अक्सर ≈ फ़सल का 1/3; जिन्स-ए-कामिल = नक़दी फ़सलें (कपास, गन्ना)
- गाँव: पंचायत, मुक़द्दम/मंडल (मुखिया), पटवारी (हिसाब रखने वाला)
हल किए गए उदाहरण
1. एक खेत में 90 मन अनाज हुआ। राज्य एक-तिहाई लेता है। किसान के पास कितना बचा?
चरण 1: 90 का एक-तिहाई = 90 ÷ 3 = 30 मन राज्य को। चरण 2: 90 - 30 = 60 मन। किसान के पास 60 मन बचे।
2. जमा 300 रुपये, पर वसूली 240। हासिल और कमी कितनी?
चरण 1: हासिल = 240। चरण 2: कमी = 300 - 240 = 60। चरण 3: प्रतिशत में 60 ÷ 300 = 20 प्रतिशत कम।
3. एक खेत 4 साल ख़ाली रहा। वह किस प्रकार की ज़मीन है?
चरण 1: पोलज कभी ख़ाली नहीं रहती। चरण 2: परौती थोड़े समय। चरण 3: चचर 3 से 4 साल। इसलिए चचर।
4. राज्य जिन्स-ए-कामिल क्यों पसंद करता था?
चरण 1: कपास और गन्ना ज़्यादा दाम में बिकते। चरण 2: उसी हिस्से पर ज़्यादा राजस्व मिलता। चरण 3: इसलिए राज्य इन्हें बढ़ावा देता।
आम गलतियाँ
- खुद-काश्त और पाहि-काश्त उलटना। खुद = अपना गाँव; पाहि = बाहर से।
- जमा और हासिल को एक मानना। जमा माँग है; हासिल असल वसूली।
- ज़मींदारों को आम किसान कहना। वे हक़, क़िले और सैनिकों वाले भू-स्वामी थे।
- आइन-ए-अकबरी को किसानों की नज़र मानना। यह दरबार के लिए लिखी गई।