विदेशी यात्रियों की नज़र में सामाजिक जीवन (लगभग 10वीं से 17वीं सदी)
यात्रा-वृत्तांत वह किताब है जो कोई यात्री घूमी हुई जगहों के बारे में लिखता है। लगभग 1000 से 1700 ई. के बीच मध्य एशिया, उत्तरी अफ़्रीका और यूरोप से लोग भारत आए: विद्वान, व्यापारी, सैनिक, पादरी, डॉक्टर।
इतिहासकारों के लिए क्यों काम के
- ये रोज़ की ज़िंदगी बताते हैं, जैसे खाना, कपड़े, बाज़ार, जिन्हें यहाँ के लेखक मामूली समझकर नहीं लिखते थे।
- ये अपने देश से तुलना करते हैं, तो फ़र्क़ साफ़ दिखता है।
- पर ये ग़लत भी समझ सकते हैं या बढ़ा-चढ़ाकर लिख सकते हैं, इसलिए दूसरे स्रोतों से मिलाते हैं।
अल-बिरूनी और किताब-उल-हिंद (11वीं सदी)
अल-बिरूनी का जन्म 973 में ख़्वारिज़्म में हुआ। महमूद ग़ज़नवी उसे ग़ज़नी ले गया। वहाँ उसने संस्कृत सीखी और धर्म, खगोल और चिकित्सा की भारतीय किताबें पढ़ीं।
उसकी किताब
अरबी में लिखी किताब-उल-हिंद में 80 अध्याय हैं: धर्म, त्योहार, रीति-रिवाज, माप-तौल, क़ानून। हर अध्याय में पहले सवाल, फिर संस्कृत ग्रंथों से जवाब, फिर दूसरी संस्कृतियों से तुलना।
तीन रुकावटें
- भाषा: संस्कृत अरबी-फ़ारसी से बहुत अलग थी।
- धार्मिक विश्वास और रीतियाँ अलग थीं।
- अपने में सिमटे रहना: लोग बाहर वालों से ज्ञान बाँटने में झिझकते थे।
जाति पर
उसने चार वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) बताए और इन्हें पुराने फ़ारस के सामाजिक वर्गों जैसा माना। पर उसने अपवित्रता (छूने से अशुद्ध होना) की बात नहीं मानी। उसने कहा प्रकृति ख़ुद चीज़ों को साफ़ करती रहती है, जैसे सूरज हवा को। उसने ज़्यादातर ब्राह्मणों के लिखे संस्कृत ग्रंथ पढ़े, इसलिए उसकी तस्वीर ग्रंथों वाली आदर्श व्यवस्था की है, हमेशा असली ज़िंदगी की नहीं।
इब्न बतूता और रिहला (14वीं सदी)
इब्न बतूता मोरक्को के तंजियर शहर से था। उसे किताबों से ज़्यादा घूमना पसंद था। वह 1333 में सिंध पहुँचा। सुल्तान मुहम्मद बिन तुग़लक़ ने उसे दिल्ली का क़ाज़ी (न्यायाधीश) बनाया, फिर दूत बनाकर चीन भेजा। उसकी अरबी किताब का नाम रिहला है।
नई चीज़ें
- नारियल: उसने लिखा इसका खोल आदमी के सिर जैसा दिखता है।
- पान: खाने के बाद खाया जाने वाला पत्ता।
शहर और व्यापार
शहर भीड़ भरे और समृद्ध थे, बाज़ार भरे रहते थे। दिल्ली और दौलताबाद बहुत बड़े थे। बाज़ारों में संगीत-नाच भी होता था। सूती और रेशमी कपड़ा दूर-दूर बिकता था।
डाक व्यवस्था
दो तरह की: घोड़ों वाली डाक (उलुक़), जिसमें हर कुछ मील पर घोड़े बदलते, और पैदल डाक (दावा), जिसमें हर तिहाई मील पर धावक बदलते। सिंध से दिल्ली की ख़बर 5 दिन में पहुँचती, जबकि पैदल 50 दिन लगते।
दास
बाज़ारों में दास खुले आम बिकते और तोहफ़े में दिए जाते थे। कई दासियाँ घरों में काम करती थीं, कुछ अच्छी गायिकाएँ थीं। कुछ दास सुल्तान के जासूस भी थे।
फ्रांस्वा बर्नियर: भारत और यूरोप की तुलना (17वीं सदी)
फ्रांस्वा बर्नियर फ्रांस का डॉक्टर और विचारक था। वह 1656 से 1668 तक भारत में रहा। वह शहज़ादा दारा शिकोह का डॉक्टर था। उसकी किताब है ट्रैवल्स इन द मुग़ल एम्पायर।
उसका तरीक़ा: तुलना
वह भारत की तुलना यूरोप, ख़ासकर फ्रांस से करता था और अक्सर यूरोप को बेहतर दिखाता था, ताकि यूरोप के राजा सबक लें।
ज़मीन का सवाल
बर्नियर के अनुसार सारी ज़मीन बादशाह की थी। इसलिए कोई ज़मीन बच्चों को नहीं दे सकता था, कोई उसे सुधारता नहीं था, खेती गिरी और लोग ग़रीब हुए। उसने कहा यहाँ सिर्फ़ दो वर्ग हैं: बहुत अमीर शासक और बहुत ग़रीब जनता।
इसी से यूरोप में प्राच्य निरंकुशवाद (पूर्व के राजा सर्वशक्तिमान, जनता ग़रीब) का विचार बढ़ा। पर मुग़ल दस्तावेज़ बताते हैं कि ज़मीन पर हक़ थे, ज़मीन बिकती और विरासत में मिलती थी। इसलिए बर्नियर सही नहीं था।
शहर और कारीगर
उसने मुग़ल शहरों को 'शिविर नगर' कहा जो दरबार पर टिके थे। पर उसने माना कि कारीगर बढ़िया चीज़ें बनाते थे और दुनिया भर से सोना-चाँदी भारत आता था। व्यापारी और डॉक्टर-शिक्षक जैसा मध्य वर्ग भी था।
औरतें
उसने सती (विधवा को पति के साथ जलाना) पर दुख और हैरानी से लिखा। पर औरतों का जीवन सिर्फ़ इतना नहीं था: वे खेती, व्यापार और शिल्प में काम करती थीं; कुछ अमीर औरतें व्यापार करती थीं और अदालत भी जाती थीं।
यात्रियों को सावधानी से पढ़ना
- उन्होंने क्या देखा, यह उनके अपने देश पर निर्भर था। अल-बिरूनी विद्वान, इब्न बतूता घुमक्कड़, बर्नियर यूरोपीय विचारक।
- क्या छूटा: ज़्यादातर राजाओं और अमीरों से मिले, आम किसानों से नहीं।
- हम क्या करते हैं: उनकी बातें दरबारी रिकॉर्ड, अभिलेख और स्थानीय किताबों से मिलाते हैं।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- अल-बिरूनी: जन्म 973, ख़्वारिज़्म; किताब-उल-हिंद (अरबी), 11वीं सदी
- इब्न बतूता: तंजियर, मोरक्को; 1333 से भारत में; रिहला (अरबी)
- फ्रांस्वा बर्नियर: फ्रांसीसी डॉक्टर; 1656 से 1668 भारत में
- उलुक़ = घोड़ा डाक; दावा = पैदल डाक
- प्राच्य निरंकुशवाद = एशिया के राजा सर्वशक्तिमान, प्रजा ग़रीब, यह यूरोपीय विचार
हल किए गए उदाहरण
1. अल-बिरूनी को भारत समझने में कठिनाई क्यों हुई?
चरण 1: उसने तीन रुकावटें बताईं। चरण 2: भाषा (संस्कृत बहुत अलग)। चरण 3: अलग धार्मिक विचार। चरण 4: लोग बाहर वालों से बात नहीं बाँटते थे। पहली रुकावट पार करने के लिए उसने संस्कृत सीखी।
2. पैदल चलने की तुलना में डाक कितनी तेज़ थी?
चरण 1: पैदल 50 दिन। चरण 2: घोड़ा डाक 5 दिन। चरण 3: 50 ÷ 5 = 10। यानी लगभग 10 गुना तेज़।
3. इतिहासकार क्यों कहते हैं कि ज़मीन पर बर्नियर ग़लत था?
चरण 1: उसने कहा सारी ज़मीन बादशाह की। चरण 2: मुग़ल दस्तावेज़ किसानों और ज़मींदारों के हक़ दिखाते हैं। चरण 3: ज़मीन बिकती-ख़रीदी और विरासत में मिलती थी। चरण 4: उसकी बात यूरोप को चेताने वाली एकतरफ़ा तुलना थी।
4. जाति पर अल-बिरूनी की राय ग्रंथों से कैसे अलग थी?
चरण 1: ग्रंथ कहते थे छूने से अपवित्रता होती है। चरण 2: उसने चार वर्ण माने, फ़ारस जैसे। चरण 3: पर अपवित्रता नहीं मानी, क्योंकि प्रकृति सब साफ़ करती है।
आम गलतियाँ
- क्रम उलटना। पहले अल-बिरूनी (11वीं), फिर इब्न बतूता (14वीं), फिर बर्नियर (17वीं)।
- किताब-उल-हिंद को इब्न बतूता की मानना। वह अल-बिरूनी की है; इब्न बतूता ने रिहला लिखी।
- बर्नियर की हर बात मान लेना। सारी ज़मीन बादशाह की होने की बात दस्तावेज़ों से साबित नहीं होती।
- यह सोचना कि यात्री सबसे मिले। वे ज़्यादातर राजाओं, अमीरों और व्यापारियों से मिले।