राजनीतिक बदलाव: जनपद से साम्राज्य तक
छठी सदी ई.पू. एक मोड़ है: आरंभिक राज्य, नगर, लोहे के औज़ार, सिक्के और बौद्ध व जैन जैसे नए धर्म।
सोलह महाजनपद
बौद्ध और जैन ग्रंथ 16 महाजनपदों की सूची देते हैं, जैसे वज्जि, मगध, कोशल, कुरु, पांचाल, गांधार और अवंति। ज़्यादातर में राजा थे। कुछ, जिन्हें गण या संघ कहते हैं, में पुरुषों का एक समूह शासन करता था (जैसे वज्जि)। हर एक की क़िलेबंद राजधानी थी। शासक कर और भेंट लेते और सेना रखते थे। ब्राह्मणों ने धर्मसूत्र लिखे, जिनमें राजा के नियम थे; आदर्श रूप से राजा क्षत्रिय होना चाहिए था।
मगध ताक़तवर क्यों बना
- गंगा घाटी की बहुत उपजाऊ ज़मीन।
- लोहे की खानें (आज के झारखंड में), औज़ार और हथियार के लिए।
- सेना के लिए जंगलों से हाथी।
- सस्ते आवागमन के लिए गंगा और उसकी सहायक नदियाँ।
- महत्वाकांक्षी राजा (बिंबिसार, अजातशत्रु, महापद्म नंद) और योग्य मंत्री।
राजधानी: पहाड़ी क़िला राजगाह (राजगीर), बाद में चौथी सदी ई.पू. में पाटलिपुत्र (पटना)।
मौर्य साम्राज्य
चंद्रगुप्त मौर्य ने लगभग 321 ई.पू. में इसकी नींव रखी। स्रोत: मेगस्थनीज़ का विवरण (इंडिका, टुकड़ों में), अर्थशास्त्र (जिसके भाग कौटिल्य से जुड़े हैं), बाद के बौद्ध, जैन व पौराणिक ग्रंथ, और अशोक के अभिलेख। पाँच बड़े राजनीतिक केंद्र: पाटलिपुत्र, तक्षशिला, उज्जयिनी, तोसलि और सुवर्णगिरि। सेना के लिए छह उपसमितियों वाली एक समिति थी (नौसेना, यातायात, पैदल, घुड़सवार, रथ, हाथी)। राजधानी के पास नियंत्रण मज़बूत, दूर कमज़ोर था।
अशोक (अभिलेखों से जनता से बात करने वाला पहला शासक) ने धम्म फैलाया: बड़ों का आदर, दासों और सेवकों से अच्छा व्यवहार, ब्राह्मणों और भिक्षुओं को दान, और दूसरे धर्मों का सम्मान। धम्म महामात्त नाम के अधिकारी इसे फैलाते थे। 19वीं-20वीं सदी में इतिहासकारों ने मौर्यों को महान साम्राज्य माना, पर यह लगभग 150 साल ही चला।
राजत्व के नए विचार
- सुदूर दक्षिण में चोल, चेर, पांड्य सरदारियाँ (तमिल संगम कविताएँ); दक्कन में सातवाहन।
- कुषाणों ने दैवी दर्जा माँगा: देवपुत्र उपाधि और बड़ी मूर्तियाँ (मथुरा के पास माट)।
- गुप्त (चौथी सदी ई. से): सिक्कों, अभिलेखों और प्रशस्तियों से पता चलता है, जैसे हरिषेण की लिखी इलाहाबाद स्तंभ प्रशस्ति जो समुद्रगुप्त की प्रशंसा करती है।
- कई राजाओं को सामंत (स्थानीय सरदार) सैनिक मदद देते थे।
आर्थिक बदलाव: किसान, भूमिदान और नगर
ज़्यादा उपज
राजाओं को ज़्यादा कर चाहिए था, इसलिए खेती बदली: उपजाऊ घाटियों में लोहे की फाल वाला हल, ज़्यादा उपज के लिए धान की रोपाई, सख़्त ज़मीन में कुदाल, और कुओं, तालाबों व कुछ नहरों से सिंचाई।
गाँव के समाज में अंतर
बौद्ध ग्रंथ गहपति (बड़े ज़मींदार), छोटे किसान और भूमिहीन मज़दूर (दास-कम्मकार) की बात करते हैं। तमिल ग्रंथों में वेल्लालर (ज़मींदार), उलवर (हलवाहे) और अदिमई (दास) हैं। गाँव के मुखिया का पद अक्सर वंशानुगत था।
भूमिदान
ईसवी सदी की शुरुआत से राजा भूमिदान देने लगे, ज़्यादातर धार्मिक संस्थाओं और ब्राह्मणों को, जिनका रिकॉर्ड तांबे की पट्टियों पर है। उदाहरण: रानी प्रभावती गुप्त का भूमिदान। इतिहासकारों में बहस है: दान से खेती नई ज़मीनों तक फैली, या यह राजाओं के कमज़ोर होने का संकेत था।
नगर और व्यापार
नगर नदियों और रास्तों पर बढ़े (पाटलिपुत्र, उज्जयिनी, पुहार)। शिल्पियों और व्यापारियों के संगठन श्रेणी काम संभालते थे। व्यापार रोम, दक्षिण-पूर्व एशिया और मध्य एशिया तक था (मसाले, कपड़ा, रत्न)।
सिक्के
चाँदी और तांबे के आहत सिक्के (लगभग छठी सदी ई.पू.) सबसे पहले थे। हिंद-यूनानी राजाओं ने सिक्कों पर राजा के चित्र दिए; कुषाणों ने पहली बार बड़े पैमाने पर सोने के सिक्के चलाए; गुप्त सोने के सिक्के बहुत सुंदर हैं। यौधेय जैसे गणों ने भी सिक्के चलाए। छठी सदी के बाद सोने के सिक्के कम मिलने से कुछ लोग व्यापार घटने की बात कहते हैं।
अभिलेखों को पढ़ना
अभिलेख पत्थर, धातु या मिट्टी के बर्तन जैसी कठोर सतह पर खुदा लेख है। इसमें लिखा होता है किसने आदेश दिया, क्या हुआ और कभी-कभी तारीख़।
ब्राह्मी और खरोष्ठी पढ़ना
अशोक के ज़्यादातर अभिलेख प्राकृत भाषा और ब्राह्मी लिपि (बाएँ से दाएँ) में हैं। उत्तर-पश्चिम में खरोष्ठी (दाएँ से बाएँ) चलती थी। 1838 में जेम्स प्रिंसेप (ईस्ट इंडिया कंपनी की टकसाल के अधिकारी) ने इन्हें पढ़ा; उन सिक्कों से मदद मिली जिन पर एक ही राजा का नाम यूनानी और खरोष्ठी दोनों में था। ज़्यादातर अभिलेख राजा को देवानांपिय पियदस्सी (देवताओं का प्रिय, देखने में सुंदर) कहते हैं; कुछ में सीधे अशोक नाम है, जिससे पहचान पक्की हुई।
इतिहासकार कैसे पढ़ते हैं
कोष्ठक के शब्द अनुवादक जोड़ते हैं; 'देवताओं का प्रिय' जैसी बातें उपाधियाँ हैं। इतिहासकार अभिलेखों को ग्रंथों और सिक्कों से मिलाते हैं।
अभिलेखों की सीमाएँ
- अक्षर धुंधले, टूटे या ग़ायब हो सकते हैं।
- शब्दों का सही अर्थ हमेशा साफ़ नहीं।
- सारे अभिलेख मिले या पढ़े नहीं गए।
- ये वही दर्ज करते हैं जो शासक कहना चाहते थे; रोज़ की खेती और आम जीवन ज़्यादातर ग़ायब है।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- महाजनपद = बड़ा राज्य (16 सूचीबद्ध, लगभग 600 ई.पू.)
- गण / संघ = समूह द्वारा शासित राज्य
- मगध का उदय = ज़मीन + लोहा + हाथी + गंगा + योग्य शासक
- मौर्य साम्राज्य = लगभग 321-185 ई.पू.; 5 बड़े केंद्र
- धम्म = सबके लिए अशोक की नैतिक संहिता
- प्रशस्ति = राजा की प्रशंसा में कविता
- आहत सिक्के = पहले सिक्के, चाँदी/तांबा
- ब्राह्मी = लिपि जिसे जेम्स प्रिंसेप ने 1838 में पढ़ा
हल किए गए उदाहरण
1. मगध के सबसे ताक़तवर महाजनपद बनने के चार कारण बताओ।
1. गंगा घाटी की उपजाऊ ज़मीन से बड़ी फ़सल और कर। 2. पास की लोहे की खानों से औज़ार और हथियार। 3. जंगलों से सेना के लिए हाथी। 4. गंगा से सस्ता आवागमन। साथ ही महत्वाकांक्षी राजाओं और मंत्रियों ने इनका अच्छा उपयोग किया।
2. कैसे पता चला कि अभिलेखों का 'पियदस्सी' अशोक है?
चरण 1: ज़्यादातर अभिलेख केवल उपाधि देवानांपिय पियदस्सी लिखते हैं। चरण 2: कुछ अभिलेखों (जैसे मास्की) में उपाधि के साथ अशोक नाम भी है। चरण 3: ग्रंथ भी अशोक का वर्णन करते हैं। तो उपाधियाँ अशोक की हैं।
3. प्रशस्ति साधारण ऐतिहासिक रिकॉर्ड से कैसे अलग है?
प्रशस्ति दरबारी कवि राजा की प्रशंसा में लिखता है, इसलिए राजा को वीर, दानी और अजेय दिखाती है। इतिहासकार को इसे सावधानी से, सिक्कों और दूसरे स्रोतों से मिलाकर पढ़ना चाहिए, क्योंकि इसमें हार और समस्याएँ छिप जाती हैं।
4. भूमिदान पर इतिहासकारों में बहस क्यों है?
मत 1: दान से खेती जंगल और नई ज़मीनों तक फैली, क्योंकि ब्राह्मण वहाँ बसे। मत 2: दान दिखाते हैं कि राजा कमज़ोर थे और स्थानीय ताक़तवर लोगों का समर्थन पाने के लिए ज़मीन देते थे। दोनों के सबूत हैं।
आम गलतियाँ
- मान लेना कि सभी महाजनपदों में राजा थे। कुछ गण थे, जिनमें समूह शासन करता था।
- अशोक के धम्म को नया धर्म कहना। यह नैतिक संहिता थी, देवता या कर्मकांड वाला धर्म नहीं।
- प्रशस्तियों को निष्पक्ष इतिहास मानना। ये प्रशंसा-काव्य हैं।
- सोचना कि अभिलेख पूरी कहानी बताते हैं। ये ज़्यादातर शासकों का नज़रिया दिखाते हैं।