पूर्वी कला और संस्कृति क्या है?
"पूर्वी कला" एशिया की कला का नाम है: भारत, चीन, कोरिया, जापान, दक्षिण-पूर्व एशिया और बहुत कुछ। यह एक शैली नहीं, एक बड़ा परिवार है। इन देशों के लोग व्यापार करते थे, विश्वास साझा करते थे और एक-दूसरे से सीखते थे, इसलिए इनमें आपसी जुड़ाव दिखता है। फिर भी हर जगह का अपना स्वाद रहा।
यहाँ कला रोज़ के जीवन और पूजा के लिए बनती थी: मंदिर, चित्र-पट, बर्तन, कपड़े, चाय के कटोरे और ऐसी छपाइयाँ जो हर कोई ख़रीद सके।
भारत: मंदिर, मूर्ति और चित्र
भारतीय कला में पत्थर की नक्काशी बहुत है। बौद्ध स्तूप, गुफा-मंदिर और बाद के हिंदू मंदिर सीढ़ीदार मीनार जैसे ऊपर उठते हैं। दीवारों पर बनी आकृतियाँ कहानियाँ सुनाती हैं। गुफा की दीवार के चित्र (जैसे अजंता) और छोटे लघु-चित्र दरबार और कथाओं को चटक रंगों में दिखाते हैं।
कई भारतीय कलाओं में नृत्य जैसी लय और बहती रेखा दिखती है। यहाँ कला और धर्म बहुत पास हैं।
चीन: स्याही, सुलेख और शिल्प
चीनी चित्रकार स्याही और ब्रश से प्रेम करते हैं। प्रकृति-चित्र में ख़ाली जगह जान-बूझकर छोड़ी जाती है: वह धुंध, आसमान या पानी बन जाती है। सुलेख को चित्रकला जितना सम्मान मिलता है, क्योंकि ब्रश की रेखा लिखने वाले का मन दिखाती है। चीन काँसे, रेशम और चीनी मिट्टी (पोर्सलिन) के लिए भी मशहूर है, जो रेशम मार्ग से दुनिया भर पहुँचे।
जापान: छपाई, बाग़ और चाय
जापान ने चीन और कोरिया से विचार लिए और उन्हें सादा और शांत बना दिया। वुडब्लॉक छपाई (उकियो-ए, 1600 से 1800 के दशकों में लोकप्रिय) में लकड़ी का ठप्पा तराशकर बार-बार छापा जाता था, ताकि आम लोग भी कला ख़रीद सकें। ज़ेन बाग़ में सजी हुई रेत और कुछ पत्थर पानी और पहाड़ का एहसास कराते हैं। चाय-समारोह शांति सिखाता है। सादी और थोड़ी घिसी चीज़ में सुंदरता देखने के विचार को वाबी-साबी कहते हैं।
दक्षिण-पूर्व एशिया और विचारों की राह
दक्षिण-पूर्व एशिया में कारीगरों ने विशाल पत्थर के मंदिर बनाए: जावा में बोरोबुदुर (लगभग 800 के दशक) सीढ़ीदार बौद्ध स्मारक है; कंबोडिया में अंगकोर वाट (1100 के दशक) एक विशाल मंदिर-नगर है। बौद्ध धर्म जैसे विचार व्यापार के रास्तों से भारत से चीन, कोरिया, जापान और दक्षिण-पूर्व एशिया पहुँचे। हर देश ने उन्हें अपने विश्वासों से मिलाया, इसलिए एक ही विचार हर जगह अलग दिखता है।
खुद करके देखो
एक पतली ब्रश या पेंसिल लो। सिर्फ़ पाँच रेखाओं में एक पहाड़ बनाओ और बाक़ी पन्ना ख़ाली छोड़ दो। अब देखो: क्या ख़ाली जगह धुंध जैसी लगी? चीनी स्याही-चित्रकार ऐसे ही सोचते हैं। फिर 3D में हर परंपरा चुनो और उसकी पहचान एक वाक्य में बोलो।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- भारत = नक्काशीदार मंदिर और मूर्ति
- चीन = स्याही, ब्रश, सुलेख, चीनी मिट्टी
- जापान = वुडब्लॉक छपाई, ज़ेन बाग़, चाय
- दक्षिण-पूर्व एशिया = विशाल पत्थर के मंदिर
- बौद्ध धर्म: भारत से चीन, कोरिया, जापान
- रेशम मार्ग = माल और विचार ले जाने वाला व्यापार-मार्ग
हल किए गए उदाहरण
1. एक चित्र-पट पर कुछ गहरे पहाड़ और बहुत सारी ख़ाली जगह है। यह किस परंपरा का होगा और क्यों?
चीन का। वहाँ स्याही-चित्रकार ख़ाली जगह को जान-बूझकर धुंध, आसमान या पानी की तरह इस्तेमाल करते हैं।
2. जावा में लगभग 800 के दशक का एक सीढ़ीदार स्मारक है जिस पर बुद्ध की कथा की पत्थर की पट्टियाँ हैं। नाम और क्षेत्र बताओ।
बोरोबुदुर, दक्षिण-पूर्व एशिया (जावा) में। यह बौद्ध स्मारक है, छतों जैसा बना और नक्काशीदार पट्टियों वाला।
3. बुद्ध की एक ही मूर्ति भारत, चीन और जापान में अलग क्यों दिखती है?
बौद्ध धर्म हर देश पहुँचा और वहाँ के कलाकारों ने चेहरा, कपड़े और शैली अपने स्वाद और सामग्री के हिसाब से बदली। विचार वही रहा, रूप बदला।
4. वुडब्लॉक छपाई चित्र से सस्ती क्यों थी?
एक तराशे हुए ठप्पे से बहुत प्रतियाँ छप जाती हैं। चित्र हाथ से बना एक ही नमूना होता है, इसलिए महँगा पड़ता है।
आम गलतियाँ
- "पूर्वी कला" को एक ही शैली समझ लेना। यह कई परंपराओं का जुड़ा परिवार है।
- यह कहना कि स्याही-चित्र की ख़ाली जगह का मतलब चित्रकार के पास समय नहीं था। यह चुनाव है।
- देश गड़बड़ा देना: उकियो-ए छपाई जापानी है, चीनी नहीं।
- धार्मिक चित्र को सिर्फ़ सजावट मान लेना। बनाने वालों और पूजने वालों के लिए उसमें अर्थ भी है।