अभिनय के चार अंग
अभिनय का अर्थ है 'आगे ले जाना'। नर्तक कहानी और उसका भाव दर्शकों तक ले जाता है।
नाट्य के पुराने ग्रंथों में अभिनय के चार प्रकार बताए गए हैं:
- आंगिक: शरीर से अभिनय। चेहरा, आँखें, गर्दन, हाथ (मुद्राएँ), पैर और पूरे शरीर के आसन।
- वाचिक: शब्दों से अभिनय। नृत्य में यह गीत, कविता और बोले गए बोल हैं।
- आहार्य: बाहर से पहनी चीज़ें। वेशभूषा, श्रृंगार, गहने, मंच और रोशनी।
- सात्त्विक: मन का सच्चा भाव। पात्र को सच में जीने से आए आँसू, सिहरन या शर्म की लाली।
अच्छा नर्तक चारों को जोड़ता है। सुंदर वेशभूषा हो पर मन में भाव न हो, तो नृत्य खाली लगता है।
ओडिसी की दो मूल मुद्राएँ
चौका चौकोर मुद्रा है: घुटने बाहर मुड़े, बाँहें फैली। यह मज़बूत और स्थिर लगती है। त्रिभंगी का अर्थ है 'तीन मोड़': सिर, छाती और कमर उल्टी दिशाओं में मुड़ते हैं। यह मंदिर की मूर्तियों जैसी कोमल लगती है।
भाव और नौ रस
भाव वह अनुभूति है जो नर्तक दिखाता है। रस वह मनोदशा है जिसका दर्शक स्वाद लेता है। 'रस' का अर्थ ही है स्वाद।
| रस | मनोदशा | स्थायी भाव |
|---|---|---|
| श्रृंगार | प्रेम, सौंदर्य | रति (प्रेम) |
| हास्य | हँसी-मज़ाक | हास |
| करुण | दया, दुःख | शोक |
| रौद्र | प्रचंड गुस्सा | क्रोध |
| वीर | बहादुरी | उत्साह |
| भयानक | डर | भय |
| बीभत्स | घृणा | जुगुप्सा |
| अद्भुत | आश्चर्य | विस्मय |
| शांत | शांति | शम (निर्वेद) |
पहले आठ रस नाट्यशास्त्र में हैं। शांत रस बाद में जोड़ा गया, जब विद्वानों ने शांति को भी अलग रस माना।
ओडिसी की वेशभूषा और श्रृंगार
- साड़ी: अक्सर ओडिशा की हाथ-बुनी रेशमी साड़ी, चमकीले किनारों वाली। इसे ऐसे सिला जाता है कि नीचे बैठने पर पैरों के बीच पंखे जैसी चुन्नट खुल जाए।
- टाहिया: सफ़ेद शोला (पिथ) के फूलों से बना मुकुट, जो मंदिर के शिखर जैसा दिखता है। यह जूड़े पर लगता है।
- गहने: कटक की बारीक चाँदी की तारकशी: झुमके, हार, बाजूबंद, कमरबंद।
- घुँघरू: पैरों की घंटियाँ, जिनसे पद-संचालन सुनाई देता है।
- आलता: हथेलियों, उँगलियों के सिरों और तलवों पर लाल रंग, ताकि हाथ-पैर की हर हरकत उभरकर दिखे।
- आँखें: गहरे काजल से आँखों की हरकत दूर से भी दिखती है।
ओडिसी संगीत
ओडिसी नृत्य ओडिसी संगीत पर होता है, जो ओडिशा की शास्त्रीय शैली है। इसमें राग (स्वरों का समूह जिससे धुन बनती है) और ताल (मात्राओं का चक्र) होते हैं।
- मर्दल: दोनों ओर से बजने वाला ढोल। यह ताल रखता है और नृत्य के बोल बजाता है।
- बाँसुरी, वायलिन या सितार: धुन बजाते हैं।
- गिनी (मंजीरा): छोटे झाँझ, जो हर थाप पर बजते हैं।
- गायक: गीत गाता है। कई गीत जयदेव के संस्कृत काव्य गीत गोविंद से आते हैं, जो राधा-कृष्ण पर है।
- गुरु अक्सर लय के बोल बोलते हैं, जिन्हें उकुटा कहते हैं (जैसे 'ता तेई ता तेई')।
ओडिसी प्रस्तुति के भाग
प्रस्तुति आमतौर पर मंगलाचरण (वंदना) से शुरू होती है, फिर शुद्ध नृत्य (बटु, पल्लवी), फिर कथा-नृत्य (अभिनय), और अंत में तेज़ नृत्य मोक्ष।
ओडिशा के लोक-नृत्य
- गोटीपुआ: लड़कियों के वेश में छोटे लड़के लचीले, कलाबाज़ी वाले आसन करते हैं। ओडिसी ने इससे कई हरकतें ली हैं।
- छऊ: मयूरभंज क्षेत्र का ज़ोरदार, युद्ध-कला जैसा नृत्य, जो महाकाव्यों की कहानियाँ कहता है।
- संबलपुरी (दलखाई सहित): पश्चिमी ओडिशा का खुशी भरा समूह-नृत्य, ढोल और निसान के साथ।
- घुमुरा: नर्तक सीने पर बँधा बड़ा घड़े जैसा ढोल बजाते हैं।
- रणप्पा: नर्तक ऊँची बाँस की बैसाखियों पर संतुलन बनाते हैं।
- और भी: दंड नाट, पाइका (योद्धा नृत्य) और चैती घोड़ा।
शास्त्रीय नृत्य लिखे नियमों और लंबे प्रशिक्षण से चलता है। लोक-नृत्य गाँव के जीवन, त्योहारों और काम से निकलता है, और उसमें कोई भी शामिल हो सकता है।
करके देखें: 3D में और घर पर
3D के आख़िरी चरण में चौका और त्रिभंगी बदलिए और स्लाइडर से नौ रस देखिए। घर पर: शीशे के सामने खड़े होइए। सिर्फ़ आँखों और भौंहों से हास्य, करुण और अद्भुत रस दिखाइए। घर के किसी सदस्य से पूछिए कि कौन-सा रस है।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- अभिनय = आंगिक (शरीर) + वाचिक (शब्द, गीत) + आहार्य (वेशभूषा, श्रृंगार) + सात्त्विक (मन का भाव)।
- भाव (नर्तक दिखाता है) → रस (दर्शक महसूस करता है)।
- नवरस: श्रृंगार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, बीभत्स, अद्भुत, शांत।
- चौका = चौकोर मुद्रा; त्रिभंगी = तीन मोड़ (सिर, छाती, कमर)।
- राग = धुन; ताल = मात्राओं का चक्र; मर्दल = ओडिसी का ढोल।
हल किए गए उदाहरण
1. राधा के अकेले इंतज़ार का दृश्य दिखाते समय नर्तकी की आँखों में सच में आँसू आ जाते हैं। यह कौन-सा अभिनय है और दर्शक कौन-सा रस महसूस करते हैं?
मन से आए सच्चे आँसू सात्त्विक अभिनय हैं। दर्शक करुण रस महसूस करते हैं, या अगर विरह के प्रेम पर ज़ोर हो तो वियोग श्रृंगार।
2. शो से पहले नर्तकी सूती अभ्यास-साड़ी बदलकर रेशमी साड़ी, टाहिया और चाँदी के गहने पहनती है। वह कौन-सा अभिनय जोड़ रही है?
आहार्य अभिनय: बाहर से पहनी जाने वाली हर चीज़, जैसे वेशभूषा, श्रृंगार और गहने।
3. ओडिसी संगीत में ताल रखने वाला वाद्य और हर थाप पर खनकने वाला वाद्य बताइए।
मर्दल (दोनों ओर से बजने वाला ढोल) ताल रखता है। गिनी या मंजीरा (छोटे झाँझ) हर थाप पर बजता है।
आम गलतियाँ
- अभिनय को सिर्फ़ चेहरे के हाव-भाव मान लेना। हाव-भाव आंगिक का हिस्सा है; अभिनय में शब्द, वेशभूषा और मन का भाव भी आता है।
- भाव और रस को एक समझना। भाव नर्तक दिखाता है; रस दर्शक महसूस करता है।
- आठ ही रस गिनना और शांत रस भूल जाना। आज ज़्यादातर गुरु नौ रस (नवरस) गिनते हैं।
- छऊ या गोटीपुआ को शास्त्रीय नृत्य कहना। ये लोक या पारंपरिक नृत्य हैं; ओडिसी शास्त्रीय नृत्य है।