कथकली के आसपास की केरल की कलाएँ
कथकली अकेले नहीं पनपी। केरल की चार पुरानी कलाओं ने इसे ढाला।
- मुडियेट्टु: देवी भद्रकाली और असुर दारिक की कथा का अनुष्ठान-नाट्य, रंगे चेहरों और बड़े मुकुट के साथ।
- तेय्यम: अनुष्ठान-नृत्य, जिसमें चमकीली वेशभूषा वाला नर्तक देवता का रूप माना जाता है।
- कूडियाट्टम: बहुत पुराना संस्कृत रंगमंच, धीमा और लंबा अभिनय।
- कलरिपयट्टु: केरल की युद्धकला। इसका शरीर-नियंत्रण और पैर उछालना कथकली की चालों में दिखता है।
केली, पुरप्पाड और कलासम
केली (केलिकोट्टु भी) शाम का ढोल है जो गाँव को बताता है कि प्रस्तुति होने वाली है। पुरप्पाड का अर्थ है "निकलना": पहला कार्यक्रम, जहाँ पात्र पकड़े हुए परदे के पीछे से आते हैं और स्वागत-नृत्य करते हैं।
कलासम कहानी के बिना शुद्ध नृत्य (नृत्त) का छोटा टुकड़ा है। यह ताल के निश्चित चक्र पर चलता है। अक्सर कलासम किसी हिस्से को समाप्त करता है, जैसे नृत्य से बना पूर्ण-विराम। चेम्पट जैसी ताल में 8 मात्राएँ होती हैं; दूसरी तालें लंबी या छोटी होती हैं।
श्रृंगार के पाँच प्रकार
चेहरे का श्रृंगार चावल के लेप, रंगों और बड़े मुकुट से बनता है। रंग बताता है कि आप कैसे पात्र को देख रहे हैं।
- पच्चा (हरा): राम, अर्जुन जैसे नेक और वीर नायक।
- कत्ती (छुरी): रावण जैसे घमंडी, ताकतवर और बुराई की झलक वाले पात्र। लाल निशान और नाक पर गाँठ।
- ताड़ी (दाढ़ी): बहुत बुरे पात्रों की लाल, हनुमान जैसे दिव्य वानर की सफ़ेद, शिकारी की काली दाढ़ी।
- करी (काला): जंगली पात्र, जैसे राक्षसियाँ और वन के शिकारी।
- मिनुक्कु (दमकता): स्त्रियों, ऋषियों और ब्राह्मणों के लिए कोमल पीला-नारंगी।
गायन और ताल-वाद्य संगीत
कथकली में कलाकार न बोलते हैं, न गाते हैं। पीछे दो गायक खड़े होकर कथा गाते हैं। पहला (पोन्नानी) चेंगिला (गोल काँसे का घंटा) और दूसरा (सिंकिडी) इलत्तालम (छोटी झाँझ) बजाकर ताल रखता है।
ताल-वाद्य ज़ोरदार और रोमांचक है: चेंडा (ऊँचा ढोल, डंडियों से बजता है), मद्दलम (बेलनाकार ढोल, हाथ से) और एडक्का (डमरू जैसा ढोल, कोमल भावों के लिए)। ये सब मिलकर नृत्य को हर मात्रा पर उठाते हैं।
करके देखो
घर पर करो। कागज़ पर सादे चेहरे बनाओ। एक को हरा रंगो और नाक पर लाल गाँठ बनाओ। दूसरे को काला करो। तीसरे को पीला-नारंगी। दोस्त को दिखाकर पूछो कि नायक कौन है, जंगली शिकारी कौन और ऋषि कौन। फिर 3D के चुनाव से अपने जवाब जाँचो।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- मुख्य शब्द: केली = शाम का ढोल-बुलावा; पुरप्पाड = पहला स्वागत-नृत्य
- कलासम = ताल पर चलने वाला शुद्ध नृत्य (जैसे चेम्पट, 8 मात्राएँ)
- श्रृंगार: पच्चा (हरा, नेक), कत्ती (घमंडी, ताकतवर), ताड़ी (दाढ़ी), करी (काला, जंगली), मिनुक्कु (दमकता, कोमल)
- गायक: पोन्नानी (चेंगिला के साथ) और सिंकिडी (इलत्तालम के साथ)
- ताल-वाद्य: चेंडा, मद्दलम, एडक्का
हल किए गए उदाहरण
1. एक पात्र का हरा चेहरा है और नाक पर लाल गाँठ। यह कौन-सा श्रृंगार है और कैसा पात्र?
कत्ती श्रृंगार: घमंडी, ताकतवर और बुराई की झलक वाला पात्र, जैसे रावण।
2. कथकली के एक पात्र की दाढ़ी सफ़ेद है। वह कौन हो सकता है?
सफ़ेद दाढ़ी वाला ताड़ी श्रृंगार: हनुमान जैसा दिव्य वानर पात्र।
3. कथकली की रात का कौन-सा हिस्सा ताल पर चलने वाला शुद्ध नृत्य है?
कलासम।
4. कौन-सा ढोल ऊँचा है और डंडियों से बजता है, कौन-सा बेलनाकार है और हाथ से?
चेंडा ऊँचा है और डंडियों से बजता है। मद्दलम बेलनाकार है और हाथों से बजता है।
आम गलतियाँ
- कत्ती का अर्थ "कटना" या "पतंग" मान लेना। कत्ती यानी छुरी, तेज़ और घमंडी पात्र का संकेत।
- यह सोचना कि कथकली के कलाकार गाते हैं। गायक पीछे गाते हैं; कलाकार मुद्राओं और चेहरे से दिखाते हैं।
- केली (शाम का ढोल) और पुरप्पाड (मंच का पहला नृत्य) को एक मान लेना।
- हर हरे चेहरे को पच्चा कहना। लाल निशान और नाक की गाँठ वाला हरा चेहरा कत्ती है।