अरैमंडी: मूल मुद्रा
अरैमंडी (अरामंडी भी लिखते हैं) का अर्थ है "आधा बैठना"। नर्तकी घुटने मोड़कर उन्हें बगल में बाहर की ओर खोलती है। एड़ियाँ पास रहती हैं, पंजे बाहर की ओर और पीठ सीधी। यह आसान दिखता है पर थका देता है, इसलिए विद्यार्थी सालों तक ताकत बनाते हैं।
यह मुद्रा क्यों? इससे शरीर नीचा और स्थिर रहता है, पैर तेज़ चल पाते हैं और ऊपरी शरीर शांत रहता है।
अडवु, सोल्लु, कोरवै और तीरमानम
अडवु शुद्ध नृत्य (नृत्त) की मूल इकाई है। इसमें एक पद-संचालन, एक हस्त-मुद्रा और एक शरीर की रेखा जुड़ती है। अडवु के परिवार होते हैं, जैसे तट्ट, नट्ट और विशरु।
सोल्लु बोले जाने वाले ताल-अक्षर हैं, जैसे ताई या ताई ही या ता का धि मि। आम तौर पर एक अक्षर के साथ एक कदम होता है।
कोरवै कई अडवुओं को जोड़कर बना लंबा क्रम है। उसका अंत तीरमानम से होता है: अंत का वाक्यांश, जो तीन बार नाचा जाता है ताकि आख़िरी कदम ठीक सम (पहली मात्रा) पर पड़े।
जाति, गति, आवर्तन और नट्टुवांगम
गति (नडै) बताती है कि एक मात्रा में कितने छोटे अंश हैं: तिस्र 3, चतुस्र 4, खंड 5, मिश्र 7, संकीर्ण 9। जाति भी यही समूह-संख्याएँ इस्तेमाल करती है। वह ताल के मुख्य भाग के आकार से ताल का नाम बताती है और सोल्लु के ताल-पैटर्न को भी जाति कहते हैं।
आवर्तन ताल का एक पूरा चक्कर है। आदि ताल में 8 मात्राएँ (4 + 2 + 2) हैं, इसलिए एक आवर्तन 8 मात्राओं का होता है।
नट्टुवांगम प्रस्तुति के संचालन की कला है। नट्टुवनार, जो अक्सर गुरु होते हैं, सोल्लु बोलते हैं और छोटी झाँझ से ताल देते हैं।
अरंगेट्रम, वेशभूषा और श्रृंगार
अरंगेट्रम सालों की सीख के बाद मंच पर पहला पूरा एकल प्रदर्शन है। शब्द का अर्थ है "मंच पर चढ़ना"।
वेशभूषा: चटक रेशमी पोशाक, जिसके आगे प्लीट वाला पंखा होता है जो अरैमंडी में घुटने मुड़ने पर खुल जाता है; मंदिर-शैली के गहने, बालों में फूल और पैरों में घुँघरू।
श्रृंगार: आँखों को गहरा रेखांकित किया जाता है ताकि पिछली पंक्ति से भी भाव दिखें; हाथ-पैर लाल अलता से रंगे जाते हैं और माथे पर बिंदी लगती है।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- अरैमंडी = आधी बैठक की मूल मुद्रा
- अडवु = नृत्त की मूल इकाई; सोल्लु = उसके बोले अक्षर
- कोरवै = अडवुओं की कड़ी जो तीरमानम पर खत्म हो
- तीरमानम = अंत का वाक्यांश, 3 बार, सम पर समाप्त
- गति: प्रति मात्रा 3, 4, 5, 7, 9 अंश
- आदि ताल = 4 + 2 + 2 = 8 मात्राएँ = 1 आवर्तन
- नट्टुवांगम = सोल्लु और झाँझ से संचालन
- अरंगेट्रम = पहला पूरा एकल मंच-प्रदर्शन
हल किए गए उदाहरण
1. तीरमानम का वाक्यांश 5 मात्राओं का है। अगर उसे बिना अंतराल के तीन बार नाचें तो कुल कितनी मात्राएँ लगेंगी?
3 गुणा 5 = 15 मात्राएँ। तीसरे वाक्यांश का आख़िरी कदम सम पर पड़ता है।
2. चतुस्र गति में 8 मात्राओं (आदि ताल का एक आवर्तन) में कितने अंश होंगे?
चतुस्र गति में प्रति मात्रा 4 अंश हैं। 8 x 4 = 32 अंश।
3. आदि ताल में 8 मात्राएँ हैं। नर्तकी 6 पूरे आवर्तन नाचती है। कुल कितनी मात्राएँ?
6 x 8 = 48 मात्राएँ।
4. हर एक का शब्द बताइए: (क) पहला मंच-प्रदर्शन, (ख) सोल्लु बोलने और ताल देने वाला व्यक्ति।
(क) अरंगेट्रम। (ख) नट्टुवनार, जो नट्टुवांगम करते हैं।
आम गलतियाँ
- अडवु और कोरवै को एक समझना: अडवु एक इकाई है, कोरवै अडवुओं की कड़ी।
- तीरमानम को एक बार का मानना। यह एक ही वाक्यांश है जो तीन बार दोहराया जाता है।
- जाति का सिर्फ़ एक अर्थ लेना। वह ताल के समूह का नाम भी है और सोल्लु-पैटर्न भी।
- गति को पूरे गीत की रफ़्तार कहना। गति एक मात्रा के भीतर के अंशों की संख्या है।