क़ानून और संस्थाओं से व्यवस्था
1603 में तोकुगावा इयेयासु शोगुन बने और उन्होंने एदो (आज का टोक्यो) में अपनी सरकार बनाई। सम्राट क्योटो में रहे और उनकी भूमिका रस्मी रही। देश दो परतों में चलता था: शोगुन की अपनी ज़मीन और दफ़्तर (बाकुफ़ु), और लगभग 260 हान (डोमेन) जिन्हें दाइम्यो चलाते थे। इस मेल को बाकुहान व्यवस्था कहते हैं।
शोगुन की सरकार क़ानूनों से व्यवस्था रखती थी। योद्धा घरानों के नियम कहते थे कि दाइम्यो बिना इजाज़त नया क़िला न बनाएँ और बिना अनुमति विवाह-संबंध न जोड़ें। मंदिरों और दरबार के लिए भी अलग नियम थे।
चार वर्ग
समाज काम के आधार पर बँटा था: समुराई (शासक और अधिकारी), किसान (जो कर देने वाला चावल उगाते थे), कारीगर और व्यापारी। समुराई दो तलवारें रख सकते थे। किसान ज़्यादातर कर चावल में देते थे। सब बराबर अमीर नहीं थे: कुछ व्यापारी बहुत धनी थे और कई समुराई तंगी में थे। कुछ लोग, जैसे बहिष्कृत समूह, इस ढाँचे के बाहर थे और उन्हें और कठिनाई झेलनी पड़ती थी।
संकिन-कोताई (बारी-बारी की हाज़िरी)
संकिन-कोताई में हर दाइम्यो को एक-एक साल बाद एदो में रहना होता था, और पत्नी-बच्चे हमेशा वहीं रहते थे। इससे शोगुन हर लॉर्ड पर नज़र रख पाता था। यात्राओं और एदो के घरों पर लॉर्ड बहुत पैसा ख़र्च करते थे। लंबे रास्तों पर सराय और शहर बस गए।
बाहरी संपर्क पर नियंत्रण
बाहर से संपर्क सीमित रखा गया: व्यापार कुछ जगहों जैसे नागासाकी में डच और चीनी लोगों से होता था, और कोरिया तथा र्यूक्यू राज्य से दूसरे रास्तों से। इससे देश में शांति बनी रही।
उद्योग, अकाल और विद्रोह
शांति और नई सड़कों से अर्थव्यवस्था बढ़ी। किसानों ने नई ज़मीन जोती, बेहतर औज़ार और खाद इस्तेमाल की, और नक़दी फ़सलें जैसे कपास, सरसों और रेशम के लिए शहतूत उगाए। कार्यशालाओं में कपड़ा, काग़ज़, साके और बर्तन बने। ओसाका (चावल के व्यापार की 'देश की रसोई') और एदो (बहुत बड़ा शहर) बड़े बाज़ार बन गए, और व्यापारी उधार देते और माल ढोते थे।
पैसे की समस्या
समुराई को वेतन चावल में मिलता था, पर रोज़ की ज़रूरतें पैसे से ख़रीदनी पड़ती थीं। चावल के दाम गिरने या ख़र्च बढ़ने पर कई समुराई व्यापारियों के क़र्ज़दार हो गए।
अकाल
खेती मौसम पर टिकी थी, इसलिए ठंडी गर्मी या बाढ़ से फ़सल बर्बाद हो सकती थी। क्योहो (1732), तेनमेई (1780 का दशक) और तेनपो (1830 का दशक) के अकालों में बहुत लोग मरे और शोगुन की सरकार को सुधार करने पड़े।
विद्रोह
चावल कम पड़ने और दाम चढ़ने पर किसान कभी-कभी ह्याकुशो इक्की (किसान विरोध) में जुड़ते थे और शहरी लोग उचिकोवाशी (चावल की दुकानों की तोड़फोड़) करते थे। ज़्यादातर विरोध कम कर या सही दामों के लिए थे, शोगुन को हटाने के लिए नहीं। फिर भी इनसे दिखा कि पुरानी व्यवस्था पर दबाव था।
3D में आज़माओ: फ़सल का स्लाइडर घटाओ और दाम व बेचैनी के खंभे बढ़ते देखो।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- शोगुन काल: 1603 से 1868 (लगभग 250 साल)
- बाकुहान व्यवस्था: शोगुन (बाकुफ़ु) + दाइम्यो के हान
- चार वर्ग: समुराई, किसान, कारीगर, व्यापारी
- संकिन-कोताई: दाइम्यो बारी-बारी से एदो में रहें, परिवार एदो में
- ख़राब फ़सल -> कम चावल -> ऊँचे दाम -> कष्ट -> विरोध
हल किए गए उदाहरण
1. शोगुन ने दाइम्यो के परिवार एदो में क्यों रखवाए?
परिवार वफ़ादारी की एक अनकही गारंटी थे। जो लॉर्ड शोगुन के विरुद्ध साज़िश करता, उसके परिवार पर ख़तरा आता, इसलिए वह विद्रोह कम करता था।
2. एक दाइम्यो बारी-बारी से 12 महीने एदो में और 12 महीने अपने हान में रहता है। 10 साल में वह कितने साल एदो में रहेगा?
वह बारी-बारी रहता है, यानी आधा समय: 10 / 2 = 5 साल एदो में।
3. समझाओ कि शांति से समुराई को परेशानी कैसे हुई।
समुराई को वेतन चावल में मिलता था, पर सामान पैसे से ख़रीदना पड़ता था। दाम बढ़ने पर चावल से कम चीज़ें आईं, और कई ने व्यापारियों से उधार लिया। शांति में योद्धा की नौकरी भी कम हुई।
आम गलतियाँ
- सोचना कि सम्राट एदो से राज करता था। एदो से शोगुन राज करता था; सम्राट क्योटो में रहा।
- कहना कि व्यापारी सबसे ऊपर थे। काग़ज़ पर वे चार वर्गों में सबसे नीचे थे, चाहे कुछ अमीर थे।
- मानना कि जापान पूरी तरह बंद था। कुछ द्वारों से सीमित और नियंत्रित संपर्क था।
- यह सोचना कि विद्रोहों का मक़सद शोगुन को हटाना था। ज़्यादातर कम कर या सस्ते चावल माँगते थे।