विदेश नीति में बदलाव और खुलना
200 साल से ज़्यादा तोकुगावा सरकार ने बाहरी संपर्क पर नियंत्रण रखा। डच और चीनी लोगों से व्यापार नागासाकी में, कोरिया से त्सुशिमा के रास्ते, और र्यूक्यू राज्य से सात्सुमा के रास्ते होता था। बाक़ी तटों से विदेशी जहाज़ लौटा दिए जाते थे।
दबाव क्यों बढ़ा
1800 के दशकों में औद्योगिक देश व्हेल पकड़ने, व्यापार और कोयले के ठिकानों के लिए प्रशांत महासागर पार जहाज़ भेजने लगे। अफ़ीम युद्ध (1840-42) में चीन की हार की ख़बर से जापानी नेताओं को डर लगा कि अगला नंबर उनका हो सकता है।
1853 और संधियाँ
1853 में अमेरिकी नौसेना के कमांडर मैथ्यू पेरी जंगी जहाज़ों और एक पत्र के साथ एदो के पास आए, जिसमें जापान से खुलने को कहा गया था। वे 1854 में फिर आए। कनागावा की संधि (1854) से दो बंदरगाह (शिमोदा और हाकोदाते) सामान की आपूर्ति के लिए खुले। 1858 में हैरिस संधि जैसी संधियों से और बंदरगाह खुले, जैसे कनागावा (योकोहामा), नागासाकी, नीगाता और ह्योगो (कोबे), और विदेशियों को वहाँ रहने व व्यापार की इजाज़त मिली।
असमान क्यों कहा गया
विदेशी लोगों पर मुक़दमा उनके अपने कौंसल चलाते थे, जापानी अदालतें नहीं (बाह्यक्षेत्रीय अधिकार, एक्स्ट्राटेरिटोरियैलिटी)। जापान अपना आयात कर ख़ुद तय नहीं कर सकता था (कोई शुल्क स्वायत्तता नहीं)। जापान ने इसे बदलने में कई दशक लगाए।
व्यापार के असर
रेशम और चाय बड़ी मात्रा में बाहर गए। सस्ता विदेशी सूती कपड़ा अंदर आया। चावल और रोज़मर्रा की चीज़ों के दाम बढ़े, और सोने-चाँदी के विनिमय से सोना बाहर जाने लगा। आम लोगों को कष्ट हुआ।
शोगुन व्यवस्था का टूटना
शोगुन की सरकार ने संधियाँ सम्राट की मंज़ूरी के बिना कीं। आलोचकों ने कहा कि शोगुन देश की रक्षा नहीं कर सका। समुराई में सोन्नो जोई ('सम्राट का सम्मान करो, विदेशियों को भगाओ') का नारा फैल गया।
भीतर से दबाव
शोगुन ने आलोचकों को सज़ा दी (अंसेई शुद्धि, 1858-59), फिर सुधार किए और मज़बूत सेना बनाने की कोशिश की। पर ताक़तवर हान, ख़ासकर सात्सुमा और चोशू, प्रतिद्वंद्वी बन गए। विदेशी जहाज़ों से टकराव के बाद दोनों ने देखा कि पुराने हथियार कमज़ोर हैं और 'भगाओ' की जगह 'पश्चिम से सीखो' की ओर आए। 1866 में दोनों हान ने गठबंधन किया।
अंत
1867 के अंत में अंतिम शोगुन तोकुगावा योशिनोबु ने सत्ता सम्राट को लौटा दी। जनवरी 1868 में नई सरकार ने शाही शासन की 'बहाली' घोषित की, और एक छोटे गृहयुद्ध (बोशिन युद्ध, 1868-69) से पुरानी व्यवस्था ख़त्म हुई। 1603 से 1868 तक की शोगुन व्यवस्था समाप्त हो गई।
संक्षेप में गिरने के कारण
- विदेशी दबाव से शोगुन की कमज़ोरी दिखी।
- असमान संधियों और महँगाई से ग़ुस्सा बढ़ा।
- ताक़तवर हान और समुराई नया नेतृत्व चाहते थे।
- राज्य और समुराई की पैसे की समस्या दशकों से बढ़ रही थी।
मुख्य सूत्र और परिभाषाएँ
- 1853: एदो के पास विदेशी जंगी जहाज़; 1854: कनागावा की संधि (2 बंदरगाह)
- 1858: लगभग 5 बंदरगाह; बाह्यक्षेत्रीय अधिकार, आयात-शुल्क पर नियंत्रण नहीं
- सोन्नो जोई = सम्राट का सम्मान, विदेशियों को भगाओ
- 1866: सात्सुमा-चोशू गठबंधन; 1867: शोगुन ने सत्ता लौटाई; 1868: नई सरकार
- बाहर का दबाव + भीतर का ग़ुस्सा -> शोगुन व्यवस्था का पतन
हल किए गए उदाहरण
1. 1853 में पहले विदेशी जंगी जहाज़ों से 1868 में शोगुन राज के अंत तक कितने साल बीते?
1868 - 1853 = 15 साल।
2. 1858 की संधियों को असमान क्यों कहा गया?
विदेशियों पर उनके अपने कौंसल मुक़दमा चलाते थे, जापानी अदालतें नहीं, और जापान अपना आयात कर तय नहीं कर सकता था। ये बंदिशें केवल जापान पर थीं, इसलिए सौदा बराबरी का नहीं था।
3. समझाओ कि व्यापार से आम लोगों में ग़ुस्सा कैसे बढ़ा।
रेशम और चाय बहुत मात्रा में विदेश बिकी, इसलिए घर में कम और महँगी हुई। रोज़ की चीज़ों के दाम बढ़े, और सस्ते विदेशी कपड़े से स्थानीय बुनकरों को चोट पहुँची। कई लोगों को लगा कि हालत बिगड़ी है और उन्होंने शोगुन को दोष दिया।
आम गलतियाँ
- यह कहना कि 1853 से पहले जापान पूरी तरह बंद था। वह कुछ द्वारों से सख़्त नियंत्रण में व्यापार करता था।
- तारीख़ें गड़बड़ाना: कनागावा 1854, हैरिस संधि 1858, शोगुन की सत्ता वापसी 1867।
- यह सोचना कि जापान ने बराबरी से संधियाँ कीं। वे असमान थीं।
- मान लेना कि केवल विदेशी दबाव ही कारण था। जापान के भीतर दाम, क़र्ज़ और ताक़तवर हान भी मायने रखते थे।